कुमार गंधर्व: गायन का अद्भुत लोकतंत्र

टॉक थ्रू एडिटोरियल डेस्‍क

8 अप्रैल 1924 को कर्नाटक बेलगांव के सुलेभावी गांव में जन्‍म लेने वाले शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमकली को हम कुमार गंधर्व के नाम से जातने हैं। प्रशंसक उन्‍हें प्रेम और सम्‍मान से कुमार जी के नाम से संबोधित करते हैं। कवि सर्वेश्‍वरदयाल सक्‍सेना ने कुमार जी को गाते हुए प्रत्‍यक्ष देखा-सुना तो जो भाव अनुभव हुआ वह इस तरह व्‍यक्‍त हुआ:

दूर-दूर तक सोई पडी थीं पहाड़ियां
अचानक टीले करवट बदलने लगे
जैसे नींद में उठ चलने लगे।

एक अदृश्य विराट हाथ बादलों-सा बढ़ा
पत्थरों को निचोड़ने लगा
निर्झर फूट पड़े
फिर घूमकर सब कुछ रेगिस्तान में
बदल गया।

शांत धरती से
अचानक आकाश चूमते
धूल भरे बवंडर उठे
फिर रंगीन किरणों में बदल
धरती पर बरस कर शांत हो गए।

तभी किसी
बांस के बन में आग लग गई
पीली लपटें उठने लगीं,
फिर धीरे-धीरे हरी होकर
पत्तियों से लिपट गईं।

पूरा वन असंख्य बांसुरियों में बज उठा,
पत्तियां नाच-नाचकर
पेड़ों से अलग हो
हरे तोते बन कर उड़ गईं।

लेकिन भीतर कहीं बहुत गहरे
शाखों में फंसा
बेचैन छटपटाता रहा
एक बारहसिंहा
सारा जंगल कांपता हिलता रहा
लो वह मुक्त हो
चौकड़ी भरता
शून्य में विलीन हो गया
जो धमनियों से
अनंत तक फैला हुआ है।

शिवपुत्र सिद्धरामैया कोमकली जन्मजात गायक थे। उन्‍होंने पुणे में प्रोफेसर देवधर और अंजनी बाई मालपेकर संगीत की शिक्षा प्राप्त की। मगर उनकी सांगीतिक दक्षता शिक्षण से परे थी। यही कारण है कि उनका नाम कुमार गंधर्व पड़ गया. गंधर्व यानी उस लोक का कुमार। शिवपुत्र के कुमार गंधर्व बनने के पीछे भी एक गाथा है, एक यात्रा जो शास्‍त्रीय से हो कर लोक संगीत तक पहुंची। उन्‍हें टीबी थी और पत्नी भानुमती ने देवास के एक स्कूल में पढ़ा कर गृहस्‍थी भी चलाई और कुमार जी का इलाज भी करवाया। इस दौरान कुमार जी जिस घर में रहे वह देवास शहर के लगभग बाहर था। घर में रहते हुए कुमार जी ने वहां लगने वाले हाट में आई देशज महिलाओं से मालवी लोकगीत सुने. यह जैसे लोक से साक्षात्‍कार था। यही समय एक शास्‍त्रीय गायक के लोक के स्‍पर्श से अवधूत हो जाने का समय भी।

कुमार गंधर्व ने मालवा के नाथ-योगियों और आमजनों के कंठ से गूंजती कबीर-वाणियों को सीखना-समझना शुरू किया. प्रकृति ने उन्हें मानो इसीलिए देवास भेजा था। नाथपंथी बाबा शीलनाथ 1901 से लेकर 1920 तक बीस साल देवास में रहे थे। शीलनाथ निर्गुण भजनों में डूबे रहनेवालों में से थे। देवास में शीलनाथ बाबा की धुनी पर कुमार साहब रात को आकर बैठते थे और घुमक्कड़ योगियों के साथ कबीर भजन गाते और सुनते थे। संदर्भ है कि अपना गाया प्रसिद्ध भजन ‘सुनता है गुरु ग्यानी’ भी उन्होंने सबसे पहले अपने घर भिक्षा मांगने आए ऐसे ही एक योगी के मुंह से सुना था। एक और प्रसिद्ध भजन ‘उड़ जाएगा हंस अकेला’ तो उन्हें शीलनाथ की धुनी पर टंगे एक आईने पर उकेरा हुआ मिला था।

आप कुमार गंधर्व को गाते हुए सुनिए यूं लगता है जैसे एक योगी तान भर रहा है। स्‍पष्‍ट आवाज और अलौकिक रागदारी जहां बहुत कुछ बूझा जा सकता है और जो अबूझ सा छूटता है वह आनंद के लोक में ले जाकर छोड़ता है। उस आवाज की उंगली पकड़े-पकड़े हम अपनी खास यात्रा पर निकल पड़ते हैं। कुमार गंधर्व के गायन के बारे में लिखने के लिए तमाम उपमाएं, बिम्‍ब कम जान पड़ते हैं। जैसे कबीर को बार-बार पढ़ने पर अलग-अलग अर्थ खुलते हैं, वैसे ही कुमार जी का गायन बार-बार सुनने पर विशिष्‍ट अनुभव ही होता है।

अपनी आलोचना पुस्‍तक ‘कविता और समय’ में प्रख्‍यात कवि अरुण कमल एक प्रसंग का जिक्र करते हैं। यह प्रसंग उन्‍होंने अशोक वाजपेयी से सुना था. प्रसंग कुछ यूं है कि कुमार गंधर्व गा रहे थे और मर्मज्ञ बैठे थे। अचानक लगा कि कुमारजी ने एक गलत सुर लगा दिया है। उन्होंने जो चुना वह उनका अपना चयन था, लेकिन सुर गलत लगा था। बाद में लोगों ने पूछा, यह सुर गलत कैसे हो गया? कुमारजी ने कहा, मैं देख रहा था कि सुर दरवाजे पर बहुत देर से खड़ा है, दरवाजा खटखटा रहा है, और मैं रोक रहा था, अभी तुम्हारा आना ठीक नहीं है. बहुत देर से खटखटा रहा था तो मैंने कहा, आ जाओ और वह आ गया।

गायन का यह लोकतंत्र अद्भुत है। जो एक इंसान को, एक शास्‍त्रीय गायक को लोक का बेलौस साधक बनाता है।

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