राजरंग

ठाकरे जी और दवे जी के कुनबे का रजनीश

राज्यसभा सीट पर बीजेपी ने तीन का चयन कैसे किया इस पर फिर कभी बात करेंगे। आज मैं यह बता सकता हूँ कि रजनीश अग्रवाल का चयन क्यों उपयुक्त है।

ठाकरे जी और दवे जी के कुनबे का रजनीश जारी >

कांग्रेस रामचंद्र गुहा से कहना तो चाहती होगी- यू टू ब्रूटस!

पत्रकार करण थापर को हाल ही में दी गई एक भेंटवार्ता में प्रसिद्ध इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक रामचंद्र गुहा ने राहुल गाँधी के बारे में अपने कांग्रेस विरोधी विचार फिर से व्यक्त किये।

कांग्रेस रामचंद्र गुहा से कहना तो चाहती होगी- यू टू ब्रूटस! जारी >

77 प्रतिशत दवा निर्माता कर रहे किसी न किसी मानक का उल्लंघन

भारत वैश्विक स्वास्थ्य सेवाओं में नेतृत्व का दावा करता है। अमानक दवा का यह संकट भारत के लिए न केवल आंतरिक बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साख की चुनौती बन गया है।

77 प्रतिशत दवा निर्माता कर रहे किसी न किसी मानक का उल्लंघन जारी >

ताक पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश, मौत कैसे रूके?

हिरासत में मौत एक सार्वभौमिक समस्या है और इसे बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के बाद उल्लंघन का सबसे क्रूर रूप माना गया है।

ताक पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश, मौत कैसे रूके? जारी >

नेपाल का जेन ज़ी विद्रोह: अगर संविधान को मजबूत कर दे…

केवल सत्ता परिवर्तन या उपद्रव की तीव्रता काफी नहीं; ज़रूरत है कि इस चेतना को संस्थागत रूप देने की।

नेपाल का जेन ज़ी विद्रोह: अगर संविधान को मजबूत कर दे… जारी >

मुख्यमंत्री को मुस्लिम टोपी पहनाने की कोशिश क्यों हुई?

धर्म और राजनीति को मिलाना खतरनाक है। इस्लाम भी कहता है कि किसी पर धर्म थोपना गुनाह है। नीतीश कुमार का टोपी न पहनना उनका व्यक्तिगत अधिकार है। इसे चुनावी हथियार बनाना न तो बिहार के मुसलमानों के हित में है और न ही लोकतंत्र के लिए सही संदेश है।

मुख्यमंत्री को मुस्लिम टोपी पहनाने की कोशिश क्यों हुई? जारी >

सोचिए, माखन चोर नाम में क्‍या रखा है?

हमारे विनम्र अभिमत में भगवान श्रीकृष्ण के प्रादुर्भाव से लेकर उनके चरित्र और लीलाओं पर किसी अलग ढंग से विचार करना ना तो समीचीन कहा जाएगा और ना ही उचित।

सोचिए, माखन चोर नाम में क्‍या रखा है? जारी >

आखिर क्‍यों बदले बदले से ओम बिरला नजर आते हैं…

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पिछले कार्यकाल में जिस तरह विपक्षी सांसदों पर सख्ती दिखाते थे, वैसा इस बार देखने को नहीं मिल रहा है। जहां पहले निष्कासन का डर था, वहीं अब केवल समझाने-बुझाने की कोशिश होती है।

आखिर क्‍यों बदले बदले से ओम बिरला नजर आते हैं… जारी >

‘कठघरे में साँसें’: क्‍यों पढ़ें यह किताब?

यह किताब इसलिए पढ़ी जानी चाहिए कि यह लेखक की आत्‍मकथा नहीं उस शहर भोपाल की आत्‍मकथा है जिसने अपने बाशिंदों को बदहवास सड़कों पर दौड़ते देखा है, जो आज भी उन्‍हें दम तोड़ते देख रहा है।

‘कठघरे में साँसें’: क्‍यों पढ़ें यह किताब? जारी >