कलारंग

आवाज़ों के जुगनू: लफ़्ज़ों का ये दरिया अच्छा लगता है…

वे आवाजें जो रोज हमारे संग होती हैं, उनके पीछे की यात्रा को जानना बेहद दिलचस्प है। आवाज़ की दुनिया के सितारों की बातों में जीवन का फलसफा दिखाई देता है।

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खाली हुई जगह को जीवन से जोड़ने की कोशिश करती सीरीज

फिल्म बहुत हौले से बताती है कि जीवन में जब कुछ बुरा हो उससे भागने के बजाय उसका सामना किया जाना चाहिए। जिस दिन ये समझ लिया, उस दिन बहुत कुछ सुलझ सँवर जाता है।

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नए पत्तों की आहट से भी शाख़ें भीग जाती हैं…

एक लिहाज से यह शेर प्रकृति के ज़रिए परमात्मा तक भी पहुंचता है। इश्तियार के ज़रिए इंसान की रूह तक भी पहुंचता है और इशारों के ज़रिए क़ुदरत के इरादों तक भी पहुंचता है।

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Guru Dutt: मानो जीवन का आख़िरी शॉट बड़े मनोयोग से रचा हो

एक असंतुष्ट, अतृप्त मन लिए गुरु दत्त अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गए हैं जो उनके चाहने वालों को आज भी उन से जोड़े हुए है।

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अलका सरावगी के उपन्यास को अधूरा ही छोड़ दिया…

इस उपन्यास के प्रारंभ में ही यह नजर आने लगा कि लेखिका ज़िद की हद तक अपने पात्रों को कभी बोलने नहीं देती; वह खुद उनके भीतर बैठकर लगातार खुद ही बोलती रहती है।

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मैं तिरी खोज में तुझ से भी परे जा निकला…

किसी राह पर चलने से पहले हर राहगीर यह तय करता है कि उसे कहां पहुंचना है। उसकी निगाहों में उसकी मंज़िल होती है। वह हर पड़ाव को तय करने के बाद मंज़िल की ओर देखता है।

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बशीर बद्र की यादों के उजाले: प्यार के एहसास को ओढ़ना, सलीके से गुजरना

अल्फ़ाज़ से मोहब्बत सीखाने वाले, एहसासों को शायरी में ढाल देने वाले बशीर बद्र साहब को अलविदा। आपकी शायरी हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगी। उनकी शायरी की खासियत को रेखांकित करते एक खास शेर की बात-

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बशीर ब्रद से वह मुलाकात… जब चेहरा किताबी था सामने  

पद्मश्री बशीर बद्र को देखकर इस बात का इत्‍मीनान हुआ कि आज भी हिंदुस्तान में उर्दू की एक अजीम हस्ती मौजूद है। हालांकि मुलाकात एक तरफा ही थी। डॉ. साहब अपनी ही दुनिया में खोए हुए थे। 

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कविता की क्यारियों के बीच मोहब्बत का दरिया और इंसानियत का जल

कवि की चिंता इस समाज में हो रहे परिवर्तन, आम आदमी के प्रति बढ़ती जा रही उपेक्षा से है। रतन चौहान अपनी कविताओं में कठपुतलियों में बदलते समाज के प्रति चिंतित हैं।

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