बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो

इतना सुंदर दृश्य है कि तबियत खुश हो गई। बस पानी की सुंदरता है और उसी में पक्षी भी हैं। सूर्योदय हुआ, पानी में से निकलता हुआ सूरज, बस देखते ही बनता है।

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रात को तब्दील होते रोशनी में देखिए…

लफ़्ज़ी मआनी पर ग़ौर करें तो यह शेर नाउम्मीदी में उम्मीद जगाने की बात करते हुए कहता है कि हर आशा निराशा में ही मौजूद होती है।

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नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात

सामने खेतों में कुछ दूर पर बड़ी भीड़भाड़ दिखी, पाण्डे रोकता रहा वहाँ मत जाओ, गंदा है, जाने लायक नहीं है। महेश जी और मैं उसी तरफ चल दिए।

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स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी

अवधेशानंद जी ने धर्म काे सेवा कर्म से जोड़ते हुए यही कहा कि पूजा-अर्चना वास्तव में धर्म नहीं है, वरन् मनुष्य की सेवा ही वास्तविक धर्म है

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उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था…

बहुत मधुर यात्रा रही मेरी भोपाल की। अपनों को खुशी दे पाने से बड़ी खुशी शायद दूसरी नहीं होती और ऐसा महसूस हुआ इस बार मैं यह कर पाया।

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आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी

जो मेरी पहचान बन गई थी-जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे यानी वकालत, वह छूट गई। आज ऑफिस में ताला लगकर नाम पट्टिका हट जाएगी वहाँ से।

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चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है

शराबी है इसलिए भगत जी उससे बात नहीं करते, फिर भी शराबी भाई का प्रेम देखने लायक है। सब कुछ इतना सरल और नैसर्गिक है कि अनायास ही श्रद्धा होने लगती है।

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उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर

आज के दिन का मेरे जीवन में बड़ा महत्व है। सफलता के साथ मेरे पारिवारिक जीवन में एक नया मोड़ आया था। आज से ही व्यक्तिगत त्रासदी के बीज अंकुरित हुए थे।

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वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…

मुझे पूरे समय यह अहसास था कि जो मैं कर रहा हूं, मैं उसके लिए नहीं बना हूं। वकालत का पेशा एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं है।

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भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…

लोग सोचते हैं कि मेरा कितना कुछ छूट रहा है, परंतु मुझे लगता है कि मैं कितना कुछ पा रहा हूं, अर्जित कर रहा हूं। जिस तरह से सबका स्नेह मिल रहा है उससे जो खोया है, वह तो मायने ही नहीं रखता।

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