निगाहे-मस्त ने ठुकरा दिया ज़माने को…
इस शेर को अगर तसव्वुफ़ के रंग में रंगा हुआ समझा जाए तो यह एक नए ज़ाविए की तरफ़ ले जाता है। यहां सुबु, जाम , ख़ुम और मयखाना इश्तियारे की तरह इस्तेमाल किए गए हैं।
निगाहे-मस्त ने ठुकरा दिया ज़माने को… जारी >
इस शेर को अगर तसव्वुफ़ के रंग में रंगा हुआ समझा जाए तो यह एक नए ज़ाविए की तरफ़ ले जाता है। यहां सुबु, जाम , ख़ुम और मयखाना इश्तियारे की तरह इस्तेमाल किए गए हैं।
निगाहे-मस्त ने ठुकरा दिया ज़माने को… जारी >
श्री महाकालेश्वर के दर्शन हेतु शारीरिक एवं मानसिक मजबूती दोनों जरूरी है क्योंकि ये वही देव हैं जो अपने ही शादी में रानी मैनावती की परिक्षा लेने में भी पीछे नहीं रहे।
जो जितने ज्यादा दिन ‘ठहरेगा’, उतना ज्यादा बिल देना पड़ेगा जारी >
कब और कैसे शादी सिर्फ दो इंसानों की भावनात्मक शारीरिक आवश्यकता से आगे बढ़कर इच्छाओं की लंबी फेहरिस्त हो गई?
लोग शादी क्यों करते हैं? जारी >
भोपाल की यह विरासत को सरकार की नजरे इनायत दरकार है, क्योंकि यह शर्म की नहीं, गर्व की विरासत है, क्योंकि सबसे पहले यहीं ब्रिटिश यूनियन जैक को हटा कर तिरंगा फहराया गया था।
जहां से शुरु हुआ था संदेशों का सफर, जहां फहराया पहली बार तिरंगा जारी >
श्री महाकालेश्वर के दर्शन हेतु शारीरिक एवं मानसिक मजबूती दोनों जरूरी है क्योंकि ये वही देव हैं जो अपने ही शादी में रानी मैनावती की परिक्षा लेने में भी पीछे नहीं रहे।
उज्जैन में पग-पग पर बाबा महाकाल की महिमा का दर्शन जारी >
उमा-महेश सृष्टि का पहला/ जोड़ा है, उमा-महेश की ही/ जुड़ी सबसे पहले गाँठ/ और धरती ने पहली बार बिआह-सुख निहारा…
शिव फूल रचते हैं और गौरा सुगंध भरती हैं जारी >
शिव ने कोई भी ऐसा काम नहीं किया जिसका औचित्य उस काम से ही न ठहराया जा सके। आदमी की जानकारी में वह इस तरह के अकेले प्राणी हैं जिनके काम का औचित्य अपने-आप में था।
मात खा रहे शिव ने कुछ ऐसा किया कि स्तब्ध रह गई पार्वती जारी >
फ़ैज़ जिस दौर में रच रहे थे तब दुनिया फासीवाद, नाजीवाद और पूंजीवाद की तिहरी मार झेल रही थी। इन तमाम परिदृश्यों ने उनकी पहले से सचेत सामाजिक नागरिक समझ को वंचित और मजलूम तबकों के साथ अधिक गहराई से जोड़ दिया।
इश्क़, इंक़लाब और फ़ैज़ जारी >
मेरे लिए यह सिर्फ एक मैदान नहीं है। इसी मैदान ने यह अहसास कराया कि कोई सावर्जनिक स्थल सत्ता से सवाल पूछने और सबको इंसाफ मिले, बराबरी का दर्जा मिले, इसकी खोज के मंच भी हो सकते हैं।
मेरे अहसासों का इकबाल मैदान, जम्हूरियत और शाहीन जिसकी शान जारी >
शेर जीवन की उस हक़ीक़त को भी बयां कर रहा है जिसमें कई सारे अक़्स हमें नज़र आते हैं। आगे की ओर जाने की इच्छा से कुछ क़दम पीछे लौटना बुरा नहीं होता।
लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले… जारी >