इश्क़, इंक़लाब और फ़ैज़
फ़ैज़ जिस दौर में रच रहे थे तब दुनिया फासीवाद, नाजीवाद और पूंजीवाद की तिहरी मार झेल रही थी। इन तमाम परिदृश्यों ने उनकी पहले से सचेत सामाजिक नागरिक समझ को वंचित और मजलूम तबकों के साथ अधिक गहराई से जोड़ दिया।
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