झाड़ ऊँचे और नीचे चुप खड़े हैं आँख भींचे…

हम हर साल 21 मार्च को विश्व कविता दिवस मनाते हैं। यह सुनकर जरा अजीब लगता है और सहज सवाल उठता है कि क्‍या कविता के लिए भी कोई एक दिन का उत्‍सव मनाया जाना चाहिए? असल में, यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने तय किया है कि ” काव्यात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से भाषाई विविधता का समर्थन करने और लुप्तप्राय भाषाओं को सुनने के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से” कविता दिवस बनाया जाना चाहिए। जाहिर है, इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया भर में कविता के पढ़ने, लिखने, छपने और शिक्षण को बढ़ावा देना है। यह “राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कविता आंदोलनों को नई पहचान और प्रोत्साहन देना” की पहल है। इस दिन को हम अपनी पसंदीदा कविता साझा कर यादगार बनाना चाहते हैं।

इस क्रम में पढ़िए हमारे स्‍तंभकार मनीष माथुर की पसंदीदा कविता :

गांधी दर्शन को जीने वाले भवानी प्रसाद मिश्र आम जनता की भाषा और जीवन के कवि हैं। ‘सतपुड़ा के जंगल’ उनकी प्रतिनिधि कविता मानी जाती है। वन पर लिखी गई ऐसी रचना दूसरी मिलना कठिन है। ऐसी रचना जिसमें प्रकृति की संपूर्ण सुंदरता को एक चितेरे की भांति उकेरा गया है। वे आपातकाल में विरोध में खड़े हुए थे। वे आपातकाल के दौरान प्रतिदिन नियम पूर्वक सुबह, दोपहर और शाम तीनों समय प्रतिरोध की कविताएं लिखा करते थे। जो बाद में ‘त्रिकाल सन्ध्या’ नामक पुस्तक में प्रकाशित भी हुईं।

सतपुड़ा के जंगल

नींद में डूबे हुए-से,
ऊँघते अनमने जंगल।

झाड़ ऊँचे और नीचे
चुप खड़े हैं आँख भींचे;
घास चुप है, काश चुप है
मूक शाल, पलाश चुप है;
बन सके तो धँसो इनमें,
धँस न पाती हवा जिनमें,
सतपुड़ा के घने जंगल
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

सड़े पत्ते, गले पत्ते,
हरे पत्ते, जले पत्ते,
वन्य पथ को ढँक रहे-से
पंक दल में पले पत्ते,
चलो इन पर चल सको तो,
दलो इनको दल सको तो,
ये घिनौने-घने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

अटपटी उलझी लताएँ,
डालियों को खींच खाएँ,
पैरों को पकड़ें अचानक,
प्राण को कस लें कपाएँ,
साँप-सी काली लताएँ
बला की पाली लताएँ,
लताओं के बने जंगल,
नींद में डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

मकड़ियों के जाल मुँह पर,
और सिर के बाल मुँह पर,
मच्छरों के दंश वाले,
दाग़ काले-लाल मुँह पर,
बात झंझा वहन करते,
चलो इतना सहन करते,
कष्ट से ये सने जंगल,
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

अजगरों से भरे जंगल
अगम, गति से परे जंगल,
सात-सात पहाड़ वाले,
बड़े-छोटे झाड़ वाले,
शेर वाले बाघ वाले,
गरज और दहाड़ वाले,
कंप से कनकने जंगल,
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

इन वनों के ख़ूब भीतर,
चार मुर्ग़े, चार तीतर,
पाल कर निश्चिंत बैठे,
विजन वन के बीच बैठे,
झोंपड़ी पर फूस डाले
गोंड तगड़े और काले
जब कि होली पास आती,
सरसराती घास गाती,
और महुए से लपकती,
मत्त करती बास आती,
गूँज उठते ढोल इनके,
गीत इनके गोल इनके।

सतपुड़ा के घने जंगल
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

जगते अँगड़ाइयों में,
खोह खड्डों खाइयों में
घास पागल, काश पागल,
शाल और पलाश पागल,
लता पागल, वात पागल,
डाल पागल, पात पागल,
मत्त मुर्ग़े और तीतर,
इन वनों के ख़ूब भीतर।

क्षितिज तक फैला हुआ-सा,
मृत्यु तक मैला हुआ-सा
क्षुब्ध काली लहर वाला,
मथित, उत्थित ज़हर वाला,
मेरु वाला, शेष वाला,
शंभु और सुरेश वाला,
एक सागर जानते हो?
ठीक वैसे घने जंगल,
नींद मे डूबे हुए-से
ऊँघते अनमने जंगल।

धँसो इनमें डर नहीं है,
मौत का यह घर नहीं है,
उतर कर बहते अनेकों,
कल-कथा कहते अनेकों,
नदी, निर्झर और नाले,
इन वनों ने गोद पाले,
लाख पंछी, सौ हिरन-दल,
चाँद के कितने किरन दल,
झूमते बनफूल, फलियाँ,
खिल रहीं अज्ञात कलियाँ,
हरित दूर्वा, रक्त किसलय,
पूत, पावन, पूर्ण रसमय,
सतपुड़ा के घने जंगल
लताओं के बने जंगल।

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