अभिव्यक्ति की आजादी सबसे कीमती, इसे दबाया नहीं जा सकता

  • जे.पी.सिंह

वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के विशेषज्ञ

गणतंत्र को इतना अस्थिर नहीं होना चाहिए कि शायरी या कॉमेडी से डोलने लगे

सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि 75 साल पुराने गणतंत्र को इतना अस्थिर नहीं होना चाहिए कि शायरी या कॉमेडी से डोलने लगे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक संरक्षण व्यक्त किए गए विचारों की लोकप्रिय स्वीकृति पर निर्भर नहीं है। विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमारे संविधान के आदर्शों में से एक है। नागरिक होने के नाते पुलिस अधिकारी संविधान का पालन करने के लिए बाध्य हैं और वे अधिकारों को बनाए रखने के लिए बाध्य हैं। कलात्मक अभिव्यक्ति और असहमतिपूर्ण विचारों के खिलाफ आपराधिक कानून के बढ़ते दुरुपयोग की कड़ी निंदा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अफसोस जताया कि आजादी के 75 साल बाद भी हमारी पुलिस मशीनरी संवैधानिक गारंटियों से अवगत नहीं है।

इमरान प्रतापगढ़ी को राहत देते हुए न्यायालय ने विरोधी विचारों के प्रति समाज की असहिष्णुता को फटकारते हुए कहा, “हमारे गणतंत्र के 75 साल बाद भी हम अपने मूल सिद्धांतों पर इतने कमजोर नहीं दिख सकते कि किसी ग़ज़ल या किसी भी तरह की कला या मनोरंजन जैसे स्टैंड-अप कॉमेडी के मात्र पाठ से विभिन्न समुदायों के बीच दुश्मनी या घृणा पैदा होने का आरोप लगाया जा सके। इस तरह के दृष्टिकोण को अपनाने से सार्वजनिक क्षेत्र में विचारों की सभी वैध अभिव्यक्तियां बाधित होंगी, जो एक स्वतंत्र समाज के लिए बहुत ज़रूरी है।”

जस्टिस अभय एस ओक और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने कहा कि यह मामला दिखाता है कि हमारे संविधान के अस्तित्व में आने के 75 साल बाद भी राज्य की कानून प्रवर्तन मशीनरी संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत नागरिकों को दिए गए महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार के बारे में या तो अनभिज्ञ है या इस मौलिक अधिकार की परवाह नहीं करती है।

विचाराधीन नज़्म “ऐ खून के प्यासे” थी, जिसका पाठ वीडियो सांसद ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर साझा किया था। गुजरात पुलिस ने FIR दर्ज की, जिसमें आरोप लगाया गया कि शायरी ने समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा की, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई और यह राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक है। FIR में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 196, 197(1), 302, 299, 57 और 3(5) के तहत दंडनीय अपराध दर्ज किए गए। फैसले में एफआईआर में लगाई गई प्रत्येक धारा की जांच की गई और पाया गया कि उनमें से कोई भी धारा लागू नहीं होती।

इमरान प्रतापगढ़ी की कविता वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले ने भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को एक नई दिशा दी है। जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ गुजरात पुलिस द्वारा दर्ज एक एफआईआर को खारिज कर दिया। यह एफआईआर उनकी एक कविता को लेकर थी, जिसे सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया था। इस फैसले ने न सिर्फ इमरान प्रतापगढ़ी को राहत दी, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल कायम की, जो अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए साहित्य, कला, या व्यंग्य का सहारा लेते हैं।

इस फैसले का महत्व तब और बढ़ जाता है, जब हम इसे हाल के दिनों में स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा के मामले से जोड़कर देखते हैं। कुणाल कामरा पर महाराष्ट्र सरकार ने एक पैरोडी शो में डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे को “गद्दार” कहने के लिए मानहानि का केस दर्ज किया है। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कुणाल जैसे मामलों में भी एक नई उम्मीद जगा सकता है। इस न्यूज रिपोर्ट में हम इमरान प्रतापगढ़ी के मामले की पूरी कहानी, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने, और कुणाल कामरा के केस की गहराई से पड़ताल करेंगे।

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ, जब कांग्रेस सांसद और मशहूर शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने 3 जनवरी 2025 को अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक कविता पोस्ट की। इस कविता का बैकग्राउंड म्यूजिक “ऐ खून के प्यासे बात सुनो” था, और इसे बीजेपी शासित गुजरात सरकार पर एक तंज के रूप में देखा गया। कविता में इमरान ने हिंसा और अन्याय के खिलाफ अपनी बात रखी थी, लेकिन गुजरात पुलिस ने इसे धर्म, नस्ल, या समुदाय के आधार पर शत्रुता को बढ़ावा देने वाला माना। इसके बाद उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 153ए के तहत एफआईआर दर्ज की गई। इस धारा में धर्म, जाति, या समुदाय के आधार पर वैमनस्य फैलाने के लिए सजा का प्रावधान है। इमरान ने इस एफआईआर को रद्द करने के लिए गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 17 जनवरी को हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। हाई कोर्ट का कहना था कि जांच अभी शुरुआती चरण में है, और इस स्तर पर एफआईआर को रद्द करना ठीक नहीं होगा। इसके बाद इमरान ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में इस मामले की सुनवाई की और फैसला सुरक्षित रख लिया। 28 मार्च 2025 को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए एफआईआर को खारिज कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में कई अहम बातें कहीं, जो भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को एक नई ऊंचाई देती हैं। कोर्ट ने कहा कि विचारों और भावनाओं की स्वतंत्र अभिव्यक्ति एक स्वस्थ सभ्य समाज का हिस्सा है। जस्टिस ओका और जस्टिस भुइयां ने अपने फैसले में लिखा, “भले ही बड़ी संख्या में लोग किसी के द्वारा व्यक्त किए गए विचारों को नापसंद करते हों, लेकिन व्यक्ति के विचार व्यक्त करने के अधिकार का सम्मान और संरक्षण किया जाना चाहिए। कविता, नाटक, फिल्म, व्यंग्य, और कला सहित साहित्य मानव जीवन को अधिक सार्थक बनाते हैं।” कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सम्मानजनक जीवन का आधार बताया। अनुच्छेद 21 हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, और कोर्ट ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ते हुए कहा कि इसके बिना सम्मानजनक जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि हर आलोचना को शत्रुता या खतरे के रूप में नहीं देखा जा सकता। जजों ने गुजरात पुलिस की संवेदनहीनता पर सवाल उठाए और कहा कि पुलिस को अभिव्यक्ति की आजादी के मायने समझने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट के रवैये की भी आलोचना की। हाई कोर्ट ने एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निचली अदालतों को भी संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आना होगा। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि अभिव्यक्ति पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध वास्तव में उचित होने चाहिए, न कि काल्पनिक या बाधा बनने वाले। जजों ने यह भी स्वीकार किया कि कभी-कभी बोले या लिखे गए शब्द उन्हें व्यक्तिगत रूप से पसंद न आएं, लेकिन उनकी जिम्मेदारी संविधान और उसके मूल्यों को बनाए रखने की है।

यह फैसला कई मायनों में ऐतिहासिक है। सबसे पहले, यह अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में एक मजबूत संदेश देता है। भारत में पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया पर व्यक्त विचारों के लिए लोगों पर मुकदमे दर्ज होने के मामले बढ़े हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह रुख उन लोगों के लिए राहत की बात है, जो अपनी बात कहने के लिए कविता, व्यंग्य, या कला का सहारा लेते हैं।

दूसरा, यह फैसला साहित्य और कला के माध्यम से अभिव्यक्ति करने वालों को मजबूती देता है। कोर्ट ने साफ कहा कि कविता, नाटक, फिल्म, और व्यंग्य जैसे माध्यम मानव जीवन को समृद्ध करते हैं। यह उन लोगों के लिए एक बड़ा समर्थन है, जो अपनी रचनात्मकता के जरिए सामाजिक मुद्दों पर बात करना चाहते हैं।
तीसरा, इस फैसले ने पुलिस और निचली अदालतों को एक सख्त संदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध लगाने में उचित-अनुचित का ध्यान रखना होगा। हर आलोचना को खतरे के रूप में देखना गलत है, और पुलिस को संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। यह फैसला उन मामलों में एक मिसाल बन सकता है, जहां आलोचना या व्यंग्य को अपराध मान लिया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा का मामला भी सुर्खियों में है। कुणाल कामरा ने हाल ही में मुंबई के खार इलाके में एक स्टैंड-अप शो किया था, जिसमें उन्होंने महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे पर एक पैरोडी सॉन्ग के जरिए तंज कसा। इस सॉन्ग में उन्होंने बॉलीवुड फिल्म “दिल तो पागल है” के गाने को आधार बनाया और बिना नाम लिए शिंदे को “गद्दार” कहकर उनकी राजनीतिक यात्रा पर व्यंग्य किया। यह टिप्पणी शिंदे के उस फैसले से जुड़ी थी, जिसमें उन्होंने 2022 में उद्धव ठाकरे की शिवसेना से बगावत कर बीजेपी के साथ गठबंधन किया और महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम बने।

कुणाल के इस व्यंग्य से शिवसेना (शिंदे गुट) के कार्यकर्ता भड़क गए। उन्होंने मुंबई के खार इलाके में स्थित यूनिकॉन्टिनेंटल होटल और हैबिटेट स्टूडियो में तोड़फोड़ की, जहां यह शो शूट हुआ था। शिवसेना कार्यकर्ताओं ने इसे एकनाथ शिंदे का अपमान बताया और कुणाल से माफी की मांग की। मामला यहीं नहीं रुका। शिवसेना विधायक मुराजी पटेल की शिकायत पर कुणाल के खिलाफ एमआईडीसी पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई। बीएनएस की धारा 353(1)(बी) के तहत यह केस दर्ज हुआ, जिसमें मानहानि और सार्वजनिक शांति भंग करने का आरोप लगाया गया। इसके बाद मुंबई पुलिस ने कुणाल को समन भेजा और 25 मार्च 2025 को उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया। हालांकि, कुणाल उस समय मुंबई में नहीं थे, इसलिए समन उनके पिता को सौंपा गया और व्हाट्सएप के जरिए भी उन्हें सूचित किया गया।
कुणाल कामरा ने इस पूरे विवाद पर साफ रुख अपनाया। उन्होंने माफी मांगने से इनकार कर दिया और कहा कि उनकी टिप्पणी अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में आती है। कुणाल ने सोशल मीडिया पर लिखा, “भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हमारे अधिकार का उपयोग केवल शक्तिशाली और अमीर लोगों की चापलूसी करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, भले ही आज का मीडिया हमें अन्यथा विश्वास दिलाए। एक शक्तिशाली सार्वजनिक व्यक्ति की कीमत पर मजाक को बर्दाश्त न कर पाने की आपकी अक्षमता मेरे अधिकार की प्रकृति को नहीं बदलती।” कुणाल ने यह भी कहा कि अगर कोर्ट उन्हें माफी मांगने का आदेश देती है, तो वे माफी मांग लेंगे, लेकिन अपनी मर्जी से ऐसा नहीं करेंगे। इस बीच स्टैंडअप कॉमेडियन कुणाल कामरा को महराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे पर पैरोडी सॉन्ग मामले में बड़ी राहत मिल गई है। मद्रास हाईकोर्ट ने कुणाल कामरा को 7 अप्रैल तक अंतरिम अग्रिम जमानत दे दी है।

सुप्रीम कोर्ट का इमरान प्रतापगढ़ी के मामले में दिया गया फैसला कुणाल कामरा के केस से कई मायनों में मिलता-जुलता है। दोनों ही मामलों में अभिव्यक्ति की आजादी का सवाल है। इमरान की कविता को गुजरात पुलिस ने शत्रुता को बढ़ावा देने वाला माना, जबकि कुणाल के व्यंग्य को शिवसेना ने अपमानजनक और मानहानि करने वाला करार दिया। दोनों ही मामलों में सत्तारूढ़ दलों ने अपने खिलाफ आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया और कानूनी कार्रवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी सबसे कीमती अधिकार है, और इसे “असुरक्षित लोगों” के डर से दबाया नहीं जा सकता।

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