यादों का उजास

- बंसीलाल परमार
प्रख्यात फोटोग्राफर
मैं बंशीलाल परमार गंगधार नामक कस्बे में जन्मा जो राजस्थान के झालावाड़ जिले में है। कभी इसे पूरब का शहर कहते थे। दशपुर (मंदसौर) को पश्चिम का शहर कहा जाता है। जो आज भी सांस्कृतिक, पुरातात्विक, प्राकृतिक तथा साहित्यिक संपदाओं से समृद्ध जिला मुख्यालय है। वैसे, इस जिले से गहरा रिश्ता होने की वजह मेरा ननिहाल है जो कि मंदसौर जिले सूंठी नामक गाँव में था। मेरे मामा स्व. रंगलाल देवड़ा गांधीवादी विचारधारा के व्यक्ति थे।
1973 में मेरी नियुक्ति मंदसौर जिले में ऐरा गांव में हुई तब मंदसौर से एक शासकीय रिश्ता बना। 1979 में सुवासरा स्थानांतरित होकर आया तब मेरी अभिरुचि चित्रकला में हुई। यह वर्ष मेरे जीवन का एक टर्निंग पाइंट था। यहां मैं यावलकर आर्ट स्कूल में गया तथा मेरी भेंट कामरेड स्व. लक्ष्मीनारायण पवार साहब से हुई जिनके बारे में आम लोगों की राय कुछ भिन्न थी। श्रद्धेय गुरुजी से न केवल कला की शिक्षा पाई बल्कि उनके सानिध्य में अपने भीतर एक राजनीतिक समझ भी विकसित हुई।
वे मंदसौर के ही निवासी थे। उनके द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष मंदसौर जिले की महान हस्तियों से परिचित हुआ। इनमें भी आरएस मिश्रा जी, हेमंत त्यागी जी, बाबूलाल विषपायी जी, शिवकुमार मिश्र जी, कामरेड शिवनारायण कश्यप जी, आदि। यह सूची लंबी होती गई और इन्हीं के माध्यम से वैचारिक कारवां बढ़ता गया। इन सबसे रूबरू होने का दूसरा एक माध्यम ओर था। यह माध्यम था छजलानी जी का ‘नईदुनिया’। यह अखबार मेरे लेखन एवं फोटोग्राफी की पाठशाला रही। इस अखबार ने पाठकों को रचनाकार बनने का अवसर दिया। उसमें एक कॉलम था, पत्र संपादक के नाम। उसमें प्रकाशित होने वाले पत्रों में गली-गटर की समस्या न होकर राजनीति और साहित्यिक चेतना भरे पत्र होते थे। इनमें स्व. कनकमल जैन, हरिशंकर उपाध्याय, प्रो. रतनलाल जैन के साथ ही श्रद्धेय बाबूलाल जी विषपायी के ज्वलंत प्रश्न प्रकाशित होते थे।
श्रद्धेय विषपायी जी से प्रथम भेंट मंदसौर में आयोजित एक फोटो प्रदर्शनी के दौरान हुई जो गांधी चौराहा स्थित नगरपालिका के हॉल में लगी थी। वहां विराट व्यक्तित्व एवं कद लिए एक महानुभाव ने आकर कहा, मैं बाबूलाल विषपायी। मेरे हाथ श्रद्धानत होते हुए उनके चरणों की ओर बढ़े। तभी रोकते हुए वे बोले, मुझे बुजुर्ग बना रहो हो? उन्होंने मुझे गले से लगा लिया। उनकी वैचारिकता से तो मैं परिचित ही था। उस समय उनकी सहजता से भी परिचित हो गया।
बचपन में पढ़ी मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’ में एक संवाद पढ़ा था जो मेरे जीवन में वेद वाक्य से ज्यादा महत्व रखता है। वह वाक्य है, “बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?” ऐसे कुछ लोग ही मिले जिन्हें इस वाक्य की फ्रेम में उपयुक्त पाया। इन गिने-चुने लोगों में विषपायी जी भी हैं जिन्होंने निर्भिक व निडर होकर वह सुब कुछ लिखा जो सच्चाई और ईमान का पक्षधर था। उनका यही गुण उनकी महानता प्रदर्शित करता है। लेखक, साहित्यकार, बुद्धिजीवी और पत्रकार एक तरह से विपक्ष का नेता होता है जो हर तात्कालिक सत्ता से ईमान की बात का आग्रह करता है। वह हमेशा जन पक्ष में होता है। फिर चाहे सत्ता किसी भी दल की हो। उनके समय कांग्रेस, जनसंघ और बीजेपी के दिग्गज नेता मंदसौर जिले का प्रतिनिधित्व करते थे। तब भी वे अविचलित हो ईमान की बात लिखते रहे। कबीर की भांति बिलकुल खरा लिखते रहे।
वे समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं में केवल लिखते ही नहीं थे अपित किसी अन्य के लिखे पर अपनी सहमति, असहमति, प्रशंसा व्यक्त करने में कंजूसी नहीं करते थे। फिर चाहे लेखक उनसे वरिष्ठ हो या कनिष्ठ। वे लेखन पर प्रतिक्रिया देने के साथ सुझाव भी देते, आवश्यक मार्गदर्शन भी करते थे। उनकी पैठ राजनीति तक ही सीमित नहीं थी, अपितु उनकी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिरुचियां भी थीं। मंदसौर में उन्होंने पुराने-नए रचनाकारों के लिए मंच स्थापित किए तथा गोष्ठियों के माध्यम सभी को एकत्र किया।
मेरा उनके साथ पत्र व्यवहार चला करता था। एक बार मैंने सुवासरा की एक राजनीतिक घटना की जानकारी लैंड लाइन फोन द्वारा उन्हें दी। अगले दिन मैंने देखा कि उन्होंने स्थानीय अखबार में वह जानकारी मेरे नाम का उल्लेख कर प्रकाशित करवा दी थी।
मैं उस समय सरकारी सर्विस में था। मैं डरा और फोन किया कि सर आपने क्या किया? मेरे नाम के उल्लेख के साथ समाचार दे दिया। उन्होंने कहा कि लेखन के क्षेत्र में डर-डर कर कब तक रहोगे? पूरी निर्भिकता के साथ उतरोगे तभी सार्थकता है। बस, उसदिन से मेरा डर खत्म हो गया। सच के साथ खड़े रहने का साहस मिला इसका श्रेय विषपायी जी को है।

मेरी उनसे अंतिम भौतिक भेंट 2005 में हुई थी। तब स्व. सतीश दुबे (इंदौर) के उपन्यास ‘डेरा बस्ती का सफरनामा’ के लिए एक समीक्षा बैठक स्व. कृष्णसिंह चिडार साहब के घर हुई थी। इस बैठक में स्व कमल जी जैन, असद अंसारी, विक्रम विद्यार्थी सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। उनके उद्बोधन के समय मैंने उनका एक फोटो खींचा जो समूह के साथ था। इस फोटो में उनके हाथ में पत्रिका थी। यह फोटो उनके पठनशील व्यक्तित्व को दर्शाता है। यह फोटो आज भी मेरे संग्रह में है।
कुल मिलाकर विषपायी जी ने कबीर की तरह जीवन जिया। उनके पत्र और साहित्य लेखन का इतना प्रभाव रहा है कि उनके निधन पर प्रख्यात कहानीकार-संपादक राजेद्र यादव ने ‘हंस’ के संपादकीय के एक कालम में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की थी। ऐसे प्रेरणा पुरुष को नमन।

