- डॉ. नंदिनी बासिष्ठा, एसजीटी विश्वविद्यालय, गुरुग्राम (हरियाणा) में एसोसिएट प्रोफेसर
- डॉ. सोविक मुखर्जी, सेंट ज़ेवियर्स विश्वविद्यालय, कोलकाता में अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर
पिछले एक दशक में अमेरिका और वेनेज़ुएला के संबंध ऐसे संघर्ष का रूप ले चुके हैं, जिसमें पारंपरिक युद्ध की घोषणा तो नहीं हुई, पर उसके विनाशकारी प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। न तो कोई औपचारिक युद्ध है और न ही सीधे सैन्य संघर्ष, लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों, कूटनीतिक अलगाव, राजनीतिक मान्यता की लड़ाई और सैन्य संकेतों ने वेनेज़ुएला को गंभीर मानवीय संकट और क्षेत्रीय अस्थिरता की ओर धकेल दिया है।
अमेरिका–वेनेज़ुएला टकराव यह दिखाता है कि आधुनिक संघर्ष अब टैंकों और हथियारों से नहीं, बल्कि वित्तीय प्रणालियों, व्यापार प्रतिबंधों और कथानक (नैरेटिव) की शक्ति के माध्यम से लड़े जा रहे हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह टकराव संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक बहुपक्षीय व्यवस्था की सीमाओं को उजागर करता है और वैश्विक शांति के भविष्य पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
संघर्ष की जड़ें
इस टकराव की जड़ें विचारधारा, भू-राजनीति और प्राकृतिक संसाधनों के नियंत्रण में निहित हैं। ह्यूगो चावेज़ के नेतृत्व में वेनेज़ुएला का समाजवाद और संसाधन-राष्ट्रवाद की ओर झुकाव, विशेषकर तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण और सामाजिक कल्याण योजनाओं में तेल राजस्व का उपयोग, लंबे समय से लैटिन अमेरिका में अमेरिकी प्रभाव को चुनौती देता रहा।
निकोलस मादुरो के कार्यकाल में यह टकराव और तीव्र हो गया। विवादित चुनाव, लोकतांत्रिक संस्थाओं का क्षरण, आर्थिक कुप्रबंधन और राजनीतिक दमन के आरोपों ने अंतरराष्ट्रीय आलोचना को जन्म दिया। अमेरिका ने इसे लोकतंत्र और मानवाधिकारों की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि वेनेज़ुएला ने इसे अपनी संप्रभुता पर हमला और साम्राज्यवादी दबाव बताया। धीरे-धीरे यह विवाद व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों में बदल गया, जिसने वेनेज़ुएला की तेल निर्यात क्षमता, अंतरराष्ट्रीय वित्त तक पहुँच और सार्वजनिक संस्थानों को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
आधुनिक युद्ध का नया हथियार
इस टकराव की सबसे प्रमुख विशेषता आर्थिक प्रतिबंधों का व्यापक उपयोग है। आज की वैश्विक राजनीति में प्रतिबंध सैन्य हस्तक्षेप का विकल्प बन चुके हैं, विशेषकर तब जब प्रत्यक्ष युद्ध राजनीतिक रूप से महँगा हो। हालाँकि प्रतिबंधों का उद्देश्य राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव बनाना बताया जाता है, लेकिन वास्तविकता में इनका सबसे गहरा असर आम नागरिकों पर पड़ा है। वेनेज़ुएला में महँगाई, आवश्यक वस्तुओं की कमी, सार्वजनिक सेवाओं का पतन और बड़े पैमाने पर पलायन इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। घरेलू नीतिगत विफलताओं के साथ-साथ प्रतिबंधों ने इस संकट को और गहरा किया है।
यह स्थिति एक गंभीर नैतिक और कानूनी प्रश्न खड़ा करती है। संयुक्त राष्ट्र की अनुमति के बिना लगाए गए एकतरफा प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानून और सामूहिक सुरक्षा की भावना के विपरीत हैं। जब आर्थिक उपाय आम नागरिकों के जीवन को प्रभावित करने लगें, तो वे शांतिपूर्ण दबाव नहीं, बल्कि आर्थिक युद्ध का रूप ले लेते हैं।
बहुपक्षीयता की सीमाएँ
संयुक्त राष्ट्र, जिसे वैश्विक शांति और सुरक्षा का संरक्षक माना जाता है, वेनेज़ुएला संकट में प्रभावी भूमिका निभाने में असफल रहा है। सुरक्षा परिषद में राजनीतिक ध्रुवीकरण, प्रस्तावों पर वीटो की आशंका और महाशक्तियों के टकराव ने निर्णय प्रक्रिया को पंगु बना दिया। महासचिव एंतोनियो गुतारेस द्वारा 2021 में प्रस्तुत “आवर कॉमन एजेंडा” में जिस वैश्विक शासन संकट की बात की गई थी, वेनेज़ुएला उसका स्पष्ट उदाहरण है। महासभा और मानवाधिकार परिषद की चर्चाएँ और रिपोर्टें प्रभावशाली तो हैं, पर उनके पास लागू करने की शक्ति नहीं है। परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र की भूमिका मानवीय सहायता तक सीमित रह गई है।
वैश्विक व्यवस्था पर प्रभाव
अमेरिका–वेनेज़ुएला टकराव समकालीन वैश्विक व्यवस्था की गहरी खामियों को उजागर करता है। अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का चयनात्मक उपयोग, कमजोर देशों की सीमित आवाज़ और बहुपक्षीय संस्थाओं पर घटता विश्वास इस संकट के प्रमुख संकेत हैं। यह टकराव दिखाता है कि कैसे छोटे देश महाशक्तियों की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में फँस जाते हैं। साथ ही यह वैश्विक राजनीति में बढ़ते ध्रुवीकरण और बहुपक्षीय सहयोग के क्षरण को भी रेखांकित करता है।
वैश्विक शांति की नई परिभाषा
इस संकट से यह स्पष्ट होता है कि इक्कीसवीं सदी में शांति को केवल युद्ध की अनुपस्थिति के रूप में नहीं देखा जा सकता। आर्थिक स्थिरता, राजनीतिक समावेशन और संस्थागत विश्वसनीयता भी शांति के अनिवार्य तत्व हैं। आवश्यक है कि प्रतिबंधों को बहुपक्षीय निगरानी में लाया जाए, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार पर गंभीर विचार हो और क्षेत्रीय व वैकल्पिक कूटनीतिक मंचों को अधिक सक्रिय किया जाए। अमेरिका–वेनेज़ुएला टकराव आधुनिक वैश्विक संघर्षों की प्रकृति को समझने का महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह दिखाता है कि आर्थिक युद्ध भी उतना ही विनाशकारी हो सकता है जितना सैन्य संघर्ष। यदि बहुपक्षीय संस्थाओं को सशक्त नहीं किया गया और संवाद को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो ऐसे ‘मौन संघर्ष’ वैश्विक स्थिरता को लगातार कमजोर करते रहेंगे।
संयुक्त राष्ट्र चार्टर और ‘सस्टेनिंग पीस’ एजेंडा हमें याद दिलाते हैं कि शांति दबाव से नहीं, बल्कि संवाद, सहयोग और समावेशी विकास से निर्मित होती है। बिना इस दृष्टिकोण के, वेनेज़ुएला जैसे संकट भविष्य में और गहराते रहेंगे।

