14 मिनट सितार दिल को छलनी करता है और तबला विचारों को बेचैन

  • पंकज शुक्‍ला

जी हां, मैं भी आदमी हूं।
आपके जैसा आदमी।
आदमी की भीड़ में जैसा होता है
वैसा ही सामान्‍य सा एक आदमी
जिसके हाथ में काम कम है
जिसके सिर पर छाया भी कुछ कम है
जिसके पेट में भूख है
मगर झोले में सामान भी कम है।
मैं भी आपके जैसा आदमी ही हूं

नहीं, नहीं।
मैं आपके जैसा कहा हूं,
मैं वैसा नहीं हूं,
जो उठाते है हाथ
जो तोड़ते हैं इरादे
कभी कभी तो वे हाथ भी नहीं उठाते
जुबां से ही तोड़ते है ख्‍वाब
वे जो पसीजते नहीं
कि मैं यदि तड़पूं सड़क पर
कि भूख से दम तोड़ दें मेरे बच्‍चे
मैं वैसा बिल्‍कुल भी नहीं हूं।

मैं तो वह हूं जो
मरता है हादसों में
मैं तो वह हूं जो
रहता है सफर में
मैं तो वह हूं जिसकी जिंदगी
खर्च होती है साधन जुटाने में
हां, मैं भी आम आदमी हूं
मगर आपके जैसा नहीं
मैं तो वह हूं जो
मरता है जीने के लिए …

अगर वह बोल सकता तो शायद ऐसा ही कुछ कहता। मगर उसका न बोला गया इससे भी ज्‍यादा तीखा है। गर्म शीशा जैसे कानों में घोल गया उसका चुप रहना। वह चीखता है, मगर उसकी कातर चीख हमारे कानों तक नहीं पहुंचती। वह भागते-भागते गिर पड़ता है, मगर उसकी दौड़ हम तक नहीं पहुंचती। हम सिर्फ दर्शक हैं। अपने आसपास घट रही जिंदगी और बढ़ रही मौत के मूक दर्शक। इसीलिए जब बात खत्‍म होती है तो हमारे जेहन में कुछ दृश्‍य टंगे रह जाते हैं और कुछ आवाजें, वे आवाजें जो हमारे कानों से सुनी ही नहीं बल्कि अहसास ने उन्‍हें भर लिया है। वह आवाज जो शोर में दबती नहीं बल्कि कोरस में भी पहचान ली जाती है, मुख्‍य गायक स्‍वर की तरह। यह आवाज चीख है, यह आवाज सहायता के लिए पुकार है, यह आवाज प्रार्थना का स्‍वर है मगर सब मूक। बिना शब्‍द। अभिव्‍यक्ति विहीन। सिर्फ हमारे आसपास घटता सच जिससे हम जितना मुंह चुरा रहे हैं, वह उतना ही उजागर हो रहा है।

यह सिर्फ मेरे भाव हैं। हो सकता है, आप इससे ज्‍यादा महसूस करें और स्‍वयं को मुझसे अधिक असहाय पाएं। हो सकता है आप मझसे ज्‍यादा मुंह चुराएं।

यह सब तब होगा जब आप एक छोटी सी फिल्‍म देखेंगे, ‘ग्वावा– ए मॉब लिंचिंग’। युवा रंगकर्मी राहुल शर्मा (राहुल्य) के निर्देशन में बनी इस फिल्‍म का निर्माण अंतरराष्ट्रीय सितार वादिका स्मिता नागदेव ने किया है। स्मिता जी ने निर्माण ही नहीं किया बल्कि उनके शास्‍त्रीय संगीत ने इस मूक लघु फिल्म को संगीत दिया है।

अगर यह कहूं कि यह फिल्‍म निर्देशक राहुल शर्मा की जितनी है उतनी ही संगीत निर्देशक स्मिता नागदेव की भी है। यह उनका संगीत ही है जिसने फिल्‍म में संवाद की जगह ले ली। उन्‍होंने फिल्म के बैकग्राउंड स्कोर को राग ‘मियां की तोड़ी’ पर रचा है। जब वाद्यों की भीड़ से संगीत का वातावरण बनाए जाने का चलन बलवती है उस युग में सितार और तबले का उपयोग बस। स्मिता जी ने इन दो वाद्यों के साथ ऐसा काम किया है। दृश्य और संगीत का ऐसा तालमेल कि पीड़ा, करुणा, निरूपायता और असहायता के भाव शब्दों के बिना ही दर्शक तक पहुंच जाते हैं। ऐसा नहीं है कि इससे पहले ऐसा संगीत नहीं रचा गया या एक-दो वाद्यों से कल्‍पनातीत प्रभाव न रचा गया हो, लेकिन मेरा अनुभव है कि स्मिता जी के संगीत से बनी लघु फिल्‍म ‘ग्वावा– ए मॉब लिंचिंग’ में बजते सितार के तार दिल को छलनी करते हैं और तबले पर पड़ी हर थाप विचारों को बेचैन। संगीत निरीहता, भय, आक्रोश और कातरता का ऐसा माहौल बुनता है कि पूरी फिल्‍म में शब्‍दों का न होना अखरता नहीं है। और यह आहत मन, बेचैनी देर तक हमें सामान्‍य नहीं होने देती।

निर्देशक राहुल शर्मा ने कुछ जगह कुछ शब्‍दों, कुछ वाक्‍यों का प्रयोग किया है। यह प्रयोग फिल्‍म को अलग तल पर ले जाता है। जब ये शब्‍द कान में पड़ते हैं तब सहसा याद आता है कि अच्‍छा, अब तक फिल्‍म में संगीत ही शब्‍दों का काम कर रहा था। बताना जरूरी है कि सितार पर स्‍वयं स्मिता जी थीं जबकि तबला प्रख्‍यात वादक अशेष उपाध्‍याय ने बजाया। जैकी भावसार, अंकिता पाल और नन्‍ही भूमि मीना मुख्‍य भूमिकाओं में हैं। इसका लेखन और निर्देशन राहुल शर्मा ‘राहुल्‍य’ का है। इस फिल्‍म के बारे में पड़ताल करने से हमें पता चलता है कि इसे बेहद सीमित संसाधनों से कुछ घंटों में फिल्‍माया गया है। लेकिन प्रभाव के मामले में यह किसी बड़े बजट की फिल्मों को टक्‍कर देती है। राहुल शर्मा के निर्देशन का कौशल यही है कि पूरी फिल्‍म पर उनकी पकड़ हर एंगल से दिखाई देती है। और अभिनय इसके संगीत, कथ्‍य व संदेश की ही तरह दमदार। तीनों मुख्‍य कलाकारों ने बिना बोले, भंगिमाओं से वह सब संप्रेषित कर दिया जो अक्‍सर कह कर भी नहीं किया जा सकता है। तीनों मुख्‍य कलाकारों जैकी भावसार, अंकिता पाल और नन्‍ही भूमि मीना का आंगिक अभिनय एक पल भी यह महसूस नहीं होने देता कि वे कलाकार हैं, बल्कि वे उस भूमिका के सच्‍चे किरदार ही अनुभूत होते हैं।

जब फिल्‍म को लेकर इतनी बातें कह रहा हूं तो इसकी कथा को जानने की जिज्ञासा होती है। कथा का खुलासा करना फिल्‍म के साथ ईमानदारी नहीं होगी। यूं भी मेरी दृष्टि में कथा से ज्‍यादा फिल्‍म का कथानक यानी नेरेटिव मायने रखता है। अनुभव के आधार पर दर्शक कई बार फिल्‍म के बारे में अनुमान लगाता है मगर फिल्‍म कुछ ओर ही दिखाती हैै।और जब कथा दर्शकों के अनुमान को सही सिद्ध कर रही होती है तब लगता है, काश, ऐसा न हो। अनुमान गलत साबित हो जाए। मगर ऐसा तो न होना था, न होता है। निर्देशक राहुल शर्मा (राहुल्य) कहते हैं, “ग्वावा-ए मॉब लिंचिंग’ हमारे समय की एक मूक चीख है। हर भीड़ हिंसा की घटना के पीछे एक इंसान, एक परिवार और एक अधूरी कहानी होती है। हम चाहते थे कि दर्शक सिर्फ देखें नहीं, बल्कि महसूस करें।”

याद करेंगे तो इस की पृष्‍ठभूमि में बहुत सी फिल्‍में याद आ सकती है। जैसे, मुझे समानांतर सिनेमा की आधार फिल्‍मों में से एक ‘द बाइसिकल थीव्‍स’ याद आई। इसे देखते हुए मुझे बुद्धदेव दासगुप्‍ता की‍ फिल्‍म ‘बाघ बहादुर’ याद आई। और याद आए, ‘बाघ बहादुर’ के अभिनेता पवन मल्‍होत्रा। लेकिन, इन फिल्‍मों से ज्‍यादा वे खबरें, अखबार कतरनें और न्‍यूज चैनल की रिपोर्ट्स याद आईं जो हमारे समय पर हावी होती क्रूरता को बयान करती हैं।

सच ही है, इस फिल्‍म को देखते हुए सिर्फ महसूस किया जा सकता है। महसूस किया जा सकता है कि शाब्‍दिक, मानसिक और शारीरिक हिंसा किस तरह हमारे जीवन को प्रभावित कर रही है। यह हमारी मानवता को इतने स्‍तरों पर प्रभावित कर चुकी है कि अब जैसे किसी भी बात पर हम चौंकते नहीं हैं। पहले सोचा जाता था, कि समय के साथ समाज प्रगति करेगा। रूढि़यों से मुक्‍त हो कर अधिक संवेदनशील बनेगा। मगर अब तो लगता है, मानवता के ह्रास में समाज विपरित गामी हो गया है। इस अवसान पर मौन ही रहा जा सकता है। यह 14 मिनट की फिल्‍म ऐसा ही बिंब रचती है कि दर्शक मौन हो जाता है। फिल्‍म की कथा तो ठीक, इसका संगीत, इसका फिल्‍मांकन और इसके अभिनेता मिल कर ऐसा अनुभव देते हैं, कि समूचा वर्तमान हमारी पीठ पर लदा बोझ सा लगने लगता है। मन चाहता है, इस बोझ को उतार फेंके लेकिन हम छटपटा कर रह जाते हैं। किए का बोझ कब उतरा है भला?

फिल्‍म खत्‍म होते-होते कई विचार छोड़ जाती है। एक खास सवाल भी, आखिर ऐसा कब तक होता रहेगा?

प्रतिष्ठित खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 2025 में आधिकारिक स्क्रीनिंग के लिए चुनी गई ‘ग्वावा– ए मॉब लिंचिंग’ को निर्माता व निर्देशक ने खासतौर से हमें उपलब्‍ध करवाया है। इसे यहां देखा जा सकता है।

फिल्‍म देखने के लिए कृपया क्लिक कीजिए

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