
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
डूबने और उभरने के बीच का सिलसिला
लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले,
ग़ुरूब होने का मतलब ज़वाल थोड़ी है।
अपने अनोखे लब-ओ-लहजे और स्त्री की भावनात्मक – मनोवैज्ञानिक समस्याओं को पेश करते हुए उर्दू शाइरी को एक नई दिशा दे कर बेबाक लहजा इस्तेमाल करती, इंतहाई जुरअत के साथ अत्याचार और हिंसा के ख़िलाफ़ प्रतिरोध करती नज़र आती शाइरा परवीन शाकिर का यह शेर जज़बात-ओ-ख़्यालात पर शर्म-ओ-हया के पर्दे नहीं डालता बल्कि तजुर्बात की सदाक़त, ख़ुशगवार ताज़ा बयानी का सुबूत भी देता है। इसमें ज़िंदगी की हक़ीक़त, तजुर्बे की तहदारी और तरबियत का असर भी नज़र आता है। बहुत सादगी के साथ ज़िंदगी के फलसफे के क़रीब ले जाते शेर को समझना ज़रूरी है।
लफ़्ज़ी मआनी पर ग़ौर करें तो यह शेर बहुत सीधी बात कह रहा है कि उभरने से पहले डूबना पड़ता है। डूबना पतन का पर्याय नहीं होता। यह स्वाभाविक रूप से समझ आने वाली बात है। इसमें कोई उलझन नज़र नहीं आती। अब इसके पीछे चल रहे अर्थों की पड़ताल करते हैं। जिस तरह हर शेर के पीछे, हर मिसरे के पीछे या कहें हर लफ़्ज़ के पीछे एक ध्वनि चलती रहती है। वह ध्वनि उसके अर्थो को कई-कई दिशाओं की तरफ़ ले जाती है। हर शब्द के आसपास उसका ध्वनि क्षेत्र होता है। इस तरह यह शेर भी अपने हर लफ़्ज़ में एक ध्वनि क्षेत्र निर्मित कर रहा है। यहां कहने को बहुत साधारण सी बात कही गई है कि उभरने के पहले डूबना पड़ता है। इसे इस तरह समझें कि सृजन से पहले विसर्जन ज़रूरी है। अपने आप को ख़त्म करने पर ही अपने आप की पहचान हो पाती है। जो अपना सब कुछ ख़त्म करने का का हुनर नहीं जानता उसे कभी सब कुछ नहीं मिलता है।
हज़रत अमीर ख़ुसरो ने तो बहुत पहले इसी बात को इस अंदाज में कह दिया था “खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वाकी धार। जो उबरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।” जो बगैर डूबे उभरने की कोशिश करते हैं उनका डूबना तय होता है मगर जो डूबने की मंशा रखते हैं उन्हें ही उभरना नसीब होता है। यह कहते भी है कि ज़िंदगी एक सागर के समान है। इसके जितना भीतर जाते जाएंगे नायाब मोती हाथ लगाते जाएंगे। विद्वान यह कह भी गए हैं कि एक ज़िंदगी को समझने के लिए कई-कई ज़िंदगियों की ज़रूरत होती है। यानी डूबने पर जो गहराई, जो अनुभव और ज्ञान प्राप्त होता है, वही किसी व्यक्ति के उभरने का संकेत देता है, उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है।यहां डूबने का अर्थ समाप्त होना नहीं है। किसी चीज में डूबना इंसान को ख़त्म नहीं करता बल्कि बेहतर बनाता है। कोई फनकार यदि अपने फन के भीतर नहीं डूबेगा तो वह अच्छा फनकार नहीं बन सकता।
कोई कलमकार यदि अपने क्षेत्र की बारीकियों से वाक़िफ नहीं होगा तो वह अच्छी रचनाएं नहीं लिख पाएगा। मुशाहिदे और मुताअले की बात यहां ग़ौरतलब है। एक मिसरा लिखने के पहले बहुत कुछ सोचना होता है। जिस विषय पर लिख रहे हैं उसके इर्द-गिर्द उठ रही ध्वनियों को सुनना होता है। गहन चिंतन करना पड़ता है, तब कहीं जाकर कागज़ पर एक पंक्ति उभरती है। इसके विपरीत अगर सतही तौर पर कुछ लिखा जाए तो वह असरदार नहीं होता। शेर में भी यही बात कही गई है। जिस भी क्षेत्र में आप मुब्तिला हैं उसमें बहुत गहराई से जाने की ज़रूरत है। आप जितने गहराई में जाएंगे, उतने उभर कर बाहर आएंगे। गहराई आपको ख़त्म नहीं करती, अवनति की तरफ नहीं ले जाती, वह उन्नत करके बाहर लौटाती है। पानी के भीतर आप जितना जाएंगे, पानी आपको उतना ही ऊपर की तरफ फेंकेगा और किनारे पर बैठने वाले उम्र भर किनारे पर ही बैठे रह जाएंगे। इस लिहाज से यह शेर ज़िंदगी के फलसफे को समझा रहा है।
शेर जीवन की उस हक़ीक़त को भी बयां कर रहा है जिसमें कई सारे अक़्स हमें नज़र आते हैं। आगे की ओर जाने की इच्छा से कुछ क़दम पीछे लौटना बुरा नहीं होता। बहुत ऊपर तक जाने के लिए कुछ वक़्त नीचे बने रहना बुरा नहीं होता। कामयाबी हासिल करने के लिए कुछ वक़्त ठहरना, ठहर कर सोचना, सोच कर अपनी राह बनाना और अपनी बनाई राह पर आगे बढ़ना भी ग़लत नहीं होता। गहराइयों में जाना ज़िंदगी का अंत नहीं है, वह ज़िंदगी की एक नई शुरुआत है। यह शेर इसी शुरुआत का हौसला दे रहा है।
संपर्क: 9827084966

