
- प्रेमशंकर शुक्ल
कवि-साहित्यकार
महाशिवरात्रि पर विशेष
प्रेमशंकर शुक्ल हमारे समय के महत्वपूर्ण कवियों में शुमार होते हैं। उनकी कविताओं में लोक अपने भरपूर विन्यास के साथ उपस्थिति होता है। प्रेमशंकर शुक्ल ने शिव और शक्ति को लेकर कविताएं लिखी हैं जो उनके विभिन्न काव्य संग्रहों में संकलित हैं। इन्हीं रचनाओं में से कुछ का पुनर्पाठ:
महादेवी-महादेव
शिव फूल रचते हैं
और गौरा सुगंध भरती हैं
गौरा गीत गाती हैं
और ताल देते हैं शिव
जीवन के राग सिरजती हैं महागौरी
और कर्पूरगौर अनवरत सहेजते हैं करुणा
दुनियादारी को बूझते हैं महादेव
और महादेवी चीन्ह लेती हैं :
गूढ़ से गूढ़ चालाकियाँ
सृष्टि का पहला प्रेम और दाम्पत्य हैं उमा-महेश
गझिन बुनते हुए परस्परता
उदात्त को किए हुए असीम-अथाह
प्रेम ने यहीं पूर्णता पाई
विवाह, परिवार का यहीं से हुआ श्रीगणेश
विकसित है यहीं
सम्पूर्णानंद!
आद्या-आशुतोष के घर में ही है यह :
कि मिली हुई है पूरम्पूर
जगत को जगह। (‘असमाप्त आरम्भ ‘ से)
आदि पालथी
चित्र की आदि पालथी में बैठे हैं शिव-पार्वती
आदि पालथी में
शिव की जाँघ पर पार्वती का पाँव
पार्वती की जाँघ पर शिव का पाँव
आधे होंठ से पार्वती-आधे होंठ से शिव
पूरी करते हैं मुस्कान
अर्धनारीश्वर संधि की आदि संज्ञा
कर्ता अभिन्न क्रिया
संधि स्मित-आनन
रचता रहता है निरभ्र-नभ
निहार-निहार जिसे कविता
होती रहती है निर्मलमति
पार्वती के हाथ में जो कमल फूल है
उठती रहती है उसमें शिव-पार्वती की
साथ-हँसी की सुगंध
नाभि में भी अँधेरे की
आधी गहराई शिव की है
आधी पार्वती की
आदिसंधि है यह
ध्रुवसत्य की तर्ज पर कह सकते हैं हम जिसे
ध्रुवसंधि
पार्वती पूरी हैं-पूरे हैं शिव
पार्वती को शिव पूरा कर रहे हैं
शिव को पार्वती
पूरक से पूर्णता है
और पूर्णता में साथ का समरस
पार्वती चारुकेशी हैं
जटाजूट मंडित हैं शिव
शीश से पाँव तक अभिराम छवि
अर्थात छवि-रूप में
कविता की लय बनती रहती है
और अलंकृत होता रहता है आदिप्रेम
सम्पुट-काय गौरी-महादेव
जिसमें संकेतित यही कि-
हर स्त्री में आधा पुरुष है
हर पुरुष में आधी स्त्री
हम से सधा है जब तक यह संतुलन
हम पृथ्वी पर बोझ नहीं हैं! (“जन्म से ही जीवित है पृथ्वी” से)
श्वेत-लाल
परकम्मा का कैलाश
श्वेत शिव
लाल हैं उमा
हमारी आँख के लिए दो फूल- श्वेत और लाल
अपना बायाँ दे दिया है श्वेत ने लाल को
श्वेत को लाल ने अपना दायाँ
परस्पर से एक होने की कविता-कथा है यह
समरस-सम्पूर्ण
मंत्र दर्शनार्थी है
महागौरी-महादेव का
दर्शन में मंत्र
मंत्रमुग्ध।
सुखानुभूति
शिव सावन भीजते हैं
गौरा गीत गाती हैं
गौरा के पावस-गीतों से
लहलहा उट्ठा है सारा पर्वत-प्रदेश
गाते-गाते अचानक ठहरकर गौरा सोचती हैं –
बाघम्बर कहाँ सुखाउँगी अब
गौरा की चिन्ता समझ प्यार में शिव
मन ही मन मुस्कराते हैं
और बरसते सफेद बादल में शिव की मुस्कान भीजती है!
नाच-नाच कर भीजते शिव को निहार-निहार
गौरा गाती हैं मीठे – तरल गीत
मलंग-मन कविता भी नाचती है
और भीजते हैं सारे रस छन्द अलंकार
पूरित मन लिए भाव और अर्थ
भाषा में सुखानुभूति जीते हैं
शिव की मस्ती में
बूँदें बावरी हो बरसती हैं खूब
शिव सावन भीजते हैं
गौरा गीत गाती हैं
अपनी बेटी नदियों के पानी-घर
पहाड़ों ने भी
भर दिए हैं। (‘ शहद लिपि’ से)
अर्धनारीश्वर
शिव-पार्वती की अर्धनारीश्वर छवि
मुझे अद्वितीय लगती है
पूरी मुस्कान में
आधी मुस्कान शिवा की-आधी शिव की
कविता ने अभी तक इतनी न्यारी और सुंदर
छवि नहीं पायी है
पूरे आवर्त में
आधी नाभि शिव की, आधी शिवा की
छलकते गंग-जल ने अपने लिए
इतनी सुन्दर जगह नहीं पायी है
क्रिया में
एक हाथ शिवा का, एक शिव का
सृष्टि की आत्मा और शरीर पूरी करता रहता है
सृष्टि की चित्रशाला में
अर्धनारीश्वर छवि में ही हैं सम्पूर्ण रंग-तरंग
अर्धनारीश्वर छवि निहारना
सौन्दर्य-छन्द का सम्पूर्ण अलंकार दर्शन है
आधे शिव-आधी शिवा परस्पर पूरक में ही हैं पूर्ण
सन्धि से ही सामर्थ्य है अलौकिक अथाह
( जीवन-संधि के दरकने पर
इसीलिए कवि की छाती फटती है!)
संज्ञा ने शिवा-शिव के मुश्तरका रूप को-
साझा मन को
अर्धनारीश्वर कह
शास्त्र या वाणी के मुँह पर
सुगन्ध का फूल रख दिया है।
एकनिष्ठ
सावन की फुहार शिव की हँसी लगती है
उज्ज्वल आकाश शिव का रूप
निहारते हुए इन्हें मन भीजता है
निर्मल होती है निगाह
सावन गा-गा कर पत्तियाँ हरी होती हैं
स्त्रियाँ परी
स्त्रियों के पारी-पारी से गाने से
लोक को मिठास मिलती है
जलहरी में चढ़ा अक्षत और खीरा का फूल
लोकमंगल रच रहा है
बूँद-बूँद भीजती है माई नर्मदा
नर्मदा-जल से
शिव-अभिषेक करते तुम्हारे हाँथों ने ही बचाया
मेरी आयु में जल
ओंकारेश्वर-घाट की तुम्हारी मुस्कुराहट
मुझे एकनिष्ठ करती है!
शिवालय
शिव-अभिषेक करता है खीरा का फूल
शिव-अभिषेक करता है कनेर का फूल
दोनों फूल के पीले का संवाद है
जलहरी में
शिव फूलों की बात सुन
सुगंध-मन मुसुकाते हैं
पार्वती शिव की मुस्कान से भीजते
शिवालय में
सावन की बारिश निहारती रहती हैं!
लय-विलय
जलहरी में जल नाचता है
डमरू में अनहद नाद
शिव कण्ठ में नाग
नाचता है
जटाजूट में गंग-तरंग
शिव की दूधिया मुस्कान निहार
गौरा का मन नाचता है
देखि-देखि यह
कैलाश नाचता है
पानी कर-करके अपने को
नाचती है कैलाश की बरफ
हर तरफ नाचता है
मानसरोवर के हंसों की नाच देख
नाचती है भाषा
और कविता की लय में बढ़त बनती है
सावन-मेघ थिरक
उमड़-घुमड़ बरसते हैं जल-रस
और नाचते हैं बूँद-बुँदानी
डमरू में अनहद नाद नाच-नाच कर
कविता की लय में
गद्य का विलय कर देता है !
उमा-महेश
उमा-महेश सृष्टि का पहला
जोड़ा है, उमा-महेश की ही
जुड़ी सबसे पहले गाँठ
और धरती ने पहली बार बिआह-सुख निहारा
शिव की जाँघ पर उमा और जटाजूट में गंग
कविता का आदि आभूषण है
शिव काव्य पुरुष हैं
और सारी लय-गति
उमा से है
अर्धनारीश्वर में ही सम्पूर्ण हुआ है सौन्दर्य
साथ का ऐसा विहंगम काय-मन ही
महामिलन रचता है । और रूप-रस से
भर जाता है कविता का कलेजा
आज नाकुछ बात पर टूट रहे हैं जब दाम्पत्य
घट रही है परस्पर सहने-समझने की सामर्थ्य
आदि दम्पति उमा-महेश
अपनी अप्रतिम महाकाव्यात्मक छवि से
हमारे मन में सम्बन्ध बचाते रहते हैं
सम्बन्ध से ही सृष्टि है अपनत्वमय
उदात्त को उड़ान के लिए यहीं मिलता है सम्पूर्ण आकाश
संगीत का आदि घराना कैलाश ही है
कलाओं का आदि गुरुकुल भी
रचना के हृदय-देश में
उमा भावना हैं महेश भाव
इनकी जुगलबन्दी ने ही
धरती को दाम्पत्य का अथाह संगीत दिया है।
सावन के बिरह में
बड़ी माँ के किस्से में था कि –
गौरा की याद में
शिव के आँसुओं से
चम्पा के फूल बने
शिव की याद में
गौरा की आँसुओं से तारे
दोनों में इतनी एका, इतना अपनापा
इतनी समानता
कि दिन के चम्पा के फूल
रात के तारे हो जाते हैं
रात के तारे दिन के चम्पा के फूल
तभी से एकदम तभी से
प्रेमियों के कलेजे में
तारे फूल की तरह गड़ते हैं
और फूल तारे की तरह
इनकी सुगन्ध और उजास भी
सावन के बिरह में
प्रेमियों की साँस पर दर्द की तरह
लिखी मिलती है!

