
- पंकज तिवारी
कला समीक्षक
महाशिवरात्रि पर विशेष: उज्जैन यात्रा वृत्तांत
भारत की संस्कृति, संपत्ति एवं भव्यता जगजाहिर है और बात यदि धार्मिक हो फिर तो क्या कहने। यहां प्राकृतिक संपन्नता भी सौंदर्य की पराकाष्ठा तक है। यहां संस्कृति जड़ों में संपन्नता को साथ लिए दर्शित होती है जिसके आध्यात्मिक मायने बेहद गहरे होते हैं। इन्हीं गहरे रहस्यों, भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में एक जो अपने रहस्यमई दुनिया हेतु प्रसिद्ध हैं जो अकेले ही हैं जो दक्षिणामुखीं हैं, महाकालेश्वर के बारे में आज हम जानने का प्रयास करेंगे।
पुराणों में वर्णित क्षिप्रा नदी पर स्थित श्री महाकालेश्वर का मंदिर भव्य है और भव्य है यहां की विधि-विधान! साक्षात दर्शन मिल जाना मतलब जीवन सफल हो जाना कहा जा सकता है। यहां इंसान तभी जा सकता है जब महाकालेश्वर का उसे बुलावा आया हो अन्यथा यहां पहुंच पाना दुर्लभ है। उज्जैन का समीपस्थ बड़ा शहर इंदौर है। वायुसेवा द्वारा इंदौर आ कर सड़क मार्ग या रेलमार्ग से उज्जैन आ जाया सकता है। देश के अन्य स्थानों से ट्रेन द्वारा उज्जैन पहुंचना आसान और किफायती यात्रा विकल्प है। उज्जैन स्टेशन से पंद्रह-बीस रुपए में ई-रिक्शा से मंदिर या महाकाल लोक तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। स्टेशन से मंदिर के पड़ाव तक शहर बड़ा ही शांत नजर आता है पर इसके आगे की भीड़ हाय तौबा हेतु काफी है। श्री महाकालेश्वर के दर्शन हेतु शारीरिक एवं मानसिक मजबूती दोनों जरूरी है क्योंकि ये वही देव हैं जो अपने ही शादी में रानी मैनावती की परिक्षा लेने में भी पीछे नहीं रहे। कथा है कि द्वारपूजा के दौरान मैनावती को भगवान शिव के साथ भूत प्रेत की भीड़ दिखाई दे रही थी फलत: यहां भी भक्तों की कभी भी परीक्षा ली जा सकती है। भोलेबाबा बड़े ही निराले हैं वो कभी भी किसी की भी परीक्षा ले सकते हैं। अपनी उज्जैन यात्रा के दौरान दर्शन प्राप्ति के बाद बाहर आते ही झमाझम बारिश में भीगते हुए कुछ ऐसा ही हम सभी ने भी महसूस किया था।
सावन का पवित्र महीना, झमाझम बारिश के बीच भीगतीं सड़कें, रामघाट पर पवित्र स्नान के बाद कतार में खड़े महाकालेश्वर के दर्शन को व्याकुल भीगते लोग, बम-बम भोले हर-हर महादेव जैसे पवित्र शब्दों से गुंजायमान धरती- आसमान, मंदिर के ऊपर से गुजरती कर्क रेखा की वजह से धरती के नाभिस्थल पर खड़े दर्शक, दर्शन के पश्चात झूमते लोगों के मदमस्त चालों को देखकर सभी पर किसी दैवीय शक्ति के असर को आसानी से देखा जा सकता है जैसे हर ओर चलती फिरती कलाकृतियां हों। जानें कहां-कहां से लोगों का उज्जैन की पवित्र धरती पर पहुंचना और यहां के माहौल विशेषतः भीगे-भीगे माहौल में रम जाना एक अलग ही लोक में होने का एहसास कराता है। परीक्षा भारी है पर लोगों के उत्साह के आगे कमजोर सी हो गई है। माथे पर विशेष तरीके से लगा तिलक, महाकाल के विशेष डिजाइन से सजे कपड़े, चारों तरफ बस और बस उज्जैन के राजा श्री महाकालेश्वर की उपस्थिति ही नजर आ रही थी।
सीढ़ीनुमा रास्ते से होते हुए कतारबद्ध गर्भगृह तक पहुंचने में तमाम कलाकृतियां देखी जा सकतीं हैं। रंगीन भित्तिचित्र अभी नया है पर बहुत ही सुन्दर है। भगवान शिव से संबंधित एक से बढ़कर एक कलाकृतियों को सजाया गया है। गर्भगृह में भगवान महाकालेश्वर का विशाल और एक मात्र दक्षिणमुखी शिवलिंग है जिसका जलधारी उत्तर की ओर न होकर पूर्व की ओर है। भीड़ की वजह से दर्शन मात्र कुछ ही सेकंड को मिल पाता है पर नसीब वालों को, जिस पर कृपा प्रभु की होती है, को निहारने का मौका मिनटों के लिए मिल जाता है। नंदी दीप, कोटितीर्थ, माता पार्वती, कार्तिकेय और भगवान गणेश जी भी यहीं हैं। जलाभिषेक की भव्यता देखते बनती है। मंदिर के निचले भाग में महाकालेश्वर, मध्य भाग में ओंकारेश्वर तथा ऊपर के भाग में श्री नागचंद्रेश्वर स्थित हैं। नागचंद्रेश्वर मंदिर के दर्शन वर्ष में सिर्फ एक बार नाग पंचमी के दिन ही किया जा सकता है।
लगभग पौने ग्यारह वर्ग मीटर लंबे चौड़े तथा पौने उनत्तीस मीटर ऊंचे इस मंदिर को अपने यहां तक के सफर में तमाम झंझावातों से गुजरना पड़ा पर बीती बात बिसारते हुए वर्तमान के सौन्दर्य को निहारा जाए तो खूब खूब आनंद है। क्षिप्रा नदी के निकट यहां का मनोरम दृश्य मन मस्तिष्क को शीतलता से भर देता है। यहां की भस्म आरती विशेष है पर उसे देखने हेतु करीब पंद्रह दिन पहले से ही अपनी सीट आरक्षित करानी पड़ती है। भस्म से भगवान का भव्य श्रृंगार किया जाता है तथा भोर के चार बजे से आरती शुरू हो जाती है, आरती देखने हेतु विशेष वस्त्र जो वहां पर ही दिया जाता है, पहनना पड़ता है। नंबर लगे होने के बावजूद भी जो जल्दी पहुंचता है अच्छे से आरती का आनंद ले पाता है। जिनको भस्म आरती देख पाने का मौका किसी कारण से नहीं मिल सका हो वो थ्रीडी के माध्यम से भस्म आरती का आनंद ले सकते हैं।
महाकालेश्वर मंदिर के अलावा उज्जैन में हरसिद्धि मंदिर, कालभैरव, सांदिपनी आश्रम, गोपाल मंदिर, चिंतामण गणेश मंदिर सहित कई ऐसे स्थल हैं जहां जाना तो बनता ही है।

महाकाल लोक की निराली छटा
महाकाल लोक की तो अपनी एक अलग ही दुनिया है जिसका वज़ूद महाकालेश्वर से ही है जहां उनके जीवन से जुड़ी तमाम घटनाओं को संजोकर रखा जा रहा है। आज जबकि हर तरफ अफरातफरी का माहौल है, मन अशांत, तन थका हुआ होता है। सुकून को तरसते लोग, लोक से दूर जाने को व्याकुल हैं पर मजबूर हैं। शांति के खोज में अशांति के और करीब पहुंच रहे हैं। वैज्ञानिक खोज मानव के हाथ से सारी चीजें छीनती जा रही है, एआई जिसका ताजा उदाहरण है। जहां हम मजबूर हैं अपने आपको मजबूत कर पाने में, ऐसे ही समय में एक जगह है जहां हमें भव्यता का भान होता है। देवलोक में पहुंच जाने सा आभास होता है। स्वर्ग में पहुंचे हुए महसूस करते हैं दर्शनार्थी।
जी हां हम बात कर रहे हैं देवों के देव, कालों के काल महाकाल में नए बने महाकाल लोक का जिसे महाकाल कॉरिडोर भी कहा जाता है। उज्जैन के महाकाल परिसर को विस्तारित करते हुए करीब 20 हेक्टेयर तक पहुंचा दिया गया है जो आने वाले समय में और भी विस्तार पाएगा। दिन और रात में अलग-अलग नजर आने वाला यह कॉरिडोर वाकई लाजवाब बन पड़ा है। लगभग आठ सौ मीटर की दीवार जिसपर म्यूरल उत्कीर्ण है, मनमोहक है। मोनोक्रोमिक कार्य, पत्थरों पर गज़ब की नक्काशी भगवान शिव से जुड़े सैकड़ों किस्से थाती हैं इस लोक के। रूद्रसागर के किनारे पर सजे इस लोक के दर्शन हेतु पांच से छः घंटे भी कम हैं। इसके निर्माण से महाकालेश्वर के दर्शन हेतु भीड़ को संयोजित करने में भी सुविधा होगी। यहां निर्मित सुविधा केंद्र में एक साथ लगभग चार हजार श्रद्धालु रह सकते हैं।
एक सौ आठ मनके को ध्यान में रखकर इस लोक में एक सौ आठ स्तंभ बनाए गए हैं और सभी पर शिव के आनंद नृत्य की मुद्राएं हैं। भगवान शिव को पसंद पौधों को भी यहां रोपा गया है। भविष्य में हरियाली का भी गजब क्षेत्र होगा यह लोक। यह नाइट गार्डन भी है। सभी मूर्तियों पर पड़ रही गज़ब की लाइटिंग लोगों को बस और बस कृतियों को निहारने और उसी में खो जाने को विवश करता है।

महाकाल लोक के दर्शन की शुरुआत नंदी द्वार से होती है, जहां चार विशाल नंदी की प्रतिमाओं के साथ भव्य द्वार बनाया गया है यानी भगवान का दर्शन नन्दी की अनुमति के साथ ही संभव है। राजस्थानी पत्थरों से राजस्थानी कलाकारों द्वारा निर्मित यह लोक लुभावन है। आगे श्री गणेश हैं। कमल कुंड है जहां बीच में ध्यानमग्न भगवान शिव, अपने विशालकाय रूप में हैं जिनके चारों तरफ़ पानी और कमल है। चार विशाल शेर चारो तरफ हैं पर मुख शिव की तरफ ही है। शिव स्तंभ, डमरू, अर्धचंद्र, सर्प, रूद्राक्ष, त्रिशूल का सुंदर संयोजन और सभी में भव्यता यहां की विशेषता है। सप्तऋषि पर कार्य पुनः चालू है। त्रिपुरासुर का वध करते भगवान शिव, इस कृति में शिव को धनुष धारण किए दिखाया गया है। कृति में सारथी ब्रह्मा, बाण में विष्णु तथा रथ को खींचते चारो अश्व, वेद हैं और आगे बढ़ते हुए रथ पर सूर्य और नवग्रह की भी मूर्तियां हैं।
महाकाल लोक में आए दर्शनार्थी दर्शन के समय इतने खो जाते हैं कि उन्हें अपने होने का भान ही नहीं होता। महाकाल पथ पर धीरे-धीरे खोए-खोए चलते लोग, उन पर अलग-अलग कोणों से पड़ रहा प्रकाश, उधर रुद्र सागर में रोशनी की वजह से झिलमिल होती लहरें देखते बनता है। दूर-दूर तक प्रकाश में नहाया शहर उज्जैन जिसे देख मन मतवाला हो उठता है। काॅरीडोर में और आगे बढ़ने पर समुद्र मंथन का विशाल दृश्य, वो भी जीवंत रुप में देखकर कलाकारों के कलाकारी को नमन करने का जी करता है। एक तरफ देव एक तरफ दानव बीच में विषपान करते महादेव, कण्ठ के नीले होने की कहानी है ये कृति। हैरत में डूबे श्रद्धालु, रंग बिरंगी लाइटें, मोहक मोहक कृतियां जिसमें बैल पर सवार भोले बारातियों संग अपने विवाह में जा रहे हैं भव्य बन पड़ है। ब्रह्मा, बिष्णु, महेश की एक साथ में बनी मूर्ति, देवी गंगा के धरती पर आने का प्रसंग सहित कई मूर्तियां यहां जीवंत हैं। भारत माता मंदिर में भारत माता को भी दैवीय रूप में दिखाया गया है। मंदिर के बाहर बने मानचित्र में बारह ज्योतिर्लिंग का बहुत ही सुन्दर तरीके से अंकन हुआ है।

यहां के हर कृतियों के बारे में भी आप जान सकते हैं बस वहां लगे बारकोड को स्कैन करना होगा। पत्थरों में उत्कीर्ण उनकी महिमा जीवन्त बन पड़ी है। यहां से करीब नौ सौ मीटर बाद श्री महाकालेश्वर का गर्भगृह है तब तक आपको लगातार कृतियों के दर्शन होते रहेंगे और गर्भगृह तक पहुंचते-पहुंचते श्रद्धालु शिव महिमा को भलीभांति जान सकेगा। राजस्थान, गुजरात, उड़ीसा के कलाकारों ने गजब का संयोजन किया है इस पूरे लोक में। इस पूरे लोक को सजाने में प्रमुख भूमिका आर्किटेक्ट कृष्ण मुरारी शर्मा की है।

