
सुनील कुमार गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार
मेरा भोपाल, मेरी नजर
देश के दिल मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल ताल और पहाड़ों का नगर है। विरासत ने इस शहर को शांत, गरिमामय और ठहरा सा स्वभाव दिया है। यहां की फिजाओं में ‘नवाबी ठाट’ और ‘राजा भोज ‘ की पहचान का अनूठा समावेश है। यहां की गंगा-जमुनी तहजीब जगत ख्यात है। 1984 की गैस त्रासदी ने भोपाल की धड़कनों को थामने में कोई कसर नहीं छोड़ी है लेकिन इस भीषण आपदा के बाद भी भोपाल जिंदादिल शहर बना रहा। भोपाल को भोपाली बने बिना नहीं जाना जा सकता है। सबके पसंदीदा शहर को खास नजर से देखने और महसूसने का जतन है यह स्तंभ।
इसके लेखक सुनील कुमार गुप्ता मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं और कलाधर्मी हैं। अभिनय, गायन, शायरी, घुमक्कड़ी में आपकी विशेष रूचि है। भोपाल को सुनील जी की नजर से देखना शहर घूम आने जैसा अनुभव होगा। -संपादक
भोपाल का पहला डाकघरः इस विरासत को बचा लीजिए सरकार
मेरा भोपाल तू रहे जिन्दा, हुस्न हो तेरा और पाइन्दा
शायर और प्रोफेसर जी.एम नग़मी के भोपालनामे में लिखे इस शेर की तरह मेरी रूह में बसने वाले भोपाल शहर, ख़ासतौर पर पुराने भोपाल की ख़ासियत यह है कि यहां हर गली, हर चौबारा, हर इमारत अपने दामन में एक ऐसा इतिहास, ऐसी कहानी समेटे हैं, जिसे छूकर, देखकर, सुनकर, महसूस कर आप सुकून, खुशी और जोश से भर जाएंगे या भौचक रह जाएंगे या आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे, बदन में फुरफुरी दौड़ जाएगी। हर दास्तां अपने वक्त की आवाज़ों, रिश्तों और गुफ़्तगू यानी संवाद के सफर को दर्ज करती है। इस सफर में हुक्मरान, आवाम, रईस और मुफ़्लिस, खिदमतगार, तीमारदार सब एक साथ होते हैं।
जरा कल्पना कीजिए कि मेरी तरह आप सुबह की सैर पर निकले हों और आपके कदम ऐसी जगह पर जाकर ठहर जाएं, जहां गुमनाम, चुपचाप से कोने में खड़ी इमारत टाइम मशीन की तरह आपको अतीत में ले जाए और कुछ बुदबुदाने लगे। अचानक वहां आपको ‘हिन्दोस्तां ज़िदाबाद’ के नारों की बुलंद गूंज सुनाई देने लगे और कुछ नौजवान अंग्रेजों के झंडे ‘यूनियन जैक’ को उतार फेंक अपना ‘तिरंगा’ फहराते हुए आजादी के तराने गाते-नाचते दिखने लगें। यह वो हक़ीकत है, जिसकी इबारत भोपाल में आजादी के मतवालों ने 15 अगस्त 1947 को इसी छोटी सी इमारत में लिखी थी और गिरफ्तार कर लिए गए, क्योंकि 15 अगस्त को भारत तो आज़ाद हो गया था, लेकिन भोपाल नहीं। भोपाल के आखिरी नवाब हमीदुल्ला के सिपहसालार तिरंगा फहराने वाले जांबाजों को यहीं से मुश्कें बांध कर ले गए थे। इस जगह पर यह घटना इतिहास में इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दिखाती है कि 15 अगस्त 1947 के बाद भी भोपाल में तिरंगा फहराना अपराध था। भोपाल रियासत के नवाब ज़ाहिरा तौर पर भारत में विलय का विरोध प्रदर्शित कर रहे थे। ‘तिरंगे’ जैसे राष्ट्रीय प्रतीकों को राज्य विरोधी माना जाता था। यही वजह है कि इसके कई नायक गुमनाम रह गए।

जी हां, हम बात कर रहे हैं भोपाल के जुमेराती इलाके में सिंधी मार्केट, जुमेराती और चौकी इमामबाड़ा को जोड़ने वाले तिराहे पर कोने में दुबकी छोटी सी इमारत में आज भी चलने वाले डाकघर की, जो अब उप डाकघर जुमेराती के नाम से जाना जाता है। यह डाकघर भोपाल का पहला डाक घर है, जहां उस दौर की आधुनिक सुविधाओं के साथ सुव्यवस्थित डाक व्यवस्था की बुनियाद पड़ी और नए सफरनामे की शुरुआत हुई। गुज़रे इतवार सैर का मुक़ाम यही वो डाकघर था, जिसके इतिहास को टटोलने और उस वक्त से जुड़े अहसासों को दर्ज करने की हमने कोशिश की। इस डाकघर में आजादी के जश्न-जुनून और ज़ुल्म की अपनी दास्तां तो रोचक-रोमांचक है ही, इसके साथ ही भोपाल में यह डाकखाना खुलने और उसके लिए जद्दोजहद की भी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। भोपाल के रियासत काल में आज की तरह कोई व्हाट्सएप, ईमेल, मैसेंजर, टेलीग्राम, जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म, ई-पोस्ट, ई-मनीआर्डर, स्पीड पोस्ट, रजिस्ट्री जैसे साधन और सूचना-संचार का संसार तो था नहीं। 18वीं सदी के उत्तरार्ध तक यहां कोई संगठित डाक व्यवस्था नहीं थी। शाही फरमान, सैन्य आदेश, दूसरे राजाओं-नवाबों को संदेश पैदल, घुड़सवारों-हरकारों और भरोसेमंद दूतों के जरिए ही भेजे जाते थे। आम-जनता के लिए ख़तो-किताबत की सहूलियत तो थी नहीं। अपने तरीके से संदेशों को भेजना-मंगाना तो रईसजादों या कहें सक्षम, समृद्ध लोगों के बस की ही बात थी।रियासत के काम को अंजाम देने के लिए रायसेन, गढ़ी, आंबापानी, बेगमगंज आदि स्थानों पर डाक चौकियां थीं। इन तक फरमान पहुंचाने के लिए हरकारे हुआ करते थे। भोपाल गजेटियर के दस्तावेजों के मुताबिक 1818 में भोपाल रियासत के ब्रिटिशों की सरपरस्ती में आने के बाद यहां प्रशासनिक सुधारों काम शुरू हुआ और इस क़वायद के 12 साल गुजरने के बाद सन् 1830-40 के बीच भोपाल में रियासती डाक व्यवस्था की औपचारिक शुरूआत हुई। वास्तव में भोपाल रियासत की बेगमों के शासनकाल में यहां डाक व्यवस्था को दुरुस्त करने पर ज्यादा महत्व दिया गया।

भोपाल रियासत की रीजेंट और नवाब सिंकदर जहां बेगम की (1845-1868 ) ने उस समय अपनी रियासत का पहला डाक टिकट तो जारी कर दिया, लेकिन डाक को लाने-लेजाने के ऊंट-घोड़े-हरकारे जैसे सभी साधन बहुत महंगे साबित हुए। यह स्थिति निरन्तर बनी रही। उधर अंग्रेज अपनी डाक व्यवस्था थोपने के लिए बार-बार सिकंदर जहां बेगम पर दबाव डाल रहे थे और कह रहे थे कि आपकी डाक व्यवस्था महंगी है, क्योंकि भोपाल में रेल्वे स्थापित नहीं है। इसलिए भोपाल रियासत अपना जारी किया हुआ डाक टिकट बंद करे या फिर उसकी रायल्टी अंग्रेज सरकार को दे। दोनों पक्षों के अड़े रहने के कारण इसका कोई समाधान नहीं निकल सका। पूरे मुल्क में डाक-दूरसंचार व्यवस्था मजबूत पकड़ के साथ ब्रिटिश इंडिया गर्वनमेंट संभाले हुए थी, उसकी यह आपत्ति थी कि डाक, रेलवे, सीमा शुल्क और कर आदि राजस्व संबंधी मामले ब्रिटिश इंडिया गवर्नमेंट के हाथ में होना चाहिए। अभिलेखों से पता चलता है कि ब्रिटिश सरकार के अधीनस्थ देश की दूसरी रियासतों जैसे-इंदौर की होल्कर और ग्वालियर की सिंधिया रियासत के मुकाबले भोपाल रियासत बहुत पिछड़ी हुई और कमज़ोर थी। भोपाल को अपने वजूद को बरकरार रखने, वक़्त के साथ चलने के लिए कई समझौते और संघर्ष करना पड़े। अभिलेखों से यह भी पता चलता है कि इसके बाद जब शाहजहां बेगम (1868-1901) भोपाल की नवाब बनीं तो उन्होंने कलकत्ता जाकर वहां वायसराय लॉर्ड डरफन से भेंट की तथा दोनों के मध्य एक संधि हुई। संधि के दो प्रारूप तैयार किए गए। पहले प्रारूप में यह तय हुआ कि भोपाल रियासत की करेंसी समाप्त कर दी जाए, क्योंकि ब्रिटिश सिक्के अथवा नोट और भोपाल रियासत के सिक्के अथवा नोट की विनिमय दर में बहुत अंतर है। इसलिए यह संभव नहीं है कि भोपाल की करेंसी अन्य रियासतों में क्रय-विक्रय के काम में उपयोग की जा सके। इस संधि के मुताबिक भोपाल रियासत की करेंसी समाप्त कर दी गई और यहां ब्रिटिश करेंसी लागू हो गई।
दूसरी संधि का प्रारूप यह था कि भोपाल (1885) में रेलवे की सुविधा उपलब्ध हो गई है। इसलिए भोपाल को अपनी डाक व्यवस्था समाप्त कर ब्रिटिश इंडिया गर्वनमेंट की डाक योजना लागू की जाए। इस योजना को लागू करने के लिए भारत सरकार के दूरसंचार एवं रेलवे के उच्चाधिकारियों का दल और ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट भोपाल आए। बेगम शाहजहां बहुत तरक्की पसंद, लेकिन ज़िद्दी स्वभाव की शासक थीं। उन्होंने एक शर्त यह भी रखी कि भोपाल के डाक टिकटों पर ब्रिटिश वायसराय या रानी विक्टोरिया के चित्र नहीं दर्शाए जाएंगे। यह शर्त बयां करती है कि अंग्रेजों का साथ भोपाल रियासत के लिए मजबूरी था, लेकिन वास्तव में उनसे कामकाजी रिश्तों भर का लगाव था। बेगम शाहजहां रियासत की पहचान पर खतरे को लेकर सजग और संजीदा थीं।
बहरहाल, काफी जद्दोजहद के बाद सन् 1887 में भोपाल के व्यापारिक क्षेत्रों से जुड़े मोहल्ले जुमेराती में ‘इम्पीरियल स्टेट पोस्ट ऑफिस’ स्थापित किया गया, जिसके लिए भूमि ब्रिटिश सरकार ने भोपाल रियासत से खरीदी। इस ऐतिहासिक डाकघर की स्थापना के बाद इस पर ब्रिटिश सरकार का ध्वज ‘यूनियन जैक’ लहराया गया। यहां से भोपाल में सुव्यवस्थित डाक व्यवस्था की बुनियाद पड़ती है। उस समय पोस्ट मास्टर का पद बहुत ही जिम्मेदार व्यक्ति को दिया जाता था, क्योंकि नवाबी दौर में शासकों को डर रहता था कि कहीं कोई उनकी शिकायत तो ब्रिटिश सरकार को नहीं कर रहा है। जिन लोगों के पास चिट्ठी-पत्री, डाक अधिक संख्या में आती थी, उन्हें संदिग्ध नजरों से देखा जाता था और उन पर निगरानी बैठा दी जाती थी। उस समय गोपनीय पत्रों को भेजने से पहले शासन की अनुमति लेना पड़ती थी। इसलिए लोग पोस्ट मास्टर से अच्छे संबंध विकसित करते थे, ताकि उनके पत्र खोलकर नहीं पढ़े जाएं।

भोपाल गजेटियर के मुताबिक शाहजहां बेगम और उनके बाद सुल्तान जहां बेगम (1901-1926) के शासनकाल में डाकघरों की संख्या बढ़ी, डाक शुल्क तय हुए। जनता के लिए पत्र, मनीऑर्डर और नोटिस संभव हुए। एक नजरिए से देखें तो यह डाकघर उस सफर की बुनियाद रहा, जहां से चलकर डाक व्यवस्था ने केवल तकनीकी इतिहास ही नहीं लिखा, बल्कि जन-जन तक सूचना का जरिया, सत्ता और नागरिक के बीच संवाद का जरिया बनी। जनता को अपनी अभिव्यक्ति का एक रास्ता मिला। डाकघर सामाजिक संपर्क के केन्द्र बन गए।
भोपाल के सबसे पहले और सबसे पुराने डाकघर के बाहर एक लालरंग का पोस्ट आफिस का डिब्बा आज भी लगा हुआ है। हालांकि व्हाट्सएप, ई-मेल के इस दौर में इसमें चिट्ठियां बहुत कम ही आती हैं। भोपाल के ऐतिहासिक महत्व का यह पोस्ट ऑफिस खुलता तो है, लेकिन पुरसाने हाल उजड़े हुए दयार जैसा है। चाय-पान की दुकानों का अतिक्रमण कैम्पस की बाउंड्री तोड़कर भीतर घुस गया है। कैम्पस में गंदगी और लंबी डोरी पर टंगे किसी के बहुत सारे कपड़े सूख रहे थे। गेट के बाहर दोनों ओर किसी धार्मिक समूह के झंडे टंगे हुए थे। पुराने भोपाल के सबसे व्यस्ततम बाजारों में शुमार जुमेराती में भीड़ तो बहुत रहती है, ट्रेफिक जाम भी खूब लगता है, लेकिन हर नजर से यह डाकघर छुप सा जाता है। इस ऐतिहासिक डाकघर के नजदीक तकरीबन 50 साल से किराना दुकान चला रहे क़ासिम अली कहते हैं, कि भोपाल के इस सबसे पुराने डाकघर में हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को कुछ अधिकारी और आम लोग जुटते हैं और झंडा फहराकर जाने के बाद कभी सुध नहीं लेते। कुछ लोग कहते हैं कि यह राज्य संरक्षित इमारत है, लेकिन राज्य संरक्षण की सूचना देती कोई तख्ती तो हमें नहीं दिखाई दी और हालात भी ऐसे नहीं दिखे कि इस इमारत का कहीं, किसी भी तरह का कोई संरक्षण किया गया हो।

भोपाल की यह विरासत को सरकार की नजरे इनायत दरकार है, क्योंकि यह शर्म की नहीं, गर्व की विरासत है, क्योंकि पूरे भोपाल के साथ-साथ यहां भी 15 अगस्त 1947 को आजादी का जश्न मनाया था और सबसे पहले यहीं ब्रिटिश यूनियन जैक को हटा कर तिरंगा फहराया गया था। बताया जाता है कि उस वक्त भोपाल रियासत के नवाब हमीदुल्ला की पुलिस ने प्रजामंडल सरकार के नुमाइंदे रहे पं. चतुर नारायण मालवीय, भाई रतन कुमार जैसे कई युवा आंदोलनकारी गिरफ्तार किए गए थे। उनके नाम गजेटियर और प्रशासनिक दस्तावेजों में हो सकता है कि न मिलें, क्योंकि गजेटियर आमतौर पर प्रशासनिक घटनाओं का संक्षेप देता है और जनआंदोलन के व्यक्तिगत कार्यकर्ताओं के नाम नहीं देता। दूसरी वजह यह भी है कि 1949 में भोपाल के भारत संघ में विलय के दौरान भोपाल रियासत की पुलिस कार्यवाही, एफआईआर और मजिस्ट्रेटी कार्रवाई का बड़ा हिस्सा नष्ट कर दिया गया था। एक बार फिर दरकार इसे बचा लीजिए, सहेज लीजिए सजा और संवार लीजिए सरकार। यह हमारी विरासत-हमारी शान-हमारी पहचान है।

