कोलकाता का ‘चौरंगी’: आखिर आज शंकर भी चला गया…
- टॉक थ्रू टीम
हर शहर में एक चौक होता है, पुराने बाजार की यादों वाला चौक। हर शहर में एक न्यू मार्केट होता है, व्यापार के नए कलेवर का चेहरा। हर शहर में एक गली यादों वाली होती है। कुछ बैठकों को याद दिलाती मंडलियां, कुछ गलियां, कुछ दुकानें और कुछ किरदार। कोलकाता में एक चौरंगी है। शहर के मध्य का वह इलाका जो अपने फैशन स्टोर, मार्केट, पुराने सिनेमाघरों और शानदार रेस्टोरेंट्स के लिए प्रसिद्ध है। ब्रिटिश काल में इसे ‘साहिब पारा’ यानी अंग्रेजों का इलाका कहा जाता था। भव्य बंगलों और इमारतों वाले इस इलाके में चौरंगी रोड (अब जवाहर लाल नेहरू रोड) कोलकाता की सबसे महत्वपूर्ण सड़कों में से एक माना जाता है। मगर चौरंगी केवल कोलकाता का एक इलाका भर नहीं है। यह तो वहां की संस्कृति है और उस चौरंगी को जानना है, तो शंकर का ‘चौरंगी’ पढ़ना पढ़ेगा। अपने विविधरंगी चरित्रों के कारण यह उपन्यास जीवन की महागाथा कहा गया। जीवन की चकाचौंध में दु:ख की अंधेरी परतों से रूबरू करवाता ‘चौरंगी’। और आज इस चौरंगी का सर्जक शंकर यानी उपन्यासकार मणि शंकर मुखर्जी आज 20 फरवरी को संसार से विदा हो गए साहित्य समाज के लिए शोक की इस घड़ी में शंकर का अद्भुत शोकगीत ‘चौरंगी’ की बात करने से बड़ी श्रद्धांजलि क्या होगी?
बंगाली साहित्य के सर्वप्रसिद्ध लेखक शंकर द्वारा लिखित ‘चौरंगी’ प्रकाशित होते ही लोकप्रिय हो गया था। इस पर एक फिल्म और एक नाटक भी बना। इसके असाधारण पात्रों में रहस्यमय मैनेजर मार्को पोलो, आकर्षक रिसेप्शनिस्ट स्याटा बोस, कराबी गुहा आदि ने जल्द ही लोकप्रियता हासिल कर ली। ‘चौरंगी’ वह उपन्यास है जिसने लोकप्रिय बंगाली कथा साहित्य को एक नई पहचान दी। 1950 के दशक के कलकत्ता की कहानी ‘चौरंगी’ शहर के सबसे बड़े होटलों में से एक, शाहजहाँ होटल के प्रबंधकों, कर्मचारियों और मेहमानों के निजी जीवन की एक गाथा है। होटल में भर्ती हुआ नया कर्मचारी शंकर ही सूत्रधार है और वह इन किरदारों की कहानियां सुनाता है। घटनाओं के साक्षी और हिस्से के रूप में वह रोजमर्रा के जीवन को दर्ज करता है और भव्य होटल की दिखावटी रोशनी के पीछे जीवन की काली त्रासदी को कुरदेता रहता है। इस तरह किरदारों का जीवन, उनके स्वप्न, उनकी महत्वकांक्षाएं, उनकी पीड़ाएं व्यक्तिगत न रह कर महानगर कोलकाता का जीवन दृश्य बन जाता है। यह उपन्यास कोलकाता के शीर्ष औद्योगिक परिवारों के जीवन और व्यापारिक षड्यंत्रों की झलक पेश करता है। एक होटल के माध्यम से जिंदगी के विविध रंग-रूपों से परिचित करवाता है।
‘चौरंगी’ उनकी दूसरी रचना है। इसे उन्होंने अपने पहले उपन्यास के लगभग सात साल बाद लिखा था। समाचार एजेंसी पीटीआई को एक साक्षात्कार में शंकर ने को बताया था कि ‘चौरंगी’ के पहले वे सिर्फ एक किताब का लेखक के रूप में पहचाने जा रहे थे। इस अभिशाप को तोड़ने और मिल रहे ताने का जवाब देने के लिए ‘चौरंगी’ रचा गया। वे बताते हैं कि वे कुछ समय से प्रार्थना कर रहा थे कि किसी तरह ‘एक किताब का लेखक’ का टैग मिट जाए। कुछ लोग कहते थे कि ‘एक किताब के लेखक’ आलू के पौधों की तरह होते हैं- पहली फसल के बाद कुछ नहीं बचता।
कैसे मिली प्रेरणा
लेखक शंकर ने अपने साक्षात्कार में बताया था कि एक दिन अचानक हुई बारिश से बचने के लिए जब वे एक किताबों की दुकान के शेड में खड़े थे तब चौरंगी स्ट्रीट की ग्रैंड होटल के
चमकीले नियॉन साइनबोर्ड पर नजर पड़ी। बोर्ड को लगातार देखते रहने पर एहसास हुआ कि बड़े होटलों के कामकाज और अंतरंग जीवन से परिचित हूं। यही नई किताब की विषय वस्तु बन सकती है। उस समय उन्होंने एक किताब खरीदी थी। उसमें से एक में एक छोटी सी कविता थी। कविता का मंतव्य कुछ यूं है:
हमारा जीवन एक सर्दी के दिन के समान है;
कुछ लोग नाश्ता करके चले जाते हैं;
अन्य लोग दोपहर का भोजन करते हैं और पेट भर खाते हैं;
सबसे बुजुर्ग व्यक्ति बस रात का भोजन करके सो जाता है;
जो सबसे पहले जाता है उसे सबसे कम कीमत चुकानी पड़ती है।
एसी मफेन की इस कविता ने लेखक शंकर को झकझोर दिया और इस तरह लेखक ने अपने अनुभवों में ‘चौरंगी’ खोज ली। इस उपन्यास के लिए लेखक शंकर ने राज्य शराब विभाग में प्रशिक्षु बनकर शहर के बेहतरीन बारों में कई सप्ताह बिताए ताकि कॉकटेल के नाम और उन्हें बनाने की विधि सीख सकें, जबकि वे शराब नहीं पीते थे। बारीकियों पर उनकी पकड़, गहन शोध और कहानी कहने की उनकी अद्भुत कला ने उन्हें आशातीत सफलता दिलाई।
यह प्रतिष्ठित रचना नए पाठकों को आकर्षित करती रहती है, और एक अन्य महान लेखक, साम्राज्यवाद के कवि रुडयार्ड किपलिंग से प्रेरणा लेती है, जिनका शंकर चौरंगी की अंतिम पंक्तियों में उल्लेख करते हैं, “सारा अच्छा कलकत्ता सो गया है, आखिरी ट्राम गुजर चुकी है… तारों के नीचे कुछ भी साफ, पवित्र या अच्छा नहीं है, और हम सब एक साथ विनाश की ओर जा रहे हैं। आमीन!”
जिस दिन ‘चौरंगी’ छपा, उसी दिन शादी
‘चौरंगी’ उपन्यास 10 जून 1962 को प्रकाशित हुआ था। शंकर ने एक साक्षात्कार में बताया कि छपी किताब देख निश्चिंत होकर उसी दिन शाम को उत्तरपाड़ा गया और विवाह मंडप में बैठा। ‘चौरंगी’ के साथ शंकर के जीवन में दाम्पत्य भी आया। बांग्ला में तो ‘चौरंगी’ के सवा सौ से अधिक संस्करण निकल चुके हैं। राजकमल प्रकाशन ने 1964 में इसका हिंदी संस्करण प्रकाशित किया था। राजकमल चौधरी ने ‘चौरंगी’ का अनुवाद किया है। हिंदी से ही भारत की दूसरी भाषाओं में उसका अनुवाद हुआ। रूसी अनुवाद तक हिंदी से हुआ। यहां तक कि हिंदी संस्करण पढ़कर ही विक्रम सेठ इतने मुग्ध हुए कि उन्होंने पेंग्विन वालों से अंग्रेजी अनुवाद छापने की अनुशंसा की।
पाठकों की प्रतिक्रियाएं ऐसी कि…
अमर उजाला में प्रकाशित एक साक्षात्कार में लेखक शंकर ने बताया था कि एक बार अपनी बेटी को छोड़ने मैं कलकत्ता हवाई अड्डे पर गया था और अंदर जाने के लिए लाइन में खड़ा था कि एक विदेशी महिला बार-बार मुझे देख रही थी। उसने अपने बैग से पेंग्विन से छपी ‘चौरंगी’ निकाली और बैक कवर पर छपी मेरी फोटो देखते हुए मेरी बेटी से पूछा कि क्या ये भारतीय लेखक शंकर हैं? बेटी ने जब हां कहा, तो वह मेरे पास आई और कहा कि यह उपन्यास पढ़कर ही वह शाहजहां होटल को देखने बेल्जियम से कोलकाता आई हैं।
‘गार्जियन’ ने अपनी समीक्षा में लिखा था, ‘चौरंगीः अ लवली चार्मिंग बुक, ब्रिमिंग विद लाइफ एंड फुल ऑफ द अनस्पेक्टेडनेस ऑफ द क्रेजली ऑब्जर्व्ड वर्ल्ड।’ लेकिन हिंदी की प्रतिक्रिया का, तो जवाब ही नहीं। ‘चौरंगी’ पढ़कर हिंदी के एक पाठक ने अपना नाम तो नहीं भेजा, किंतु आगरा से डाक से रेवड़ी ही भेज दी थी। मेरी मां मजे लेकर कहती थीं कि बांग्ला के पाठक, तो किताब पढ़कर लंबी-लंबी चिट्ठियां लिखते हैं, आगरा के जिस हिंदी पाठक ने रेवड़ी भेजी, वह मेरा श्रेष्ठ पाठक है। ‘चौरंगी’ पढ़ने के बाद बनारस के एक पाठक ने आम की टोकरी भेज दी थी। रेलवे के कर्मचारियों ने बदमाशी की और आम निकालकर उसमें पत्थर रख दिए। मुझे लगा कि जीवन यही है। लोग आपसे प्रेम करते हैं, किंतु उनका प्रेम गंतव्य तक कई बार नहीं पहुंचता।
चला गया शंकर…
उपन्यास का पात्र शंकर आधुनिक होती होटल से निकाल दिया गया था। उपन्यास का पात्र शंकर कहता है कि “यही दुनिया एक दिन मुझे कितनी खूबसूरत लगती थी। इसी दुनिया में मनुष्य को श्रद्धा से देखा करता था। विश्वास करता था कि मनुष्य के अंदर ही देवता निवास करते हैं। लेकिन आज मुझे महसूस हुआ, मै गधा हूं। दुनिया ने मुझे कितनी ठोकरें लगायी है और मुझे होश नहीं आया है। मेरे ज्ञान नेत्र क्या कभी खुलेंगे ही नहीं? नहीं,नहीं इस तरह जिंदगी नहीं चलती। मुझे भी चालाक बनना पड़ेगा। दुनिया वालों की तरह अक्लमंद बनना पड़ेगा।”
जब लेखक से पूछा गया कि उपन्यास की आखिरी पंक्ति के ठीक पहले की पंक्ति हैः शाहजहां की क्लान्तिहीन लाल रोशनी अब भी जल रही है, बुझ रही है। इसका आशय क्या है?
शंकर ने बताया था, इसका अर्थ है कि जीवन यहीं खत्म नहीं हुआ। जीवन ही तो एक चौरंगी है। उसके अलावा जीवन और क्या है? जो जितने अधिक दिन बचा रहेगा, उसे उतने ही अधिक बिल का भुगतान करना होगा।

