एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
विभूति झा से मेरा परिचय कुछ इस तरह का है कि वे पहले एक नामी वकील थे। अब आदिवासियों को साथ लेकर संघर्षरत हैं। ग्रामसभा को लेकर जनजागरण जैसा कुछ कर रहे हैं और उसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। अभिन्न मित्र देवीलाल पाटीदार को मेरे द्वारा संपादित एक पुस्तक ‘नर्मदा घाटी से बहुजन गाथाएं’ का संपादकीय बहुत अच्छा लगा और उन्होंने विभूति दा को इन डायरियों के संपादन का कार्य मुझसे करने के लिए सुझाया। विभूति दा इन्दौर आए। बात हुई। मैंने स्वयं पर शंका करते हुए, कि क्या वह कार्य कर पाऊंगा? सहमति दे दी। उनकी डायरी “एक लक्ष्यहीन यात्रा” को लंबी कहानी में बदलना जोखिम भरा काम है। यह एक विलक्षण दस्तावेज है। यह एक ऐसी गाथा है जो बताती है कि सिर्फ महत्वाकांक्षा को छोड़ देना भर काफी नहीं होता। ऐसा तो तमाम लोग कर सकते हैं। विभूति दा महत्वाकांक्षा के त्याग से बहुत आगे जाते हैं और अपना स्वअर्जित यश भी समाज से विस्मृत करा देते हैं। समाज जब उनकी यश और कीर्ति को भी भूल चुका होता है, तब अपनी यात्रा के करीब पंद्रह बरस बाद, वे अपने इस कथोपकथन पर जमी धूल झाड़ते हैं और उसे सबके सामने लाने की कोशिश करते हैं। इस लंबी कहानी में एकाध जगह अनायास उस अर्जित यश का यशोगान सामने आता है तो वह बहुत कठोरता से उसे विलुप्त कर देते है।
यह असाधारण होते हुए भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतांत। यह एक व्यक्ति के “लौटने” की गाथा है।
इस पूरी गाथा में कुछ भी उपदेशात्मक नहीं है। यह नैतिकता का पाठ भी नहीं पढ़ाती। यह एक ऐसी रचना है, जो सिखाती है, कि बिना किसी को दुखी किए कैसे अपना जीवन जिया जा सकता है और उसे सकारात्मक बनाया जा सकता है। इस गाथा की सिर्फ एक विशिष्टता है कि यह सच कहती है। याद रखिए कीट्स ने कहा भी था, ’’जो सुन्दर है, वही सत्य है, जो सत्य है वही सुंदर हो सकता है। गांधी ने भी “सत्य ही ईश्वर है” कहा था। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। – चिन्मय मिश्र
शाहगंज: नर्मदा तट
चलते, ढुलकते जैसे भी हो, पहुंचना तो नर्मदा के किनारे ही था। आज जब कहानी लिख रहा हूं तो याद आ गया कि लोग वास्तव में नर्मदा की परिक्रमा, यानी दोनों तटों पर आना जाना करते हैं, और यह यात्रा एक तट पर तेरह सौ बारह किलोमीटर यानी कुल दो हजार छह सौ चौबीस किलोमीटर की होती है। गौरतलब है पहले के समय में जब लोग नर्मदा परिक्रमा पर निकलते थे, तो अपनी पूरी संपत्ति का दान कर देते थे या उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित कर, सभी बंधनों से मुक्त होकर यह यात्रा करते थे। यह परिक्रमा कमोबेश सांसारिक जीवन त्याग का प्रतीक भी है। वैसे नर्मदा, दुनिया की एकमात्र नदी है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। लोग इस त्याग को परंपरा की तरह निभाते हैं। परंतु मेरे साथ तो यह अनायास ही हो गया। सब कुछ अपने-आप छूट गया! कुछ भी सायास नहीं हुआ।
मैं शाहगंज पहुंच गया था। कस्बे के शुरू में ही पुलिस थाना और बस स्टैंड है। लोग मुझे घूर रहे हैं। बारिश की वजह से सड़क पर चहल पहल भी कम है। सीधे चलते हुए नर्मदा तट पर बने रेस्ट हाऊस के किनारे पहुंचा। पहले भी दो-एक बार यहां आ चुका हूं। शायद इसीलिए शाहगंज दिमाग में बैठ गया। मेरा मन भी उछाल ले रहा है और उधर नर्मदा जी में भी बाढ़ आई हुई है। पानी एकदम मटमैला है। मेरा मन भी कसैला है। उसका भी रंग साफ नहीं है। पानी अभी थोड़ा उतरा है, इसलिए कीचड़ है। पास ही एक मंदिर बन रहा है। एक औघड़ बाबा बैठा कुछ खा रहा है। उसका शरीर मैल से काला हो रहा है। शायद तेल चुपड़ा हुआ है। शरीर पर बेतहाशा मक्खियां भिनभिना रहीं हैं। पास ही एक बेहद गंदा कुत्ता बैठा हुआ है। बाज समय वह भी उसके हाथ से खींचकर कुछ खा लेता है। बीच-बीच में हम दोनों एकदूसरे को देख लेते हैं। उस क्षण मैंने सोचा, नहीं-नहीं यह मेरा भविष्य नहीं हो सकता! मन में द्वंदद्व है। अजीब पशोपेश में हूं। नर्मदा जी सामने हैं! एक ख्याल है क्या नर्मदा जी के ह्दय में समा जाऊँ? दूसरा विचार है कि इसके तट पर निरंतर चलता चलूं। बाबा को देखकर वितृष्णा होने लगी और नर्मदा का गंदला पानी अपनी ओर न बुलाता सा लगने लगा।
मैं जिस उद्देश्य के साथ निकला था, कि नर्मदा जी पहुंचना है, उसके अप्रतिम जल को ओर बढ़ा। ध्यान दिया तो महसूस हुआ कि यहां कल शाम या आज सुबह ही अंतिम संस्कार हुआ है। धीरे-धीरे पानी तक पहुंचा। जल का स्पर्श किया। नर्मदा जी में थोड़ा अंदर गया, वहां आचमन किया। कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर बाहर निकला। कुछ ही दूरी पर दूसरा घाट दिख रहा था। नाव व मछुआरे भी नजर आ रहे थे। लगा कि यदि कोई कपड़ा होता तो स्नान कर लेता। अंतिम संस्कार के बाद कोई कपड़ा छोड़ा होता तो वही ले लेता। तभी ध्यान आया कि काठ्या ब्राहमण तो कुछ भी नहीं छोड़ता। अंतिम संस्कार के बाद बचा कपड़ा भी प्रयोग में लेने का विचार कहीं ना कहीं अपने अंदर रचे-बसे अहंकार के टूटने का और मोह से बाहर आने की शायद शुरूआत ही है। साथ ही मेरी वर्तमान स्थिति की सच्चाई भी।
मैं दूसरे घाट की ओर चल पड़ा। एक अधेड़ व्यक्ति, जो स्नान के बाद लोटे में जल लेकर किनारे की ओर जा रहा था, से पूछा जगदीश मंदिर कहां है? वो बोला पीछे चले आओ। ऊपर तक काफी चलना पड़ता है। कीचड़ और फिसलन बहुत है। नंगे पांव चढ़ना भी मुश्किल जान पड़ा। कई बार फिसलते-फिसलते बचा। तभी ध्यान गया कि साथ वाला व्यक्ति तो बड़ी आसानी से चढ़ रहा है, और इतना ही नहीं उसके लोटे से संभवतः एक बूंद जल भी नहीं छलका। गजब! ऊपर पहुंचा तो कीचड़ से सनी गलियां मिलीं। एकाएक बम्हनी में बिताए बचपन की याद आई। बम्हनी बंजर। वैसे इसे केवल बम्हनी ही कहा जाता है। मध्यप्रदेश के मंडला जिले का एक कस्बा है जो बंजर नदी के किनारे बसा है। याद आया ऐसी ही गलियों से निकलकर स्कूल जाते थे और भंवरताल के रास्ते में बंजर नदी के तट पर ऐसी ही फिसलन और कीचड़ होता था। इतना ही नहीं कई बार भंवरताल से बम्हनी पैदल ही स्कूल आना होता था। तब जूते-चप्पल उतारकर हाथ में रख डोंगी से कीचड़ और पानी से भरी बंजर नदी पार करते थे। किताब कापियां सिर पर होती थीं। आज तमाम बरसों बाद फिर से बचपन याद आ गया। तब सब कुछ समेटता था आज कुछ भी नहीं है समेटने को। न जूता, न कापी-किताब,न जिज्ञासा और न ही कोई आकांक्षा। जब से निकला हूं, लगता है मेरा बचपन ही है जो मेरे साथ निरंतर चल रहा है। और मैं सबको, और सबकुछ छोड़कर, शायद बचपन को अपने पास लौटा लाना चाहता हूं। यह भी है कि हम सब अपना मोक्ष कमोवेश अपने बचपन में ही ढूंढ़ते हैं।
तभी अचानक तंद्रा टूट गई। उस श्रद्धालु ने मुझे जगदीश मंदिर तक पहुंचा दिया था। उड़के किवाड़ को धक्का देकर अंदर गया। पानी लगातार बरस ही रहा था। मंदिर के आसपास काफी जगह थी। आंगन, रिहायशी जगह, बड़ा सा हाल। पर दिखाई कोई नहीं दे रहा था। मैं बाहर फर्श पर बैठा रहा। तभी पीछे से एक युवा चेला हाथ में चाय लिए आता दिखा। उसने दरवाजे को धकेला और बोला “गुरु जी चाय ले लें।”
अंदर वाले बाबा ने अपना धड़ बाहर निकाला, चाय ली, और मेरी तरफ देखते हुए चेले से पूछा “कौन है?”
चेले ने कहा “पता नहीं।”
बाबा ने चाय पी। अपना धड़ अंदर किया और दरवाजा फिर बंद हो गया। चेला किताब पढ़ने लगा।
मैंने पूछा “क्या यहां रूका जा सकता है?”
उसने कहा “बाबा मंदिर के अंदर तो किसी को रूकने नहीं देते, बाहर कहीं सो सकते हो।”
लोगों का आना जाना लगा था। माहौल भी जम नहीं रहा था। मैं बाहर जाने लगा। बाद में आए व्यक्ति ने पूछा, कहां जाओगे? मैंने कहा घाट देखने। घाट दूर से सुंदर दिख रहा था। वह व्यक्ति बड़ा शंकालु और आदतन भेदिया जान पड़ता था। बोला जरा बैठो परिचय हो जाए। खोद-खोद कर पूछता रहा। कहने लगा इरादे ठीक नहीं लगते। अकेले नहीं जाने देगें। इस पर मैंने कहा तो साथ चलो। इस तरह का अविश्वास, मेरे लिए सर्वथा नया अनुभव था। क्या यह जरूरी है कि कोई व्यक्ति अपनी गोपनीयता न बनाए रखे? पर नई व्यवस्था तो शक्की होना ही गुण मानती है। तमाम परिचय पत्र अब अनिवार्यता बनते जा रहे हैं। मनुष्य का तो जैसे अब कोई अस्तित्व ही नहीं है। वह आधार कार्ड या मतदाता कार्ड का स्वामी भर रह गया है। बहरहाल, वह साथ ही गया। वहां घाट पर खुदाई कर पुरानी सीढ़ियां निकाली जा रहीं थीं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का चुनाव क्षेत्र है। खूब खर्च हो रहा है। फिर बचपन याद आ गया। मंडला में नर्मदा किनारे ऐसे ही सुंदर घाट हुआ करते थे। धीरे-धीरे मिट्टी में दब गये। बाबा घाट, नाना घाट आदि। कुछ उत्साही युवक हर साल इन्हें निकालते हैं। और–! वहां का बाबा घाट और शाहगंज का पटा घाट दोनों और नर्मदा जी का स्वरूप एक से प्रतीत हुए। इतना ही नहीं घाट पर आने वाले लोग भी बम्हनी मंडला जैसे ही दिखाई दे रहे थे। वह चिपकू अवधेश शर्मा था। नाम-पता-फोन नम्बर पूछ रहा था। साथ ही लगातार उपदेश देता रहा। मैंने आधा-अधूरा अर्धसत्य बता दिया। अपना नाम बिभुदत्त मिश्र बता दिया। तब वह शिक्षा के बारे में पूछने लगा। वह जानकारी मिलने पर कुछ संतुष्ट हुआ और बोला आप तो स्वयं समझदार हैं, उचित कदम ही उठाएंगे। मेरे मन मे अनायास पिछले दिन मिले अनपढ़ व्यक्तियों की सरलता और इस पढ़े लिखे की कुटिलता और अविश्वास की तुलना होने लगी। अचानक वह बोला चलो वापस मंदिर चलें।
घाट पर जहां बैठे थे, दूर कुछ छोटे-छोटे मंदिर भी दिखाई दे रहे थे। मुझे लगा यह स्थान उपयुक्त होना चाहिए। उससे पूछा तो अनमने से बोला हां, जाकर देख लो, नहीं तो जगदीश मंदिर आ जाना। वहां भोजन व सोने की व्यवस्था कर देंगे, कल घर चले जाना। मैंने कहा ठीक है। टीले पर मंदिर की दीवाल पर स्वल्पाहार के स्थान का बड़ा सा विज्ञापन था। वहां पहुंचा तो देखा देवी का नया मंदिर है। कुछ ऊपर शिव मंदिर भी है। शिव मंदिर के सामने तीन-चार लोग लेटे-बैठे थे। कुछ आगे एक बाबा तार खींचने में लगा था। उन देहाती लोगो से मैंने पूछा क्या यहां रूका जा सकता है? उन्होंने कहा, हम भी रूके हुए हैं बाबा से पूछो। मैं झिझकता हुआ बाबा के पास गया। वह तो बिजली का तार खींचने में ही तल्लीन था। एक तार गिर गया। मैंने उठा दिया। इस पर उसने मुझे कनखियों से देखा। मैंने भी उसकी ओर ध्यान से देखा। सिर्फ लाल लंगोट लगाए उस अजीब सी आकृति वाले बाबा का पेट थोड़ा निकला हुआ था। और वह शरीर पर राख लपेटे था। क्या वह भी औघड़ है? हो, शायद!
मैंने बातचीत शुरू करते हुए कहा “क्या यहां रात्रि विश्राम कर सकता हूं?”
बाबा बोले: क्यों नहीं और लोग भी रूके हैं, वैसे ही आप भी रूको। भोजन बनाने के लिए सामान भी मिल जाएगा।
मैंने कहा: जो लोग पहले से रूके हैं वे शायद भोजन बनायेंगे तो मुझे दे देंगे।
बाबा बोले: पूछ लेना। आटा-दाल हम दे देंगे।
मैंने कहाः ठीक है, देखेंगे।
बाबा बोले: अभी तो भूखे हो, कुछ पका लो। (इस समय दोपहर का दो ढाई बजा होगा।)
मैंने जवाब दिया: नहीं, मैं खा चुका।
बाबा ने कहा: देखकर लगता तो नहीं। कहां खा लिया?
मैं बोला: खटपुरा के मंदिर में।
बाबा बोले: वहां से तो पैदल आ रहे हो। इतनी जल्दी कहां कुछ खाया होगा?
मैंने कहा: वहां एक बूढ़े बाबा हैं। एक रोटी और दाल बनाकर दी थी।
बाबा: नर्मदा जी में स्नान कर लिया?
मैं: हां स्नान करके ही आया हूं।
बाबा ने कहा: ठीक है मंदिर में जाकर आराम करो।
जहां बात हो रही थी उसके एकतरफ हनुमान मंदिर है और दूसरी ओर राम-जानकी का पुराना मंदिर। इसमें आवासीय परिसर भी है और बाबा शायद इसी में रहते हैं। मैं भी शिव मंदिर चला गया। वहां बहुत से लोग रूके हुए हैं। बैठकर मैंने एक अधेड़ स्त्री से पूछा, शाम को अपने साथ मेरे लिए भी खाना बना दोगे? उसने रूखपेन से जवाब दिया, हम दिन में एक टाइम खाना बनाते हैं,शाम को नहीं। तुम बाबा से सीधा (सीधा का अर्थ होता है बिना पकी खाद्य सामग्री जैसे आटा व दाल।) लेकर अपना चूल्हा जला लो। यहां सब अपना-अपना खाना बनाते हैं। लकड़ी भी बीन लाओ। (गौरतलब है परिक्रमावासी दूसरे का बनाया न खाते हैं न खिलाते हैं। यह बात काफी हद तक ठीक भी है। परंतु पश्चिमी निमाड़ (बड़वानी-धार) में परिक्रमावासियों को गृहस्थ अपने घर में बुलाकर भी स्वयं के द्वारा तैयार खाना खिलाते हैं। कई बार तो इनकी संख्या सैकड़ां में हो जाती हैं और पूरा गांव इनकी व्यवस्था में जुट जाता है।) खैर, मैं वहीं लेट गया। परिक्रमावासियों को लग रहा होगा कि हम पवित्र लोगों के बीच पेंंट-शर्ट वाला दढ़ियल कहां से आ गया। थोड़ी देर बाद एक स्त्री चाय लेकर आई। सबने बांटकर पी, मुझे नहीं दी। शाम हो गई थी। नर्मदा जी की पूजा अर्चना शुरू हुई। ये लोग जबलपुर के हैं। मैंने बताया कि मैं भी मण्डला से हूं पर रूखापन बना रहा।
इसी बीच तीन-चार लोग कपड़े-लत्ते, फल मिठाई वगैरह लेकर आए। मैंने सोचा चलो, अच्छा हुआ, मुझे भी कुछ मिल जाएगा। परंतु ये एक महिला परिक्रमावासी के परिवार के थे। जबलपुर से आए थे। संपन्न यादव ठेकेदार। कुछ भी खाने को नहीं मिला। रात बढ़ती जा रही थी और भूख भी। सोचा परिक्रमावासी काफी शुष्क लोग हैं। पूछा तक नहीं। इतने में वही बाबा जी आ गए। उनका आगंतुकों से परिचय होता रहा।
बाबा ने मुझे कोने में दुबके देखा तो बोले “अरे आप कैसे कोने में बैठे हो, भोजन पाया? ओढ़ने बिछाने के कपड़े भी तो नहीं हैं?”
मैंने कहा “कोई बात नहीं, ऐसे ही लेट जाऊंगा। भोजन अब कल ही करूंगा।”
बाबा ने कहा “अरे, ऐसे थोड़ी ही होता है। चलो मेरे साथ चलो। अपने लिए कुछ बनाया है, उसी में पा लेना।”
मेरे लिए यह एक बेहद सुखद अनुभूति थी। भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी कुछ-कुछ समझ में आने लगा था। मैं उनके साथ चल पड़ा।
(अपनी यात्रा के शुरूआती दिनों को लेकर विस्तार में जाना संभवतः इसलिए जरूरी है जिससे यह समझ सकें कि मेरे रूपांतरण में ये शुरूआती दिन कितने महत्वपूर्ण रहे हैं। मेरा अहं और मेरी झिझक किस तरह दूर हो रहे थे। कैसे मैं एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर रहा था, जो इस पृथ्वी पर और भौगोलिक रूप से मेरे इतने नजदीक होते हुए भी, मुझसे शायद जन्म जन्मांतर की अंतिम गणना तक दूर थी। अनजाने में पहली बार एक ऐसी व्यवस्था में स्वयं को पा रहा था जो वर्तमान आर्थिक युग को नकारती थी। साथ ही संभवतः पहली बार आर्थिक युग या अर्थ या धन पर आधारित सामाजिक व्यवस्था का बेहतर विश्लेषण कर पाने की शुरूआत करने की स्थिति में आया था। यह एक नए सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक व आध्यात्मिक दृष्टांत को समझ पाने की शुरूआत भी थी। समाज में परस्पर निर्भरता कैसे विकसित होती है, यह भी दिखाई देना शुरू हो रहा था और धर्म का सुंदर और वीभत्स दोनों ही रूपों का आंरभिक आभास भी होने लगा था।)
मैं उठकर बाबा जी के साथ राम जानकी मंदिर आ गया। उन्होंने आंगन में आसन डालकर मुझे बैठाया। बोले अभी आरती करके फिर पाएंगे। आरती बड़ी आकर्षक थी। अंदर से एक स्त्री जो कि साध्वी ही है, भी शामिल हुई। वह साध्वी शायद बाबा की पत्नी है। दो लड़के भी रूके हुए थे। बाबा की सदिच्छा मुझे आकर्षित कर रही थी।
एकाएक बाबा ने साध्वी से कहा “ये भगत भी यहीं भोजन पाएंगे। दुःखी हैं। पैदल चलकर आए हैं। सबकुछ त्यागकर आए हैं। पढ़े-लिखे अच्छे घर के हैं।”
मैं आश्चर्य से बाबा की ओर देखने लगा।
तभी बाबा ने पहली बार मुझसे कुछ पूछा: “कहां से आ रहे हैं?”
मैंने कहा “भोपाल से।”
वे बोले “आराम से बैठो। बाटी बनाई है। अभी दाल-बाटी पाते हैं, फिर कंबल दे देगें। यहीं सो जाना। कल से अपनी व्यवस्था परिक्रमावासियों के बीच जमा लेना। जब तक चाहो यहां रहो। जब मन ठीक लगे चले जाना। मैं भी कल ही लौटा हूं। घूमता रहता हूं। परिक्रमावासी यहां रूकते हैं। उन्हें सीधा-सामान देते हैं, वे अपना बनाते हैं। यहां कोई नहीं आता। आप तो जब तक हो भोजन यहीं पा लेना और विश्राम वहां कर लेनाा”
बाबा की सहृदयता ने मुझे बेहद प्रभावित और द्रवित किया। न उसने नाम पूछा, न जात, न धर्म, न पता। इतना ही नहीं उस पर यह भी कहने लगा, मैंने आपको वहां जब घाट के बुर्ज पर बैठे थे, तभी देख लिया था। मुझे पता था यहां आओगे और रूकोगे।
मैं सोच रहा था कि जो बाबा ने सोचा वह तो मैं भी नहीं सोच रहा था, तो बाबा ने कैसे अनुमान लगा लिया? विचार आया ऋषि मार्कण्डेय ने नर्मदा की परिक्रमा क्यों शुरू की होगी। गंगा नगरीय सभ्यता के विकास की प्रतीक है और नर्मदा आरण्यक संस्कृति की। मनुष्य के भीतर बसी करूणा ही तो मनुष्य का आदिमतम गुण है। शायद आगे और कुछ भी समझ में आए।
बाबा ने अपने धूने पर बाटियां दबा रखी थीं। खूब घी डालकर, हरी मिर्च के साथ दाल-बाटी खाई। बाबा ने जबरदस्ती करके खूब खिलाया। तीन दिन बाद भरपेट भोजन किया। बाद की बातचीत में सामने आया कि ये दोनों लड़के गुना जिले के कुंभराज से आए हैं। वहां भी बाबा का स्थान है। जहां हम बैठे थे, वह भी बाबा के पूर्वजों का ही है, उनके बड़े पिताजी (ताऊ) स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और बड़े किसान थे। बाबा ने एक दरी और कंबल दिया। वहीं धूना के किनारे सो गया। बाबाजी से मिलकर बहुत अच्छा लगा।
सुबह पांच बजे के पहले ही नींद खुल गई। सोचा शौच जाने का अच्छा समय है। टांगो की हालत के मद्देनजर पूरा बैठ भी नहीं पा रहा था। नर्मदा जी के किनारे कुछ दूर चला गया। बहुत दिन बाद भरपेट खाना खाया था इसलिए पेट भी ठीक से साफ हुआ। अतिरिक्त वस्त्र तो थे नहीं इसलिए जल्दी से पूरे कपड़े उतारकर नहा भी लिया। यूं पानी में तो कपड़े सहित भीगता ही रहा था। परंतु नहाने की अपनी एक स्वीकार्य विधि भी तो है! सूर्योदय हो रहा था। नर्मदा का विस्तार अब दिखाई देने लगा था। सूर्योदय और मछुआरों की छोटी-छोटी डोंगियां देखते हुए शांत और आत्मविभोर-सा बैठा रहा। ये छोटी-छोटी डोंगियां दूर से बचपन में बनाई कागज की नांवों की तरह की दिखाई दे रहीं थीं। चिड़ियों की चहचाहट भी मन शांत कर रही थी। पत्थर पर बैठ पानी में पैर डाले बैठा रहा। हर तरह की पीड़ा और क्रोध जैसे कहीं छूट गए थे। केवल पैरों के छाले ही दुख रहे थे। दांत का दर्द भी चला गया। नर्मदा जी में स्नान ने जादू जैसा असर किया था।
तभी बाबाजी दो बाल्टियों में पानी लाते दिखे। साठ बरस के होंगे, पर पूरी तरह से तंदरूस्त। शायद पहले पहलवानी करते रहे हों। ऊपर आकर शरीर पर भस्म पोती और मुझसे कहा,
“डोलडाल हो आए?”
मैं समझ गया कि शौच जाने को डोलडाल कहते होंगे। वे फिर बोले “स्नान कर लिया?”
मैंने कहा “हां।”
“थोड़ी देर में चाय बनेगी ।”
मैंने देखा मंदिर में दर्शन करने और जल चढ़ाने वाले आने लगे हैं। मुझे घूर रहे हैं। इस बीच चाय बनी। सबने अपने अपने गिलास में ली। मुझे भी एक गिलास मिल गया। अब यह मेरे पास रहेगा। चाय पियो, धोओ और पास रखो। मेरे इस नए जीवन की पहली संपत्ति। अब सब लोग अपना-अपना काम करने लगे। कोई पानी भरने लगा, कोई झाडू लगा रहा था तो कोई निंदाई कर रहा था तो कोई लकड़ियां बीनने लगा था। धीरे-धीरे हममें बातचीत भी होने लगी। सामूहिकता संवाद भी बनाती है। मुझे बर्तन धोने से मना कर दिया गया। मैंने बरामदे में झाडू लगाना शुरू किया। थोड़ी देर हुई होगी, मुझसे झाडू भी ले ली गई। न जाने क्यों चीन में माओ के लांग मार्च का ध्यान हो आया। उस दौरान चीन में कार्यकर्त्ता जिस घर में रात्रि विश्राम करते थे, वहां सुबह कुछ घंटे मेजबान के खेत आदि में कार्य करके, उसके अतिथि सत्कार का ऋण चुकाते थे। हमारे आदिवासी समाज में भी ऐसी ही प्रथा है परंतु यहां तो सर्वथा विपरीत परिस्थिति है। विशुद्ध धार्मिक यात्रा! पंरतु ऋण मुक्ति का वही उपाय? सचमुच हैरानी की बात है!
बाबा सपत्नीक हवन को बैठ गए। मैं उठकर जाने लगा तो बाबा बोले “आप भी बैठो, आप तो ब्राह्मण हो।”
मैंने कहा: “हां, जन्म से लेकिन कर्म से नहीं। आपको कैसे मालूम ?”
बाबा ने कहा: “जैसे ट्रेन में टी.टी. पहचान जाता है कि कौन किस दर्जे का यात्री है और कौन बे टिकट। जैसे स्कूल में मास्टर समझ जाते हैं कि कौन सा विद्यार्थी किस काबिल है। वैसे ही इतने भ्रमण और अनुभव के बाद हम भी आदमी देखकर सब समझ जाते हैं। बैठ जाओ।”
मैंने कहा “कमाल है!” और मैं बैठ गया।
प्रसाद लेकर शिव मंदिर के बाहर पत्थर पर बैठा ही था कि तीन-चार बुजुर्ग मंदिर में आए और दर्शन करके वहीं बैठ गए। चेहरे से रिटायर्ड शिक्षक लग रहे थे। मेरा अंदाजा सही निकला। वे सब ब्राह्मण ही थे। क्या मुझ में भी बाबा जी की दिव्य शक्ति आ गई? सिर्फ दो दिन में? उन्होंने मुझसे उगलवा ही लिया कि मैं ब्राह्मण हूं। वैसे बाबा इसे पहले ही प्रमाणित कर चुके थे। क्या ब्राह्मण होना भारत में आज भी इतना महत्वपूर्ण है? जातिवाद की जड़ों की गहराई, मजबूती और उसकी पैठ अब समझ में आ रही थी। मैंने गोलमाल परिचय के बाद बताया कि बरसात बाद नर्मदा परिक्रमा का इरादा हैं। वे लोग नर्मदा महिमा सुनाते रहे।
जारी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया

