
- शशि तिवारी
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस: जरा ठहर कर सोचिए कि क्या सच में ये ध्यान देने योग्य नहीं हैं?
पिछले दिनों ‘टॉक थ्रू’ पर पर पूजा सिंह के कुछ अनुभव (‘हार्ड डिस्क के बारे में बात करनी है? किसी मेल कलीग को फोन दीजिए’) पढ़ने को मिले। इन अनुभवों में दिखा कि एक व्यक्ति की योग्यता को सिर्फ इसलिए कम आंकना बल्कि उसे सिरे से नकार देना क्योंकि वह स्त्री है। एक पढ़ी-लिखी, अपने कार्य में दक्ष और अपने क्षेत्र में अच्छा कर रही स्त्री को उसके संपूर्ण ज्ञान के साथ खारिज कर दिया जाता है। यह विडंबना और गहरी हो जाती है जब पता चलता है कि यह भेदभाव तकनीक के क्षेत्र में कार्यरत पुरुष कर रहा है जिनसे अधिक व्यापक सोच की उम्मीद की जाती है। यह एक बानगी है कि आम तौर पर समाज स्त्री के प्रति कैसी धारणा सदियों से वहन कर रहा है। समय बीतने पर भी इन कड़वे अनुभवों का कसैलापन नहीं जाता है। इन अनुभवों से उपजी हताशा और क्षोभ को संवेदनशील पुरुष समझ पाएंगे और स्त्री गहरे महसूस कर पाएगी। आखिर यह कमोबेश हर स्त्री की आपबीती जो है।
स्त्री घर में रह रही हो या बाहर निकल रही हो, हर हाल में उसके अपने संघर्ष हैं। हमारे सम्मानित समाज ने तय मानकों से इतर उसे पढ़ने-लिखने, बाहर निकल कर बराबरी से काम करने की सो कॉल्ड ‘आज़ादी’ दे कर उपकृत तो कर दिया है पर उसकी योग्यता पर संदेह करना अभी छोड़ा नहीं है और उसकी क्षमता पर भरोसा करना अभी पूरी तरह सीख नहीं पाया है। ऐसी कितनी ही बातें याद आ रही हैं। कुछ अपनी कुछ दूसरों की। हालांकि इसमें नया कुछ भी नहीं है, हम सभी ऐसी बातों के इतने आदी हो चुके हैं कि इन पर ध्यान भी न जाए। पर इसीलिए बहुत जरूरी है कि इन पर बात हो क्योंकि ध्यान जाना चाहिए। अपने आस पास किसी भी व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली बात हो रही हो तो ध्यान तो जाना ही चाहिए। कुछ अनुभव जो समय-समय पर किन्हीं स्त्रियों के रहे, उन्हें रख रही हूं। जरा ठहर कर सोचिए कि क्या सच में ये ध्यान देने योग्य नहीं हैं?
अनुभव: 1
संस्था में सभी अपने हिस्से के काम निबटा रहे थे। नोटिस करने वाली बात यह थी कि साथ ही नियुक्त हुए पुरुष सहकर्मियों के काम को लेकर संस्था प्रमुख आश्वस्त थे। उनके पेपर्स लेकर आराम से रख लिए जाते जबकि महिलाकर्मियों के काम को उलट-पलट कर सूक्ष्म दृष्टि से पढ़ा जाता। नई नौकरी थी पर खुद पर भरोसा भी था। यह रवैया थोड़ा विचलित तो करता था, फिर भी बिना कुछ बोले उन्हें ऐसा करने का भरपूर अवसर दिया गया। करीब एक सप्ताह तक ऐसा चला। फिर एक दिन उन्होंने कहा, ‘आपके काम में गलतियों की गुंजाइश न के बराबर है। क्या आप घर ले जाकर कुछ अतिरिक्त काम कर लेंगी?’
जवाब में विनम्रतापूर्वक बोली गई ‘ना’ बड़ी सुकूनबख्श थी।
अनुभव: 2
विद्यालय का कार्यभार संभाले थोड़ा समय ही बीता था। निरीक्षण के लिए आए उच्चाधिकारियों ने पिछले कई वर्षों में न कराए गए कामों के लिए उत्तरदायी ठहराने की पूरी कोशिश की। महिलाकर्मी ने अपना पक्ष रखा जो कि सर्वथा उचित था। पर इससे अफसर के अहं को चोट पहुंची। वे बाद में यह कहते पाए गए कि अमुक स्थान पर एक महिला थी जो कि बहुत बोल रही थी। यही भाषा थी उनकी….ठीक यही शब्द।
जाहिर सी बात है, समाज को हर सही या गलत पर चुप्पी साधे महिलाओं की आदत पड़ी हुई है। अपने साथ हो रही ज्यादती पर कुछ कहना ‘बहुत बोलना’ माना जाता है। और जब ऐसी मानसिकता लिए लोग हों तो फिर बोलती हुई स्त्रियां कहां सुहाती हैं भला?
अनुभव: 3
बेटी को कॉलेज में दाखिला दिलाने का समय था। बेहतर की तलाश में सभी संभावित विकल्पों पर विचार हो रहा था। इस क्रम में जब पति कॉलेज सर्च करते, वहां बात करते तो सब कुछ नॉर्मल पर जब पत्नी यही कर रही होती तो दृश्य बदल जाता। एकेडमिक रिकॉर्ड्स, वांछित कोर्स, ब्रांच आदि के विषय में विस्तार से बात के बाद जब फीस स्ट्रक्चर आदि की बात आती तो उधर से वे कहते, “सर को फोन दीजिए प्लीज़।”
ऐसा एक बार नहीं हुआ। बार-बार हुआ। अलग-अलग संस्थानों में हुआ। स्पष्ट है कि बाकी सब तो ठीक है पर फाइनेंशियल मुद्दों पर पुरुष से ही बात करने को तरजीह दी जा रही थी। इसके पीछे की सोच साफ थी कि तुम कहां इन बातों को समझोगी। और समझती भी हो तो अंतिम निर्णय तो घर के पुरुष का ही होगा। ( यह अलग बात है कि पूरे पुरुष समुदाय की तरफ से संतुलन साधते पति फोन ले कर साफ कहते कि जिनसे अब तक बात की है उन्हीं से आगे की बात भी कहिए। हम दोनों बाद में डिस्कस कर समझ लेंगे कि क्या करना है।)
बात यहीं खत्म नहीं होती। एडमिशन के बाद हॉस्टल देखने की बारी थी। सभी सुविधाएं पसंद आने के बाद बात आई फीस की। “मैम पेमेंट कैश में करेंगी या ऑनलाइन? और ईयरली या सेमेस्टरवाइज?” काउंटर पर बैठी महिला ने पूछा। जवाब में कुछ बोलने से पहले ही उनके बगल में बैठे पुरुष बोल पड़े- “वेट…! सर को आ जाने दीजिए। वहीं बताएंगे ना।”
सर, जो एक कॉल आने पर जरा देर के लिए बाहर चले गए थे। उन्हें सर का इंतजार करने दिया। आने पर सर से वही प्रश्न पूछा गया। सर ने वह सवाल अपनी पत्नी की ओर उछाल दिया।
पत्नी ने पेमेंट के लिए अपना फोन उठाया तो असहज होने की बारी काउंटर के दूसरी ओर बैठे लोगों की थी।
अनुभव: 4
एक सज्जन कुछ आकस्मिक आवश्यकता के समय में सहायता के लिए एक मित्र के पास गए। रकम जरा बड़ी थी जो उन्हें चाहिए थी। पर मित्र और उनकी पत्नी ने आपस में विचार कर मदद करना स्वीकार किया। अब वहां वे सज्जन अपनी बड़ी परेशानी भूलकर उससे ज्यादा बड़ी उलझन में पड़ गए। धीमे स्वर में बोले, “जब आप यूज़ कर ही रहे हैं फिर भाभीजी को नेट बैंकिंग की क्या जरूरत…! इतने स्कैम हो रहे हैं! कहीं कुछ….।”
मित्र भी धीरे से बोले,” भैया अभी तो आपकी भाभीजी ही आप को संकट से उबार सकती हैं सो आप इस पर ध्यान दीजिए… जब स्कैम होगा… हम लोग देख लेंगे।
क्या यह हैरत की बात नहीं कि ये विचार एक उच्च शिक्षित, कॉलेज में लेक्चरर व्यक्ति के हैं?
अनुभव: 5
एविएशन सेक्टर में काम कर रही लड़की बीमारी की हालत में डॉक्टर के पास इलनेस सर्टिफिकेट बनवाने गई। उन्होंने पूछा, ‘‘सामने की बिल्डिंग में रहने वाली जो लड़की अमुक एयरलाइंस में काम करती है क्या आप उसे जानती हैं? उसका वॉट्सएप मैसेज आया था, उसे भी एक दिन का इलनेस सर्टिफिकेट चाहिए। गई होगी कहीं बॉयफ्रेंड के साथ…।’’
‘‘सर, आप यह कैसे कह सकते हैं? हो सकता है उसे वास्तव में जरूरत हो।’’
‘‘अरे सब पता है मुझे। कैसे तो मॉडर्न कपड़े पहनती है….’’
‘‘सर…. मॉडर्न कपड़ों का मतलब यह नहीं होता कि….’’
‘‘बाइ द वे…. आप तो उसे जानती तक नहीं फिर क्यों उसकी साइड ले रही हैं?’’ बात काटते हुए वे बोले।
‘‘सर, उसे तो मैं सच में नहीं जानती। नहीं पता कि वह कैसी है लेकिन आपकी सोच वास्तव में बहुत बुरी है और इतना जान गई हूं कि आप मेडिकल सर्टिफिकेट के साथ कैरेक्टर सर्टिफिकेट भी देने का काम करते हैं।’’
अनुभव: 6
पत्नी की खास सहेली के यहां विवाह समारोह में जाने में पति ने अनिच्छा जताई। इनकार की वजह यह थी कि निमंत्रण पत्र पर उनका नाम नहीं लिखा गया था। पत्नी के नाम के साथ लिखे ‘with family’ को इग्नोर करते हुए उनका कहना था कि क्या मैं ड्राइवर की हैसियत से साथ चलूं?
मतलब आप पत्नी के स्वयंभू मालिक तो बन बैठे पर शादी के 30 सालों के बाद भी उसके परिवार का हिस्सा न बन पाए।
ये कोई मनगढ़ंत किस्से नहीं …
बाहर काम करते हुए एक लंबा समय गुजरा और कई साल अभी बाकी हैं। समय के साथ बहुत कुछ बदला, बहुत सारी नई चीजें जानने सीखने को मिलीं पर कुछ चीजें जो शुरू से अब तक जस की तस हैं उनमें एक है कि काम करती महिला को अतिरिक्त संतुलन साधने की आवश्यकता हमेशा रही। यहां हम गृहस्थी और नौकरी में संतुलन की बात नहीं कर रहे। यह तो फिर भी उतना कठिन नहीं जितना कि बाहर अपनी बाउंड्रीज निर्धारित करना। यदि महिला शांत, रिजर्व और काम से काम रखने वाली है तो मान लिया जाता है कि जरूर इसके घर परिवार में कुछ दिक्कत है। यदि शादीशुदा हुई तब तो पति से रिश्तों पर भी प्रश्नचिह्न लगाए जा सकते हैं। सिंगल है तो खड़ूस या घमंडी का तमगा दिए जाने में देर नहीं की जाती। इसके उलट अगर थोड़ी खुले मिजाज की, हंसने बोलने वाली,घुल मिल कर रहने वाली हुई तब अलग संभावनाएं तलाशी जा सकती हैं। ऐसे में यदि महिला अपने उच्चपदस्थ/ समकक्ष/ अधीनस्थ आदि के साथ एक सम्मानजनक संबंध मेंटेन करने में सफल हो पाई है तो उसके एफर्ट्स की सराहना करनी चाहिए।
फिर भी….ऐसी बातें जब बाहर के लोगों की ओर से आएं और परिवार में सपोर्ट सिस्टम मजबूत हो तो इनसे निकलना आसान होता है। पर घर में यही सब झेलना पड़े तब?
ये कोई मनगढ़ंत किस्से नहीं बल्कि हम सब के ही बीच की महिलाओं की अनुभवजन्य बातें हैं। सबसे ज्यादा निराशाजनक यह है कि हर बार सामने के किरदार में आए लोग वेल क्वालिफाइड हैं। हास्यास्पद है कि अपनी यही मानसिकता लिए ये लोग समय आने पर स्त्री को महान बताने से नहीं चूकते।
स्त्री स्वतंत्रता का फलक बहुत व्यापक है। विभिन्न आयामों के साथ स्त्री विमर्श की अपरिमित गुंजाइशें हैं। स्त्री को विक्टिम बना कर पुरुष को कटघरे में खड़ा करना कभी उचित नहीं लगा। पर यह पुराने समय से चली आ रही समाज की कड़वी सच्चाई है जिनसे हमें नजरें फेरनी नहीं चाहिए। सामान्य रूप से देखने पर ये छोटी बातें लगती हैं पर वास्तव में देखा जाए तो एक स्त्री के आत्मविश्वास पर आघात करती हैं हर बार। ऐसे हर अवसर पर समाज की मानसिकता पर हैरानी होती है और एक स्त्री के तौर पर निराशा। खीझ सी होती है कि तमाम सुविधाओं, संसाधनों के साथ हम आधुनिक तो हो गए पर विचार के स्तर पर अभी भी आदिम ही रह गए शायद।
यदि स्त्री को चयन का अधिकार दिया जाए कि वह महानता की मूर्ति मानकर स्वयं को पूजा जाना पसंद करेगी या सहज, स्वाभाविक तरीके से स्वयं को एक व्यक्ति भर मान लिया जाना तो निःसंदेह वह दूसरा विकल्प ही चुनेगी। वास्तव में उसे अच्छा महसूस होगा कि समाज गरिमापूर्ण ढंग से उसकी उपस्थिति को स्वीकार करना सीख ले।

