एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
कुंभराज के लिए प्रस्थान
शाम पांच बजे शाहगंज से कुंभराज के लिए प्रस्थान किया। साधुओं ने कहा यात्रा में नंगे सिर नहीं निकला जाता तो पहली बार गमछे का फट्टा बनाकर साफे जैसा लपेट लिया। तभी फिर बचपन के बब्बा जी की याद आ गई। वे बेहद शानदार साफा बांधते थे। उनकी छवि अभी भी धुंधली नहीं हुई है। बड़ी-बड़ी मूंछें और सिर से ऊपर तक का डंडा। उनके बाद हमारे खानदान में किसी ने साफा नहीं बांधा। बस में बैठकर बुधनी पहुंचे। कंडक्टर ने पैसे नहीं लिए। बुधनी पहुंच कर राम मंदिर में रूके। बढ़िया प्रसादी ‘ग्रहण’ की। यहां एक लंबे बाल वाला गोलमटोल साधु जो सिगरेट पीता है और डॉव साबुन से नहाता है, भी ठहरा हुआ है। उसने बताया एक समय था, जब उसकी जटाएं, उसके शरीर से भी लंबी हो गई थीं, तब वह ‘वीआईपी’ साधु बन गया था। बड़े-बड़े नेता, उद्योगपति, फौजी अफसर उसके ‘दर्शन’ करने आते, फोटो खिंचवाते और ढ़ेर सी दक्षिणा दे जाते थे। धीरे-धीरे जटाएं छोटी होती गई और उसका वैभव काल भी समाप्त हो गया। इसका उसे बड़ा क्लेश है। वह उस काल के लौट आने के इंतजार में रहता है। इसीलिए वह दर-दर ‘भटक’ रहा है और वह इसे ‘भ्रमण’ कहता है। मैंने उसका नाम तक जानने की कोशिश नहीं की। यह भी मजेदार है कि उसका सारा साधुत्व, सारी महिमा सिर्फ उसके लंबे बालों की वजह से ही थी उसका अपना कोई बौद्यिक योगदान नहीं? क्योंकि बालों का बढ़ना एक प्राकृतिक प्रक्रिया ही है। जैसे कोई जानवर तीसरा सींग निकल आने भर से पूज्य हो जाता है, वैसे ही यह अपने बालों की वजह से पूज्य हो गया। वहीं साधु होकर भी वैभव व लालच से खुद को दूर नहीं रख पाया।
बुदनी घाट और मंदिर में वह लालित्य नहीं है जो शाहगंज में है। दोपहर भोजन के बाद एक घटना घटी जिसने साधु समाज की कुछ अन्य विशिष्टताओं से मेरा परिचय कराया। दो गृहस्थ आए और उन्होंने सभी साधुओं को विदाई के बीस-बीस रुपए दिए। छविदास बाबा को भी जब बीस रुपए ही देने लगे तो वह बोले, “यहां के बाबा को बुलाओ। शरणागतों, अभ्यागतों और महंतों सबको एक ही लाठी से नहीं हांक सकते।” हंसदास बाबा भी इसी स्वर में थे। दोनों ने अधिक रुपए झटक लिए। सियाचरण बाबा भंडारी की भूमिका में थे। उनके लिए भी अतिरिक्त दक्षिणा मांगी तो उन्होंने लेने इंकार कर दिया। बाबाओं का लोभी चेहरा और स्पष्ट होता जा रहा था।
दोपहर चाय पीकर मंदिर से दो ढ़ाई किलोमीटर की दूरी पर स्थित स्टेशन के लिए निकल पड़े। स्टेशन पहुंचकर प्लेटफार्म के दूसरी ओर जमीन पर बैठ गए। मैं भी पग्गड बांध उनमें शामिल हो गया। गाड़ी की प्रतीक्षा के दौरान मैं अपने संशय और संदेह को दबा नहीं पाया।
मैंने पूछा – “क्या टिकिट नहीं लेंगे?”
जवाब मिला- “अरे, कैसी बात करते हैं? साधु और टिकिट?”
मैंने कहा- “तो, मैं क्या करूं?”
जवाब आया- “अगर साधुओं की जमात में शामिल हुए हो तो टिकिट भूल जाओ, नहीं तो अलग हो जाओ। अपनी रेल में तो टिकिट लेकर यात्रा करना साधु का ‘अपमान’ है।’’
मैं चुप रह गया। सोचा अभी तो यात्रा शुरू ही हुई है। मेरी पहली बिना टिकट यात्रा का वृतांत भी कम रोचक नहीं है। छह बजे बीच पटरी पर गोंडवाना एक्सप्रेस आकर रूकी। वैसे यहां उसका स्टापेज नहीं है। पहले जब भी यहां ट्रेन से गुजरा हूं, इस स्टेशन ने मुझे बेहद आकर्षित किया था। लगता था बुधनी रूकना चाहिए। आज मैं एक विचित्र परिस्थिति में यहां हूं। इस तरह से यहां आऊंगा इसकी कल्पना भी नहीं की थी। तभी साधुओं का एक पुण्यवचन कानों में पड़ा। “जनरल डिब्बे में सवारी हमारा अधिकार है और स्लीपर में टी.टी. और यात्रियों का सहयोग।” इसे ‘मॉरल कोड ऑफ कंडक्ट’ की संज्ञा दी जा सकती है!
निरीक्षण शुरू हुआ। सभी डिब्बे ठसाठस भरे थे। गार्ड से पहले ‘केवल विकलांगों के लिए’ वाला डिब्बा खाली था। सभी उसमें चढ़ गए। गार्ड और पुलिस वालों ने भी सिर हिलाकर मौन स्वीकृति दी। डिब्बे में चार सवारियां थीं। उनमें एक बीमार महिला जो एक सीट पर लेटी हुई थी। हम सबने डिब्बे में जमीन पर आसन जमा लिया। बाहर बारिश के बाद बेहद हरा भरा है। इसी रास्ते से एक महीने पहले मैं पैदल गुजरा था। बिनेका का हनुमान गढ़ी मंदिर भी दिख गया। इसी बीच हड़बड़ाट सी मच गई। बीमार स्त्री ने सीट पर ही पेशाब कर दी। वह बहकर बाबा लोगों की ओर आने लगी। हड़कंप सा मच गया। जल्दी-जल्दी सबने सामान खिसकाया, फिर भी कुछ-कुछ छुआ गया। तुरंत बाथरूम में जाकर सफाई हुई।
किसी बाबा की आवाज आई – “राम-राम पेशाब, वह भी मुसलमान स्त्री की! छी-छी!”
गौर करिए, सबसे कम जोर पेशाब पर उससे थोड़ा ज्यादा जोर मुसलमान पर और सबसे ज्यादा स्त्री पर। मैं मुस्कराया, किसी हिन्दू स्त्री की होती तो क्या छी-छी नहीं होती? खैर, भोपाल छोड़ने के एक माह बाद जिस नए परिवेश व परिस्थिति में भोपाल की ओर लौट रहा था, वह एक माह पूर्व सर्वथा अकल्पनीय ही था। भोपाल करीब आने लगा, तो मैं ऊपर चढ़कर बैठ गया। वैसे भी विकलांग डब्बे में कौन देखेगा? पर अपने अंदर का डर, या संकोच तो हावी हो ही जाता है। सोचा कि बाबा लोग भी एकतरह से विकलांग की श्रेणी में ही तो आते हैं। पारिवारिक और आर्थिक विकलांगता। भोपाल स्टेशन पर दस-पंद्रह मिनट रूककर ट्रेन चल दी। मैंने तब राहत की सांस ली। भोपाल से इस तरह से गुजरना एक अजीब सी अनुभूति रही। मिसरोद से सूखी सेवनिया तक खिड़की से बाहर देखा तक नहीं। भोपाल से गुजरते हुए अंदर अजीब सा सन्नाटा पसर गया था। बस यही लगता रहा कि जितना जल्दी हो सके, यहां से निकल जाएं।
रात नौ बजे के आसपास बीना पहुंचे। प्लेटफार्म पर आसन जम गया। पारले ग्लूकोज बिस्किट के पैकेट और मूंगफली खरीद कर थोड़ा-थोड़ा “पाकर” खूब सारा जल “पाया”। थोड़ी देर में दमोह-कोटा पेसैंजर आई। आश्चर्यजनक ढंग से साफ सुथरी व सुसज्जित रेल समय पर आई। यात्री भी साधुओं को स्थान दे ही देते हैं। टिकट पूछने का तो सवाल ही नहीं। चार बजे सुबह रूठियाई पहुंच गए। अंधेरा ही था। सभी प्लेटफार्म पर जम गए। इनमें से कोई भी कुर्सी या वहां लगी बैंच पर नहीं बैठता। जमीन पर ही आसन-जमाते हैं। एक आदमी रखवाली करने को जगता रहता है। छह बजे कुंभराज के लिए एक मिनी बस मिली। किराया पच्चीस रुपए लेकिन साधुओं के लिए रियायती पंद्रह रुपए। सबने अपना-अपना किराया दिया। हम चल पड़े थे, आगरा बंबई रोड पर गुना से ब्यावरा की ओर। ख्याल में आया कि इससे पहले मैं न जाने कितनी बार इस सड़क से अपनी कार से निकला हूं। आज उसी जानी-पहचानी रोड पर एक मिनी बस में साधुओं के साथ यात्रा करना एकदम अलग अनुभव है।
कुंभराज: साधू समाज में प्रवेश
रात में किसी ने कुछ खाया नहीं था, इसलिए शौच की आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई। कुंभराज पहुंचे तो बताया कि अभी आठ-नौ किलोमीटर और आगे जाना है। दूसरी बस एक किलोमीटर दूर से मिलना थी। पैदल चल पड़े। अब पेट में कुछ खलबली सी मचने लगी थी। आठ बजे दूसरी बस आई। पांच रुपए किराया। साढ़े आठ बजे सड़क के किनारे बने ‘मनोकामनापूर्ण श्री ऊमर वाले हनुमान, ग्राम बड़ौद (कुंभराज)’ पर उतर गए। मंदिर के आसपास खेत ही खेत और मंदिर के नजदीक कोई आबादी भी नहीं है। यहां भी खेतों में ही घर बनाने का रिवाज है। जंगल भी नहीं है। एकदम सपाट और सोयाबीन के लहलहाते खेत। मंदिर में केवल एक हैंडपंप है। उसमें भी पानी काफी नीचे है। गर्मी में तो यह रेगिस्तान ही लगता होगा। पहुंचते ही सबसे पहले सब लोग अपना-अपना लोटा कमंडल लेकर अलग-अलग दिशाओं में खेत में निकल पड़े। मुझे अभी भी खुले में बिना किसी आड़ के लगभग आधा खड़े होकर शौच करने में संकोच होता है। इसलिए काफी दूर गया। खेतों में बहुत कीचड़ है। उधर बाबा लोगों की अगवानी के लिए काफी लोग आए हैं। मंदिर में कोई बाबा नहीं है। बस एक पुजारी है। ठाकुर बाबा ने इसे अपना भरण-पोषण स्थान बना रखा है। कुंभराज कस्बे के और आसपास के भक्तगण यहां आते हैं। मंदिर के एकतरफ सड़क पर होने से चढ़ोत्री भी काफी आ जाती है।
रास्ते में नींद पूरी नहीं हो पाई थी। न ही ठीक से लेटना-बैठना हो पाया था। मेरे बदन में तो पिछले पांच छह दिनों से दर्द हो रहा था। जब से मोटरसायकल पर अड्डू के साथ घूमने गया था। अब सबको विश्राम के लिए स्थान आवंटित हुए। गंजेड़ी पार्टी यानी बाबा छविराम दास, कमलदास और मोहनदास को एकसाथ गुरु महाराज के धूने पर स्थान दिया। हंसदास को परछी में तखत पर। छोटू और मैं वहीं परछी में जमीन पर और सियाचरण बाबा भण्डारे के बाहर तखत पर। वैसे यह स्थान शाहगंज से एकदम अलग है। वहां नर्मदा तट की सुंदरता, शांति और अर्जित एकाकीपन था। यहां इस सबका सर्वथा अभाव है। यहां बाबाओं के आसपास भीड़ लगी रहती है और शोर शराबा होता रहता है। जल के तो यहां दर्शन तक नहीं होते। यहां पूरे समय खाना-खिलाना ही चलता रहता है। यहां मीणा यानी देशवाड़ियों की संख्या और प्रभाव ज्यादा है।
मुझे भोपाल छोड़े एक महीना होने में अभी दो दिन बाकी हैं। इन सत्ताईस-अठ्ठाइस दिनों का अनुभव तो अनूठा ही कहा जाएगा। यहां बाबा छविराम दास को विशेष सम्मान दिया जा रहा है। उनके मन में यह धारणा घर कर गई है कि वे गुरु पूर्णिमा को मुझे दीक्षा देंगे। शायद इसी वजह से मेरी ओर काफी ध्यान देने लगे हैं। वे अच्छा रामायण पाठ करते हैं। आने के बाद से मुझे एक रामायण गुटका देकर पाठ के लिए अन्य साधुओं के साथ मुझे भी धूना में बैठा लेते हैं। मुझे भी अच्छा लगता है। वस्तुतः धूना में आसन लगाना सांकेतिक है क्योंकि जिसका आसन धूना में लगता है वह वरिष्ठतम साधु होता है और उसका प्रथम स्थान माना जाता है। यह सम्मान पाने के बाद बाबा छविराम के नखरे और रौब दोनों ही बढ़ गए हैं। कुछ लोग यहां पर शारीरिक, पारिवारिक, सामाजिक व आर्थिक समस्याएं इस विश्वास के साथ लेकर आते हैं कि साधुओं के सानिध्य से कोई हल निकल आएगा। इसी क्रम में एक साठ वर्षीय पंडित जी अपनी पचास वर्षीय पंडिताइन के साथ आए और बोले अभी तक बच्चा नहीं हुआ है। मगर आस लगी हुई है। हंसदास ने जिम्मा लिया। तभी एक साधु ने चुटकी ली, “हो तो सकता है, लेकिन वर्ण संकर होगा।” क्या कोई साधु ऐसा सोच भी सकता है? पर बात यहीं नहीं रूकी। अब छविराम दास के ‘केस’ की बात। एक बीस-बाइस वर्ष के डॉक्टर पिता कहते हैं बच्चे को सोते हुए डिस्चार्ज हो जाता है। इससे कमजोर होता जा रहा है। धार्मिक प्रवृत्ति के हैं और घबराए हुए हैं। मैं दूसरे के केस में ‘कूद’ पड़ा और बोला “यह तो स्वाभाविक प्रक्रिया है, न होना अस्वाभाविक है। शादी के बाद ठीक हो जाएगा। किसी इलाज झाड़ फूंक या बाबा बैरागी की जरूरत नहीं है।”छविराम दास को भी मन मानकर हामी भरनी पड़ी। एक अन्य मामला ऐसे युवक का है, जिसने कम ब्याज पर पैसे लेकर अधिक ब्याज पर चलाए हैं और अब वे वापस नहीं आ रहे हैं। जिन्होंने दिए हैं, वे पीछे पड़ गए हैं। यह बाबा सियाचरण दास का पुराना ‘दुधारू मुवक्किल’ है और हंसदास इसे तोड़ने की कोशिश में लगे हैं। एक और डॉक्टर आया है जिसके पैर में घाव हो गया है, जो बरसों से ठीक नहीं हो रहा है। छविदास अब इसका इलाज करेंगे। ऐसे विविधता भरे प्रकरण यहां रोज आते रहते हैं।
मैं यह देख रहा था कि भारत में आस्था व श्रद्धा का व्यावसायिक प्रयोग कितना आसान है। बाबागिरी भी व्यावसायिक गलाकाट प्रतिस्पर्धा से मुक्त नहीं है। दूसरी ओर यह भी समझ में आ रहा है कि समाज में व्याप्त असुरक्षा और व्यवस्था की नाकामी अंततः व्यक्ति को यहां ले आती है। बहरहाल, यहां रोज किसी न किसी ‘मुवक्किल’ (भक्त नहीं) की ओर से भंडारा होता है। और अपने-अपने पैरोकार को विशेष भेंट की प्राप्ति होती रहती है। इस भोजन महोत्सव की वजह से लगभग हरेक बाबा का एक-एक करके पेट खराब हो रहा है। इसके बावजूद कोई भी खाना कम नहीं करता है। इसकी एक वजह यह भी है कि यहां का पानी भी अच्छा नहीं लगता। नर्मदा का पानी पीने के बाद तो जैसे यहां के पानी में दम ही नहीं दिखती। हैंडपंप में नहाने में भी मजा नहीं आता। यहां बिच्छुओं की भरमार है। लगभग रोज ही किसी न किसी को काट लेते हैं। पुजारी या मुकेश झाड़फूंक करते हैं। पता नहीं जहर उतरता है भी या नहीं? गनीमत है हम लोग बचे हुए हैं। मच्छर और मक्खियां भी बहुतायत में हैं।
भोपाल से निकले एक माह हुआ
आज भोपाल से निकले पूरा एक महीना हो गया। इस दौरान तमाम नए तरह के आश्चर्यजनक अनुभव हुए हैं। विवेचना करना अभी जल्दबाजी ही होगी। यहां बारिश एकदम बंद है। कमोबेश सूखे जैसी स्थिति है। छोटू तो आनंद में है पर मैं लगभग अनमनी स्थिति में हूं। शरीर का दर्द भी बढ़ रहा है, पेट साफ नहीं होता और ऊपर से नहाने में भी मजा नहीं आता। होने को तो ये सामान्य समस्याएं हैं, लेकिन जहां व्यस्तता ही न हो वहां ये समस्याएं भी विकराल लगने लगती हैं। फिर एक दिन राजस्थान सीमा पर एक छोटी पहाड़ी पर उजाड़ सा मंदिर देखने गया। हंसदास साथ में था। उसे दस्त लगने लगे तो जल्दी ही लौट आए। मैं सोचने लगा कि अब तो जल्दी गुरूपूर्णिमा हो और यहां से निकलें। बाबा सियाचरण ने इस साधुविहीन मंदिर को धीरे-धीरे ‘कल्टीवेट’ उपजाऊ या दुधारू किया है। उन्होंने यहां चेले बनाए, भगत इकट्ठे किए हैं और बीच-बीच में आकर यहां से चढ़ोत्री ले जाते हैं। गुरु पूर्णिमा पर यहां इसलिए विशेष रूप से आए हैं क्योंकि यहां गुरूओं को अधिक चढ़ोत्री मिलने की आशा है। साधुओं का जमावड़ा साथ है। इससे अच्छा और ज्यादा प्रभाव पड़ता है। शायद इसीलिए छविरामदास को बड़े साधु के रूप में ‘प्रोजेक्ट’ किया जा रहा है। यहां की एकरसता, मोनोटोनी अब बोझिल लगने लगी है।
यहां निकलने से पहले बाबा ने कहा था कि यहां से गुजरात निकलेंगे लेकिन अब कह रहे हैं पहले शाहगंज जाएंगे फिर देखेगें। जाहिर है गुरु पूर्णिमा पर यहां से जो ‘माल’ मिलेगा उसे शाहगंज तो पहुंचाना होगा। चाहे जो हो, मेरी अभी शाहगंज लौटने की बिल्कुल इच्छा नहीं है। उसके कई कारण हैं, जैसे वहां अब काफी लोग मुझे पहचानने लगे हैं और जिन लोगों के साथ मेरा वहां रहना हुआ है, वे अब शायद मेरा पूर्व परिचय देने में गौरवान्वित महसूस करने लगे हैं। जाहिर है, मुझे इसी सबसे तो बचना है। अपनी विरक्ति को कायम रखना है। इसी सबसे बचने के लिए ही तो वह सब कुछ छोड़ा था।
कल यानी तीस जुलाई को गुरूपूर्णिमा है। बाबा छविराम दास ने माइक की व्यवस्था कर अपने रामायण पाठ की पहुंच दूर गावों तक बढ़ा ली है। उम्मीद है इससे भगत आकर्षित होगे। परंतु इसके बाद मैंने पाठ में बैठना छोड़ दिया। उधर, छविराम ने मुझसे कहा कि अब गायत्री मंत्र का जाप शुरू कर दो, कल सुबह शुद्ध होना पडे़गा यानी बाल उतरवाने होगे, तभी तो संस्कार होगा। परंतु मैं चुप ही रहा। मुझे इनके इरादे कुछ नेक नहीं लग रहे हैं। वैसे तो कल छोटू को भी जनेऊ-कण्डी धारण कराया जाना है, उसकी शुद्धि के लिए तो नाई आएगा ही सही। विचलित हो मैंने सियाचरण बाबा से बात की और कहा “मुझे सिर्फ जनेऊ ही तो दोबारा धारण करना है, संस्कार तो पहले हो ही चुका है। कोई नया संस्कार नहीं होना है।”
बाबा बोले “ठीक है, किसी भी पंडित से जनेऊ धारण करा देंगे और अगर तैयार हो तो, मैं हीरा पहना दूंगा।”
मैंने कहा “ठीक है, कोई शुद्धि-वुद्धि नहीं होगी।” गौरतलब है, वैष्णव लोग जिसे हीरा कहते है वह तुलसी के पेड़ से बनी माला होती है और शैव लोग रूद्राक्ष की माला पहनते हैं। बाबा ने बताया कि पास के गांव में एक ब्राहमण डाक्टर कल्याण शर्मा हैं। उनसे बात कर ली है, वे जनेऊ पहना देंगे। मैं पुन : सोच में पड़ गया कि साधु हो जाने पर भी जाति से पीछा नहीं छूटता। समाज विज्ञान का सारा अध्ययन जैसे आखों के सामने आ रहा था। ब्राहमण होना कितनी बड़ी या संभवतः भारत में क्या सबसे बड़ी बात है? एक व्यक्ति जो संयोगवश जन्म से ब्राहमण है और साधु बनने जा रहा है, उसे ‘अन्य जाति’ का साधु भी जनेऊ पहनाने की पात्रता नहीं रखता? एक गृहस्थ ब्राहमण क्या अन्य जाति के साधु से श्रेष्ठ होता है? यह भी उल्लेखनीय है कि इन सब संस्कारों में दान-दक्षिणा भी काफी देनी पड़ती है। और भविष्य में भी समय-समय पर देते रहना पड़ता है।
क्रमशः…
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