एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
फिर शाहगंज: अलविदा साधू समाज
अब शाहगंज में रूकने की तो बिल्कुल भी इच्छा नहीं है। यहां से वापसी शायद किसी नई जीवनयात्रा की ओर ले जाए। धार तक अकेले जाने लायक हालत नहीं है। देब साहब से बात की। कल कुकरू जाकर बारह सितंबर को लौटेंगे। दीपक को फोन किया उसने बताया इटारसी से रतलाम सीधी ट्रेन मिलती है। यह ठीक रहेगा। कल सुबह कुकरू निकल जाएं। वहां से लौटते हुए इटारसी में ट्रेन पकड़ लेंगे। देब साहब से पक्का किया कि दास शर्मा साहब साथ में चल रहे हैं न। कल सुबह साढ़े आठ बजे यहां से मुझे ले लेंगे। यह भी तय हो गया। बाबा को बता दिया कि कल सुबह जा रहा हूं। दीनदयाल मास्टर को बोला कि अब फिर शायद ही आऊं।
आज शायद शाहगंज की आखिरी रात है। चाहे जो हो इस जगह ने मुझे वह दिया है जो जीवन में अभी तक कहीं और नहीं मिला था। उससे संतुष्ट हूं या असंतुष्ट, सहमत हूं या असहमत, यह अलग प्रश्न है। परंतु यह तो कहूंगा ही कि ऐसा अनुभव अब शायद ही कभी कहीं और मिल पाए। जाहिर है शाहगंज हमेशा याद रहेगा।
10 सितंबर 2007
लगभग ढ़ाई महीने का बाबाओं का साथ लगता है अब पूरा हो गया। मैं बाबा नहीं बन पाया। वैसे सोचता हूं क्या मैं बाबा बनने का सोचकर निकला था? परिस्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि मुझे इन त्यागी, महात्यागी वैष्णवों का ही साथ मिला, किसी और का नहीं। ये त्यागी लोग साधु समाज में शायद सबसे अधिक मेरी प्रकृति और बनावट के विपरीत हैं। मैंने तो इन्हें नहीं चुना, बस ये मिल गए। पढ़ने-लिखने, सोचने-विचारने, चर्चा करने से इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। स्वयं कहते हैं कि इनके दो ही कार्य हैं-भजन और भोजन। लेकिन मैंने तो इन्हें केवल भोजन करते ही देखा। भजन करते भी कभी नहीं देखा। इनकी केवल दो ही रूचि हैं-भोजन भंडारा और बिदाई। कौन कैसा भोजन कराता है और कितनी बिदाई देता है, यही इनकी चर्चा का विषय भी है। अच्छा व्यक्ति वहीं है जो साधु की सेवा करे। और साधु सेवा से आशय भोजन और बिदाई। आध्यात्म की, धर्म की चर्चा करते मैंने इन्हें कभी नहीं देखा। बस थोड़ी-बहुत वह धूर्त मैथिल साधु छबिरामदास ही करता था। आरती में रटे-रटाये भजन बोलना और थोड़ी देर हवन के लिये बैठ जाना, यही इनके धार्मिक कार्य हैं। बाकी पूरे समय भोजन से संबंधित क्रिया-कलाप ही होते रहते हैं। सोने में इनका कोई मुकाबला नहीं। भोजन क्रिया से जो भी समय बचे, वह सोने में लग जाता है।
बाबा सियाचरणदास तो विशुद्ध गृहस्थ है। अपनी पत्नी से तंग आकर उसने शायद बाबा वेश बना लिया था लेकिन वह भी बाबा बनकर पीछे लगी रही तो अब दोनों मिलकर साधु का भेष धारण कर अपनी गृहस्थी चला रहे हैं और पारिवारिक सुख भी प्राप्त कर रहे हैं। जो भी दान-दक्षिणा इकट्ठी होती है मंदिर और परिक्रमावासियों के नाम पर,उससे घर खर्च चलता है और जो भी बचता है वह लड़के के परिवार को चला जाता है। अच्छा जीवन है। दोनों हाथ में लड्डू हैं-साधु भी और गृहस्थ भी। शायद इसी तरह से समाज में स्वीकार्यता मिल जाती है। इस सबके बावजूद बाबा सियाचरणदास मुझे बुरा आदमी नहीं लगता।
खैर जो भी हो, इनके साथ रहकर बहुत कुछ सीखा। ऐसे-ऐसे अनुभव हुए जो अन्यथा कभी संभव ही नहीं हो सकते थे। रामकृष्ण मिशन, इस्कॉन या निताई गौड़ सम्प्रदाय जैसे पढ़े-लिखे साधुओं के साथ रहते तो इस तरह के जमीनी अनुभव नहीं होते। कुछ दूसरे किस्म के ही शायद होते। परंतु यह तय था कि धर्म की जमीनी हकीकत नहीं जान पाता। क्या पता, उनके साथ रहकर मैं साधु ही बन जाता? वैसे मेरी प्रकृति और नास्तिकता को देखते हुए ऐसा लगता तो नहीं। इतने दिनों में न तो मुझे कोई चमत्कार दिखा और न ही कोई ज्ञानी संत या महात्मा। हो सकता है आगे चलकर ऐसा कुछ हो जाता। अभी तक तो न धर्म, न योग,न ज्ञान और न ही भक्ति कुछ भी देखने को नहीं मिला। हां पर नया अनुभव मिला और नए रहस्योद्घाटन भी हुए।
इन बाबाओं के साथ बैठकर और इनका सूक्ष्म अध्ययन करके तो ऐसा लगा कि इनके अनुसार अच्छे साधु में निम्नलिखित गुण होने चाहिये :
अनपढ़
अज्ञानी
अविवेकी
आत्मकेन्द्रित
आत्मसीमित
असहिष्णु
अहंकारी और
आडम्बरी
चाहे जितना भी प्रयत्न कर लूं मेरा निजी तौर पर इन मापदंडों पर खरा उतरना असंभव है। मैं हार गया! हारा इसलिए भी कि मैं अपनी रची इस अष्टपदी के एक भी पद पर खरा नहीं उतर पा रहा था। थोड़ा बहुत आत्मकेंद्रित जरूर रहा। पर वास्तव में वह आत्मवलोकन अधिक था।
सुबह उठा तो ठीक लग रहा है। वैद्य जी की दवाई ने असर किया लगता है। तैयार हुए और चाय पी फिर आरती हुई। दीनदयाल मास्टर विदा करने आ गए। रास्ते से देब साहब का फोन आ गया। बाबा ने कहा, जरूर आ जाना, नवरात्रि यहीं करना। बाबी के चेहरे पर परेशानी झलक रही है। पता नहीं आए न आए? इन्हें लगता है कि मेरे यहां रहने से इन दोनों के प्रभाव में वृद्धि हुई है। नर्मदा मैया को प्रणाम किया। अच्छा हुआ कल स्नान कर लिया था। राम,जानकी, बजरंग बली और शिव जी को प्रणाम किया। परिक्रमावासियों को नर्मदे हर बोला और निकल गये। गाड़ी आ गई। दीनदयाल ने सामान रख दिया। अलविदा शाहगंज। पर सिर्फ कह देने भर से सब छूट नहीं जाता। यहां जो बहुत कुछ मिला भी है, वह भी साथ ले जा रहा हूं।
कुकरू पहुंचते ही सो गया। बहुत थकान लग रही है। यहां काफी ठंडक है। शाम को उठकर चाय पी। थोड़ी बातचीत की। फिर संध्या के लिये बैठे। देब साहब और दास शर्मा साहब ड्रिंक के लिए बैठे, मैंने भी साथ में चाय पी। आज इतने दिन में पहली बार शराब देखी। थोड़ी देर में खाना खा लिया। इनके लिए आसिफ ने मुर्गा बनाया है। पहले की तरह मेरे लिए भोपाल से मछली बनवाकर लाये हैं। खाने की कोशिश की मगर एक पीस भी नहीं खा पाया। दाल, सब्जी खाई और सो गए।
सोते समय दास शर्मा साहब ने पूछा “कैसा लग रहा है सब कुछ छोड़कर?”
मैंने कहा “जो था, उसे छोड़कर तो निश्चय ही बहुत अच्छा लग रहा है। जैसा था उससे बहुत बेहतर। लेकिन आगे क्या अभी स्पष्ट नहीं है। पीछे सपाट, लेकिन आगे अभी पाट नहीं।”
उन्होंने जोर देकर पूछा “बाबा लोगों का साथ?”
मेरा जवाब भी उतना ही स्पष्ट था “दैट लैग इज़ ओव्हर नाओ।”
“दैट लैग इज़ ओव्हर नाओ।” यानी वह दौर अब पूरा हुआ। खत्म हुआ। बीत गया। पर जो कुछ पिछले उनतीस जून से दस सितंबर यानी ढाई महीनों के दौरान घटित हुआ क्या वह कभी विस्मृत हो पाएगा? क्या भूलना कभी सायास हो सकता है? जहां तक मैं समझ पाया हूं, पिछले दिनों में कि मैं साधु बनने के लिए तो नहीं निकला था। मैं शायद कुछ भी बनने के लिए निकला ही नहीं था। मैं तो सब छोड़कर निकला था। सब छोड़ने निकला था। पर फिर सोचता हूं कि सिर्फ बीता कह देने से सब बीत नहीं जाता। ठीक उसी तरह, सब छोड़ने का सोच लेने भर से सब छूट भी नहीं जाता। कुछ अनावश्यक छूट जरूर जाता है, लेकिन उसी के समानांतर कुछ नया परंतु बेहद जरूरी जुड़ता भी जाता है।
यहां मुक्तिबोध की कवितां ‘अंधेरे में’ की ये पंक्तियां फिर याद आ रहीं हैं:
सूनी है राह
अजीब है फैलाव
ध्वस्त दीवारों के उस पार
कहीं पर
बहस गरम है
दिमाग में जान है
दिलों में दम है
सत्य से सत्ता के युद्ध को
रंग है
पर
कमजोरियां
सब मेरे संग हैं।
पिछले ढ़ाई महीने इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण थे, कि इस दौरान मैंने कई तरह की अपनी शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक सीमाओं को तोड़ा। अपने व्यवसाय की धुरी तार्किकता को एकतरफ रख मैंने परस्पर विश्वास के सहारे जीवन जीने की कोशिश की। यह भी जाना कि समाज में सभी के लिए बदलाव की गुंजाइश है, बशर्ते वह व्यक्ति स्वयं अपने बनाए जाल से बाहर आने को तैयार हो। यह भी जाना कि प्रियजन व मित्रजन हमेशा आपके साथ बने रहने को तत्पर रहते हैं भले ही वे पूरी तरह से आपसे सहमत न भी हों। तमाम बुराइयों और सीमित बौद्धिकता के बावजूद भारत के साधु में इतनी हिम्मत और आत्मीयता अभी बाकी है कि वे एक अंजान को अपने घर, डेरे, मठ में रहने देते हैं, उसके भोजन की व्यवस्था करते हैं। वरना, आजकल जो हालात हैं, उनमें यदि कोई प्यासा घर का दरवाजा खटखटाकर पानी मांग ले तो हमें लगता है कि अभी दिन में बहाने से देख जाएगा और रात में घर साफ कर जाएगा। सी सी टी वी के इस युग में सिर्फ आपका चेहरा ही इन साधुओं के लिए काफी है। जाहिर है तमाम असहमतियों के बावजूद मैं इन सबके प्रति कृतज्ञ तो हमेशा बना ही रहूंगा।
इस लक्ष्यहीन यात्रा का पहला चरण यहां विराम ले रहा है। पता नहीं कि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए मुझे कितने चरण की यात्रा करनी होगी। परंतु सबसे जरूरी तो यही है कि मैं अपना ‘लक्ष्य’ तो निर्धारित करूं। क्या मैं लक्ष्य का निर्धारण कर पांऊगा? अभी तो सबकुछ अस्पष्ट सा है। परंतु यह तो पिछले पचहत्तर दिनों में तय हो गया कि मैं बाबा नहीं बन रहा, साधु नहीं बन रहा, और न सन्यासी बन रहा हूं। चूंकि यह मेरी प्रवृत्ति नहीं है। इसलिए यह मेरी नियति भी नहीं हो सकती। इस दौरान तत्वत: घाट घाट का पानी भी पी लिया है।
केदारनाथ अग्रवाल ने कविता ‘तन टूटा’ में कहा है:
तन टूटा/ मन टूटा
लेकिन आन न टूटी
चाल चलन की
पहले वाली बान न टूटी।
बूढ़े कंधों पर
साधे हूं सिर का बोझा।
नहीं चाहिए
मदद तुम्हारी औघड़ ओझा।
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है

