एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
11 सितंबर, 2007; कुकरू (बैतूल)
आज ही के दिन सन दो हजार एक में अमेरिका के ट्विन टावर में दो बड़े धमाके हुए थे। मानव इतिहास में शायद पहली बार इस स्तर पर मानव के आत्मघाती दस्ते ने इतना भीषण नरसंहार किया था। अमेरिका का दंभ भी टूटा था और फिर एक पूरी कौम के खिलाफ सिलसिलेवार बदले की अमानवीय कार्यवाही भी शुरू हुई थी। उस बात को छह बरस बीत गए। मैं आज अमेरिका के न्यूयार्क शहर से बहुत दूर मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के छोटे से कुकरू गांव में हूं। यह समुद्र सतह से करीब तीन हजार फुट ऊंचाई पर स्थित है। यहां अक्सर तेज हवाएं चलती रहती हैं। सुबह अच्छी खासी बारिश भी हो गई। मौसम बहुत खुशगवार है, लेकिन मैं सुबह बड़ी मुश्किल से उठ पाया। खांसी बहुत आ रही है। हां, बुखार जरूर उतर गया है। अच्छे मौसम के बावजूद बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हो रही है। जबकि पहले जब भी यहां आया, सबसे ज्यादा मैं ही घूमता था। अब यहां मैं एकदम नए संसार में हूं।
कुकरू का जीवन बड़ा आदिम सा है। मेरी नई शुरूआत के लिए यह संभवतः उपयुक्त व सार्थक भी है। सुबह उठा तो कुछ बेहतर लगा। चाय पी और थोड़ा-सा बाहर टहला। अच्छी ठंड है। धूप में अच्छा लगता है। देव साहब ने सबको बता दिया कि मैं अभी कुछ दिन और यहां रूकूंगा। देव साहब जाते हुए मेरी तबियत को लेकर काफी चिंतित लगे। अच्छे बिजनेसमैन हैं, लेकिन इतने सालों में मेरे साथ पूरे परिवार के व्यक्तिगत संबंध भी हो गए हैं। उम्मीद है आज तबियत कुछ सुधरेगी। नाश्ता करके ये लोग ग्यारह बजे के करीब निकल गये। जाते हुए देब साहब जबर्दस्ती एक हजार एक रूपए ‘दक्षिणा’ यानी विदाई दे गए। बाबागिरी काम तो आती ही है! साथ ही राम सिंह को बार-बार हिदायत दे गये, ध्यान रखने के लिये। अब मैं बिल्कुल अकेला हो गया हूं। सोचता हूं, जब तक यहां हूं दिन में लिखने का कुछ काम कर लूंगा। रात में तो अंधेरा रहता है। खाना खाया, आराम किया और बाहर सड़क पर गया। इसी बीच ठंड लगने लगी। आकर लेट गया। रात में जल्दी खाकर सो गया। गले में दर्द है।
कुकरू सुंदर जगह है। काफी ऊंचाई पर बसा है और यहां शुद्ध हवा है। पानी की कमी है इसलिये पहाड़ियां सूखी हैं। नीचे वादी बहुत सुंदर है और वहां घना जंगल है। इस इलाके में हवा बड़ी तेज चलती है और लगभग हर समय चलती रहती है। बरसात में यहां बहुत ही अच्छा लगता है। यहां आने पर भैंसदेही से खामला और फिर एकदम चढाई। चूंकि भैंसदेही के कुछ आगे से ही चढ़ाई शुरू हो जाती है, इसलिये एकदम इतने ऊपर आने का अहसास नहीं होता। ऊपर चढ़ते ही लगभग सौ साल पुराना बड़ा सुंदर फॉरेस्ट रेस्ट हाउस मिलता है। जिसके आसपास कॉफी का प्लान्टेशन भी अंग्रेजों के जमाने का है। अंग्रेज तो चले गए पर अंग्रेजियत और सामंती आचार व्यवहार तो यहीं छोड़ गए थे। आईएएस एमएन बुच जब बैतूल कलेक्टर थे, तब कुकरू पर बहुत ध्यान दिया। अपने चरित्र के अनुसार यहां का जो सबसे सुंदर स्थान है, जहां से पूरी घाटी दिखती है, उसका नाम ‘बुच पॉइंट’ रख लिया और एक शेड बनवा दिया। यहां आदिवासी छात्रों का एक आश्रम भी है। पहाड़ियां ज्यादातर नंगी हैं। यहां कोरकू आदिवासी रहते हैं जो थोड़ी-बहुत कोदो, कुटकी की खेती करते हैं। समस्या यह है कि यहां हवा इतनी तेज चलती है कि मक्का, ज्वार के पौधे खड़े ही नहीं रह सकते। पानी की समस्या है, बिजली भी नहीं है। बैलगाड़ी में ड्रम रखकर पानी नीचे से लाते हैं।
बुच पॉइंट के पास एक बहुत पुरानी मजार भी है, जिसकी बड़ी मान्यता है। कुल मिलाकर यह बड़ी शांत और अच्छी जगह है। ध्यान के लिए उत्तम। दोपहर में बैठकर लिखता रहा। खूब सो रहा हूं, लगता है जैसे बरसों की नींद यहां पूरी हो रही है। शाम साढ़े सात से सुबह साढ़े पांच तक तो यहां खासा अंधेरा रहता है। यहां की रात खूब लंबी है। आज गणेश चतुर्थी है। महाराष्ट्र के पास है यह स्थान एक दम बॉर्डर पर। यहां तो आदिवासी है। आसपास के गांवों में बड़ी धूमधाम होगी। महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी का सबसे अधिक महत्व है।
16 सितंबर 2007
सुबह उठा तो बेहतर लग रहा है। मैं कल सुबह यहां से निकलूंगा। देब साहब ने बताया है कि भैंसदेही के बजाय यदि दूसरी तरफ परतवाड़ा की ओर जाओ तो सड़क बहुत अच्छी है और खंड़वा के लिये बस मिल जायेगी। वहां से सीधे धार। यही करूंगा। एक नया रास्ता भी देखने को मिलेगा। राम सिंह को बताया कि किधर से जाना है।
17 सितंबर 2007
आज यहां से निकलना है। कुकरू में अकेले बहुत अच्छा लगा। आराम भी मिल गया। राम सिंह,वीरेन जी और शोभे ने बड़ी सेवा की। दस बजे रोटी, सब्जी खाई और साढ़े दस बजे राम सिंह की मोटरसायकल पर बैठकर निकल गये। एकदम पास ही महाराष्ट्र लग गया और लगातार ढलान शुरू हो गया। यह बेहद सुंदर घाट घटांग घाट है। महाराष्ट्र है इसलिए सड़क भी ठीक है। बीच में खूब बारिश हुई है जिससे भू-स्खलन हुआ है और चट्टानें खिसकी हुई हैं। इन घाटों को देखने के लिए यह मौसम सबसे अच्छा हैं। एकदम हरा और हर तरफ पानी के झरने और सोते। आधा घंटे में करीब दस कि.मी. पहुंचे। एकदम नीचे अमरावती-बुरहानपुर रोड पर परतवाड़ा से बीस कि.मी. इधर घटांग गांव है, यहां चाय पी। साढ़े ग्यारह बजे महाराष्ट्र रोडवेज की अच्छी बस आई। राम सिंह ने बैठाल दिया और बड़ी श्रद्धा से चरणस्पर्श किया। फिर जबर्दस्त घाट और लगातार ढलान करीब पंद्रह कि.मी. यानी कुकरू से लेकर गंगाडोह तक लगातार पच्चीस किलोमीटर ढलान है। इससे कुकरू की ऊंचाई का अंदाजा लग सकता है। यहां चिकलधरा नाम का पर्यटन स्थल भी है, पचमंढी की तरह। रास्ता मेलघाट टाइगर रिजर्व से होकर गुजरता है। जंगल, नदी, पानी। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि यह रास्ता इतना सुंदर होगा। टाइगर रिजर्व का एक गेट सीमाडोह में है और दूसरा धारणी के पास। इससे गुजरना सचमुच एक अनुभव है। अमरावती जिले में इतना सुंदर जंगल कल्पना से परे है। यह घाट करीब सौ किलोमीटर का है। यह असाधारण सुंदर वन क्षेत्र इसलिए बदनाम है, क्योंकि यहां भारत में सर्वाधिक कुपोषण व बाल मृत्युदर है। अजीब विरोधाभास है।
धारणी तहसील मुख्यालय है। यहां डेढ़ बजे के करीब पहुंचे। यह बस अब बुरहानपुर जाएगी, जिसे महाराष्ट्र के मील के पत्थरों में ब्रह्माणपुर लिखा है। यहीं उतर गया। यहां से खंडवा के लिए प्रायवेट बस मिली। बहुत धीरे-धीरे चली। थोड़ी देर में म.प्र. पहुंच गए।
खंडवा से सनावद के लिए बस पकड़ी जो वहां करीब साढ़े छह बजे पहुंची। सनावद से साढ़े सात बजे महेश्वर के लिए बस मिली बड़वाह, मंडलेश्वर, महेश्वर। पौने दस के करीब महेश्वर। यहां से अब धामनोद जाना है। अब कोई बस नहीं है। एक दूध की गाड़ी मिली, यानी ट्रक मिला। पीछे डाले में दूध के डिब्बों के ऊपर बैठने को मिल गया। उसी में चल दिए। इस तरह का पहला अनुभव। करीब ढ़ाई महीने पहले पैदल बिना गंतव्य की जानकारी के निकला आज एकदम नए तरह से सफर कर रहा हूं, लेकिन गन्तव्य पता है। रात के अंधेरे में सुनसान रोड पर एक ट्रक के पीछे डाले में अकेले दूध के कनस्तरों के ऊपर बैठे हुए, तेजी से भागता हुआ ट्रक। मजा आ गया। इस तरह धामनोद पहुंचे। दीपक ने कहा था धामनोद के आगे दूधी फाटा से धार के लिए गाड़ियां मिलेंगी। पिछली बार महेश्वर आए थे तब दूधी रूककर नाश्ता किया था। ट्रक वाले से कहा दूधी उतार देना। रात का करीब साढ़े दस बज गया। ट्रक वाले ने दस रूपए लिए। दूधी में पता किया रात आठ बजे से सुबह छह बजे तक दूधी से धार के बीच कोई गाड़ी नहीं चलती। रोड बंद रहता है।
यहां से सुबह सात बजे से पहले कोई गाड़ी नहीं मिलेगी। ट्रक भी नहीं चलते। खतरनाक आदिवासी इलाका है। सोचा चलो, अब रात दूधी में ही काटना है। पोहा खाया, चाय पी, टहलता रहा। यहां गणेशजी स्थापित हैं। जबर्दस्त संगीत और नृत्य चल रहा है। यह सब एक बजे तक चला। एक दुकान के आगे शटर के बाहर ऊपर शेड है और वहां एक हाथ ठेला बंधा हुआ खड़ा है। पास में पान और एसटीडी की दुकान है। उसे बताकर हाथ ठेले पर सामान रखा, दरी बिछाई और बैग सिर के नीचे रखकर सो गया। हाथ ठेला पर सोने में आनंद आ गया। एकदम नया अनुभव। मैं तो अनुभवों की खान होता जा रहा हूं। खांसी तो आ रही है, लेकिन बहुत नहीं। चार बजे के करीब उठ गया। टहलता रहा। शायद कोई ट्रक मिल जाए। कुछ भी नहीं मिला। सारी रात इंदौर से बंबई, पुणे, शिर्डी की लक्जरी स्लीपर बसें आकर चाय-नाश्ते के लिए रूकती रहीं। यहां कमोबेश रात भर ऐसी ही रौनक बनी रहती है। आज अठारह तारीख हो गई है। अंततः सात बजे एक छोटी बस धामनोद से धार के लिए आकर रूकी। जल्दी से बैठ गया। अच्छा घाट है। रोड भी ठीकठाक ही है। ड्राईवर ने बहुत तेज बस चलाई। रास्ते भर सवारियां चढ़ती-उतरती रहीं। आखिर में पौने नौ के करीब झिराबाग के सामने मेन रोड पर उतर गया। इस बार एकदम नया अनुभव रहा। अगर इंदौर के रास्ते आता तो रात नौ-दस के बीच पहुंच गया होता, लेकिन ये अनुभव कहां हो पाता! यह भी अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं।
धार: स्मृतियाँ
सुबह नौ बजे के करीब पैदल चलता हुआ झिराबाग पैलेस पहुंच गया। कुकरू में रहते हुए महसूस हुआ है कि इतने बड़े बाल और दाढ़ी बहुत अधिक असुविधाजनक हैं, खासतौर पर तब जबकि बीमारी के कारण रोज नहाना संभव हो नहीं पाता है। वैसे भी अब बाबाओं का साथ तो छोड़ ही दिया है और बाबागिरी भी छूट गई हैं। सोचता हूं कटवा लूं। छोटे कराऊं या मुंडवा लूं?
खाने से पहले वजन लिया छियत्तर किलो। मजा आ गया। यानी ढाई महीन में लगभग बारह किलो कम हो गया। वजन देखकर अच्छा लगा। मेरी स्थिति बड़ी अजीब सी है। मैं सोच नहीं पा रहा हूं कि मैं किसी नए युद्ध में उतरने की तैयारी में हूं या खेल के मैदान में किसी फाइनल मैच की तैयारी कर रहा हूं। दोनों ही स्थितियों में मेरा शारीरिक रूप से पूरी तरह से स्वस्थ होना अनिवार्य है। यह भी तय है कि मैं रेल्वे प्लेटफार्म, धर्मशालाओं, नदी किनारे जैसे असुरक्षित और तकलीफदेह स्थानों की बजाय अब झिराबाग पैलेस में हूं। क्या इस तरह से मैं उचित संतुलन बना पाऊंगा। यहां मैं अपने भावी जीवन के लिए विकल्प की तलाश में आया हूं। अब मुश्किल इसलिए है कि जो पहला विकल्प मेरे सामने आया था, मैं उसे नकार चुका हूं।
निर्मल वर्मा एक बेहद महत्वपूर्ण स्थापना करते हैं जो संभवतः मुझ पर सटीक बैठती है। उनका कहना है:
भोगे हुए अनुभव बीत जरूर गए हों, अभी अतीत नहीं बने हैं। हम उनकी छुअन और सिहरन अब भी अपने भीतर महसूस कर सकते हैं। इतिहास की अभी ऐसी कोई दीवार नहीं बनी है, जो शहर को कब्रगाह से अलग कर सके। जिन मुरदों को हम दफनाकर घर लौटते हैं तो पाते हैं, वे पहले से ही हमारी प्रतीक्षा में बैठे हैं। घटना तब तक स्मृति नहीं बनती, जब तक वह हम से बिल्कुल अलग नहीं हो जाती। बिना स्मृति के कोई घटना सिर्फ हादसा बनकर रह पाती है। हादसे में मनुष्य बदहवास हो जाता है। स्मृति का वह अवकाश उसमें नहीं होता, जिसके रहते ही हम घटनाओं को एक सिलसिलेवार श्रृंखला में बांधते हैं, जिसे हम इतिहास कहते हैं।
मैं अभी लगातार चल ही रहा हूं। अतीत अभी मेरे साथ है। शायद मैं उससे पूरी तरह से छुटकारा चाहता भी नहीं हूं। और मेरी इच्छा कम से कम अभी तो “इतिहास” बनने की भी नहीं है। सुबह उठकर फिर वही पूरी दिनचर्या। कुकरू रहते हुए खांसी और बुखार के कारण प्राणायाम और व्यायाम बंद कर दिया था। आज से फिर शुरू कर दिया। लिखना भी शुरू कर दिया। ‘कल्चरल हेरीटेज’ पढ़ना भी आज से शुरू कर दिया। यह बहुत रोचक और ज्ञानवर्धक है। बहुत बड़ा काम किया है, रामकृष्ण मिशन ने। भारत की सांस्कृतिक विविधता और वैभव को समझे बिना, वर्तमान समाज को समझ पाना भी असंभव सा है। मुझे अब आगे का रास्ता तय करना है।
सुबह नौ बजे के करीब दीपक पहुंच गया। दीपक के साथ चर्चा करके यह तय हुआ कि कल बाल और दाढ़ी छोटे करा लूंगा, सिर नहीं मुंड़वाना है। कल डोलग्यारस भी है। आजकल गणेशोत्सव चल रहा है। मुझे याद आ रहा है कि आज से ठीक पच्चीस साल पहले उन्नीस सौ बयासी में कक्काजी से मिलने मैं रात में भंवरताल पहुंचा था और थोड़ी ही देर बाद मेरी गोद में सिर रखकर और पानी का घूंट पीकर उन्होंने आखिरी सांस ली थी। मैं एकदम टूट गया था। मेरे जीवन में शायद इससे बुरा दिन और कोई नहीं था। सोचता हूं पिता का न रहना, हमें एकाएक वयस्क से प्रौढ़ बना देता है। उनके रहते हम हमेशा निर्णय लेने की प्रक्रिया में बहुत सक्रिय नहीं रहते। पिता का न रहना उस पूरे संसार का चले जाना है, जिसे हम उनके इर्द गिर्द बसाते हैं। पर साथ तो छूटता ही है। आज भंवरताल भी याद आ रहा है। पता नहीं पिछले वर्षों में इसी दिन क्या मुझे उनकी इतनी कमी महसूस हुई थी? इतनी याद आई थी ? शायद नहीं। तो आज एकाएक! जाहिर है वे अभी भी मेरी स्मृति में हैं, इतिहास नहीं बने हैं। भंवरताल में मेरा बचपन उनकी सौगात ही तो है। वह बचपन आज भी मेरे साथ है और शायद आज भी कक्का जी की ऊंगली पकड़े हुए ही साथ-साथ चल रहा है।
आज डोल ग्यारस है। आज से पच्चीस बरस पहले इसी दिन भीगते पानी और कीचड़ में कक्काजी का डोला खाट में डालकर भंवरताल से पैदल बम्हनी तक लेकर आए थे और फिर मंडला। वहां उनका अंतिम संस्कार किया था। अम्मा तो उससे डेढ़ साल पहले जा चुकी थीं। मुझे अनाथ हुए पच्चीस बरस हो गए। अजीब बात है, इतने बरसों में मेरा अपना परिवार विकसित हुआ, मेरे आसपास का दायरा बढ़ता गया, परंतु मैं स्वयं को अनाथ व बेसहारा क्यों समझ रहा हूं? आज पच्चीस बरस बाद भी वह भावना क्यों बनी हुई है?
सुबह नाई जल्दी आ गया। मेरी मालिश की और फिर दीपक के सामने बैठकर दाढ़ी और बाल कटाए। आइने में मैं एकदम दूसरा ही आदमी नजर आया। दस-बारह साल पुराना चेहरा दिखाई दिया, सफेदी के अलावा। बाल, दाढ़ी कटाकर बहुत हल्का लगा। नहाने के बाद और अच्छा लगेगा। पिछले ढाई-पौने तीन महीने में तमाम अभावों के बावजूद मन में कई तरह की ताजगी और ऊर्जा आई है। शायद उसका प्रभाव अब शरीर पर भी पड़ने लगा है। अब तबियत काफी ठीक है।
अजीब बात है, सबकुछ अनुकूल होने के बावजूद अब यहां मन नहीं लग रहा है। आए हुए भी बहुत दिन नहीं हुए हैं। मगर छोटी-छोटी बात पर मन खिन्न हो जाता है। सोच रहा हूं कहां जाऊं? तभी महेश जी का फोन आ गया। मैंने कहा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। कहने लगे कि कल मिलने आयेंगे। सोचता हूं महेश जी आयेंगे तो उनके साथ ही कुछ दिनों के लिए चला जाऊंगा। इस वातावरण और मानसिक बोझ से निकलना जरूरी है। आज अनंत चौदस यानी गणेश चतुर्दशी है। झाबुआ जिले में शिवगंगा का जबर्दस्त कार्यक्रम चल रहा होगा। जैसा कि मुझे लग ही रहा था, ग्यारह बजे के करीब महेश जी ने बताया कि आज नहीं आ पायेंगे, मेघनगर में रहना आवश्यक है। सोचता हूं कि कल मैं ही मिलने चला जाऊंगा। महेश जी को फोन करके बता दिया। अब मैं कुछ दिन के लिए वहीं रूक जाऊंगा। महेश जी ने भी यही कहा कि “विभूजी महाराज को रोक लेंगे।”
क्रमशः…
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