एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
आरएसएस, शिवगंगा और आदिवासी
सुबह झाबुआ पहुंचकर थोड़ी देर आराम करके महेश जी और मैं मोटरसायकल से मेघनगर चल दिए। महेश जी मोटर सायकल चला लेते हैं। मैं भी सोचता हूं कि अब मोटर सायकल चलाने की आदत डालूंगा। उन्नीस सौ नवासी के बाद से दोपहिया वाहन कभी चलाया ही नहीं। ऐसे स्थानों और ऐसे कामों के लिए मोटरसायकल ही उपयुक्त वाहन है। छह साल पहले भंवरताल रहते हुए भी यही सोचा था लेकिन फिर सब कुछ रह ही गया और दोबारा मोह-माया में फंस गया। अब कुछ तय हो जाए तो एक मोटरसायकल की व्यवस्था कर लूंगा। मेघनगर के रास्ते में बीच में बारिश भी आ गई। मेघनगर में शिवगंगा के पास बहुत बड़ी जगह है, लगभग एक हेक्टेयर जिसमें बांउण्ड्री वाल खिंची हुई है। एक जगह चार और दूसरी जगह भी चार-पांच चालनुमां कमरे बने हुए हैं। सरस्वती शिशु मंदिर भी यहीं लगता है। बाकी जगह खाली पड़ी हुई है। रेल्वे स्टेशन से केवल आधा किलोमीटर दूरी पर है। शिवगंगा के अच्छे दिनों अर्थात संघ के साथ मधुर संबंध के समय यह स्थान जुटाया गया होगा।
महेश जी ने बताया कि इसे ‘बिरसा मुण्डा ट्रस्ट’ के नाम से खरीदा है। आसपास इससे लगे हुए क्रिश्चियन मिशनरी का बड़ा अस्पताल, स्कूल, बिशप हाउस और ईसाइयों के घर हैं। किसी अन्य संस्था की एक विकलांग शाला भी है, सहारा नाम से। क्या पता ईसाइयों को यहां से बेदखल करने के दूरगामी लक्ष्य के मद्देनजर ही यह जगह ली गई हो? आज यह जगह बहुत कीमती होने के साथ शांत भी है। थोड़ी ही दूरी पर विशाल वनरोपणी भी है। अच्छी जगह है। अभी तक शायद वीरान ही पड़ी हुई थी। अब महेश जी इसे अपना मुख्यालय बनाना चाहते हैं। रेल्वे स्टेशन के कारण यह उपयुक्त स्थान भी है। महेश जी ने बताया कि कल और परसों यहां जिलास्तर का प्रशिक्षण वर्ग है जिसमें जिले भर से लगभग पच्चीस-तीस की संख्या में संगठक इकट्ठे होगें।
वैचारिक भिन्नता के बावजूद मेरे मन में शिवगंगा के कार्य को लेकर काफी सम्मान है। वस्तुतः मैं किसी संगठन के क्रियाशील अथवा सक्रिय बने रहने के पीछे के आयामों को समझना चाहता हूं इसलिए यहां के लोगों और कार्यों को काफी विश्लेषणात्मक ढंग से देखना और समझना चाहता हूं। यह भी शोध व कौतुहल का विषय है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से अलग होने के बाद भी शिवगंगा किस तरह एक भाजपा शासित राज्य में स्वयं को सक्रिय बनाए हुए है।
अर्जुन ने खाना बनाया। ढ़ेर सारे भुट्टे खा लिए थे इसलिए भूख नहीं रही। थोड़ा-थोड़ा खाना खाया। इसके बाद महेश जी के साथ बातचीत चलती रही। वह संघ से अपने रिश्तों और अलग-अलग स्थानों पर गणेशोत्सव की झांकियों के बारे में बताते रहे और फिर सो गए। कुछ देर बाद एक चतुर्वेदी आए जो ग्वालियर में संघ के प्रचारक थे लेकिन अब यहीं रहने लगे हैं। संघ से निकाले जाने के बाद से यहां प्रवीण बाफना के साथ बेकरी का व्यवसाय कर रहे हैं या उनके यहां नौकरी कर रहे हैं। रात में खाने और सोने यहां आ जाते हैं। मैंने पूछा वैभव जी कहां हैं जो पिछली बार मिले थे? बताया कि यहीं हैं और उसी खंडेलवाल सेठ के यहां रह रहे हैं। मैं इस बार ठीक डेढ़ महीने बाद आया हूं। पिछली बार सात से दस अगस्त के बीच यहां था। वैभव जी इस क्षेत्र में संघ के प्रचारक थे। बाद में हटा दिए गए। मैंने आकाश भगत के बारे में पूछा। बताया वह पेटलावद में हैं। पिछले साल तक धार में संघ का प्रचारक था और खुद ही छोड़ दिया। आकाश से फोन पर बात हुई, शायद कल आए। अभी आने की इच्छा थी, लेकिन कोई साधन नहीं है।
संघ से इतने सारे प्रचारक अलग किए गए हैं या खुद अलग हुए हैं, यह सोचने वाली बात है। अंदर ही अंदर बहुत कुछ गड़बड़ चल रहा है। सत्ता से निकटता का यह परिणाम तो स्वाभाविक ही है। अपेक्षाएं और असंतोष बढ़ता जा रहा है। यहां मुझे तमाम सारे असंतुष्ट स्वंयसेवक मिले। एक ही स्थान पर इतने सारे असहमत लोगों का मिलना आश्चर्य में डाल रहा है। अब तक जो आरएसएस के बारे में सुना था, यहां स्थिति ठीक उसके विपरीत है। सामान्यजनों के बीच तो संघ को लेकर यही धारणा है कि इसमें असंतुष्ट होने की गुंजाइश ही नहीं है।अगले दिन सुबह महेश जी के साथ रेल्वे प्लेटफार्म की ओर घूमने चले आए। छोटे शहरों में कमोबेश रेल्वे स्टेशन घूमने का एकमात्र स्थान होता है। वैभव भी यही आ गए। स्टेशन पर बढ़िया चाय पी। सुबह ही महेश जी ने बताया था कि आज शाम से यहां जिले भर के संगठकों की बैठक है। उसके पहले दिन में कुछ प्रमुख आठ-दस संगठक किसी गांव में जाकर बैठेंगे और वहीं भोजन करेंगे। पहले मुझे भी गांव साथ जाने का कहा था, अब बताया कि मुझे गांव नहीं जाना है, मैं यही रहूंगा। शाम छह बजे से यहां बैठक होगी। रात में साढ़े आठ बजे अवन्तिका एक्सप्रेस से हर्ष चौहान भी इंदौर से आएंगे। यह नया निर्णय कैसे? मुझे लगा यह उचित भी है। एक बाहरी व्यक्ति को संगठन की अंदरूनी बैठकों में शामिल नहीं करना चाहिए। महेश जी के जाने के बाद मैं अकेला रह गया। अर्जुन ने खाना खिलाया। मैं बैठकर गीता पढ़ता रहा और थोड़ी देर सोया।
शाम चार बजे महेश जी आ गए। बताने लगे कि गांव में बहुत अच्छा लगा। सबने मुझे बहुत याद किया। यह भी बताया कि बैठक में एक कार्यकर्ता ने बहुत विश्वास के साथ कहा भी कि मैं संघ द्वारा भेजा गया भेदिया हूं जो शिवगंगा के अंदर घुसकर उसे तोड़ने का काम करेगा और यह भी कि जो लोग बताते हैं कि यह आदमी वकील था, वे सरासर झूठ बोलते हैं, कोई वकील इस तरह का हो ही नहीं सकता। सुनकर बहुत हंसी आई। पहले उमा भारती का और अब आर.एस.एस का आदमी। क्या उन्नति है! संघ का कितना भय है, यह भी जाहिर हुआ। इस बात से यह भी समझ में आ रहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य करने वालों में अभी भी स्वयं पर या अपने काम पर विश्वास नहीं है। संगठन तो परस्पर विश्वास पर ही खड़ा हो सकता है और निरंतरता से कार्य करता रह सकता है। इतना ही नहीं संभवतः इन्हें अपने द्वारा किए गए सार्वजनिक कार्य पर भी पूरा विश्वास नहीं है। बहरहाल, जिस वातावरण में विकसित होंगे, सोच भी तो उसी के अनुसार ही विकसित होगी। खैर, अभी बहुत से नए कार्यकर्त्ताओं से मुलाकात होना संभावित है। देखता हूं शाम की बैठक में भी शामिल हो पाता हूं या नहीं।
शाम होते होते संगठक इकट्ठे होने लगे। पिछली बार जब आया था तब भी इनमें से अधिकांश से भेट हुई थी। आज फिर मुलाकात होगी। आकाश से मिलकर अच्छा लगा। उसने अपना हुलिया बदल लिया है-लुंगी, कुर्ता पहनने लगा है। फोन पर बातें भी कम कर दी हैं। इतना ही नहीं अपनी तरफ से बहुत कम फोन करता है। रूपसिंह जी जो पहले यहां प्रचारक थे, अब अलग होकर इंदौर में रहते हैं। विनय पांडे इंदौर में रहते हैं, उन्होंने पहले कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में काम किया है। प्रकाश जी पेटलावाद क्षेत्र में हैं। सुमेर सिंह भी उसी क्षेत्र से है। रंजीत सिंह सोंड़वा क्षेत्र से जहां ‘नक्सलवादी’ सक्रिय हैं वहां सक्रिय है। सुरेश जी थांदला क्षेत्र में काम करते हैं, जानू भाई पिटोल गुजरात बॉर्डर पर, राघोबा, राम सिंह भगत जी, जंगल सिंह, मेघजी भाई, नरावलिया के सरपंच आदि। पुराने परिचित लोगों में-राजाराम, खेम सिंह, रतन सिंह, गब्बू सिंह (झाबुआ), रमेश आर्य (राणापुर), लक्ष्मण सिंह नायक (मेघनगर) और अन्य लोग यहां पहुंचे हैं।
बैठक शुरू होने से पहले मैदान में बैठकर अनौपचारिक बातचीत होती रही। नए लोगों से परिचय हुआ। ऐसा बताया गया कि कट्ठीवाडा-सोंडवा क्षेत्र में आदिवासियों के बीच ‘नक्सलियों’ का बहुत प्रभाव है और शिवगंगा के कार्यकर्ताओं से टकराव भी होता है। यह भी बताया कि उन्होंने कई जघन्य हत्याएं की हैं और ईसाई मिशनरी उन्हें पूरा सहयोग प्रदान करती है। ‘नक्सलवादी’ बाहर से आते हैं और यहां के ईसाई आदिवासी उनसे जुड़ जाते हैं। उल्लेखनीय है कि शासकीय तौर पर कभी भी यह बात नहीं कही गई है कि इस इलाके में नक्सलवादी मौजूद हैं। थोड़ी-बहुत बातचीत और तर्क से यह समझ में आया कि अधिकतर कार्यकर्ता कुतर्क करते हैं, उनका बौद्धिक स्तर उन्नत नहीं है और रटी-रटाई भाषा बोलते हैं। जैसा सुना और सीखा है वही बोलते रहते हैं। प्रश्न करने वाले को पराया आदमी और विरोधी समझते हैं और उसी पर प्रश्नचिह्न लगा देते हैं। चूंकि भाजपा सत्ता में है, इसलिए यह भी सोचना है कि इन लोगों को जिला प्रशासन को पूरा सहयोग देना चाहिए और जो प्रशासन का विरोध करता है, वह विध्वंसकारी है। अधिकतर कार्यकर्ता बडे़ फेनेटिक हिंदुत्ववादी लगे। थोड़ी बातचीत और तर्क-वितर्क के बाद उन्हें भी असुविधाजनक लगने लगा और मुझे भी। मैं उठकर चला गया। बैठक शुरू हो गई। मैं उसमें नहीं गया और न किसी ने बुलाया। मैंने ठीक ही किया। मैं यह भी समझ गया कि यहां सबकुछ पूर्व निर्धारित सा ही रहता है। फिर भी संगठन तो सक्रिय है और संघ की खिलाफत का साहस जुटा पाया है।
यहां आदिवासियों के बीच जो कुछ हो रहा है, उससे हिन्दू धर्म की एकदम नई व्याख्या सामने आ रही है। पहले ईसाई मिशनरी और अब हिन्दूवादी संगठन और इन दोनों के बीच फंसे आदिवासी। एक चिकित्सा और शिक्षा की बात करता है, तो दूसरा पानी और ग्रामीण विकास की। लक्ष्य दोनों के संभवतः एक ही हैं।
खैर, थोड़ी देर में खाने के लिए विराम हुआ। महेश जी ने बताया कि हर्ष जी और उनके साथ एक श्याम खरे इंदौर से आएंगे और तब हम लोग साथ में खाना खा लेंगे। इस बीच बाकी लोगों ने खाना खा लिया। मैं बाहर बैठा था इसी बीच एक स्कूटर वाले कार्यकर्ता के साथ दो लोग बैठकर आए। मैं समझ गया कि यही दोनों होंगे। हर्ष जी ने भी मुझे पहचान लिया। हर्ष चालीस-पचास के बीच में पढ़े-लिखे समझदार व्यक्ति लगे। हम चारों ने अलग कमरे में बैठकर खाना खाया-थोड़ी सब्जी भी मिल गई। हर्ष चौहान काफी समझदार और गंभीर व्यक्ति लगे। आईआईटी दिल्ली के पढ़े हुए हैं। धार से भाजपा के टिकिट पर सांसद का चुनाव लड़कर हार चुके हैं। अब पूरी तरह से शिवगंगा का ही काम करते हैं। वैसे संघ से जुड़े हुए हैं और वनवासी कल्याण परिषद में हैं, लेकिन विरोध चल रहा है। शिवगंगा के प्रमुख चिंतक, विचारक, समन्वयक हर्ष ही हैं। मुझे महसूस हो रहा था कि कुछ सार्थक चर्चा संभव हो पाएगी। वैसे बातों-बातों में बहुत सारी नई जानकारियां अपने आप मिलती जा रहीं थीं। खाने के बाद हम लोग भी बैठक में चले गए-ऑब्जर्वर की तरह। झाबुआ जिले में गणेशोत्सव संबंधी रिपोर्ट सभी क्षेत्र से प्रस्तुत की गई। इनका तरीका और अनुशासन काफी उन्नत है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो भी आदिवासी बोलता है वह अपनी भीली भाषा में ही वक्तव्य रखता है। बाकी लोग हिन्दी में बोलते हैं। भीली अधिकतर समझ में आ जाती है, बशर्ते ध्यान से सुनें।
झाबुआ जिले की जनगणना के अनुसार इस जिले में सोलह सौ गांव हैं। लेकिन शिवगंगा के अनुसार कुल तेरह सौ बीस गांव हैं, बाकी के फलिए हैं। इनमें से ग्यारह सौ इक्त्तीस गांवों में शिवलिंग की स्थापना शिवगंगा ने प्रारंभ में की थी। इस बार सात सौ पचास गांवों में गणेश जी की स्थापना हो पाई। कर्मकांड का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है। जो समाज अमूर्त को पूजता रहा है उसे सायास मूर्ति पूजा में धकेला जा रहा हैं। झाबुआ जिले में आठ तहसीलें हैं,-झाबुआ, मेघनगर, राणापुर, थांदला, पेटलावाद, भांबरा, जोबट और अलीराजपुर। इनमें से अलीराजपुर, जोबट और भांबरा में शिवगंगा का काम कम है। झाबुआ जिला गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र के बॉर्डर पर है। म.प्र.के धार, खरगौन और रतलाम जिले इससे लगे हुए हैं। शिवगंगा ने अपने संगठनात्मक कार्य के लिए झाबुआ को जिला, विकास खंड, विकास केन्द्र, विहार और ग्राम स्तर पर इकाई में बांटा है। आज जिस अवसर पर हम यहां हैं यह वर्ग जिला स्तर का है, जिसमें विकास खंडों के प्रतिनिधि शामिल होंगे जिनकी संख्या दो सौ के करीब होगी। यहां के प्रतिनिधि अपने-अपने क्षेत्र में जाकर उसी की तैयारी में जुट जायेंगे। उसके बाद दशहरे के समय ग्राम स्तर पर शस्त्र पूजन कार्यक्रम होगा जिसका निर्णय और प्रवर्तन विकास केन्द्र स्तर पर होगा। मैं इस प्रस्ताव को सुनकर अचंभित सा हूं। यदि पानी का काम कर रहे हैं तो शस्त्र पूजा करने का क्या औचित्य है? गौरतलब है आदिवासी समुदाय का शस्त्रों से अनादि काल से नाता रहा है, लेकिन वे कभी इसे महिमा मंडित नहीं करते। मैं समझना चाहता हूं कि इनको क्यों अनावश्यक आक्रामक व धर्म भीरू बनाया जा रहा है। नवंबर-दिसंबर में विकास खण्ड स्तर पर सशक्तिकरण वर्ग आयोजित होंगे जिनमें विहार स्तर से प्रतिनिधि आयेंगे। नवंबर के दूसरे पखवाड़े में केवल जनसहयोग द्वारा धनसंचय का कार्य गांव-गांव जाकर होगा। जनवरी,अंतिम सप्ताह में जिला स्तर पर समस्त कार्यकर्ताओं और शिवगंगा से जुड़े लोगों का एक विशाल आयोजन होगा, जिसमें स्वामी अवधेशानंद और रामदेव जैसे धर्मगुरूओं को बुलाया जाएगा।
पूरे दिन के घटनाचक्र और संवाद पर गौर करने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया कि इस कार्यक्रम यानी शिवगंगा का मूल उद्देश्य तो आदिवासी समाज का हिन्दूकरण ही है। धीरे-धीरे मुझे इस समूह के बारे में अधिक स्पष्टता होती जा रही है। आज की पूरी चर्चा में आदिवासी समुदाय के त्योहारों या रीतिरिवाजों को बनाए रखने को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई। यह मानकर चला जा रहा है कि आदिवासियों का हिन्दूकरण, उनकी नियति बना दी जाए। शिवगंगा के लगभग सभी आयोजन धर्म पर आधारित और केन्द्रित हैं। इससे एजेंडा भी स्पष्ट हो जाता है।
इन बैठकों का अवलोकन करके और कार्यकर्ताओं की बातें सुनकर ऐसा महसूस हुआ, जैसे यह किसी हिन्दू धार्मिक संगठन का आयोजन हो। सारे कार्यकर्ता कट्टर हिन्दुत्ववादी ही लगे। महेश जी भले ही बीच-बीच में अपनी तरफ से धर्म की व्यापक परिभाषा और अर्थ बताने की कोशिश करते रहते हैं परंतु उसका अर्थ तो यही निकलता है। कट्ठीवाड़ा की रिपोर्ट देते हुए वहां के प्रतिनिधि ने बताया कि वहां कुछ लोगों ने दो स्थानों पर सर्वधर्म गणेशोत्सव समिति बनाकर हिंदू-मुस्लिम और ईसाईयों ने मिलकर गणेश जी की स्थापना की थी और झांकी निकाली थी। इस पर सब लोग बहुत हंसे और मखौल उड़ाया। सारी बातचीत, चर्चा एवं विचार या तो धार्मिक आयोजनों पर केन्द्रित रहा और या फिर संघ से अपने तनावपूर्ण रिश्तों पर। ऐसा लगा कि संगठन का मुख्य काम धर्म रक्षा, धर्म स्थापना और धर्म उत्थान ही है। इस सब में विधर्मी और अधर्मी लोगों का कोई स्थान नहीं है। यह स्पष्ट ही है कि विधर्मी कौन है? जो भी इसमें साथ नहीं है या इसमें आड़े आता हो, वह राष्ट्रविरोधी है। वैसे देखा जाए तो पिछले लगभग दो महीने में, जब से मैं सम्पर्क में हूं, शिवगंगा ने कांवड़ यात्रा और गणेश उत्सव आयोजन में ही सारी शक्ति झोंक रखी है। वर्तमान में कहीं और कुछ होते तो दिखा नहीं। लोग बड़े अच्छे हैं, अनुशासित हैं, समर्पित हैं इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन सब कुछ धर्म के नाम पर। इसे शिवगंगा के स्थान पर धर्मसेना भी कह दिया जाए तो शायद ही कोई अंतर पड़ेगा। वस्तुतः इसे धर्मसेना या धर्मगंगा कहना ही उचित होगा। इसी तरह महेश जी को प्रचारक या संयोजक,संगठक के बजाय यदि धर्माचार्य या धर्मगुरू भी कह दिया जाए तो शायद गलत नहीं होगा। धर्मरक्षा ही इनका अंतिम लक्ष्य है यही प्रतीत हुआ।
यहां स्थिति विकट और समस्या गंभीर है। मेरी बुद्धि और मन दोनों ही यह सब स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हैं। जगह उपयुक्त है, लोग अच्छे हैं, इसलिए काम सार्थक हो सकने की संभावनाएं हैं। किन्तु इस तरह के बौद्धिक, वैचारिक और व्यावहारिक धरातल पर इनके साथ किस तरह जुड़ा जा सकता है? और कैसे इस कर्मकांड में लिप्त हुए बिना कुछ सार्थक काम किया जा सकता है? मेरे सामने अब यह बहुत ही कठिन सवाल है। मुझे मुख्यतः हर्ष जी से ही लंबी चर्चा करनी होगी। जाते हुए पूछ भी रहे थे कि अब, कब बैठ सकते हैं? मैंने भी कहा कि अब बैठकर चर्चा करना और विचार-विमर्श करना आवश्यक हो गया है। महेश जी को भी संभवतः अब यह अहसास हो रहा है।
क्रमशः…
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