एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
झाबुआ भ्रमण आदिवासी समाज
आज उनतीस सितंबर हो गई है, थांदला जाना है। हम लोग तीन मोटरसाइकलों पर हैं। साथ में राजेश पटेलिया है। वह नगर पंचायत का पार्षद है। इसकी भांग की दुकान और ढाबा है। भीमकुण्ड गांव में शिवगंगा के सम्पन्न कार्यकर्ता के यहां रूके। ककड़ी खाई। पास ही पद्मावती नदी है। इस इलाके में नाम बहुत सुंदर है। नदी में नहाया। मेरी जानकारी में नहीं था कि झाबुआ में कपास की इतनी अच्छी खेती होती है। कपास, सोयाबीन, तुअर, भिंडी, सभी साथ-साथ एक ही खेत में। नहाने में आनंद आया। वहीं भुट्टे सेंक-सेंककर खिलाये गये। राजेश के ससुर रमेश नणालिया के घर खाना खाया। घर का घी साथ में। यहां घी चम्मच से नहीं निकालते बल्कि डिब्बे से खाने में उलट देते हैं। यहां से रूपरेल पहुंचे। यह सुंदर गांव तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा है। महेश जी भी पहली बार यहां आए हैं। मुझे आश्चर्य हुआ कि यहां उनसे भी अपरिचित कोई है?
हम लोग पहले थोड़ी देर छोटे भाई के यहां बैठे, फिर बड़े भाई के यहां चले गये। सबके घर एक-दूसरे से लगे हुए हैं। छोटे भाई की आर्थिक स्थिति बेहतर दिखती है। बड़े भाई नानूजी भामोर बुजुर्ग हैं। उनकी दो पत्नियाँ हैं और दोनों से बच्चे हैं। बड़ी पत्नी से बेटा नरसिंह है जो काफी बड़ा है और बगल में एक दूसरे घर में रहता है। उसका बेटा रूपसिंह अभी रेडियो पर क्रिकेट कामेंट्री सुन रहा था। दूसरी पत्नी का बड़ा बेटा बद्दू भी अब नरसिंह के बगल में दूसरा घर बना रहा है। इस तरह एक के बगल में दूसरा घर। परिवार के सदस्यों के घर बनते जाते हैं और जमीन बंटती चली जाती है। लेकिन इसके बावजूद रहते सब अगल−बगल में साथ-साथ हैं और इस तरह इनके कुनबे का एक फलिया (टोला) बन जाता है। कोई बाहरी आदमी इनके फलिया में नहीं रहता। इस क्षेत्र की सामाजिक व पारिवारिक परिस्थितियां काफी अलग हैं।
शहरियों और आधुनिक समाजशास्त्र तथा कानून पढ़े लोगों के लिए तो कई बातें सर्वथा निंदनीय पर यही तो इस आदिवासी समाज की विशिष्टता है। हम लोग इनके बीच सुधार की बात उठने का इंतज़ार नहीं करते बल्कि अपनी समझ के अनुसार इन पर सब कुछ थोप देना चाहते हैं। हममें इतना धैर्य नहीं है।
नानूजी के यहां सादा भोजन किया- रोटी, दाल और साथ में घी। थकान हो गई और नींद आने लगी। भजन-कीर्तन का कार्यक्रम बद्दू के निर्माणाधीन घर में होता रहा। हम लोग परछी में खटियों पर सो गए। कुछ देर नानूजी से पुरानी बातें सुनते रहे। यहां समाजवादी मामा बालेश्वर दयाल ने रजवाड़े के दिनों में आदिवासियों के बीच काफी काम किया है और ये लोग आज भी बड़े सम्मान के साथ उन्हें याद करते हैं। शिवगंगा के सुरेश जी ने वैचारिक रूप से उनकी आलोचना की तो नानूजी ने लगभग झिड़क दिया। इससे यह भी पता चलता है कि यह समुदाय भेड़ चाल चलने वाला नहीं है। वैचारिक प्रतिबद्धता को समझता है। बात करते- करते नींद आ गई।
सुबह जल्दी उठकर घूमने निकल गया। नदी-नाले से लौटते हुए गाँव के लोग। यहां सभी आपस में “राम-राम” करते हैं। कितना अपनापन, कितनी आत्मीत्यता है इस “राम-राम” संबोधन में। सदियों से समाज में यह प्रचलन में है। राम इन आदिवासियों के देवता नहीं हैं। मेरी याददाश्त में गाँव-देहात में मुस्लिम लोगों को भी “राम-राम” कहने में कोई परहेज नहीं होता था। गांधी के राम भी शायद यही होंगे। इन्हीं जन-जन के राम को अल्लामा इकबाल ने “इमाम-ए-हिन्द” कहा होगा। संत कबीर ने भी इन्हीं निर्गुण, अमूर्त राम का नाम लिया होगा। दूसरी ओर आज के समय ईजाद किया गया “जय श्रीराम” या “जय-जय श्रीराम” का उद्घोष कितनी आक्रामकता, कितना अहंकार और अलगाव का अहसास कराता है,जो एक तरह से कर्कषता लिए हुए है। यह उद्घोष हमारी परम्परा और संस्कृति के एकदम विपरीत है।
वापसी की यात्रा शुरू की। बस तो यहां कभी कभार ही आती है। एक ही मोटरसाइकल है और हम चार लोग हैं। इस पर सबका जाना संभव ही नहीं है। तभी सरपंच के यहां से कोई आता दिखा। हम पीछे बैठ गए और थांदला पहुंच गए। यहां से मेघनगर जाते हुए एक छोटे से गांव गुड़ा गांव पहुंचे। आज रात कल्याणपुरा में विकासखंड़ स्तर के कार्यकर्ताओं की बैठक है। महेश जी को उसमें शामिल होना जरूरी है। कल्याणपुरा के लिए मेघनगर हो कर जाना पड़ता है। मैंने महेश जी से कहा मैं मेघनगर रूक जाऊंगा। बैठक में जाकर क्या करूंगा? लेकिन पता लगा अर्जुन मेघनगर से अपने घर चला गया, वहां कोई नहीं है। अब कोई और दूसरा चारा नहीं है और बैठक में शामिल होने की मेरी इच्छा नहीं है। इधर, मेरे पैर की ऐड़ियां हमेशा की तरह फटने लगी हैं, और दुःख भी रही हैं। बीच बीच में दाहिने पैर में अंगूठे के नाखून के अंदर से भी सड़ा हुआ खून निकल रहा है और दुख भी रहा है। उंगलियों के नाखून तो अपने आप निकल गये लेकिन अंगूठे का मरा हुआ, नाखून फंसा हुआ है। वह तकलीफ दे रहा है। चलने में भी थोड़ी तकलीफ होने लगी है। सर्दी-खांसी भी बनी हुई हैं। धार जा कर सब ठीक करना होगा। शिवगंगा से रिश्ते के बारे में भी सोचना है। अब यहां मन नहीं लग रहा है। धीरे-धीरे अब सच्चाई सामने आ रही है। मुझे लगा था कि शायद इन लोगों के साथ मिलकर आगे कुछ काम किया जा सकता है। परंतु बहुत ही कठिन प्रश्न सामने खडे़ हो रहे हैं। वास्तव में आज मैं वहीं पर हूं जहां से मैंने इन लोगों के साथ अपनी पहली यात्रा शुरू की थी। परंतु इस बार मुझे सर्वथा नए अनुभव हो रहे है? इनका विस्तृत विश्लेषण आवश्यक है।
शाम सात बजे कल्याणपुरा पहुंच गए। एकदम अंधेरा है। बिजली नहीं है। धीरे-धीरे कार्यकर्ता इकट्ठा होने लगे। मैं बाहर आंगन में कुर्सी लगाकर बैठ गया और बैठक की बातें सुनता रहा। चर्चा के दौरान शस्त्र पूजन के बारे में और आगामी जिलास्तरीय प्रशिक्षण वर्ग की तैयारियां को लेकर बात हुई। महेश जी धर्म की विस्तृत व्याख्या करते हुए उसे सामाजिक कर्तव्य से जोड़ते हुए, अपनी बात रखते रहे। मुझे लगा ऐसा उन्होंने विशेष रूप से मुझे संबोधित करते हुए या मेरी उपस्थिति को ध्यान में रखते हुए किया होगा। शिवगंगा का मूल उद्देश्य संभवतः पानी का नियोजन नहीं बल्कि धर्म का नियोजन ही है। सवाल तो यही है कि मूल लक्ष्य क्या है और उसे पाने का रास्ता कौन सा चुना जा रहा है। रात को बैठक का एक सत्र और होना था। परंतु मैं तो थकान की वजह से जल्दी ही सो गया।
अगले दिन सुबह जल्दी नींद खुल गई। यहां जहां रूके हैं वहां दोनों तरफ नदियां हैं। एक ओर ‘अनास’ और दूसरी ओर ‘खेड़िया’। नहा के लौटा तो देखा दूसरी बैठक की तैयारियां शुरू हो गई हैं। सात बजे शुरू हुई बैठक आठ बजे तक चली। इसके बाद सब अपने अपने गांव रवाना हो गए। हम लोग भी बिचौली-मोहकामपुर गांव पहुंचे। आज रात यही रूकेंगे। यहां एक बड़े से घर में पहुंचे। यह कोदर सिंह तड़वी का घर है। इनका बड़ा परिवार है। बहुत से लड़के हैं। यह जगह बहुत सुंदर है। इनका घर पहाड़ी के एकदम नीचे है। नदी किनारे एक कमरे में पति-पत्नी भजन कीर्तन करते रहते हैं। अब यहां ठंड शुरू हो गई है। इनका सबसे छोटा बेटा सरपंच है। भरा पूरा कुनबा है। साथ ही बहुत सम्पन्न भी हैं। भीलों के तड़वी हैं यानी मुकद्दम या पटेल। इनका खूब दबदबा है।
मैं बच्चों के साथ नदी पर गया और खूब नहाया। लौटकर आए तो खाना तैयार मिला। मीनू था मक्के की रोटी, गेहूं की रोटी, चावल, दाल, सब्जी, घी चटनी! खूब खाया। खाने के बाद बैठकर परिवार से बातें होने लगीं। मैंने बातों बातों में नोट बुक में उनकी वंशा-वली बना डाली। सबको खूब मजा आया। ठीक करके इनको भेजूंगा। इस परिवार में खूब अपनापन है। लगता ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं। सोचता हूं अच्छा हुआ कि आज धार नहीं गया।
दोपहर में थोड़ी देर कमरे में लेटे और उसके बाद नदी के किनारे पेड़ के नीचे खटिया डालकर छाया में लेटे रहे। सचमुच आज भंवरताल की याद आ रही है और वहां जैसे सब इकट्ठे होते थे, पूरा परिवार एकसाथ। अब न ऐसी जगहें रहीं, न ही ऐसे परिवार। ये सारे लोग साथ रहते हैं। नई-नई इकाई बनती जाती हैं और नए-नए मकान जुड़ते चले जाते हैं, लेकिन हैं सब एक ही। अब तक मैं दो पत्नियों वालों से मिला था। यहां उससे भी आगे की स्थिति है। पहली दोनों पत्नियों के लड़कों जाम सिंह और मोकना ने अलग-अलग मकान बांध लिये हैं, लेकिन उनके भी बच्चे तो पूरे समय साथ ही रहते हैं। वैसे तो तीसरी पत्नी के बड़े लड़के मोहन ने भी अलग मकान बना लिया है, लेकिन उसका बेटा कुरे सिंह तो पूरे समय दादा-दादी के पास ही बना रहता है। यह वास्तव में सामाजिक व मनोवैज्ञानिक अध्ययन व शोध का विषय है कि एक से ज्यादा पत्नियां कैसे एक ही परिसर में साथ-साथ और सौहार्द से रह पातीं हैं। मुझे लगा कि इस इलाके का व्यापक भ्रमण जरूरी है।
दोपहर में लगभग दो बजे मोहकमपुरा का भ्रमण करने निकले। रात तो यहीं बिचौली में तड़वी की कुटिया में ही रूकेंगे। रास्ते में लहलहाते खेत दिखे। यहां बहुत ही अच्छी जमीन है और बहुत अच्छी फसल। पानी का भरपूर साधन है। इस तरह से ये लोग खेती करते हैं कि एक ही खेत में सब कुछ बो देते हैं और सब कुछ बहुत अच्छी तरह होता है-कपास,सोयाबीन, मक्का, तिली, तुअर, भिंड़ी, मिर्च, मूंगफली, उड़द मूंग तथा धान। एक एक अनाज पकता जाता है और कटता जाता है। आखिर में कपास बच जाती है। मक्का कटने के बाद दोबारा मक्का बो देते हैं-ठंड की फसल। और इसके अलावा गेहूं और चना भी बोते हैं। मसूर और बटला के अलावा सभी दलहन यहां होते हैं। बताते हैं ठंड का मक्का खाने में ज्यादा अच्छा होता है। इनसे खेती कला सीखने के लिए बहुत कुछ है। उधर मंडला-डिंडौरी में बैगा भी बोऊर खेती कमोबेश इसी तरह से करते है। वहां तो वे हल का इस्तेमाल नहीं करते। आधुनिक संसाधन अपनाने के बावजूद ये लोग करते तो पारंपरिक खेती ही हैं। यहां सारा कुनबा खेती के काम में लगा रहता है, बच्चे से बूढ़े तक, चाहे कितना भी सम्पन्न परिवार हो। अभी शहर की ओर रूझान कम है। पूरे समय कुछ न कुछ काम चलता रहता है। खेतों से गुजरते हुए मोहकामपुरा के तड़वी फलिये में सुखराम के घर पहुंच गए। वह कल्याणपुरा से साथ है। थोड़ी देर उसके यहां रूके। उसके पिता प्रेमचंद काफी बुजुर्ग हैं, वही तड़वी हैं। करीब सत्तर से ऊपर ही होंगे। बगल के घर से उनके बड़े भाई बिदुआ भी आ गए, वह पचहत्तर से ऊपर। दोनों ने साथ बैठकर चिलम में भरकर तम्बाकू पी। दोनों में प्रेम देखकर बड़ा अच्छा लगा। बताया कि पहले चकमक चलती थी, अब तो माचिस से ही चिलम जलाते हैं। इसके बाद लगभग घर-घर जाते रहे। कहीं भुटटा खाया, कहीं खेत से मूंगफली उखाड़ी, भूनी और खिलाई।
ग्राम देवी के स्थान भी गए जिसे यहां वन कहते हैं और मंडला की तरफ खेरमाई, बुंदेलखंड में खेड़ापति। यह एकदम नदी के किनारे सुंदर स्थान है। फिर दूसरा फलिया, तीसरा और चौथा। भीलों के फलिये अलग हैं और पटैलियों के अलग। हां, गांव एक ही है-मोहकामपुरा, जो बिचौली ग्राम पंचायत में ही है। गांव बहुत बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है। कोई सड़क यहां नहीं आती और यह नदियों से घिरा हुआ है। शायद इसलिये यहां शुद्ध आदिवासी संस्कृति देखने को मिली। यहां भिलाला नहीं रहते हैं। झाबुआ तहसील में भील और पटैलिया हैं। भिलाला अधिकतर जोबट और अलीराजपुर तहसीलों में निवास करते हैं। कमाल की बात यह है कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी अपनी भीली भाषा बोलते हैं। हिंदी समझते हैं, बोल भी सकते हैं, लेकिन बोलते भीली ही हैं। यहां के गांवों और नगरों के गैर आदिवासी भी भीली समझते हैं और काफी कुछ बोलना भी जानते हैं। यह गोंडों से एकदम उलटा है जिनकी नई पीढ़ी अपनी भाषा-बोली भूलती जा रही है और सब हिंदी बोलने लगे हैं। गोंडों की अपनी भाषा पारसी जानने वाले अब इक्का दुक्का लोग ही रह गए है। ईसाइयों की प्रतिक्रिया स्वरूप ही अब पिछले कुछ बरसों में इनका हिन्दूकरण शुरू हुआ है जिसे एम.एन. श्रीनिवास के शब्दों में ’संस्कृताइजेशन’ बोल सकते हैं। शिवगंगा की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। वैसे शिवगंगा इनकी भाषा बनाए रखने पर जोर देती है। उनका यह कहना है कि भील तो मूलतः हिंदू ही हैं, उन्हें मुस्लिम शासकों और अंग्रेजों ने हिंदू धर्म से अलग होना दर्शाया है। उनका कहना है कि वे हमेशा से हिंदू देवी-देवताओं की आराधना करते रहे हैं केवल उनकी प्रतिमाएं-मूर्तियां नहीं थीं जो अब वे स्थापित करना सीख रहे हैं। यह तर्क किसी भी स्तर पर न तो तर्कसंगत है और न न्यायोचित। भीलों व आदिवासियों का अपना देवलोक है। भीलों ने लंबे अर्से तक इस इलाके पर सीधा राज किया है। तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के चलते वे पूरी तरह से जंगलों में लौट गए हैं। ईसाई मिशनरियों ने नए सिरे से इनका ‘सुधार’ किया, अब हिन्दू संस्थाएं इनका अपनी तरह से ‘सुधार’ करना चाहती हैं। इस समुदाय की मंशा कोई जानना ही नहीं चाहता।
शाम होने लगी। संयोग से सूर्यास्त के समय पहाड़ी पर बसे फलिया में पहुंचे। बहुत ही मोहक सूर्यास्त देखा। बेहद सुंदर गांव है। छोटी-छोटी पहाड़ियां, बीच में नदी-नाले का बहता हुआ पानी और खेत ही खेत। बीच-बीच में छोटे-बडे़ घर टोलों में बसे हुए हैं। सूर्यास्त के बाद शिवगंगा ने जो शिवलिंग स्थापित किया है, उसके दर्शन के लिए गए। सभी फलियों के बीचोंबीच खेतों से घिरे हुए नाले के किनारे एक खाली जगह में चबूतरा बनाकर शिवलिंग स्थापित किया हैं। वहां बैठकर अच्छा लगा। नारियल और मूंगफली का प्रसाद खाया। ठंडक हो गई। दोपहर में निकले तब गर्मी थी। अब ठंडक है। खेतों में बहुत ओस हो गई, अच्छा-खासा अंधेरा हो गया। रात बिताने फिर कोदर सिंह के घर पहुंचे। बाहर भजन कीर्तन चल रहा है। इच्छा तो बहुत है वहां जाने की, लेकिन हिम्मत नहीं हो रही है। वैसे यहां का जीवन बड़ा मनोहारी है। दोपहर में हम केवल दो लोग यहां से निकले थे अब लौटे तो दस लोग साथ में हैं। लोग मिलते गए साथ होते गए। जितने भी लोग साथ में आए कोदर सिंह और उनकी पत्नी सुरती बाई ने एक-एक को बैठाकर जबरदस्ती खाना खिलाया। मुझे फिर बचपन और भंवरताल की याद आ गई। कक्का जी और अम्मा भी याद आए। उनके यहां से भी कोई बिना खाना खाए नहीं जा सकता था।
खाना खाकर करीब सुबह साढ़े नौ बजे घर से निकले। सबसे मिलकर विदाई ली। कोदर सिंह ने हम दोनों को नीम के दो-दो साबुन और तेल की एक-एक शीशी दी। बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी ने बड़ी आत्मीयता से ठीक वैसे ही विदाई दी जैसे किसी सगे संबंधी को देते हैं। मुझे भी लगा कि जैसे अपने घर से जा रहा हूं। सिर्फ आंसु निकलना ही रह गए थे। सबने कहा “फिर जरूर आना और कुछ दिन रहना।” मैंने कहा “हां जरूर आएंगे।”
इस बार झाबुआ जिले में छह दिन रहा। पिछली बार चार दिन रहा था। सोचता हूं इन दस दिनों में इतना मक्का खाया जितना कि सारे जीवन भर में नहीं खाया होगा। यहां गेंहू की रोटी तो खाने की इच्छा ही नहीं होती। झाबुआ जिले में बहुत सी छोटी-छोटी नदियां हैं, इसलिये फसल अच्छी होती है,। जमीन भी उपजाऊ है, साधन उपलब्ध हैं और यहां के आदिवासी अच्छे-खासे, खाते-पीते संपन्न हैं। इससे छोटी नदियों का महत्व स्पष्ट होता है और समझ में आता है कि ये नदियां स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप पोषण देती हैं। बेहद गरीबी या पिछड़ापन तो कहीं दिखाई नहीं दिया। खास बात यह है कि इतने दिनों और इतने स्थानों में घूमने और रहने के बावजूद कोई भी शराब पीते या शराब के नशे में नहीं दिखा। कोई झगड़ते भी नहीं दिखा। लोग बड़े-बड़े परिवारों में सुख-शांति से रहते दिखे। बहुविवाह यहां सामान्य बात है। हर पीढ़ी में एक से अधिक पत्नियां होने की प्रथा आम है। लड़की को भगाकर लाने और शादी करने का प्रचलन अभी जारी है। कल ही तलावली गांव में ऐसे ही विवाद का निराकरण हुआ। लड़के की ओर से लड़की के पिता को एक लाख दस हजार का मुआवजा देना पड़ा। भगोरिया पारंपरिक रूप से अभी भी होता है। होली से पहले एक हफ्ते अनेक लगभग पचास स्थानों पर साप्ताहिक हाट भरते हैं। यहां गांवों में मुस्लिम आमतौर पर नहीं रहते। शहरों में हैं। सभी में काफी सद्भाव है। हां, इतने दिनों में गांव या नगर में एक भी सिख नहीं दिखा। ईसाई मिशनरियों का यहां सैकड़ों साल का काम है और उनका प्रभाव हर जगह दिखता है। ऐसा लगता है कि शिवगंगा के साथ अधिकतर संपन्न किसान हैं, कोई भी छोटा किसान या मजूदर कार्यकर्ता इनके साथ नहीं मिला। ज्यादातर खाते-पीते ट्रेक्टर, मोटरसायकल और मोबाइल वाले लोग ही इनसे जुड़े हुए हैं। सत्ताधारी भाजपा से जुडे़ हुए सरपंच और गांव प्रमुख भी इनके साथ हैं। नगरीय क्षेत्रों में बड़े व्यापरियों और साहूकारों का समर्थन और आर्थिक सहयोग भी इन्हें दिखाई देता है। कुछ गुंड़े और दादा किस्म के लोग भी जुड़े हुए हैं, जो शायद अब इस तरह का कोई भी संगठन चलाने की अनिवार्यता बन गए हैं। संघ से विरोध और अलगाव के कारण यह लोग परेशानी में हैं। सत्ताधारी पार्टी भी उनका साथ नहीं देती। थांदला में शिवगंगा का प्रभाव कम दिखा। शायद इसलिये क्योंकि महेश जी का वहां जाना बहुत कम है। शहरी कार्यकताओं और गांव के कार्यकर्ताओं की सोच और व्यवहार में बड़ा अंतर है। गांव के कार्यकताओं को इन सब विवादों से ज्यादा वास्ता नहीं है, जबकि शहरी कार्यकर्ताओं का आधा समय इसी तरह की चर्चा में बीतता है, संघ बनाम शिवगंगा या भाजपा बनाम शिवगंगा। यह तो आनेवाला समय ही बता पाएगा कि ‘शिवगंगा’ कहां तक प्रवाहमय रह पाएगी। यह एक राजनीतिक खींचतान का विषय बनता जा रहा है। खैर अभी तो मैं यहां की सामाजिक स्थिति को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश में हूं।
एकदम नई तरह की सामाजिक और पारिवारिक मान्यताओं के बीच, मैं नैतिक और अनैतिक की दुविधा से गुजर रहा था। मगर यहां का आदिवासी समुदाय इसे जिस सहजता से स्वीकार और अंगीकार कर रहा है, वह वास्तव में समाजविज्ञान के अध्येताओं के लिए शोध का अच्छा विषय हो सकता है। इसी उधेड़बुन में दिन बीत गया। आज गांधी जयंती है। महात्मा गांधी का सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक तानाबाना जिस नैतिकता के इर्दगिर्द घूमता है, यहां का समाज भौतिक तौर पर उससे काफी भिन्न नजर आता है। परंतु गहराई से देखें तो जिस वैचारिक व आध्यात्मिक पवित्रता के साथ आदिवासी समाज जीता है, अपने में निहित तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद, वह वास्तव में भविष्य के लिए आशा जगाता है। खैर, अब तो शिवगंगा भी गांधी की प्रशंसा करती नजर आती है। शायद दिखावटी ही हो। कुछ स्पष्ट कह नहीं सकते।
क्रमशः…
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