एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
मेघनगर : शिवगंगा का सरोकार
महेश जी और मैं वापस मेघनगर आ गए। अगली सुबह से संगठनात्मक बैठक शुरू हो गई। जनवरी में ग्राम सशक्तिकरण शिविर के नाम से एक बड़ा आयोजन करने का कार्यक्रम है, उसी की तैयारी के संबंध में यह जिले भर के संयोजकों की बैठक रखी है। इंदौर में बारह तारीख को जो बैठक हुई थी उसकी निरंतरता में यह बैठक है। पिछली बैठक में इन्होंने शिवगंगा के मूल उद्देश्य तय किए थे। ये हैं:-
धर्म जागरण 2. स्वाभिमान रक्षा 3. पुण्य 4. परमार्थ।
इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शिवगंगा को काम करना है। इसी के लिए तथाकथित ग्राम सशक्तिकरण शिविर का आयोजन होना है, जिसमें स्वामी अवधेशानंद होंगे और बाबा रामदेव को लाने की कोशिश चल रही है। उसी की तैयारी को लक्ष्य करके इस महीने के अंत में हर विकासखंड में ग्राम सशक्तिकरण वर्ग लगना है। दिनभर बैठक चलती रही। अल्पाहार और भोजन के लिए सत्रावसान होता है। शाम को लगभग छः बजे बैठक समाप्त हुई। एक-दो सत्र में, मैं भी बैठकर सुनता रहा।
आज के सत्रों में बैठकर और इनके उद्देश्यों की औपचारिक घोषणा के बाद यह तो स्पष्ट हो गया कि मैं शिवगंगा में रहकर काम नहीं कर सकता। यह भी लगता है कि इनकी सोच समझ में सुधार लाया जा सकता है और उसे सही दिशा दी जा सकती है, पर समय लगेगा। लोग अच्छे हैं, समझ सही नहीं हैं। महेश जी में छटपटाहट और तड़फ हैं, सही दिशा पकड़ने की। यही ठीक हो सकता है कि इनसे थोड़ी औपचारिक दूरी बनाकर रखते हुए पूरक के रूप में काम किया जाए। परंतु क्या यह संभव हो पाएगा?
इन्हीं के सत्र में बैठे-बैठे जो विचार मेरे मन में आया उसके संबंध में हर्ष जी और महेश जी से चर्चा करना उचित है। यह सोचकर मैंने शाम को हर्ष जी के सामने स्पष्ट किया कि मुझे अपनी अलग पहचान बनाए रखते हुए काम करने पर विचार किया जाए। बिरसा मुंडा ट्रस्ट के नाम से मैं काम कर सकता हूं जिसमें और भी लोग जुड़ सकते हैं। यहां एक अलग कमरे में अपना कार्यालय बनाकर उसे लायब्रेरी का रूप दे देंगे-आदिवासी संस्कृति और आंदोलन, आदिवासियों के कानूनी अधिकार और कार्यकर्ताओं के नागरिक अधिकारों पर साहित्य एकत्रित करते हुए उस पर चर्चा, कार्यशाला और साहित्य प्रकाशन का काम किया जा सकता है। स्ट्रीट थिएटर पर काम कर सकते हैं एक रेपर्टरी बना सकते हैं। ग्राम सशक्तिकरण के उद्देश्य से गांवों का भ्रमण करते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, बिजली आदि की समस्याओं के निराकरण के लिए विचार-विमर्श, और जल संरक्षण के कार्य तथा खेती के पूरक ग्रामीण उद्योग स्थापित करने के कार्य किए जा सकते हैं।
मैंने स्पष्ट किया कि धर्म और धर्म जागरण की जो आप लोगों की समझ है उसे लेकर आप में और मुझमें गंभीर मतभेद हैं जो आगे चलकर और गहरे हो सकते हैं, इसलिए साथ होते हुए भी अलग-अलग पहचान रखना उचित है। हर्ष जी ने कहा विचार करना होगा। महेश जी ने कहा विचार क्या करना? आप तो जैसा लगे काम करना शुरू कर दो। मेघनगर के आसपास के गांव संभाल लो। मैंने भी कहा ऐसे नहीं, विचार करके भावी रूपरेखा बनाना आवश्यक है। मैंने यह भी कहा कि बीच-बीच में, मैं मंडला जिले में भी जाकर इस दिशा में काम करना चाहूंगा।
हर्ष जी और महेश जी से स्पष्ट बातें करने के बाद चित्त हल्का लगा। अब उन्हें तय करना है कि यह संभव होगा या नहीं। रात में खाना खाकर हर्ष और मुकेश जैन चले गए। महेश जी और मैं रह गए। मुझे महसूस हो रहा था कि महेश जी की रूचि मुझे यहां बनाए रखने में है। परंतु हर्ष जी मेरी बात और विचार को शायद ज्यादा गंभीरता से ले रहे हैं और त्वरित विश्लेषण भी कर रहे हैं। यह भी लगता है कि महेश जी की सोच है कि मुझमें समय के साथ परिवर्तन आ सकता है। परंतु हर्ष जी शायद समझ गए हैं कि मुझमें किसी मौलिक परिवर्तन की संभावना नहीं है। मुझे यह भी महसूस हो रहा है कि आरएसएस के विचार ही इन लोगों के भी आधार हैं और उनमें कोई परिवर्तन आएगा, ऐसा सोचना स्वयं को अंधेरे में ही रखना होगा। परंतु एकाएक किसी निर्णय पर पहुंचना भी जल्दबाजी ही होगी। मुझे इनके साथ यह दौर पूरा करना बेहद जरूरी है। यह सब सोचते विचारते नींद आ गई।
सुबह उठकर महेश जी ने कहा उन्हें आज थांदला जाना है, मैं आराम करूं। ठीक भी है। अभी घूमना शुरू नहीं किया है। एक दिन और आराम करना ठीक रहेगा। मैं अकेला रह गया। कून सिंह और हरी सिंह है, खाना बनाकर खिलाने के लिए। मुझे लगा कुछ पढ़ ही लूं। वाल्मीकि रामायण के दो खंड रखे हैं-हिंदी अनुवाद सहित। कुल डेढ़-दो हजार पृष्ठ होंगे, फिर पता नहीं कभी मौका लगे या न लगे, उठाकर पढ़ना शुरू कर दिया। बहुत ही रोचक हैं। एकदम सीधा सीधा वर्णन है। तुलसीदास कृत रामचरित मानस की तरह घटनाओं का अति नाटकीयकरण इसमें नहीं है। प्रत्येक चरित्र की अच्छाइयां और कमजोरियां दोनों का ही उल्लेख है, साथ ही उनके मानव स्वभाव की गुत्थियों का विवरण भी है। सभी चरित्रों का चित्रण ईश्वर की तरह न होकर मानव के रूप में है। श्रीराम को भी एक सद्गुणी मानव के रूप में प्रस्तुत किया गया है जिसमें राज्य की आकांक्षा, मोह, क्रोध, क्लेश और भय तथा हताशा के साथ ही साथ कर्तव्य, त्याग और बलिदान का अद्भूत और उन्नत मिश्रण है। कैकेई का राम के प्रति प्रेम और दशरथ के भीरूपन तथा चाल को भी उभारा गया हैं। निश्चय ही यह अधिक प्रामाणिक और वस्तुपरक ग्रंथ प्रतीत होता है और शायद इसीलिए धर्मग्रंथ के रूप में इसकी पठनीयता नगण्य ही है। अभी तो पूरा पढ़ने में बहुत समय लगेगा। मैं काफी तेजी से पढ़ रहा हूं। कुछ सरसरी तौर पर देख लेता हूं और कुछ अंश पूरा पढ़ता हूं। पुत्रहीन बूढ़े दशरथ की पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा से किए गए आयोजनों के वर्णन में लगभग स्पष्ट इंगित किया है कि श्रृष्यश्रृंग के योग से पुत्र उत्पन्न हुए। यह बात सामान्यजन को अधिक उजागर हो जाए तो नया हंगामा भी खड़ा हो सकता है। कहीं रामायण ही प्रतिबंधित करने की बात ही न उठने लगे, पर तुलसी के रामचरित मानस और वाल्मीकि की रामायण में कुछ मौलिक विभिन्नताएं तो जरूर हैं। यह समझना भी इस प्रवास की बड़ी उपलब्धि ही गिनी जाएगी?
दशहरा और शस्त्र पूजन
आज इक्कीस अक्टूबर दशहरा है। जल्दी उठकर नहा धोकर तैयार हो गया। आज और कल विकास केंद्रों में शस्त्र पूजन कार्यक्रम होना है। मैंने इच्छा प्रकट की थी कि मैं देखना चाहूंगा। संगठन के पूरे चरित्र को समझने का संभवतः यह सबसे अच्छा मौका है। जो कुछ भी दबा छुपा होगा वह बाहर आ जाएगा। आज झाबुआ से राजाराम जी के साथ रामाखण्ड जाना है। मोटरसायकल लेकर राजू मुझे लेने आ गया। सुशील को झाबुआ जाना है, वह भी साथ हो लिया। सुबह बहुत ठंडी हवा चलती है। आठ बजे झाबुआ पहुंच गए। वहां से राजाराम मुझे लेकर रामा विकासखंड के लिए निकले। धार रोड पर लगभग बीस पच्चीस किलो मीटर रामा (काली देवी) है। वहां से अंदर कच्ची सड़क पर लगभग आठ-दस किलो मीटर दूर जाकर बोचका गांव है यहां शस्त्र पूजन कार्यक्रम करना है। करीब साठ-सत्तर लोग अपने-अपने पारंपरिक हथियार लेकर इकट्ठे हुए है। हथियारों की पूजा की, धागा बांधा, नारियल फोड़ा और साफ-सफाई भी की।
राजाराम ने भीली भाषा में बहुत ही संतुलित और अच्छा उद्बोधन दिया। फिर मुझसे बोलने के लिए जिद करने लगे। थोड़ा-सा मैं भी बोला कि धर्म क्या है? और शस्त्र पूजन का महत्व क्या है? गांव की एकता क्या है? बोलकर मुझे अच्छा लगा। यहां पहली बार कुछ बोला। मैं सारी बातों को सही परिप्रेक्ष्य में रखना चाह रहा था। जिस तरह से इन सबको धार्मिकता को लेकर प्रेरित और उत्तेजित किया जा रहा है, उससे मुझे काफी तकलीफ हो रही है।
सुबह यह तय हुआ कि मैं थांदला-पेटलावाद जाऊंगा। आकाश पेटलावाद में है। उसकी इच्छा थी कि मैं वहां जाऊं। उस क्षेत्र में प्रकाश जी माकोड़िया भी काम करते है जो शिवगंगा के सबसे वरिष्ठ कार्यकर्ताओं में से हैं। सुशील ने भी जाने का तय कर लिया। सीधी रतलाम जाने वाली बस में बैठकर खवासा पहुंच गए। यह थांदला तहसील का एक प्रमुख कस्बा है। थोड़ी दूर पर रतलाम जिला लग जाता है। यहां से एक रोड सीधी बाजना और फिर सैलाना जाती है, यह दोनों स्थान रतलाम जिले में हैं। खवासा में अच्छी खेती होती है। टमाटर की जबर्दस्त उपज है। यहां पाटीदार लोग भी काफी हैं। यहां पर पंजाब से तीन गुना ज्यादा रासायनिक कीटनाशक टमाटर में उपयोग में लाया जाता है। इस स्थान का चरित्र कहीं से भी आदिवासी नहीं लगा। सुर सिंह आ गए। इस क्षेत्र के कार्यकर्ता हैं। देखता हूं शायद उनसे कुछ बात बन जाए। प्रकाश, सुर सिंह, खूमचंद और मैं अंततः शाम पांच बजे के करीब दो बाइक पर निकले। पगडंडी वाले रास्ते से होते हुए मादलदा गांव में काड़ीकुंआ फलिया पहुंचे। रास्ता एकदम उजाड़,वीरान व मरूस्थलनुमा है। यह राजस्थान का बॉर्डर है। कोई सड़क नहीं, साथ ही यातायात का साधन नहीं। सड़क से करीब दस किलो मीटर अंदर आए। यहां एक सरकारी स्कूल बना हुआ है। उसी के एक कमरे में शिवगंगा का शिवलिंग स्थापित है। सरकारी स्कूल में मंदिर की स्थापना ने वास्तव में आश्चर्यचकित किया। हमारे यहां तो विद्यालय को ही शिक्षा का मंदिर कहा जाता है। पर यहां शिक्षा तो नदारद है, मंदिर जरूर है, वह भी शंकर जी का। अधबना भवन है, लंबे समय से ऐसे ही पड़ा हुआ है। पहले का बना हुआ एक कमरा है, वहां महीने में दो-चार दिन के लिए एक शिक्षक आता है। गांव में महीनों से लाइट नहीं है।
काडीकुंआ के अंदर जाकर सबको शस्त्र पूजन के लिए मादलदा में आने का कहकर आगे बढ़े। लगभग दो किलो मीटर आगे चलकर मादलदा गांव आया। यहां एक उप-स्वास्थ्य केन्द्र बना है जो बंद पड़ा हुआ है और उसके बरामदे में लकड़ी भरी और कण्डे थोपे हुए हैं। एक आंगनवाड़ी है वह भी बंद पड़ी हुई है। सरकारी सेवाओं की यही दयनीय स्थिति कमोवेश पूरे अंचल में है। एक पेड़ के नीचे हनुमानजी का मंदिर है, खुले में शिवलिंग स्थापित है। नया सा स्कूल भवन है। वहां ‘विद्या भारती’ का एक शिक्षक पढ़ाने आता है। करीब छः बजे मादलदा पहुंचे। कोई नहीं मिला। हाउसिंह भगत के यहां गाड़ियां खड़ी की, चाय पी। फिर दिनेश के यहां गए, चाय पी। तय हुआ कि चारों लोग तीन अलग-अलग जगह खाना खायेंगे और भगत के यहां सोयेंगे। भगत का घर बहुत सम्पन्न है तथा उसकी चक्की भी है। इस पूरे इलाके में भगत लोगों का जबरदस्त प्रभाव है। अंधेरा हो गया था। प्रकाश और सुर सिंह कहने लगे कि पहले चलकर खाना खा लेते हैं, बाद में शस्त्र पूजन के लिए चलेंगे। मैंने कहा पहले जिस काम से आए हैं वह कर लें, फिर खा लेंगे, नहीं माने। कहने लगे, लोग देर से आएंगे और देर तक बैठेंगे। मुझे उनका यह व्यवहार सर्वथा अविश्वसनीय सा लगा। भोजन को प्राथमिकता? बहादुर के यहां खाने गए। अच्छा सम्पन्न घर है। पास में कुंआ है और तालाब भी। लाइट तो गांव में है नहीं। चंद्रमा की रोशनी हर तरफ खिली हुई है। चांदनी बड़ी अच्छी लग रही है। खाना बना और फिर खाया गया। साढ़े आठ बज गए होंगें। शस्त्र पूजन के लिए जहां लोग इकट्ठे हैं, वहां पहुंचे। बस खुले में चांद की रोशनी। पता लगा काडीकुआं के पंद्रह सोलह लोग शस्त्र लेकर आए थे। भूखे प्यासे। एक घंटा रास्ता देखकर चले गए। मैंने तो पहले आने का कहा ही था। पर नहीं माने अब बीस-पच्चीस लोग बचे हैं और थोड़े से शस्त्र। यहां का काम करने का तरीका कुछ जम नहीं रहा है। प्रकाश जी ने मुझसे पूछा बोलेंगे? मैंने मना कर दिया बोलने का। वैसे भी कोई अर्थ निकलता दिखाई नहीं दे रहा था।
प्रकाश जी हिंदी में थोड़ी देर बोले। शस्त्र पूजन की आवश्यकता बताई-ईसाईयों और मुसलमानों से अपनी और अपने गांव की रक्षा करना इसी के आसपास सारी बातें। उसके बाद भगत जी बोले और अपनी बहादुरी का बखान करते रहे कि कैसे आसपास से ईसाइयों का आना बंद किया। बताने लगे कि दिन में चरवाहे बच्चों को पढ़ाने कोई शिक्षक आता था और पढ़ाता था। उस पर ईसाई होने का शक हुआ और मार कर उसे भगा दिया। अब कोई नहीं आता। गुस्सा तो बहुत आ रहा था लेकिन दबाए बैठा रहा। फिर कहने लगे कि काडीकुंआ के जिस अधबने स्कूल में शिवलिंग रखा हैं वहां पैंतीस युवक हर सोमवार को इकटठा होते है वहीं साधना करते हैं। यह सबकुछ सुनना अब मेरे लिए असहनीय होता जा रहा था। बच्चों की पढ़ाई तक बंद करवाने को ये लोग गर्व का विषय बता रहे हैं। इसके बाद मैं बीच में बोल पड़ा कि इन युवकों ने कभी यह नहीं सोचा कि यहां शिक्षक क्यों नहीं आता? कभी ये नहीं सोचा कि निरक्षर बच्चों को पढ़ाना चाहिए? ईसाई होने से उसे तो मार कर भगा दिया, लेकिन अपनी तरफ से उन्हें पढ़ाने के लिए क्या किया? क्या यही धर्म है? अपने गांव का, समाज की तकलीफों का ध्यान रखना, उन्हें दूर करने की कोशिश करना, क्या ये सब धर्म में शामिल नहीं है? इसके बाद जोश थोड़ा ठंडा हुआ। कुछ लोग हां में हां मिलाने लगे। सभा समाप्त हो गई। हाउसिंह भगत जी के घर जाकर सो गए। काफी सनाका सा खींच गया था। संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा। कोई सीधी प्रतिक्रिया भी सामने नहीं आई। इसकी एक वजह यह भी है कि संगठन के लोग जानते हैं कि उन्हें क्या करना है। अच्छी शिक्षा उनके उददेश्य में रोड़ा भी बन सकती है।
यहां नजर आता है एक परिपूर्ण नैसर्गिक जीवन
दातून करने के बाद भगत जी के यहां ताजे दूध की चाय पी। फिर मेरे कहने पर टहलते हुए कुछ घरों में गए। बहादुर के काका दाउसिंह के यहां गए। बूढ़ा आदमी यहां का तड़वी है। यह गांव पुराना और जाना माना गांव है, लूटमार के लिए। यहां भील लुटेरों का बहुत ताकतवर गैंग हुआ करता था जिसका सरदार यही दाउसिंह तड़वी था। उसके पैर में गोली धंसी हुई साफ दिखाई देती है। अब सब सुधर गए हैं। यह भी एकतरह का प्रोफेशन ही था। खैर अब सब खेती-बाड़ी करने लगे हैं। खेती अच्छी होने के साथ पानी भी है, बस बिजली की समस्या है। पम्प चलाने के लिए पैदल चलकर डीजल लाना पड़ता है। तड़वी के घर में बहुत सारे लोग है और लड़के-लड़कियां सब पढ़ते हैं। सब बहुत खुश हो गए। दूध पिलाया और खाने के लिए रोकने लगे। मुर्गा-मुर्गी, बकरा-बकरी, भेड़ सब तरफ खेल रहे हैं। बकरी और भेड़ के बच्चे में बड़ा प्रेम है। यहां एक परिपूर्ण नैसर्गिक जीवन नजर आता है। प्रकृति, पशु व मनुष्य का एकाकार जैसा होना। यहां से निकलकर नहाने के लिए बहादुर के घर के पीछे वाले तालाब में गए। इस तालाब से एकदम लगा हुआ दूसरा घर ढोल्का गांव का है जो राजस्थान में है। हम राजस्थान घूम कर आए, वहां लघुशंका की और फिर मध्य प्रदेश के तालाब में तैरकर नहाए। कुछ-कुछ ऐसा पहले गुजरात के साथ भी कर चुके है। यह जिला भी बेहद रोचक है, इसका एक हिस्सा गुजरात से जुड़ता है तो दूसरा राजस्थान से। तीनों राज्यों की मिली जुली संस्कृति एक चौथी अनूठी संस्कृति निर्मित करती है। इस विविधता को जीवंत देखना, समझना और इसमें शामिल होना एकदम नया व आत्मीय अनुभव रहा।
बहादुर अपने घर से चावल की राबड़ी बनवाकर ले आया। इससे पहले मक्के की राबड़ी तो दो-तीन बार खाई है। बड़ी ही स्वादिष्ट होती है। चावल की आज पहली बार खा रहा हूं। छाछ में चावल पकाए गए हैं जिसमें ऊपर से दूध मिलाकर अब खिला रहे हैं। छाछ और दूध दोनों एकसाथ बहुत मजा आ गया। अच्छे से खाना खाया और निकल गए।
खवासा से कुछ दूर बामानिया बस्ती है। यह मामा बालेश्वर दयाल की कर्मभूमि है। इस इलाके में उन्हें देवता की तरह पूजा जाता है। उन पर विस्तृत शोध की जरूरत है। यहां रेल्वे स्टेशन भी है। खवासा और बामनिया के बीच एकदम मरूस्थल है। बामनिया में समाजवादी नेता और समाज सुधारक मामा बालेश्वर दयाल ने भील आश्रम बनाया था। और यहीं उनका निधन हुआ था। पड़ोसी राजस्थान के जिलों में उन्होंने बहुत काम किया और अभी भी वहां के किसान उन्हें पहली फसल चढ़ाने आते हैं। पिछले साल कुछ समाजवादी डॉ. सुनीलम आदि ने उनकी शताब्दी यहां मनाई थी। सुनीलम यहां प्रयत्न नाम से कोई संस्था भी चलाता है। बामनिया से करवड़ और फिर सारंगी होते हुए तीन बजे के करीब पेटलावाद पहुंचे। यहां शिवगंगा का कार्यालय है, वहां जा कर थोड़ी देर लेट गए। पेटलावाद तहसील में काफी कस्बे हैं और कस्बाई संस्कृति है। यहां आदिवासी संस्कृति बहुत कम दिखाई देती है। प्रकाश की आकाश से बात हुई। अभी तक यह तय नहीं हो पा रहा है कि रात किस गांव में रूकना है।
पेटलावद से साढ़े चार बजे के लगभग रायपुरिया के लिए निकले। तभी अर्पणा का फोन आ गया। दो दिन से सिग्नल न होने से मेरा फोन बंद था। अभी सिग्नल मिला। भंवरताल से बोल रही है। बताया कि इन लोगों ने जबलपुर में एक सेकण्ड हैण्ड स्कॉर्पियों का सौदा कर लिया है। इस हफ्ते ले लेंगे। सुनुवां और गल्ली से बात कराई। सुनुवां तो बस रोता ही रहा। मैं भी उदास हो गया और लगा कि भंवरताल जाना चाहिए। बहुत देर बात हुई।
आकाश यहीं मिलने वाले थे, अब फोन आया कि मोहनकोट में मिलेंगे। मोहन कोट के लिए निकले। आधा घंटे में पहुंच गए। यहीं कल से इनका वर्ग लगने वाला है। मोहनकोट पहुंच कर पता लगा कि आकाश आगे जामपाड़ा गांव में मिलेगा। जामपाड़ा पहुंच गए। तब तक अंधेरा हो गया था। सड़क से दूर नदी नककर गांव है। थोड़ी दूर पर एक बड़ा तालाब भी है। यहां नया-नया संपर्क कालू सिंह के यहां रूके। वह अच्छा संपन्न भील है। बूढ़े मां,बाप साथ में रहते हैं और दो बेटे और दो बेटियां हैं। हम लोग टहलने के लिए ऊपर पहाड़ी पर गए। चांदनी खूब खिली हुई है। लौटकर कालू सिंह के यहां अच्छे से खाना खाया। फिर सब गप्पे मारने बैठ गए। कालू सिंह, उसकी पत्नी और दोनों बेटियां, तामा और सगन व दोनों बेटे मनोहर और अमित साथ हो लिए। एक भतीजा भी है। बड़ी बेटी और बड़े बेटे की शादी हो चुकी है। बेटा करीब चौदह-पंद्रह साल का है। आठवीं में पढ़ता है। बहू आठवीं पास है। बेटे से बड़ी है। बेटा छोटा है। लेकिन काम करने वालों की कमी है इसलिए बहू लाना जरूरी था। अभी इसी साल शादी हुई है। बड़ा सुखी परिवार है। इस तरह पूरे परिवार को साथ बैठकर हंसी मजाक करते पहली बार देखा। आकाश में भी गुण है, परिवार के अंदर पैठ बनाने का। एक बिलकुल अलग तरह की सामाजिक संरचना यहां नजर आती है। सामुहिकता का बोलबाला होते हुए भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी कायम है। हमारे नगरीय समाजों में इस किस्म की स्वतंत्रता अब भी दुर्लभ है। यहां सब आपस में जुड़े रहते हैं। बुजुर्ग अपने को अलग रखना भी जान समझ लेते हैं। बूढ़े पिताजी बाहर आंगन में ही खाट पर रजाई ओढ़कर खांसते हुए सोए हैं। अंदर नहीं आते। बूढ़ी मां परछी में खाट पर सोई हुई है।
क्रमशः…
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