एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
24 अक्टूबर 2007
सुबह पांच बजे ही सोकर उठ गया था। पहले मोहनकोट जाना था। वहां आज इनका वर्ग है। परंतु अब वहां जाने का मन नहीं हो रहा है। इसलिए मैंने कहा मैं मेघनगर निकल जाता हूं। मोहनकोट से साढ़े सात पर सीधी बस जाती है। छह बजे के करीब आकाश के साथ में पैदल मोहनकोट के लिए निकल गया। रास्ते में दातून की। जब धार से निकला था तो मसूढ़े में काफी दर्द था। अब दातून करते-करते एकदम ठीक हो गया है। जल्दी मोहनकोट पहुंच गए। अभी टाइम है। पास के नखलिया फलिए में विजय सिंह के घर जाकर चाय पी। लौटकर मोहनकोट आए और तभी बस आ गई जो अंतर्वेलिया होकर मेघनगर जाएगी। आकाश से निरंतर बातचीत होती रहती है। महेश जी के अलावा बस इसी से बातचीत होती है। थोड़ा सोचने-समझने वाला है। इसमें जानने-समझने की इच्छा है। शायद इसीलिए संघ के प्रचारक का काम इसने छोड़ा। अगर सब कुछ ऐसा ही चलता रहा तो बहुत समय इनके साथ नहीं टिक पाएगा। शिवगंगा का संघ के शिकंजे से निकल पाना मुश्किल ही दीखता है। महेश जी और आकाश ही मेरे साथ से प्रभावित और प्रसन्न दिखते हैं। बाकी के शायद काफी डरे हुए और सशंकित हैं।
बस अच्छी है। मुझे बिल्कुल पीछे की सीट पर जगह मिली है। आगे जाकर एकदम भर गई। अचानक ऐसा लगा कि मेरी जांघ पर कोई मुंह रगड़ रहा है। देखा तो एक बकरा है जो मेरी धोती से रगड़-रगड़ कर अपनी खुजली मिटा रहा है। अपने मालिक यानी एक बच्चे के साथ चुपचाप और शराफत से ऐसे खड़ा हुआ है, जैसे बस में इंसानों के साथ सफर करने का अभ्यस्त हो। बड़ा रोचक लगा। अभी तक यहां मुर्गा गोद में लेकर सफर करते हुए तो बहुतों को देखा, लेकिन बकरा आज पहली बार देखा। आगे कल्याणपुरा कस्बे में आज हाट है, वहां आराम से चुपचाप अपने मालिक के साथ बकरा उतर गया। यहां बिकने के लिए आया होगा। वह इसे बेचकर घर का सामान खरीद कर ले जाएगा। स्थानीय लोग बकरा बकरी,मुर्गा को यहां का (एटीएम) कहते हैं। जब भी जरूरत पड़े तुरंत बिक जाता है और काम निकल जाता है। अंतर्वेलिया से एकतरफ सड़क झाबुआ और दूसरी तरफ मेघनगर चली जाती है। साढे़ नौ के करीब मेघनगर पहुंच गए। बहुत दिन बाद बस स्टेण्ड पर पोहा, जलेबी और कचौड़ी खाई फिर कार्यालय पहुंचा, वहां महेश जी को मेरे आने की खबर मिल गई थी।
मक्के की राबड़ी खाने के लिए तैयार मिली। राबड़ी भी खा ली। यहां तो जो भी खा लो, सब पचता चला जाता है। आज तक कभी पेट की गड़बड़ी नहीं हुई, जगह-जगह खाया और हर जगह का पानी पिया। वातावरण शुद्ध हो तो सबकुछ अनुकूल हो जाता है। साथ ही स्थानीय भोजन का महत्व भी समझ में आ जाता है।
मेघनगर आकर वाल्मीकि रामायण का पाठ जारी रखा। अब शाम से यहां सशक्तिकरण वर्ग शुरू होना है। महेश जी से मैंने कहा कि अब मैं निकलता हूं। उस दिन हर्ष जी और आप से जो चर्चा हुई है, उसके बारे में कुछ सोच लें तब मुझे खबर कर देना। अब काफी समय हो चुका है। इस तरह से और चलने का कोई अर्थ नहीं है। महेश जी की तो बिल्कुल इच्छा नहीं है मुझे जाने देने की, जबकि मतभेद बहुत हैं। काफी भोले हैं। संघ जैसे संगठन इन्हीं जैसों के बल पर फलफूल रहे हैं। इनका अभी लोगों में विश्वास बाकी है। मुझे समझाते हुए कहने लगे उन्नीस की सुबह वनवासी कल्याण आश्रम, पुणे के एक वरिष्ठ सदस्य प्रोफेसर सदाशिव देवधर आ रहे हैं। आपसे भी मिलना चाहते हैं, तब तक रूक जाइए। मुझे हंसी आ गई, महेश जी के भोलेपन पर। मैंने कहा ठीक है, आप चाहते है तो इतने दिन और सही, लेकिन कुछ तय तो करना पड़ेगा। महेश जी ने कहा, सब हो जाएगा। सब तय है, आप तो बस यहीं रहो।
शरदपूर्णिमा के बहाने
सुबह उठकर घूमने गया। यहां वन विभाग की नर्सरी का क्षेत्र बहुत सुंदर है। वर्ग वाले सुबह से उठकर व्यायाम आदि करते हैं और फिर प्रभातफेरी पर निकलते हैं। वही संघ वाला कार्यक्रम जारी है। नहा-धोकर पढ़ने बैठ गया। बीच में अल्पाहार मिला। आज शरदपूर्णिमा है। आरएसएस. से पहली पहचान शरदपूर्णिमा के माध्यम से ही हुई थी। बहुत छोटे थे, तब मंडला में मुहल्ले में नानाघाट के पास ताम्बे जी अपने घर में शरदपूर्णिमा पर खीर खाने सारे बच्चों को बुलाते थे। एक बार मैं भी गया था। बड़ा अच्छा लगा था। खीर भी और वातावरण भी। देशभक्ति के गीत गाते थे। बाद में, बहुत बाद में, पता लगा कि यही संघ का गढ़ है और इस तरह संघ में छोटे-छोटे बच्चों को आकर्षित किया जाता है। उसके बाद कभी भी संघ से संपर्क नहीं हुआ। अब जाकर ही संघ को देखने का मौका मिल रहा है। उनकी कार्यपद्धति समझ में आ रही है। शरदपूर्णिमा के बहाने एकबार फिर बचपन याद आ गया। यह भी समझ में आया कि संघ कितना लंबा दांव चलता है।
आज से शिवगंगा सशक्तिकरण वर्ग शुरू हो गया। जो अलग-अलग सत्र होने हैं, उनके एक-दो सत्र में मैं भी बैठना चाहता हूं। गांव के दुःख और दुख के कारण, अल्पाहार के बाद वाले सत्र में पीछे बैठकर सुनता रहा। लोगों ने जो दुःख बताए वे मुख्यतः पानी, सिंचाई की समस्या, गांव में गुटबंदी, ईसाइयों के प्रभाव से धर्म परिवर्तन, भूमि संरक्षण, बढ़ते परिवार में जमीन का विभाजन, ढोर-डंगर की कमी, इलाज की सुविधाओं के अलावा बिजली, डीजल की अनुपलब्धता, शिक्षा का कुप्रबंध, सड़क का अभाव और रोजगार की तलाश में दूसरे राज्य में जाने की मजबूरी। दहेज भी एक बड़ी समस्या है। शादी लड़की के मां-बाप को दहेज दिए बिना हो ही नहीं सकती। हम इस समस्या को जिस तरह से देखते हैं स्थानीय समाज में उससे उलट ही प्रचलन में है।
रोजगार व पलायान की चिंता नहीं
बातचीत के दौरान कुछ रोचक बातें पता लगीं। इन लोगों में स्त्री और पुरूष दोनों ही दाई का काम करते हैं। यानी प्रजनन के समय मदद करने में कुछ स्त्रियां और कुछ पुरूष दाई का काम सीखते हैं। पुरूष दाई पहली बार सुना। वैसे यह आदिवासी समाज में ही संभव है, क्योंकि सबकुछ प्रकृति प्रदत्त जो है। दूसरे आदिवासी समुदायों से हटकर इनके ममेरे-फुफेरे भाई-बहन में शादी नहीं होती। पिता और माता दोनों के ही गोत्र में शादी वर्जित है। यह तो पूरी तरह उत्तर भारतीय हिंदू समाज की तरह है। अधिकतर जनजातियां और दक्षिण पश्चिम भारत के हिंदुओं में इस तरह का विवाह सामान्य है। दहेज की मांग उन परिवारों में ज्यादा होती है, जहां के सदस्य राजनीति से जुड़े हुए हैं या स्थानीय संस्थाओं में सक्रिय हैं। सामान्य आदिवासियों में प्रतीकात्मक दहेज होता है। एक व्यक्ति ने मजेदार बात यह कही कि अगर दहेज का दबाव न हो तो हरेक मर्द चार,चार पांच-पांच ब्याह कर लेगा। बहुविवाह इनमें संपन्नता और पौरूष का प्रतीक है। यह एक नए दृष्टिकोण को भी समझाता है। दहेज के पीछे छुपी भावना तो स्पष्ट होती ही है, परंतु महिलाओं की स्थिति यहां भी उतनी बेहतर नहीं है, जितनी कि हमारी कल्पना में है। गांव के पचास में से अड़तालीस लोग रोजगार के लिए गुजरात जा चुके हैं। परंतु यहां यह प्रमुख चिंता नहीं है। यहां तो लगता है सबको धर्मातरण रोकना, शिव का मंदिर बनाना और हिंदूकरण ही मुख्य लक्ष्य समझाया जा रहा है।
आज आकाश का मोहनकोट वर्ग पूरा हो जाएगा और अगला खवासा में उन्तीस से है। मैंने और महेश जी ने कहा है शाम को यहां आ जाए। कल सुबह यहां का वर्ग भी समाप्त हो जाएगा। दिन भर पढ़ता रहा। वाल्मीकि रामायण में किष्किंधा कांड में चालीस से छियालिस वर्ग तक विश्व भूगोल का जो उल्लेख है वह आर्श्चयजनक है। आज भी उसे पढ़कर अनेक स्थानों को समझा जा सकता है। इतने पुराने समय में भी बिना संचार माध्यमों के भूमण्डल के बारे में जितनी अधिक जानकारी थी, वह अचंभित करने वाली है। लंका विजय के बाद राम ने सीता जी के बारे में किस तरह एक अत्यन्त सामान्य मनुष्य की तरह संदेह व्यक्त किए थे उसका उल्लेख अयोध्या काण्ड के एक सौ पंद्रह-सोलह सर्ग में है। सीता का संताप और वेदना का भी वर्णन है। यह सब रामचरित मानस में नहीं है। अग्नि परीक्षा का भी इसमें उल्लेख है। अयोध्या काण्ड में राम के वनवास जाने के निर्णय के संबंध में अलग-अलग लोगों ने जो मत प्रकट किया है, उसमें ऋषि जाबालिक का भी मत है जो स्पष्टतः भौतिकवादी और अनिश्वरवादी है। इनमें संबंधित सर्ग एक सौ आठ में बुद्ध का भी उल्लेख है। वाल्मीकि रामायण कितनी पुरानी है? यह जानना जरूरी है लेकिन अभी तक इसका समय काल पूरी तरह से स्थापित नहीं हो पाया है। इस ग्रंथ का विस्तार चकित करता है।
अतीत को कैसे भूलूंगा
आज अट्ठाइस अक्टूबर है। आज चार महीने पूरे हो रहे हैं। नया अनुभव जुड़ता जा रहा है और पुराना सबकुछ जैसे पार्श्व में जा रहा है। देखना होगा कि मैं अपने अतीत को कहां तक विस्मृत कर पाऊंगा। कर पाऊंगा भी या नहीं? मुझे अपने में काफी बदलाव महसूस हो रहा है। शिवगंगा का यहां का वर्ग पूरा हो गया और दूसरा थांदला में चल रहा है। महेश जी ने मुझसे और आकाश से थांदला जाने को कहा। वे जोबट जाएंगे। देवधर जी, जिनसे मिलवाने को वे उत्सुक थे यहां यानी मेघनगर आकर थांदला जाएगे और उसके बाद पेटलावद चले जाएंगे। महेश जी वही आ जाएंगे। ग्यारह बजे हम थांदला पहुंच गए। नई मंड़ी में टेंट, कनात लगाकर वर्ग चल रहा है एकदम नगरीय माहौल है। हम टेंट के पीछे बैठकर सुनते रहे। यहां भी इस समय गांव के दुख वाला सत्र चल रहा है। यहां लोगों ने जो दुख बताए वे इस प्रकार हैः-
कर्ज का बोझ, दहेज, अशिक्षा, दलाल, अनाज के उचित दामों का अभाव, पटवारी आदि को घूस, पंचायत में भ्रष्टाचार, सिंचाई के साधनों की कमी, खाद का अभाव और इस सबसे फसल का नुकसान, पुलिस का अत्याचार तथा अशिक्षा, चिकित्सा व्यवस्था का अभाव तथा आपसी एकता की कमी।
दहेज प्रथा: लड़की को तैयार करने का मुआवजा, क्योंकि काम करने वाली एक घर से दूसरे घर जाती है। गरीबों को मुआवजा मिलना चाहिए, बडे लोगों को नहीं। धनी आदिवासियों में लालच बढ़ रहा है। तड़वी भी बिना दहेज की शादी कराने से इंकार करते हैं।
शिक्षा व्यवस्था का अभावः स्कूल नहीं है, दूरी है और बच्चों की रूचि पढ़ने में नहीं है, शिक्षक पढ़ाते नहीं। बच्चों का खेतों में काम करना जरूरी है, एक-दो पढ़ते हैं बाकी काम करते हैं, बाल विवाह के कारण भी अशिक्षित रहते हैं। सरकार जो छात्रवृति और खाने की व्यवस्था बच्चों के लिए करती है, उसे शिक्षक और अधिकारी मिलकर खा जाते हैं तथा गांव में सड़क यातायात का अभाव है।
गांव में शिव मंदिर नहीं हैः ईसाइयों और मुस्लिमों की तरह हमारी भी हफ्ते में एक दिन बैठक होनी चाहिए, जिसके लिए मंदिर और चबूतरा हो।
अपने संस्कारों और परम्पराओं की उपेक्षाः परिवार में घर और जमीन के बंटवारे से फूट और समाज में बुजुर्गों के प्रति आदर की कमी
मैं दिनभर यह सब सुनता रहा। जो एक दर्जन समस्याएं गिनाई गई, वे कमोबेश भारत के सभी गांवों व कृषक समाज में विद्यमान हैं। हां, पुलिस अत्याचार की बात यहां ज्यादा हो सकती है। वहीं दहेज प्रथा को लेकर जो बहस हुई उसने बहुत आकर्षित किया। इसमें लड़की तैयार करने का मुआवजा देने की बात कही गई। लड़की का यहां भी अर्थ एक काम करने वाली से ज्यादा नहीं गिना गया। क्या यह अर्धशहरी समाज की नई संकल्पना है? हम तो सुनते रहे हैं कि यहां लड़की वालों को दहेज मिलता है, जबकि बात तो मुआवजे की हो रही है। यह कि गरीब को मुआवजा मिले। यह भी जानना होगा कि अमीर आदिवासियों में लालच क्यों बढ़ रहा है?
अभी तक मेरी संकल्पना में इस तरह का अमीर आदिवासी था ही नहीं। साथ ही एकता में कमी किस संदर्भ में कहा गया है। संघ बनाम शिवगंगा ? या कुछ और? यहां के संदर्भ में यह हिन्दू बनाम ईसाई। शिक्षा की बात सुनकर अच्छा लगा कि शायद जागरूकता आ रही है। शिक्षकों की अनुपस्थिति वास्तव में दुखद ही है। मध्याह्न भोजन आदि के भ्रष्टाचार पर भी बात हुई। इस वर्ग में शायद सबसे महत्व का बिंदु रहा, गांव में शिव मंदिर का न होना। परंतु यह भी कुतुहल का विषय है कि मंदिर की आवश्यकता मुसलमानों और ईसाइयों की तरह सप्ताह में एक बार इकट्ठा होने के लिए ज्यादा है। यह स्पष्टतः संघ और उससे जुड़े संगठनों का प्रभाव है। वैसे भील आदिवासियों में सामान्यतया मंदिरों की संकल्पना कम ही है। हां वे गाथले (मृतक परिजनों की मूर्तियां) जरूर बनाते हैं। कहीं किसी पेड़ आदि के नीचे घोड़े आदि भी चढ़ाते हैं। पर यहां तो हिन्दू धर्म में उन्हें प्रविष्ठ करने और सांस्थानिक बनाने की मुहिम की जा रही है। जहां तक संस्कार और परंपराओं की उपेक्षा का सवाल है, आदिवासियों में सामुहिकता की भावना तो है, लेकिन संयुक्त परिवार को लेकर बहुत आदर नहीं है। भील समाज में तो शादी होते ही अलग घर बनाकर दे दिया जाता है। हालांकि नए बनने वाले घर मूल घर से जुड़े रहते हैं और उनमें सामूहिकता बनी रहती है। सवाल या समस्या तो यही है कि शिवगंगा जैसे संगठन उन पर बहुसंख्यक हिन्दू समाज की मान्यताएं थोप देना चाहते हैं। इस संबंध में और विचार की आवश्यकता महसूस हो रही है।
शाम को आकाश और मैं नदी तक टहलने गए। महेश जी का फोन आ गया कि अब पेटलावाद नहीं जाना है। कल सब झाबुआ में मिलेंगे। देवधर जी कल भर रूकेंगे और रात में चले जाएंगे। ऐसी स्थिति देखकर हम दोनों थांदला से मेघनगर के लिए निकल गए। थांदला में न तो अच्छा लग रहा है और न ही शौच, स्नान, सोने आदि की उचित व्यवस्था है। दोपहर में तो खाना खा लिया था, वापस मेघनगर पहुंच गए। यहां अर्जुन भी वापस आ चुके हैं। फूल सिंह और अर्जुन ने खाना बनाया। खाना खाया। थोड़ी देर टहले। आकाश मुझसे चर्चा कर करके काफी पशोपेश में पड़ता जा रहा है। कहता है महेश जी पर भी अनजाने ही मेरे साथ का काफी असर हो रहा है और उनकी धर्म के बारे में समझ और परिभाषा बदलती जा रही है। मैंने बताया कि मैं एकदम अंदर आकर तो नहीं लेकिन अलग रहकर साथ काम कर सकता हूं, पूरक की तरह। ऐसा प्रस्ताव भी मैंने रखा है। मैंने आकाश से यह भी कहा कि मुझे मुश्किल ही लगता है कि शिवगंगा मुझे झेल पाए। इस तरह से यह मेरा अंतिम प्रवास ही लगता है। धीरे-धीरे मुझमें अधिक स्पष्टता आती जा रही है।
सुबह-सुबह देवधर जी आ गए और आकर सो गए। मैं उठकर घूम आया। नहा-धोकर तैयार हो गया। महेश जी का फोन आया कि मैं और देवधर जी झाबुआ पहुंच जाएं, वे भी वहां आ रहे हैं। नाश्ता किया, अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर बसस्टैंड निकल पड़े। शायद अलविदा मेघनगर। आकाश और अर्जुन बस स्टैंड तक छोड़ने आए। देवधर जी और मैं बस से झाबुआ निकल पड़े। रास्ते में फिर महेश जी का फोन आ गया कि वे झाबुआ नहीं आ पा रहे हैं, सीधे पारा जा रहे हैं, जहां वर्ग चल रहा है। हम भी वहां आ जाएं। देवधर जी ने कहा वे तो झाबुआ रूकेंगे। मैं दूसरी बस में बैठकर पारा निकल गया। मुझे यह आश्चर्य लग रहा था कि जिन देवधर जी के बहाने मुझे रोका था, महेश जी उनसे मिलने का भी प्रयत्न नहीं कर रहे हैं। देवधर जी शायद कुछ समझौता कराने आए हैं, इसलिए महेश जी नहीं मिल रहे हैं।
अभी तो मेरा एकमात्र उद्देश्य इस इलाके को अच्छे से समझना है और इसी के साथ शिवगंगा संगठन को भी। ये जो वर्ग (शिविर) हो रहे है, ये दोनों ही मामलों में मेरे लिए काफी सहायक सिद्ध हो रहे हैं। इंतजार है अगले वर्ग का। अगर यह कहा जाए कि सारी मतभिन्नताओं के बावजूद शिवगंगा से लगातार संपर्क बना हुआ है तो वह मुख्यत: इस क्षेत्र और यहां के समाज को समझने के लिए ही है, तो शायद गलत नहीं होगा। महेश जी के निरंतर साथ से इस दृष्टि से निश्चित रूप से मैं बहुत लाभान्वित हो रहा हूं।
साढ़े ग्यारह बजे के करीब पारा पहुंच गया। यह रामा (काली देवी) विकासखंड का कस्बा है। बस से तो उतर गया, लेकिन यहां कोई लेने नहीं आया। राजाराम जी को फोन किया तो फोन कव्हरेज एरिया के बाहर। महेश जी को किया तो बोले वे भी अभी-अभी जोबट से राणापुर पहुंचे हैं। कहां जाना है ठीक-ठीक उन्हें भी नहीं मालूम। गांव का नाम वलाला है, रजाला रोड पर है। एक-दो लोगों से पूछा और रजाला रोड पर पैदल चल पड़ा। बडी वलाला तीन किलो मीटर है और छोटी वलाला पांच किलो मीटर। यह पता नहीं कि जाना कहां है? शायद कोई परिचित दिख जाए। इसी उम्मीद में चलता गया। करीब एक किलो मीटर चलकर पीछे से एक मोटरसायकल पर राम सिंह भाई भगत जी आ गए। उन्होंने बताया बड़ी वलाला के स्कूल में वर्ग है। वहीं पंचायत भवन भी है। स्कूल भी चल रहा है और वर्ग भी। स्कूल में रेडियो पर यू.जी.सी. या इसी तरह का कोई स्टेशन लगा कर उससे पढ़ाया जा रहा है। यह पहली बार देखा। यह बात भी समझ में आई कि एक शासकीय स्कूल में इस तरह की गतिविधि करना, बिना प्रशासन के सहयोग के तो संभव नहीं है। साथ ही ये लोग बहुत चालाकी से बच्चों को सीधे साथ में न लेते हुए भी अपने प्रभाव में तो ले ही लेते हैं। यहां रामा ब्लॉक का वर्ग है। राजाराम जी यहां के प्रभारी हैं। मुझे देखकर प्रसन्न हुए। वैस्ताजी भी खुश हुए और भी कुछ लोग पहचान गए। थोड़ी देर में महेश जी भी आ गए। सबने स्कूल के बरामदे में खाना खाया। बच्चों की रिसेज चल रही है। खाना खत्म, पढ़ाई शुरू। इस क्षेत्र में शिवगंगा का अच्छा प्रभाव है। अगला सत्र मानचित्र बनाने वाला शुरू हुआ। अपने-अपने गांव के बड़े अच्छे मानचित्र बनाए कुछ लोगों ने। शाम को खेल। मैं दूर तक घूमने निकल गया। थोड़ी देर बैठे बातें करते रहे। फिर खाना लग गया।
पहली बार सीधे जमीन पर बैठकर बिना किसी दरी बिना आसन के सबके साथ खाना खाया। यह एकतरह से चमत्कार ही था। न मालूम कितने समय बाद इस तरह जमीन पर बैठ पाया। न कोई दवाई न कोई अतिरिक्त प्रयत्न। पैदल चलना, सात्विक व स्थानीय भोजन, शुद्ध जलवायु और तमाम चिंताआ से मुक्ति क्या इन सबके सम्मिलन ने यह संभव बनाया? सब्जी महेश जी के निर्देशन में अच्छी बनी है। खाने के बाद का सत्र कथा शिवगंगा की। महेश जी बोले और उसके बाद मुझसे बोलने के लिए सबने बहुत कहा। मैं भी करीब दस मिनिट तक बोला-धर्म से मैं क्या समझता हूं, विषय पर। लोगों ने मंडला और अन्य आदिवासियों और नगरीय समाज के बारे में प्रश्न पूछे। उनसे बातचीत होती रही। इस तरह करीब आधा घंटा वार्तालाप चला। जाते-जाते अपनी स्थिति स्पष्ट कर देना मैंने भी उचित समझा। इससे शायद यह लोग भी मेरे बारे में ठीक राय बना पाएंगे। इसके बाद मैं सो गया। बगल के कमरे में गाना-बजाना चलता रहा।
क्रमशः…
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