एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
धार: अब आगे?
सुबह पांच बजे मैं उठ गया। पता लगा छह बजे यहां से सीधी एक बस धार जाती है। उसके बाद पारा से जो बसें मिलती हैं वे पहले झाबुआ जायेंगी और फिर वहां से धार। जल्दी से चाय पीकर तैयार हो गया। छह बजे सबसे राम-राम करके बस स्टॉप पर चला गया। महेश जी और नाथूबा वहां तक छोड़ने आये। आज वर्ग का समापन सत्र है। मैंने उन्हें वापस भेज दिया। महेश जी से कहा कि मैं एक दो दिन धार रूककर शायद मंडला जाऊंगा। दीवाली मनाने वे वहां आएं। साढ़े छह के करीब बस आई। अलविदा झाबुआ! इस बार काफी व्यापक भ्रमण हो गया है। गुजरात व राजस्थान दोनों की सीमाओं में प्रवेश भी किया। इस जिले की विविधता, प्राकृतिक व मानवीय दोनों से, काफी सीखने को भी मिला। यह भी समझ में आया कि क्या नहीं करना है। क्या करना है से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि क्या नहीं करना है। खैर कच्चे पहाड़ी रास्तों से होती हुई बस राजगढ़ सरदारपुर निकली। रास्ते में कचौड़ी, पोहा, जलेबी खाई। दस बजे धार पहुंच गए और साढ़े दस बजे झिराबाग।
झाबुआ से धार आते हुए मैं सोच रहा था कि लगातार विरोधाभासी रहवासी परिस्थितियों में रह पाना कितना सार्थक हो पाएगा। जब तक आगे के कार्य की स्पष्टता नहीं होती, तब तक यह चलाया जा सकता है। परंतु इसे एक कंफर्ट जोन बनाना उचित नहीं होगा। बहरहाल, मुझे अभी तो तुरंत होने वाले आमूल परिवर्तन के बारे में मन बनाना ही पड़ेगा। झिराबाग की अपनी संस्कृति है और झाबुआ की अपनी। देखते हैं, आगे क्या बनता है। मुझे भी अच्छा-खासा जुकाम हो गया है। हर बार यहां आते ही जुकाम हो जाता है। शायद महलों से एलर्जी हो गई है! शाम को थोड़ा टहले। इतने दिन वहां गांव, देहातों में वनवासियों के बीच रहने के बाद अब यहां अटपटा-सा लगने लगा है। ऐसा लगता है वह स्वाभाविक है, मेरे चरित्र के अनुकूल है और यह अस्वाभाविक लादा हुआ सा है। इसे एक सकारात्मक विकास भी माना जा सकता है। मगर देखें आगे क्या होता है? अभी भंवरताल जाने का तो मन बना ही लिया है। वजन 75 किलो हो गया है। कमाल है। चार महीने में 12 किलो कम!
सुबह जल्दी उठकर घूमने गए और बाहर लॉन में चाय के लिये बैठे। बहुत ज्यादा छींके और खांसी आने लगी। चाय के साथ रोटी बहुत अच्छी बनती है। जब भी मौका लगेगा, इसे चालू रखूंगा। झाबुआ की और फिर आगे की चर्चा दीपक के साथ होती रही। मैंने कहा अभी तो जम नहीं रहा है। दीपक ने सुझाव दिया कि झाबुआ जिले में ही जोबट में काम शुरू किया जा सकता है-अलग-थलग, लेकिन शिवगंगा के सहयोग से। जोबट झाबुआ जिले के एकदम बीचोंबीच में है और आगे चलकर जब अलीराजपुर जिला बनेगा तो उसमें शामिल होगा। मेरे लिये तो यही क्षेत्र मनपसंद है। मैंने कहा, यह किया जा सकता है। अब तो जो भी तय करना है शिवगंगा वालों को ही तय करना है।
दीपक ने उसी समय हर्ष जी को फोन लगाकर बात निकाली। हर्ष ने स्पष्ट कहा कि “उनकी जो विचारधारा है उसे लेकर साथ काम कर पाना अभी संभव नहीं है। मार्क्सवाद उनके व्यक्तित्व और विचारों में कूट-कूटकर भरा है जो निकल नहीं पाएगा। और धर्म को लेकर उनकी जो सोच-समझ है, उसके साथ शिवगंगा का चल पाना संभव नहीं है। अलीराजपुर क्षेत्र में नक्सलियों का प्रभाव और कार्यक्षेत्र बढ़ता जा रहा है। स्वाभाविक है कि ऐसे व्यक्ति से वे भी संपर्क करेंगे और आशंका है कि ये उनके साथ हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में तो खुल्लमखुल्ला विरोध होना ही है।” हर्ष ने कहा कि “ठीक रहेगा कि वे धार में ही अपना काम शुरू कर दें। साल-दो-साल बाद स्थिति स्पष्ट होगी। महेश जी से अभी बात नहीं की है।”
हर्ष की बातें सुनकर दीपक एकदम सकते में आ गया। मेरे लिए तो कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं था। हर्ष ने एकदम ठीक शंका जाहिर की है। इसके बावजूद मुझे यही लगा कि मुझसे जितना भयभीत है, उतना भयभीत होना अनावश्यक है। ऐसा नहीं है कि एकदूसरे से सहयोग करके काम नहीं किया जा सकता, लेकिन यह जरूर है कि इसके लिए काफी कुछ बदलना होगा। हर्ष जो सोचते हैं और जो कहते हैं सोच के संबंध में उसमें भिन्नता है। खैर, जो भी है साफ तो हुआ। महेश जी तो भावनात्मक रूप से बहुत अधिक करीब आ गए हैं और वे किसी भी हालत में मेरा साथ छोड़ना नहीं चाहते है। आते हुए भी कह रहे थे कि दीवाली यहीं साथ मनाते तो बहुत अच्छा रहता। हर्ष अभी मुझे जानते ही कितना हैं। मुझे आज काफी राहत भी महसूस हो रही है। किसी दबाव में आकर कार्य करना वैसे भी मेरे स्वभाव से मेल नहीं खाता। यह तय है कि मार्क्सवाद ने मुझे प्रभावित किया है, लेकिन भारत की सामाजिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों को भी मैं जानता समझता हूं। मुझे यह तो कहना ही होगा कि हर्ष ने मेरा विश्लेषण काफी सटीकता से किया है। इससे मेरे लिए भी काफी आसानी हो गई है।
न्यूनतम में जीवन चलाने की आदत
दीपक से मैंने कहा कि सोचता हूं कुछ दिन के लिये भंवरताल हो आऊं। यहां पड़े रहना तो ठीक नहीं है। उसे यह बात बिल्कुल नहीं जमी। कहने लगा धीरे-धीरे फिर वापस हो जाओगे और सब लोगों को मजाक उड़ाने का मसाला मिल जाएगा। मैंने कहा वापस होने का तो सवाल ही नहीं उठता। वैसे भी मुझे सब लोग क्या सोचेंगे या कहेंगे उसकी चिंता नहीं है। मुझे क्या ठीक लगता है वही करने की इच्छा है। इस समय मुझे भंवरताल जाना ही ठीक लग रहा है। वह कहने लगा कि जोबट में बिना शिवगंगा के कार्यकर्ताओं के भी काम शुरू किया जा सकता है। मैंने कहा, यह व्यावहारिक तौर पर संभव नहीं दिखता। न तो अब वह उम्र रही और न ही शारीरिक क्षमता। वैसे भी जिस नए जीवन की मैं अपने लिए कल्पना कर रहा हूं उसमें प्रतिस्पर्धा की कोई जगह नहीं है। साथ ही टकराव की भी गुंजाइश नहीं रखना चाहता। इस जगह से थोड़ी दूरी भी रखना चाहता हूं, थोड़े समय के लिए। फिर चुप्पी छा गर्इ। बात दरअसल यह भी है कि दीपक भी एकदम अकेला है और अंदर से चाहता नहीं कि मैं उससे दूर चला जाऊं। ऊपर से मेरा सहारा बनते दिखाते हुए वास्तव में उसे भी सहारा मुझसे मिलता है। इसमें कोई बुराई या एतराज नहीं है, लेकिन बिना कोई सार्थक काम किये यहां इस तरह से रह पाना न तो अच्छा लगता, न ही उचित है। मूल में है कि मैं कहां अधिक रचनात्मकता के साथ कार्य कर सकता हूं। अगला पूरा दिन इसी उधेड़बुन में बीत गया। मेरा जो विश्लेषण हर्ष ने किया था, मेरे लिए वह महत्वपूर्ण था और शायद भविष्य के लिए दिशानिर्देश जैसा भी कुछ था।
सुबह उठकर नहाने से बहुत लाभ हुआ। सर्दी-जुकाम लगभग ठीक है। मैं सोच रहा हूं कल निकल जाऊं। कल शनिवार है, इतवार की सुबह जबलपुर पहुंचूगा। इंदौर से जबलपुर नर्मदा एक्सप्रेस में ही जाना होगा। बाकी दिनों में तो हाइकोर्ट जाने वाले बहुत लोग उसमें रहते हैं। अभी भी थोड़ी झिझक सी बनी हुई है। शायद ऐसा इसलिए भी होगा क्योंकि अभी आगे का कुछ तय नहीं है। आधुनिक समाज में कुछ छोड़ देने की परंपरा ही खत्म हो गई है। जैसे ही कोई कुछ छोड़ता है वह संशय की नजर से देखा जाने लगता है।
सुबह जल्दी उठकर नहा लिया और घूमने गया। चाय के लिये बैठे। आज मंडला के लिए निकलना है। इंदौर से ट्रेन शाम पांच बजे हैं। यहां से एक बजे के करीब निकलना होगा। दीपक की बेटी आभा की पहली बरसी सत्ताइस नवंबर को है। सोचता हूं, उस समय मुझे यहां रहना चाहिए। उससे पहले लौट आऊंगा। उससे कुछ नहीं कहा। दीपक ने कहा पंद्रह दिन में आ जाना। किताबें वगैरह सब छोड़कर जा रहा हूं। बस एक बैग लेकर ही जा रहा हूं। न्यूनतम में जीवन चलाने की आदत पड़ती जा रही है। मुझे लगता है कि जब हम समाज पर अपनी निर्भरता को मूर्त रूप देने लगते हैं, तो व्यक्तिगत आवश्यकताएं भी कम होने लगती हैं। शायद यही सार्वजनिक जीवन की खूबसूरती भी है। मैं अभी अपने खर्च का अनुमान लगा रहा था काफी पैसे तो अभी पास में हैं। भोपाल से निकले चार महीने से ऊपर हो गए। अभी तक शायद दो हजार रुपए भी खर्च नहीं हुए। शुरू में तिवारी और मुकेश आए थे तो उनसे पांच सौ के करीब लिए थे और उसके बाद एक बार अलंकार से दो हजार रुपए मंगाए थे। अभी डेढ़ हजार रुपए पास में बचे हैं। दीपक से कभी कोई पैसा नहीं लिया। उसने बस ढ़ेर सारी चीजें खरीद कर दी हैं।
मंडला/भंवरताल: जन्मभूमि को नमन
आज चार नंवबर है। सुबह 8.30 बजे जबलपुर के मदन महल स्टेशन पर उतर कर मुंह-हाथ धोया। रिक्शा पर बैठ कर बस स्टैंड पहुंचा। नौ बजे मंडला की बस पकड़ी। मंडला से साढ़े ग्यारह बम्हनी के लिए बस पकड़ कर बारह बजे बम्हनी पहुंच गया। बस स्टैंड से पहले ही उतर गया और भंवरताल की पगडंडी पकड़ ली। लग रहा है जैसे बचपन लौट रहा है। याददाश्त के सहारे चलता रहा। पूरे पच्चीस साल बाद पैदल रास्ते से बम्हनी से भंवरताल जा रहा हूं। अगस्त उन्नीस सौ बयासी में कक्काजी के पास गया था और दूसरी सुबह सब कुछ समाप्त हो चुका था, तब इसी रास्ते आया था। उसके बाद आज ही इस रास्ते पर सब कुछ त्यागने के बाद चल रहा हूं। बरबसपुर अच्छी-खासी आधुनिक बस्ती बन गई है। यह नाम वास्तव में ‘बरबस’ अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर लेता है। नाले पर पुल बन गया है। यहां टेकरी पर चतरू लमान का घर था, जहां पानी पीते थे। अब हवेली खड़ी है। चलते-चलते बंजर नदी पहुंच गया। इसमें पानी कम हो गया है इसलिए नाव चलनी बंद हो चुकी है। पैदल पार की। घुटने से थोड़ा ऊपर पानी है। बड़ा अच्छा लगा।
धार से भंवरताल तक बड़ी रोचक यात्रा रही। सब कुछ स्मृति पटल पर जैसे दृश्यों की तरह उभरता रहा। जबलपुर से मंडला बस में बैठकर शायद बीस साल बाद आया हूं। पहले सीपीटीएस की लाल डिब्बा बस जो करीब छह−सात घंटे लेती थी और फिर एमपीएसआरटीसी की सरकारी बस जो करीब तीन चार घंटे लेती थी से आना जाना होता था। रास्ते में एक जगह पड़रिया हुआ करती थी जहां गाड़ी रूकती थी। जबलपुर,मंडला यात्रा का एक आकर्षण पड़रिया के रसगुल्ले हुआ करते थे-बड़े-बड़े गरमा-गरम गुलाब जामुन, रबड़ी डालकर और साथ में गरमा-गरम मंगोड़े। बहुत ही स्वादिष्ट। फिर नर्मदा नदी में बरगी बांध बनने का काम शुरू हुआ और पड़रिया भी डूब में आ गया। थोड़ी दूर पर एक गांव पहले से था नारायणगंज वहां दुकानें लगीं और बस वहां रूकने लगी। सन उन्नीस सौ सत्तर के आसपास नारायणगंज स्टॉप बना होगा। रसगुल्ले वहां भी मिलते हैं, लेकिन पड़रिया जैसी बात नहीं रही। वैसे हम लोग बड़े भी हो गए और हमारा स्वाद भी बदल गया। सन उन्नीस सौ अठत्तर में परिवार की अनचाही शादी के बाद बरसात में सपत्नीक पहली बार दिल्ली से मंडला आया था। सब कुछ जैसे फिल्मी फ्लेश बैक की तरह चल रहा है। नारायणगंज में बस रूकी थी, रसगुल्ले खाए थे, लेकिन बेचारी नवविवाहिता शहरी पत्नी बस स्टैंड के एक कोने में लघुशंका करके लौटते हुए कीचड़ में फंसकर चारों खाने चित हो गई थी और अम्मा द्वारा भेजी गई और उन्हें दिखाकर खुश करने के लिये पहनी गई साड़ी पूरी तरह से कीचड़ में लथपथ हो गई थी। वह दृश्य अभी भी नहीं भूलता। परंतु अब तो जैसे रिश्ते ही धड़ाम हो गए हैं। याद आने का एक अर्थ यह भी होता है कि भूला नहीं है। जिंदगी में शायद कुछ भी भुलाया नहीं जा सकता। उसे कहीं कोने में दबाए भर रखा जा सकता है। फ्लेशबैक निरंतर चल ही रहा है।
शायद उन्नीस सौ अठासी में ही अंतिम बार बस से जबलपुर से मंडला आना हुआ था। उसके बाद अपनी गाड़ी से तो कई बार आना-जाना और नारायणगंज रूकना हुआ। उस जमाने में घंटों बस के लिये इंतजार करना पड़ता था और सड़क के तो कहने ही क्या थे। अब लगभग हर आधा घंटे में जबलपुर और मंडला के बीच बस चलती है। अच्छी-खासी नई बसें। सड़क अब राष्ट्रीय राजमार्ग बन गई है और काफी ठीक हो गई है। अब दो से ढाई घंटा ही लगता है। नारायणगंज में बस रूकी। भूख तो लग ही गई थी। एक गुलाबजामुन समोसा और मंगोड़े खाकर भूख भी मिटाई और पुरानी यादों को ताजा भी किया।
अपने पैरों से चल रहा हूं या अपनी यादों के सहारे
मंडला से बम्हनी के बीच बस का सफर तो शायद आखिरी बार और भी पहले हुआ था। शायद वही पच्चीस साल पहले उन्नीस सौ बयासी में! उसके बाद तो लगभग पांच साल मैं इधर आया ही नहीं। बालाघाट या सिवनी और मंडला के बीच चलने वाली प्राइवेट बसें बम्हनी से होकर गुजरती थीं और बड़ी मुश्किल से उनमें जगह मिलती थी। दिन भर में शायद चार-पांच बसें हुआ करती थी। बारह मील या अठारह उन्नीस कि.मी. का सफर उस समय कम से कम डेड़ घंटे में होता था। रोड़ तो जैसे थी ही नहीं। अब मंडला से कान्हा तक शानदार रोड़ बन चुकी है, जो बम्हनी होकर जाती है। मंडला-बम्हनी के बीच हर आधे घंटे में बस और पहुंचने में आधा घंटा ही लगता है।
नहीं बदला तो बस बम्हनी से भंवरताल के बीच का पैदल रास्ता। यह मेरे बचपन की याद का अमिट हिस्सा भी है। बरबसपुर के बाद सब कुछ बिल्कुल वैसा का वैसा ही है। खेतों के बीच से होते हुए कुछ मकानों के इर्द-गिर्द गुजरते हुए बंजर नदी में उतरता रास्ता। कितनी बार पैदल चलकर और कितनी ही बार डोंगी में बैठकर यह बंजर नदी पार की है। डोंगी के लिये कितना इंतजार करना पड़ता था, जब वह दूसरे पाट पर हो। बरसात में जब नदी उफान पर होती थी तो डोंगी से पार उतरना बड़ा जोखिम का काम होता था। दो डोंगियां आपस में बांधकर फिर चलाते थे। कितनी ही बार भंवरताल से स्कूल के लिये बम्हनी पैदल आना-जाना होता था। नदी में जब पानी होता था, तब अपनी पेंट उतारकर पेंट और किताबों का बस्ता सिर पर रखकर घुटनों से ऊपर पानी में नदी पार करने में बहुत मजा आता था। सारे रास्ते में कीचड़ ही कीचड। उन प्राकृतिक विपदाओं में रहकर जीवन जीने में अधिक आनंद और उत्साह तथा जीवटता का उत्पन्न होना स्वाभाविक था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं अपने पैरों से चल रहा हूं या अपनी यादों के सहारे।
बंजर के उस पार खेतों की मेढ़ों के बीच से गुजरते हुए जिबराटोला तक का रास्ता है। पूरे रास्ते में खेत हैं जिनकी मेढ़ों पर चलना खासकर बरसात के दिनों में एक कला है। मैं इन्हीं मेढ़ों पर अपनी सायकल सरपट दौड़ता बम्हनी-भंवरताल के बीच का रास्ता तय करता था। रास्ते भर सारे लोग मुझे उन मेढ़ों पर सायकल भगाते देखते थे। उन दिनों तो सायकलें भी बहुत कम थीं। चालीस साल हो चुके वह सब समाप्त हुए। बहुत कुछ पा लेने की दौड़ में कितना कुछ छूट भी जाता है, यह आज समझ में आ रहा है। शायद उन्नीस सौ अठ्सठ-उनसत्तर के बाद मैंने कभी भी सायकल नहीं चलाई। जिबरा टोला में घुसते हुए हजारी मुकद्दम के घर के सामने से कुंए के पास से होकर रास्ता गुजरता था। हजारी मुकद्दम एक बूढ़ा-सा बहुत ही भला और सम्पन्न आदिवासी था। उसकी तीसरी पत्नी बहुत मोटी और उतनी ही मधुर स्वभाव की थी। घर के बाहर परछी में बैठी रहती थी। जब भी मैं वहां से निकलता तो जबर्दस्ती ’पानी पी ले बेटा’ कहकर रोकती थी और कुछ न कुछ खिलाती थी। कितने अच्छे लोग थे, वे सब। तभी एकाएक झाबुआ भी याद आ गया वहां भी बहुपत्नी प्रथा कायम है। प्रदेश के दो छोरों की आपसी दूरी नौ सौ किलोमीटर तो होगी। मौसम अलग, जमीन अलग परंतु मान्यताएं एक सी। शायद यही आदम अहसास भी है। वहां सारे भील भिलाला हैं और यहां गोंड-बैगा। हमारे भंवरताल की सारी आबादी गोंड है।
सुना रहे कि मालिक परकम्मा पर निकलो है
जिबरा टोला घुसते हुए देखा कि वह पुराना रास्ता अब नहीं है। वहां एक स्कूल बना हुआ है। हजारी मुकद्दम का घर तो दूर से ही दिख रहा है लेकिन रास्ता कहीं नजर नहीं आता। तब रास्ता पूछना पड़ा और जिससे रास्ता पूछा वह खुजल निकला। खुजल बड़ा पुराना आदमी है, करीब सत्तर पचहत्तर बरस से तो कम का तो नहीं है। इस इलाके का होशियार और धूर्त माना जाने वाला परधान। गोंड़ों में परधान एक उपजाति के समान होती है, जो कोटवार होते हैं, पूजा पाठ करते हैं और पोथी, पतरा पढ़ने वाले भी वहीं होते हैं-लगभग कायस्थों के समान। वैसे आजकल परधानों ने गोंड चित्रकला को नई विश्वव्यापी पहचान दी है। उन्होंने सृष्टि की अपनी परिकल्पना को कागज और कैनवास पर उतारा है। परधान अपेक्षाकृत अधिक शिक्षित और कथित सभ्य समाज के करीब होते आये हैं। खुजल की भी यही ख्याति रही है। हमारे छोटे काका का हमउम्र है-वे होते तो अब इक्यासी साल के होते और वह सबसे बड़े भाई का भी खास आदमी था। मैंने उसे पच्चीस साल बाद देखा और पहचान लिया। वह भी मेरी वेशभूषा देखकर हतप्रभ था। लुंगी,कुर्ता और पीठ पर बैग लदा हुआ अकेले, पैदल। मेरा यह रूप तो यहां के लोगों के लिये अजूबा है ही। मुझे पैदल देखना ही सबकी कल्पना से परे है। परंतु कुछ ही क्षणों में वे सामान्य हो गए। मैं भी काफी सहज ही था।
खुजल के घर बैठकर चाय पीने में मजा आया। उसकी दोनों बूढ़ी पत्नियां गदगद हो गई। हम शहरियों के लिए इस तरह के परिवार की कल्पना कर पाना भी असंभव है। गुण दोष, नैतिक, अनैतिक के परे भी एक सहज दुनिया होती है, जो पाप-पुण्य जैसे तमाम बंधनों से मुक्त हो, व्यक्ति को उसकी असीम स्वतंत्रता प्रदान करती है। मैं तो पहली बार ही उसके घर गया था। जब चलने लगा तो खुजल ने एक मिनिट के लिये रोका और कमरे से एक छोटी सी भेंट लेकर आया-शराब की एक बोतल। उसके हिसाब से बहुत अच्छी। बैग में रखने का आग्रह किया। मैंने मना किया और बताया कि यह सब बिल्कुल नहीं लेता। अविश्वास से देखता रहा और मैं हंसता रहा। पूछने लगा – “मुर्गा, मछली, गोश्त?” मैंने कहा “हां, इस समय तो सब बंद है।” कहने लगा “हां, उड़ते-उड़ते सुना रहे कि मालिक परकम्मा पर निकलो है।” मैं मुस्कुराता रहा। सोचता रहा, समाज कैसे अपने प्रश्न के उत्तर भी स्वयं ही दे देता है। उसने मुझसे कुछ भी जानने की कोशिश नहीं की। मैं उसके साथ चल पड़ा। मेरा बचपन अब मुझे मेरी प्रौढ़ ऊंगली पकड़कर चला रहा था। मैं उसे पकड़े मंत्रमुग्ध सा चलते चला जा रहा था। बातें करते भंवरताल की सीमा तक आ गए। मैंने जबर्दस्ती करके उसे वापस भेजा।
क्रमशः…
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