एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
भंवरताल
भंवरताल की सीमा शुरू होते ही पहाड़ी दर्रा है, जिसे हम लोग शिलखंड कहते हैं। पहाड़ी पर बड़ी−बड़ी शिलाएं पड़ी हुई हैं। पत्थर ही पत्थर। इस प्राकृतिक दर्रे के बीच से एक पहाड़ी नाला बहता है, जो पूरे साल नहीं सूखता। जब तक मैं स्कूल में पढ़ता था, यहां नाले के दोनों और बड़े-बड़े पेड़, करोंदे की झाड़ियां, जंगली फूलों की बेलें इतनी सघन थीं कि दिन में भी अंधेरा बना रहता था। लगभग ढाई-तीन सौ मीटर का यह हिस्सा पार करने में दिन में भी लोग घबराते थे। शेर का यह खास अड्डा था। बीच में एक बहुत बड़ी शिला पर बैठा हुआ उसे अक्सर देखा जाता था और एक-एक, दो-दो दिन तक यह रास्ता बंद हो जाता था। लोग हनुमान चालीसा पढ़ते हुए या जोर−जोर से गाना गाते हुए इस जगह से गुजरते थे। भंवरताल का रोमांच उसके मुंहाने पर ही बसा हुआ था। मैं अपनी सायकल पर पत्थरों के बीच से किसी तरह निकलता हुआ यहां से तेजी से गुजर जाता था।
थोड़ी देर यहां आकर उसी बडे़ पत्थर पर बैठा रहा, जो तोड़ा जाकर अब आधा रह गया है। बडे पेड़ सब नदारद हो गए हैं, करोंदे और फूलों की झाड़ियों भी बहुत कम हैं। अब काफी उजाला है। पेड़ कटने से नाले में पानी भी कम हो गया है। बहुत से बड़े-बड़े पत्थर दूसरी जगह सड़क बनाने के लिए तोड़कर गिट्टी ले जाई गई है। शिलखंड का रोमांच शायद दस प्रतिशत के ही करीब बचा है। खदानों की वजह से जंगल लगभग समाप्त हो गया है और शेर के रहने की जगह न होने से सब शेर यह इलाका छोड़कर जा चुके हैं। बचपन झिंझोड़ सा रहा है। मैं समझ रहा हूं, टूटन अंदर और बाहर दोनों तरफ है। विकास के नए पैमाने अनंत काल में विकसित प्रकृति को भस्मिभूत कर रहे हैं। हमने तो शेर अपने घर में देखा था। क्या कहें? अभी तो लौट ही रहा हूं। थोड़ी देर बैठकर अफसोस मनाता रहा और फिर उठकर चल दिया। खेती लायक जमीन यहीं से शुरू हो जाती है, लेकिन खेती नहीं है, जमीन उजाड़ पड़ी हुई है।
पगडंडी के रास्ते घर के सामने वाले उस नाले पर पहुंचा जहां चार-पांच साल पहले प्रयत्न करके स्टॉप डेम बनवाया है। पुराने समय में इस नाले में प्राकृतिक रूप से ही इतना पानी रहता था। इसे हम घुरूआकसा कहते थे। पता नहीं इसका क्या अर्थ है? जंगल कटने से पानी एकदम कम हो गया है। स्टॉप डेम के दूसरी ओर वह जमीन है जहां पिछले छह सालों से खेती हो रही है। इन्हीं खेतों के बीच हमारा घर बना हुआ है। घर से एकदम लगी हुई पहाड़ी। खेत और घर देखकर तबियत खुश हो गई। धान की फसल कटने के लिए तैयार खड़ी हुई है, तिली भी तैयार है। गन्ने का तो जैसे जंगल ही हो। सब तरफ हरियाली ही हरियाली। घर देखकर मेरा मन भी हरिया गया। बहुत दिनों बाद वास्तविक घर वापसी हो रही है। मैं चुपचाप खेतों के बीच से मेढ़ों पर चलते हुए घर पहुंच गया। तीन स्त्रियां बाड़ी में काम कर रही हैं, वहां कुछ बच्चे भी हैं। घर में कोई नहीं है। ताला लगा हुआ है। किसी को मालूम ही नहीं है कि मैं आने वाला हूं।
गल्ली या गलियार यहां पूरे समय रहता है, पास ही उसका घर है। वह नदी में मछली मारने गांव के और लोगों के साथ गया हुआ है। सुनुवां यहां का मुख्तार या मैनेजर है। पता लगा वह कुछ काम से मंडला गया हुआ है। परछी में तखत पर बैठ गया और देखता रहा। अतीत धीरे-धीरे याद आ रहा था। थोड़ी देर बाद अपनी दरी बिछाकर लेट गया। इतने में गलियार आ गया। भौंचक्का रह गया। काली चाय पी। थोड़ी देर आसपास टहलने गया। थकान बहुत ज्यादा हो गई है। रात में ट्रेन में नींद पूरी भी नहीं हुई। कल सुबह से यात्रा चल रही है। गल्ली से कहा खाना जल्दी बना लो। पानी गरम करवाकर नहाया और कपड़े बदले, तब ठीक लगा। सात बजे के करीब सुनुवां आ गया। देखकर एकदम हक्का-बक्का रह गया और स्वाभाविक रूप से एकदम लिपट गया और रोने लगा। बाहर धूनी जलवाई। थोड़ी-बहुत बातचीत की। गल्ली ने जल्दी से दाल बना ली और चूल्हे की गरमा-गरम रोटी। मजे से खाया और साढ़े आठ, नौ बजे तक एकदम बेहोशी की नींद सो गया। ऐसी रही भंवरताल वापसी। बहुत ही हल्का लगा यहां पहुंचकर। लगातार अन्य लोगों के साथ रहने और जगह-जगह खुले से लेकर महल तक में सोने के बाद, आज घर पहुंचा हूं। लग रहा है, जैसे जीवन में जो खोया था, वह यहां वापस मिल सकता है। घर की उष्मा और ऊर्जा हमेशा बनी रहती है। यह आज बहुत सालों बाद महसूस हुआ है।
अगले दिन सुबह पांच बजे उठ गया नहा-धोकर व्यायाम किया और घूमने निकल गया। वही अपने पुराने रास्ते पर। पूरा एक घंटा लगता है। सात बजे लौट आया। बहुत ही सुहावना लगता है यहां सुबह-सुबह। यहां तो अच्छी-खासी सर्दी है। वैसे ही भंवरताल तो ठंडा रहता ही है। झाबुआ धार में तो ठंड नहीं थी। मध्य प्रदेश के एकदम पश्चिमी कोने में झाबुआ है और पूर्वी कोने पर मंडला एकदम सीधी रेखा है। दोनों के बीच करीब आठ, नौ सौ किलो मीटर का फासला है। अब तो झाबुआ भी अपना-सा लगने लगा है। वैसे बहुत अंतर है दोनों स्थानों की बनावट, जमीन, जंगल और संस्कृति में। धान पूरी तरह से पक चुकी है और खेतों में खड़ी सूख रही है। कटाई नहीं हो पा रही है। यहां खेतिहर मजदूरों की बड़ी समस्या है। खदानों का काम जोर-शोर से चल रहा है, वहां मजदूरी ज्यादा मिलती है। सारे लोग खदान में काम करना स्वाभाविक रूप से पसंद करते हैं। जंगल का पूरा माहौल और सुकून खत्म हो रहा है। एक बार तो खदानों को बंद कराने की मुहिम शुरू करने का सोचा था लेकिन फिर लगा कि जब तक यहां के लोगों के लिए वैकल्पिक रोजगार की व्यवस्था नहीं हो जाती, तब तक खदानें बंद होने से बेरोजगारी बढ़ेगी और लोग दुःखी होंगे। वैसे तो इसे पर्यावरण और वन को बचाने के लिए उठाया गया कदम कहा जा सकता है लेकिन मूलतः वह व्यक्तिगत सुख-स्वार्थ से प्रेरित ही होगा। अभी फिलहाल मैं कुछ नहीं करता। आने के बाद पहली दुविधा तो सामने आ ही गई। शासन की नीतियों ने बड़ी चालाकी से लोगों की आजीविका व जीवन को पूरी तरह से खदानों पर निर्भर कर दिया है। आज फसल काटने को भी लोग नहीं मिल पा रहे हैं।
अंततः मैं एक बेहद घरेलू टाइप का व्यक्ति ही हूं
आज धनतेरस है। इस दिन नए बर्तन वगैरह खरीदे जाते हैं। मैंने कई लोगों को धनतेरस और दीपावली की शुभकामना का मैसेज किया। अर्पणा और अर्चना को फोन करके बताया कि भाईदूज भंवरताल में ही मनाएंगे। मैं घर पहुंच जाऊंगा। बहुत खुश हो गई। मैंने यह नहीं बताया कि पहुंच गया हूं। मुझे लग रहा है कि अंततः मैं एक बेहद घरेलू टाइप का व्यक्ति ही हूं। सब कुछ छोड़ देने की संकल्पना के बावजूद ऐसा बहुत कुछ हम सबके पास होता है, जो कभी भी छूटता नहीं। शायद यही अपनापन और जुड़ाव हमें हमेशा जीवंत भी बनाए रखता है। मेरे लौटने को सबलोग समारोह की तरह मनाना चाहते हैं। मगर वे जानते नहीं कि मैं तो “अवतरित” हो चुका हूं! जब उन्हें पता लगेगा तो? यही तो देखना है।
शाम को बम्हनी के रास्ते के जिबरा टोला गांव से दो लोग आ गए-अशोक भट्टाचार्य और एक अन्य। साथ में अगरबत्ती, नारियल और कुछ पैसे लेकर चढ़ोत्री के लिए। बम्हनी से भंवरताल पैदल चलकर आने की बात सारे रास्ते में फैल गई है और सबने मान लिया है कि मैं नर्मदा परिक्रमा कर रहा हूं और संत हो गया हूं। मांस, मछली, मदिरा सब त्याग चुका हूं। अब तो मेरे त्याग पर मुहर लग गई है। चाहूं तो भी बदल नहीं सकता। अनचाहे ही संतत्व की प्राप्ति हो गई। नर्मदा का असाधारण महत्व व श्रद्धा भी समझ में आती है। परंतु इस तरह की धारण बनाने में मेरी कोई राय नहीं ली गई। मैं अब समाज की आकांक्षा के अनुरूप व्यवहार हेतु बाध्य हो गया हूं। उनकी भावना का ख्याल तो करना ही पडे़गा।
बारह बजे के करीब बाबा आ गया, अपनी स्कॉर्पियों में। मुझे यहां पा कर एकदम सकते में आ गया। यहां आए हुए आज पांचवां दिन है। बाबा कहने लगा कल सब यहीं आकर दीवाली मनाएंगे। मैंने कहा नहीं, दीवाली सब अपने-अपने घर मनाओ। दूसरे दिन आना। बाबा मुझे एकदम इस तरह यहां पाकर सकते से उबर नहीं पा रहा है, उसे असूझ-सा लग रहा है, सपने जैसा महसूस हो रहा है। धीरे-धीरे सामान्य हुआ, खूब प्रसन्न है। जैसा कि अपेक्षित था बाबा के मंडला पहुंचने के बाद फोन आने शुरू हो गए। अर्पणा का फिर अर्चना का। दोनों खुशी के मारे रोते हुए बोलती रहीं। बताया विवेक दादा को भी बता दिया है, वह भी आएंगे। भाईदूज पर अब बचे हुए दोनों भाई और दोनों बहनें यहां इकटठे हो जायेंगे। वैसे सच यही है कि इन बहनों के कारण ही अभी यहां आना हो पाया, नहीं तो शायद कुछ और बाद में आता। दोनों के लिए बहुत बड़ा सहारा बन गया था, और तो कोई है नहीं, उनके काम आने वाला, मदद करने वाला। मुझे भी लग रहा है कि वैराग्य कभी भी समाधान नहीं हो सकता, खासकर मेरे अपने संदर्भ में।
देर शाम वन्या का भी फोन आ गया। अपर्णा ने फोन करके सूचना दी थी। वन्या ने कहा कि अब वन्या और अलंकार भी एक दिन के लिए यहां आएंगे। सोमवार को जबलपुर रूक कर मंगलवार तेरह तारीख को भंवरताल पहुंच जायेंगे। अलंकार ने भी बात की। मेरे भंवरताल आने से सब खुश हैं। शायद उन्हें भंवरताल के रास्ते एक बार फिर मेरी भोपाल-जबलपुर पहुंचने की उम्मीद बंध गई है। वन्या बहुत खुश लगी। उससे बहुत दिन बाद बात करके बहुत अच्छा लगा।
आज दीपावली है। भारत का संभवतः सबसे बड़ा त्यौहार। यह पूर्णतः सामाजिक व सांस्कृतिक त्यौहार बन गया है। इसमें धार्मिकता का पुट कम है। दीवाली ऐसा त्यौहार है जो लगभग सारे देश में मनाया जाता है और सभी धर्म-सम्प्रदाय के लोग इसमें शामिल होने से नहीं हिचकिचाते। एकतरह से धर्मनिरपेक्ष त्यौहार बन चुका है ‘दीपावली।’ इन दिनों मौसम भी बहुत अच्छा होता है। दूर-दूर से लोग अपने घर लौटते हैं और कोशिश करते हैं कि पूरा परिवार एकसाथ रहे। हमारी संस्कृति की इसी खूबसूरती को कैसे स्थायी बनाया जाए, यही आज का बड़ा प्रश्न है। तकनीक का लगातार हावी होना हमारे जीवन को नीरस बना रहा है। हम मनुष्यों के बजाए तकनीक को अपने ज्यादा नजदीक और अनुकूल पा रहे हैं।
आज मैं यहां भंवरताल में हूं, एकदम एकाकी और प्रकृति के एकदम करीब। अपनी जड़ों के पास। बडी ही मिश्रित-सी अनुभूति है। मुझे याद नहीं पड़ता कि वन्या के जन्म के बाद से किसी भी दीवाली पर उससे दूर रहा हूं। खैर, वैसे भी अब उसका घर बस गया है। मैं तो सारी जिंदगी अपना घर बसा नहीं पाया, उम्मीद है वह इस कमी को दूर कर पाएगी।
पिछले करीब बारह-तेरह साल से हर साल नियमित रूप से ऑफिस में दीपावली पूजा की जाती है, जिसमें परिवार और ऑफिस के सारे लोग इकट्ठे होते हैं। इसके अलावा कई सारे पुराने जूनियर्स भी उसमें शामिल होते हैं। सबको उम्मीद है कि दीवाली पर मैं वापस पहुंच जाऊंगा। अब आज वहां शामिल न होना इस बात का स्पष्ट संकेत होगा कि मेरी वापसी की कोई संभावना नहीं हैं। शायद मेरे सहयोगी भी अब अपनी नई दिशा तलाशने में ज्यादा सक्रिय हो जाएंगे। बारह बजे के करीब अर्पणा और भोलू आ गए। बहुत सारी मिठाइयां, पटाखे वगैरह लेकर। थोड़ी देर रूक कर, आशीर्वाद लेकर चले गए। कल दोपहर तक आ जायेंगे। अर्पणा बहुत ही खुश है। दोपहर में लफरा गांव से मेरा आत्मीय भतीजे के समान राजेश तिवारी आ गया। शाम तक रूका रहा। सुनुवां शाम को अपने घर चला गया। राजेश ने गलियार को पूजा करने का तरीका समझाया और अपने घर चला गया।
गलियार और उसके दोनों छोटे-छोटे बच्चे तैयार होकर आ गए। गलियार ने बड़े जतन से पूजा की तैयारी की। चौक वगैरह सजाया। बच्चे भी पूरे समय साथ रहे। गलियार ने पूजा की फिर दोनों बच्चों के साथ मिलकर दिए जलाए और सबने मिठाई खाई। बहुत अच्छा लगा। एकदम नया अनुभव। आज कोई पटाखे नहीं फोड़े। कल अर्पणा लोग आयेंगे, तब फोड़ेंगे। पूजा चल रही थी। तभी वन्या का फोन आ गया। ऑफिस से पूजा में शामिल होकर दोनों अपने घर लौट रहे थे। सोमवार-मंगलवार को आएंगे। मुझे भी थोड़ी उत्सुकता है कि इस बार कैसे क्या हुआ होगा? मैं शायद पूर्ण मुक्ति की ओर बढ़ चुका हूं।
गलियार इसके बाद अपने घर पूजा करने गया। लौटकर आया तो अपने घर से बड़े ले आया था। जल्दी जल्दी थोड़ा सा खाना बनाया, खाया और फिर सोने की तैयारी। चारों तरफ एकदम सन्नाटा है और एकदम घुप्प अंधेरा। बरसों पहले एक बार कक्काजी और अम्मा के रहते भंवरताल में दीवाली मनाई थी। पटाखों से सारा जंगल दहल गया था। पुरानी यादे फिर ताजा हो आईं। परंतु आज एक अलग-सी ही दीवाली, एकदम अलग…।
कल दीवाली हो गई आज गोवर्धन पूजा है। जिसे अलग-अलग जगहों में गोरधन पूजा, गोवरधन पूजा या गोवर्धन पूजा के नाम से मनाते हैं। इसमें पालतू मवेशियों की पूजा की जाती है और विशेष भोजन खिचड़ी बनाकर मवेशियों को खिलाकर ही खुद खाते हैं। कल मैंने गल्ली के यहां बना हुआ मक्के का पेज पिया। भील लोग भी लगभग ऐसा ही बनाते हैं और उसे राबड़ी कहते हैं। वह कुछ अधिक गाढ़ा होता है। गोंड और भील दोनों ही इसके बिना नहीं रहते। कल ही मैंने सायकल चलाई। सन उन्नीस सौ उनहत्तर के बाद शायद कभी भी नहीं चलाई थी। बड़ा मजा आया। अब जहां भी रहूं जब तक सायकल उपलब्ध होती रहेगी, रोज चलाया करूंगा। सायकल चलाना पैरों और ह्दय दोनों के लिए ही बहुत अच्छा व्यायाम माना जाता है।
दीवाली का एक विशेष आकर्षण यहां अहीरों का नाच होता है। बुंदेलखंड में इसे बरेदी नृत्य कहते हैं। कौड़ियों का ‘बाना’ पहनकर पैरों में बजने वाले घुंघरू डालकर हाथों में बड़े-बड़े डंडे या फरसे लेकर बहुत ही शक्ति के साथ नाचते और गाते हैं और आखिर में ‘आशीष’ गाते हैं और इनाम पाते हैं। दीवाली पर रात में देव सो जाते हैं, उन्हें जगाने के लिए बहुत भोर में सूर्योदय से पहले अहीरों के दल घर-घर जाकर देव ‘जगाने’ जाते हैं और नाच गाकर देव जगाते हैं। बड़ा नाचगाना शाम को होता है। सब शराब के नशे में मस्त रहते हैं। एक के बाद एक घरों में घंटों नाचते गाते रहते हैं। ए अहीर, ग्वाला या यादव लोग हैं जो स्वयं को कृष्ण वंश के चंद्रवंशी कहते हैं। दीवाली के बाद एक पखवाड़े पूर्णमासी तक स्थान-स्थान पर ‘मड़ई’ भरती है, जहां अहीरों का सामूहिक नाच-गाना और एकतरह से अलग-अलग दलों का कॉम्पटीशन चलता रहता है। अच्छे से याद है कि पहले समय में अक्सर मड़ई मेले में अहीरों के झुंडों के बीच विवाद होकर लाठी और फरसे चल जाते थे और भगदड मच जाती थीं। ऐसे समय में उन्हें नियंत्रण में रखना मुश्किल हो जाता था। अब तो यह कम हो गया, लेकिन फिर भी परंपरा चल रही है। यहां जगाने आए, लेकिन सुबह मेरे तैयार होकर घूमने निकलने के बाद। मैं अब दर्शक से प्रेक्षक में बदल गया हूं जो कुछ भी अब आसपास घट रहा है मैं उसका सिंहावलोकन भी करना चाहता हूं।
एकतरह से यह मेरा अपना ‘रिट्रॉस्पेक्टिव’ या पुनरावलोकन भी है। मैं जुड़े रहते हुए भी विरक्त रहने की कोशिश में हूं, बिना किसी को दुखी किए। यादों और स्मृति को नए सिरे से खंगाल रहा हूं।
आज भाईदूज है। भाईदूज इस बार यहां आने का सबब बन गया। शायद छह साल पहले चारों भाई,बहन भाईदूज पर यहां इकट्ठे हुए थे। बहुत लंबा समय हो गया। आज अर्चना को दोपहर तक यहां पहुंचना है। शाम चार बजे के करीब अर्चना, भव्या और भोलू यहां पहुंचे। अर्चना बहुत ज्यादा कमजोर हो गई है। भव्या ठीक लगी। अर्चना बहुत ही विषम परिस्थितियों में रह रही है। उसे देखकर बहुत अच्छा लगा। अर्चना ने बताया कि रास्ते में सागर से भाभी का फोन आया था विवेक दादा सुबह छः बजे घर से निकले हैं। शाम तक पहुंच जाना चाहिए। साढ़े पांच के करीब मंडला से छोटू का फोन आया कि उसने पांच बजे के करीब विवेक दादा को मंडला से बम्हनी छोड़ा है। बाबा के साथ मैं शिलखंड तक गया और वहां से विवेक दादा साथ आ गए। एकदम अंधेरा हो गया। उसके बाद दोनों बहनों ने टीका लगाया और कपड़े, नारियल दिए। मैंने दोनों को एक-एक रूपया दिया। दोनों बहनों के साथ बहुत अच्छा लग रहा है। विवेक दादा भी आ गए। यह अच्छा हुआ। आज वन्या, अलंकार को आना है।
अगला दिन। मैं सुबह घूमकर आ गया। उसके बाद सब उठना शुरू हुए। नौ बजे के करीब वन्या ने उठकर जाने की तैयारी शुरू कर दी। मेथी और लहसुन के पत्तों के पराठें खाए गए। बात ही बात में यह प्रस्ताव रखा गया कि आज आसपास घूमने चलते हैं और रात में जबलपुर रोड पर टिकरिया रेस्ट हाउस में रूक सकते हैं। कल वहां से निकल जाएं। वन्या की भी अभी जाने की इच्छा नहीं है लेकिन जाना भी है। उसने कहा रात भेड़ाघाट जाकर रूक जाएं और वहां से कल सुबह निकल जाएं। मेरा पुराना समय होता तो एकदम हां कर लेता, लेकिन अभी तो सब कुछ बाबा को करना है। जिस तरह का जीवन मैं जी रहा हूं उसमें अधिक खर्च करने की न तो गुंजाइश और न ही नीयत। सबको शायद अटपटा लग रहा होगा। भेड़ाघाट रूकने में बहुत खर्च होगा, जबकि टिकरिया तो मंडला जिले में है यह सब वन्या को समझाया। अभी सभी की साथ रहने की इच्छा है, इसलिए थोड़ी ही देर में सब सहमत हो गए कि यहां से निकलकर रामनगर और चौगान जाएंगे। और मंडला से वन्या की गाड़ी उठाते हुए टिकरिया पहुंचेंगे। बाबा ने टिकरिया बात करके रात रूकने की व्यवस्था भी कर ली। सब बड़े उत्साह और खुशी के साथ चलने की तैयारी करने में जुट गए।
दो दिन में ही वन्या एकदम अलग व्यक्तित्व लग रही है। बहुत जीवंत। मैंने कहा कि यहां आकर कुछ समय ऐेसे ही बिताया करो। बहुत खुश है। मेरे दिमाग से भी सारा बोझ उतर गया है। बहुत अच्छा लग रहा है।
क्रमशः…
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