
- राघवेंद्र तेलंग
सुपरिचित कवि,लेखक,विज्ञानवेत्ता
यात्रा के दो छोर हैं शून्य और अनंत
सृष्टि की यात्रा दो बिंदुओं के बीच में से होती हुई स्पेस में सम्पन्न हो रही है। ये बिन्दु रूप अन्तरिक्ष में शून्य और अनंत दो दूरस्थ छोर हैं। दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों बिंदु एक ही चौड़ी रेखा पर जैसे ऊपर-नीचे या आगे-पीछे एक-दूसरे के विपरीत गति करते हुए,ऑसिलेट करते हुए वहीं साथ में वास करते हैं। गणित की यह मान्यता भूलने वाली बात नहीं है कि पूरक यात्राओं वाली दो बिन्दुओं से चली हुई दो समानांतर रेखाएं एक आभासी ग्लोब पर यानी अनंत के दूरस्थ छोर पर नाभिकीय ग्रेविटेशन के कारण वापस जाकर जुड़ जाती हैं। अनंत और शून्य एक ही बैन्ड-लूप के दो हिस्से हैं। अनंत दो समानांतर छोटी-बड़ी रेखाओं के बीच की यात्रा है। जबकि शून्य एकल बिन्दु पर टिके रहने का अभ्यास है। दो सापेक्षिक असमान रेखाओं के ऊपर हमारी जीवन-यात्रा उम्र भर चलती है और अंततः हमारी समूची ऊर्जा दो के द्वंद्व के बीच घाटी में भटकती रही जाती है,व्यर्थ हो जाती है,नष्ट हो जाती है। शून्य और अनंत की प्रकृति ऐसी है कि दोनों एक ही समय में एक ही टाइम-स्पेस में विद्यमान रहते हैं। जब आपकी ऊर्जा आपके भार के कारण ग्रेविटी की ओर अभिमुख है तो आप ऊर्जा से क्रमशः शून्य होते जा रहे हैं। और जब आपकी ऊर्जा ग्रेविटी के विपरीत शून्यता यानी स्पेस यानी ऊपर की ओर अभिमुख होती है तब आप अनंत ऊर्जा की दिशा में बढ़ रहे होते हैं। जब आप ऊपर के बिन्दु पर अधिकांश समय होते हैं तब आप शून्य यानी ऊर्जा यानी प्रकाश समय में होते हैं और जब आप ग्रेविटी की सतह के बिन्दु पर होते हैं तब आप तेजी से खर्च होती ऊर्जा के साथ जड़ यानी मृत यानी अंधेरे में होते चले जाते हैं।
शून्य हिरण्यगर्भ है माया का संसार वहीं से अस्तित्व में आया है और वहीं उसे विलीन हो जाना है। शून्य ईश्वर है और शून्यता है दैवीय। युगल जो एन्टैन्गल्ड द्वय हैं,के बीच को बान्धे रखने वाली दैवीय शक्ति है शून्यता। ये दो एक-दूसरे के पूरक,शून्य के इन्डक्टर हैं, चुंबकीय ऊर्जा अपने में समाए हुए। युगल या कपोत चुंबकत्व की डोर से आपस में सम्बद्ध होते हैं। दोनों में यह शक्ति किन्हीं विशिष्ट क्षणों की परिस्थितियों के समय में सूरज और चांद भरते हैं। जो उबरा सो डूबा,जो डूबा सो पार। शून्य शक्ति है,असीम शक्ति,सब उस शक्ति के आगे नतमस्तक हैं तभी तो शून्य सबसे अलग है,भीड़ में सबसे अलग,तभी तो वह गिनती में शामिल नहीं है। अंक प्रणाली के सारे अंकों की कामना होती है कि शून्य उनकी भार्या होकर उनके बाई ओर विराजमान हो ताकि उनकी मूल्य वृद्धि स्थान-मूल्य के अनुसार दस की आवृत्ति में हो। यही शून्य जब स्वयं को जनक सिद्ध करने पर उतर आता है तब वह अंकों के दाएं ओर खड़े रहकर उनका श्री-मूल्य नगण्य करता चलता है। इसीलिए शून्य की स्थिति में प्रतिस्पर्धा का,काम्पीटीटिवनेस का कोई प्रश्न नहीं है,सो सुख-दुःख की बात ही नहीं है। इन बादलों के छंट जाने के बाद बच रहता है तो बस आनन्द।
मगर यह ध्यान में रहना बराबर जरूरी है कि ऊर्जा का स्वभाव है मुक्त होकर शून्य में विचरण या रमण करते रहना,बंधने-बांधने से वह उग्र हो कर विस्फोटक हुई जाती है,इसीलिए बांधने से पूर्व ऊर्जा के लिए लगाम पहनाने की प्रणाली चाहिए। पिंजरे में कोई भी रहे उसकी बेचैनी भी तब समाप्त होती है जब उसको मुक्ति मिलती है। यह बन्द ऊर्जा का पिंजरे से मुक्त होना है। जिसे शून्यता का खजाना मिल गया वो अपनी सुगंध को पा गया वरना अनंत के वन में कस्तूरीमृग के मानस में भटकन ही भटकन है। शून्य का वितान ही विराट का मैदान है जहां अपार की खुली प्रतीति है।
अनंत का युगल, जोड़ीदार, पूरक, छाया, उल्टा, विपरीतार्थी शब्द युग्म है शून्य। तो जड़ और चेतन में जड़ता का प्रतीक यह अनंत वह भी यहां इच्छाओं के संदर्भ में है। अनंत इच्छा का, जड़ता का प्रतीक है। अनंत अनंत बोझ से लदा हुआ होने के कारण शून्य गति का वाहन है। वह चाहकर भी सृष्टि की चक्रीय गति में सहभागी होने नहीं पाता। चाहे तो भी संभव नहीं, गिर पड़ेगा, हर पल संतुलन बिगड़ जाने का डर जो है। चक्रीय गति में सहभागी होने के लिए अनंत को अनंत इच्छाओं के भार से मुक्त होने की आवश्यकता है, असंतुलन के भय से मुक्ति की आवश्यकता है। विशुद्ध ऊर्जा-कण की विशेषता ही यह है कि वह निर्भय होता है क्योंकि उसमें कोई भार नहीं होता। निर्भार होना ही चिन्तामुक्त होना है। शून्य भावविहीन है इसीलिए उसमें अनंत की प्रकृति वेग के रूप में समाई है। अनंत जो शून्य से जन्मा हो वह आनंद का प्रतीक है। ऐसे अनंत की क्षणिक प्रतीति ही जीवन भर के लिए आनंददायक है।

अनंत इच्छा का चक्र होने के कारण सिन्गुलेरिटी का वह संघनित, घनीभूत, छुपा हुआ वह स्थान है जहां से छुपकर काली लहरदार तरंगे पाश, जाल के रूप में बाहर की ओर फूट पड़ती हैं। इसीलिए अंधेरे का, अज्ञान का दूसरा नाम अनंत है। वह रेखा जिसका केन्द्र दोनों पैरों के बीच यानी देहमोह यानी शरीर में है वह रेखा अनंत की, अंधकार की,कुत्सित इच्छाओं की रेखा है। इसी के समानांतर वह रेखा जिसका केन्द्र दोनों आंखों के बीच है वह प्रकाश की शून्य की,बोध की रेखा है। अनंत के बोझ से आप दुर्गति को प्राप्त होते हैं और अनंत की इच्छा के जाल से मुक्त होकर शून्यता को अपना कर आप सद्गति को प्राप्त होते हैं। अब तो यह स्पष्ट हो गया होगा कि अनंत यानी अंधकार या मृत्यु और शून्य यानी प्रकाश या जीवन या पुनर्जीवन।
इच्छा का अतिभार आपको अनंत के एक ब्लैक होल में परिवर्तित कर देता है, फिर शून्य यानी प्रकाश भी आपका भक्षण हो जाता है। इसीलिए आप एक घनी अन्धकारमय गुफा के वासी हो जाते हैं जहां सतत एक कढ़ाह में कामनाएं इच्छाएं उबल रही होती हैं। अंधेरा रुका हुआ है बोझ के कारण और ठहरा हुआ हर कुछ जड़ है मृत है। शून्यता की गति की दिशा अन्धकार के प्रसार की दिशा के ठीक विपरीत होती है और अन्धकार के प्रसार की दिशा एक ही समय में चहुंओर होती है,तभी जब प्रकाश अपनी यात्रा में होता है तब चारों ओर के अंधियारे के तमाशाई उस पर एक भटके हुए यात्री का लेबल लगाते फिरते हैं जैसे दीवाना, जुनूनी या पागल वगैरह-वगैरह।
जो इच्छा से बंधा हुआ नहीं है,वह मुक्त है,जो स्वतंत्र है वहीं निर्भय है। शून्य वह नाव है जो खाली है वही भार को भवसागर पार करा सकता है,वह शून्य दुःख को सोख लेता है सो आपके भीतर बच रहता है सुख। वह सुख आनंद और बोध का विकीर्णन करता चलता है प्रकाश जो है वह। वह उत्तल सतह का है,फोकस करना सिखाता,वह अवतल से भी बना है आपके दुखों का हर्ता। वह सुखकर्ता है व दुखहर्ता भी। सो शून्यता की अपनी नाव स्वयं बनाना सीखो और तैरना भी और डूबने वाले को बचाना भी। जीवन में संतुलन का नाम शून्यता है,संतुलन बिन्दु ही निर्भयता का केन्द्र है,यही निर्भय बनाता है,यहीं ऊर्जा लहर का उच्चतम शिखर है। यहीं ज्ञान-विवेक का चरम है जिसे पढ़ लेना बोध के जरिए ही संभव है। सीखने के लिए शून्य होना होगा, बिना स्मृति के सीखना तत्व को जानना है, दूसरों से कहने के लिए स्मृति चाहिए,स्वयं के लिए नहीं। शून्य में जाना जुनून से होकर आकर अन्दर आना है। वहीं असंतुलित होकर अनंत की ओर जाना, पागलपन में होना है।
शून्य अर्जित कर लेना सुप्रीम इन्टेलिजेन्स को बैलेंस कर लेना है। अनंत के जाल में फंसना अपनी बुद्धि,विवेक को खो देना है। अनंत इच्छाओं के जाल में बुद्धि शून्य हो जाती है। शून्य में बुद्धि बोध-ग्राह्य होकर एक विशाल रिसीवर और रिफ्लेक्टर हो जाती है। इसका अभिन्न हिस्सा होकर आप सुपर कंनडक्टर बनकर ट्रांसमीटर हो जाते हैं। शून्य की पीठ पर अनंत लदना चाहता है क्योंकि अनंत इच्छा का ही एक नाम है जबकि अनंत की इच्छा शून्य के लिए धूल समान है सो प्रकाश उस धूल को झटक कर आईना साफ कर आगे बढ़ जाता है।
प्रकाश के यात्री की पीठ नहीं होती वह अदृश्य होता है,जब आप उसके सीधे रास्ते में आते हैं तब वह आपको देखकर आगे निकल चुका होता है उसके चले जाने के बाद आपको उसे देखने का विचार आता है फिर न देख पाने के अफसोस का भी। रूकना शून्य का स्वभाव ही नहीं वह तो यात्री है,प्रकाश नाम का यात्री। आपका शरीर चक्रीय भी है और रेखीय भी। संसार करते हुए चक्रीय और बोध के क्षणों में रैखिक। रेखा पर दो बिंदु क्रमशः शीर्ष और आधार पर शून्य और अनंत हैं। गुण और दुर्गुण के रूप में। फिर दोनों चक्रीय गतियां और केशकीय प्रक्रिया मिलकर आनन्द का कीमिया बनाना प्रारंभ करते हैं।
शून्यता अर्जित करने का कोई मार्ग नहीं है इसके लिए तो राख होना पड़ता है,मरना पड़ता है,इच्छा विहीन होना पड़ता है। फिर जाकर आपके खाली स्पेस में,स्थान में प्रकृति और उसका बोध आपमें एक नवजात की तरह उतरते हैंए जन्म लेते हैं,जिससे आप हर पल क्रिएटिव रहकर आनन्द में डूबे हुए रहते हैं। शून्य हो जाते ही आप निरपेक्ष हो जाते हैंए सापेक्षता के, तुलना के सारे प्वाइंट आप रेफरेंस आपके लिए गौण, शून्य हो जाते हैं, मर जाते हैं। फिर आप अपने लिए राजा और संसार के लिए फकीर,साधु हो जाते हैं।
शून्यता यानी सत्य को जानना भी इच्छा के माध्यम से होता है, जो गहराई में उपजती है फिर यह इच्छा तय करती है कि वह सतह पर आए या कोई निर्माण करें या वापस डिसाल्व हो जाए शून्य में। शून्यता के पहले की अन्तिम इच्छा ही बोध का मध्य बिंदु है। संसार में जीवन इसी एक इच्छा और शून्यता,राग-विराग के बीच विचरण है,यात्रा है। यही यूनिवर्स में इक्विलिब्रियम की,सन्तुलन की स्थिति है।
हम सब का उद्गम शून्यता से ही है इसीलिए शून्य की हर अदा हमें लुभाती है जबकि अनंत का संसार हर पल रुलाता है। अनंत को साधना असंभव है क्योंकि उसके अनंत बिन्दु है जबकि शून्य एकमेव बिन्दु है सो फोकस सरल है साधना आसान है। नवजात शिशु के लिए जैसे शून्य की उपस्थिति भर से अनंत का मकड़जाल धुएं की तरह विलुप्त हो। जाता है, आनंद की कामना शून्य नामक नन्हे कृष्ण की कामना है। कृष्ण-विवर की शक्ति संक्रामक है। शून्य का प्रकाश वैसा प्रकाश नहीं है जैसा हम समझते हैं, शून्यता के बोध का प्रकाश अंधियारे के उज्ज्वल पक्ष को और उजाले के अंधियारे पक्ष को भी समझाकर स्पष्ट दर्शित करता है। शून्यता का एक घड़ा है जिसे प्रजापति ब्रह्मा आकाश में निर्मित करते हैं, उस एक बात को याद रखिए, उसी से ठंडा उसी से गर्म। वे माली की तरह विनिर्दिष्ट स्थान पर बीजारोपण कर देते हैं, ठीक समय-स्थान, भूमि-आकाश के तले। इस तरह जो शक्ति व्योम को गर्म रखती है वही बीज को मटके से निकाल कर अहंकार, लोभ आदि का उसका कवच गलाकर उसे अंकुरण के लिए तैयार करती है। शून्य के वटवृक्ष पर आकाश-कुसुम ऐसे ही चुनकर तैयार होते हैं।
हमने प्रारम्भ में ही कहा कि सृष्टि की यात्रा के दो बिंदु शून्य और अनंत क्रमशः दो दूरस्थ छोर हैं। ये दोनों एक ही चौड़ी रेखा पर जैसे ऊपर.नीचे या आगे.पीछे की तरह एक-दूसरे के विपरीत गति करते हुए ऑसिलेट करते हुए वहीं वास करते हैं। अब यह पूरी तरह स्पष्ट हो ही गया होगा कि आसान समझ की दृष्टि से शून्य और अनंत एक ही बैन्ड.लूप के दो भाग हैं, समानांतर रेखाएं हैं, रेखाएं जो अन्ततः एक अदृश्य ज्यामिति के खुले वृत्त की यात्रा पूरी कर एक दूजे में समाहित मर्ज हो जाती हैं। परिकल्पना या कहें पर्सपेक्टिव की सुविधा के लिए यहां हमने ज्यामितिक संकल्पना के तहत शून्य और अनंत को अलग-अलग करके देखा जबकि ये दोनों अंतर्गुम्फित हैं और दोनों एक-दूसरे में समाए हुए जैसे हैं।
@ इस आलेख के सर्वाधिकार लेखकाधीन सुरक्षित हैं।
raghvendratelang6938@gmail.com

