
- पूजा सिंह
स्वतंत्र पत्रकार
इस फ़स्ल में जो भेजिए बस आम भेजिए
नामा न कोई यार का पैग़ाम भेजिए,
इस फ़स्ल में जो भेजिए बस आम भेजिए।
असर ये तेरे अन्फ़ास-ए-मसीहाई का है ‘अकबर’
इलाहाबाद से लंगड़ा चला लाहौर तक पहुंचा।
अकबर इलाहाबादी के इन दो मशहूर शेरों से आम समझ ही गए होंगे कि आज बहुत खास बात होने वाली है। यानी आम की बात होने वाली है।
बाजार में जब कभी फल-सब्जियों की दुकानों के आसपास से गुजरना होता है तो आमों की भीनी-भीनी खुशबू यह अहसास दिला देती है कि दुनिया में चाहे जितनी उथलपुथल हो रही हो, लेकिन समय का चक्र अपने हिसाब से चलता ही रहता है। तो हुआ यूं कि कल शाम इन आमों की खुशबू ने मुझे फलों की दुकान की ओर खींच ही लिया।
चूंकि उत्तर भारत के मैदानी इलाकों से हूं इसलिए आमों को लेकर खुशकिस्मत हूं- स्वाद के मामले में भी और पहचान के मामले में भी। लंगड़ा, सफेदा, दशहरी, चौसा, सुंदरजा, हापुस, केसर, बादाम, अंबिका, आम्रपाली और गौरजीत के अलावा अनगिनत देसी आम। कोई काटकर खाने वाला तो कोई चूसकर खाने में बेहतर।
खैर, दशहरी जैसी खुशबू से खिंची हुई जब दुकान पर पहुंची तो अचरज हुआ। दो किस्म के आम रखे हुए थे जो दशहरी तो यकीनन नहीं थे लेकिन थे उसी बिरादरी के। एक छोटा सा कुपोषित दशहरी जैसा नजर आ रहा था तो दूसरा ऐसा मानो दशहरी खा-खा कर मोटा गए हों।
दुकान वाले से दरयाफ्त की। पहले आम को तो उसने बिना हील हुज्जत स्वीकार कर लिया कि वह लोकल दशहरी है यानी यहीं मध्य प्रदेश में उगाया गया दशहरी जो जाहिर है उत्तर प्रदेश के दशहरी के आसपास भी नहीं था। दूसरे आम के बारे में उसने कहा कि इसका नाम है- पुलिस आम।
“पुलिस आम? ये कैसा नाम है?” मैंने सोचा। लेकिन आम विक्रेता को न इससे ज्यादा मालूम था न ही उसकी दिलचस्पी थी। उसकी रुचि तो बस इस बात में थी कि मैं आम खरीदूंगी या नहीं। खैर मैंने आम लिए लेकिन नाम को लेकर जिज्ञासा बरकरार रही।
घर आकर जब आम की इस किस्म के बारे में अपनी जिज्ञासा इंटरनेट से प्रकट की तो कुछ दिलचस्प मिला जो शायद आपमें से कइयों को पता होगा। खबर तो मैंने भी पढ़ी थी लेकिन मालूम नहीं था कि कोरोना के दौर में एक प्रेरणा की तरह विकसित की गई यह किस्म यहां दूर भोपाल के बाजारों तक पहुंच जाएगी।
खोजने पर पता चला कि देश में मैंगो मैन के नाम से मशहूर उत्तर प्रदेश के मलीहाबाद के हाजी कलीमुल्लाह खान ने कोरोना काल में फ्रंटलाइन वर्कर्स के सम्मान में आम दो नई किस्में विकसित की थीं- डॉक्टर आम और पुलिस आम। इन आमों को दशहरी आम की ग्राफ्टिंग करके तैयार किया गया था। इन किस्मों के बारे में उस समय उन्होंने बताया था, “मैंने कोविड -19 के खिलाफ लड़ाई में फ्रंटलाइन पर काम करने वाले दो वॉरियर्स के नाम पर आम की दो किस्मों का नाम रखा। वे सच्चे हीरो हैं जो हजारों लोगों को बचाने के लिए अपना जीवन दांव पर लगा रहे हैं। उनके समर्पण और निस्वार्थ सेवा के कारण मैंने अपनी नई किस्मों का नाम दिया। ऐसा करना मेरे लिए सम्मान की बात है।”
कलीमुल्लाह साहब ने आम की 1600 से अधिक किस्में विकसित की हैं। वह एक ही पेड़ पर 300 से अधिक किस्म के आम उगाने का कमाल कर चुके हैं। उनके इस जुनून और हुनर को सराहते हुए भारत सरकार ने 2008 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया था।
ऐसा नहीं है कि कलीमुल्लाह खान ने पहली दफा ऐसा किया हो। वह समय-समय पर आम की नई किस्मों का विकास करके उसे समाज के उन लोगों को समर्पित करते रहे हैं जो अपने-अपने क्षेत्र में अद्भुत काम कर चुके हैं। फिल्मी कलाकारों से लेकर राजनेताओं और मशहूर क्रिकेटरों तक उन्होंने अनेक नामों से आम की किस्में विकसित की हैं।
चूंकि कलीमुल्लाह खान साहब मलीहाबाद के हैं और मलीहाबाद को ही दशहरी का ‘घर’ माना जाता है इसलिए एक किस्सा दशहरी का भी। दशहरी आम पहली बार लखनऊ के निकट दशहरी नामक एक गांव में तैयार हुआ था। इस मीठे जायके, पतली गुठली और भीनी खुशबू वाले आम का नाम गांव के ही नाम पर दशहरी रख दिया गया। लखनऊ के नवाब साहब को यह आम इतना पसंद आया कि इसके मूल वृक्ष जिसे मदर ट्री कहा जाता है, उसके आसपास पहरा बिठा दिया गया। यही नहीं कहते हैं कि नवाब साहब जब किसी को यह आम तोहफे में भेजते थे तो बारीक सुइयों से हर फल के बीज में एक छेद करवा देते थे ताकि कहीं कोई दशहरी का दूसरा वृक्ष न तैयार कर ले। उस गांव में दशहरी का वह मदर ट्री आज भी मौजूद है।
बाद में इस वृक्ष से कलम तैयार करके उसे मलीहाबाद क्षेत्र में लगाया और बड़े पैमाने पर दशहरी आम की खेती शुरू हो सकी।
देखिए न, हम आम से शुरू होकर पुलिस आम तक और फिर उसके बड़े भाई दशहरी तक आ पहुंचे। आम को फलों का राजा यूं ही नहीं कहते। वह केवल एक फल नहीं बल्कि एक इमोशन हो चुका है। तो अगली बार जब आम खाइये तो उसकी गुठलियां भी देखिए हो सकता है दशहरी या पुलिस आम जैसी कोई कहानी याद आ जाए।


सुंदर और जानकारी परख लेख।
धन्यवाद पूजा।
आम की मनमोहक और इतनी खास दास्तान! वाह। मुबारक हमको।