Vihaan Drama Works: भोपाल में नाट्य प्रस्तुति ‘मिजाओगी खोंगचट’ देखने के बाद की प्रतिक्रिया

- पंकज शुक्ला
पत्रकार-स्तंभकार
… यदि आप कर सकते हैं तो बताएं कि संसार की किताबों में कितने अनंत रहस्य छिपे हैं। लेकिन साथ ही उसे आकाश में पक्षियों, धूप में मधुमक्खियों और हरी पहाड़ी पर फूलों के रहस्यों के बारे में सोचने-विचारने का भी वक्त दें। उसे अपने विचारों में विश्वास करना सिखाएं, भले ही हर कोई उसे गलत क्यों न कह रहा हो।
यह अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के उस पत्र का हिस्सा है जिसे उन्होंने अपने बेटे के शिक्षक को लिखा था। 20 मई बुधवार की सांझ भोपाल की नाट्य संस्थान विहान ड्रामा वर्क्स (Vihaan Drama Works) की नाट्य प्रस्तुति ‘मिजाओगी खोंगचट’ देखते हुए मुझे यह पत्र और इस पत्र का यह अंश याद आया।
विहान बीते कुछ वर्षों से हर ग्रीष्मकालीन अवकाश के दौरान बच्चों के लिए बाल नाट्य कार्यशाला ‘स्वप्नयान’ आयोजित करता है। यह नाट्य प्रस्तुति ‘मिजाओगी खोंगचट’ इसी कार्यशाला के समापन पर आयोजित की गई थी। इस नाटक में बच्चों ने मणिपुरी लोककथाओं को मंच पर प्रस्तुत किया। यह पूरी कार्यशाला 4 से 15 वर्ष तक की उम्र के 40 बच्चों के लिए मणिपुरी संस्कृति और जीवन व्यवहार को करीब से जानने का मौका था। आमतौर पर इस तरह की कार्यशाला में बच्चे एक खासतरह का अनुशासन, अभिव्यक्ति, मंचीय झिझक से मुक्ति, टीम व खेल भावना, कला माध्यमों से परिचय जैसे विभिन्न आयामों से रूबरू और दीक्षित होते हैं। विहान का ‘स्वप्नयान’ बच्चों के लिए ऐसी उड़ान का खुला आसमान है।

मणिपुरी भाषा में ‘खोंगचट’ का मतलब होता है ‘यात्रा’ या ‘मोर्चा/रैली’। यह नाटक एक तोते ‘मिजाओ’ की जीवन यात्रा की लोककथा पर बुना गया था। ‘स्वप्नयान’ की यह प्रस्तुति वास्तव में विहान और उसके रंगकर्म की ‘खोंगचट’ है। विहान ने बच्चों के साथ सहजता से रंगकर्म का अभ्यास अपनी पहचान बना लिया है और यह सिलसिला इस नाट्य कार्यशाला के साथ एक पायदान और चढ़ा।
विहान का परिचय इसके एक किरदार तक नहीं सिमटा है बल्कि विहान का नाम लेते ही सर्जकों एक समूह का चित्र उभरता है। इस द्श्य में श्वेता केतकर, हेमंत देवलेकर, अंकित पारोचे, तेजस्वी अनंत, रूद्राक्ष भायरे, ईशा गोस्वामी, शुभम, रवि, अद्वैता, नवीन जैसे कलाधर्मी प्रमुखता से समाहित होते हैं। और इन सबके नेतृत्वकर्ता हैं, सौरभ अनंत। बीते डेढ़ दशक में विहान की टीम ने संग-साथ का प्रशंसनीय ‘खोंगचट’ रचा है।
कितनी सुखद बात है कि मंच पर ‘मिजाओगी खोंगचट’ अभिनीत कर रहे बच्चों में हर उम्र के किरदार थे लेकिन सभी ने मिल कर ऐसा प्रभाव रचा कि दर्शक उनके भाव व अभिनय से अचंभित रह गए। कोई यकीन ही नहीं कर पाया कि इन बच्चों में अधिकांश पहली बार मंच पर थे। उनमें न कोई डर था और न झिझक। 20 दिनों की कार्यशाला में यह तभी संभव होता है जब वे अपने प्रशिक्षकों में भी वैसा ही भाव देखें।
जब मैं इस नाट्य प्रस्तुति को ‘विहान की खोंगचट’ कह रहा हूं तो इसके पीछे सीख, समझ और सहयात्रा की बुनियाद भी है।

‘स्वप्नयान’ की कार्यशाला की इस प्रस्तुति में पटकथा व डिजाइन इस समूह के निदेशक सौरभ अनंत का था तो गीत-संगीत हेमंत देवलीकर था। जबकि ‘स्वप्नयान’ की पूर्व कार्यशालाओं में बतौर प्रशिक्षु रहे ईशा, ग्रैसी, कबीर जैसे युवा कलाकार अब मंच और नैपथ्य में भूमिकाएं निभा रहे हैं। इस कड़ी में एक चमचमाता नाम श्वेता केतकर का है। विहान की नाट्य प्रस्तुतियों की किरदार श्वेता केतकर कला की ऐसी विद्यार्थी हैं जो हर पल सीखने की ललक के साथ पेश आती हैं। वे नाट्य प्रस्तुतियों की मंचीय सामग्री (प्रोप) तैयार करने में दक्ष है और वे प्रोप को नाटक में सहायक किरदार की तरह प्रयुक्त करने की परंपरा को आगे बढ़ाती हैं। इन भूमिकाओं से आगे जा कर वे बाल कार्यशालाओं की नाट्य प्रस्तुतियों का निर्देशन भी कर रही हैं। बीते वर्ष ‘अंधेर जंगल और चौपट शेर’ तथा इस बार ‘मिजाओगी खोंगचट’। वे बतौर निर्देशक ही नहीं समूचे नाट्य मंचन में अपनी विविध जिम्मेदारियों पर खरा उतर कर भोपाल की महिला रंगकर्मियों की उज्ज्वल परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। वह परंपरा जिसमें लिटिल बैले ट्रुप की गुलवर्धन दी, इरफाना शरद, पापिया दासगुप्ता जैसी अनेक सिद्ध अभिनेत्रियां शुमार होती हैं जिन्होंने मंच के परे भी अपने कौशल और दक्षता से रंगकर्म को समृद्व किया।
टीम विहान ने अपनी सामूहिक यात्रा के अगले चरण ‘मिजाओगी खोंगचट’ में मंचीय व्यवस्था, प्रकाश व्यवस्था, संगीत व्यवस्था, संवाद और पटकथा… के कुशल संयोजन में बच्चों के बेलौस रूप को चमत्कृत अंदाज में मंच पर प्रस्तुत किया है।
मेरी यह बात पटकथा और संवाद का उल्लेख किए बिना पूरी नहीं होगी क्योंकि भोपाल के रंगमंच की दो विशिष्ट धाराओं व्यावसायिक तथा शौकिया रंगकर्म के बीच विहान ने अपनी खास जगह बनाई है तो उसका एक अहम् कारण इसकी नाट्य प्रस्तुतियों की पटकथा और संवादों की गहराई भी है। ‘मिजाओगी खोंगचट’ की पटकथा लिखते हुए सौरभ अनंत ने मणिपुरी लोक संस्कृति के विभिन्न आयामों को सहजता से उकेर दिया कि प्रस्तुति की तारतम्यता कहीं से भी टूटी नहीं बल्कि दर्शकों में उत्सुकता और जिज्ञासा बढ़ी ही। कथा और वेशभूषा, गीत-संगीत मणिपुरी संस्कृति में रचा-बसा था लेकिन संवाद सार्वभौमिक थे।

कुछ संवाद नाट्य प्रस्तुति के बाद दर्शकों के साथ चले आए हैं, जैसे:
– नदी पूरी तरह नहीं सोती है। बांस पूरी तरह चुप नहीं होते हैं। रंग पूरी तरह बूढ़े नहीं होते हैं।
– पानी सबको हरा नहीं करता है। कुछ दु:ख सूखे पत्तों की तरह अटके रहते हैं। टूटे हुए भरोसे का दुःख ऐसा ही दु:ख है।
– जो सबसे ताकतवर होता है झील उसकी होती है…
– पेड़ कटे जैसे धरती के पंख कटे…
– जंगल सिर्फ पेड़ नहीं होते, नदियां सिर्फ पानी नहीं होती… ये सब भी परिवार होते हैं।
इन संवादों का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि इन्हीं के कारण मुझे अब्राहम लिंकन का पत्र याद आया था क्योंकि विहान टीम ने बच्चों को किताबों से मिलवाया और किताबों के बाहर की दुनिया से भी।
आखिर, सृजन हमें सिखाता है कि हमारा होना अकेले होना नहीं होता बल्कि यह परस्परता में खिलता है, संवरता है और परिपक्व होता है।
विहान का ‘खोंगचट’ (यात्रा) इसी परस्परता के सिद्ध होने की तस्दीक है।


