
- डॉ. शेफाली चतुर्वेदी
स्वतंत्र पत्रकार
मिट्टी, धागा और बाँस लेकर आर्सेनाले की सदियों पुरानी दीवारों के बीच भारत ने रच दिया घर का वो एहसास जो पता बदलने से नहीं बदलता
उसकी दीवारें नहीं हैं जिन्हें आप छू सकें। छत नहीं है जो आपको धूप से बचाए। फर्श नहीं है जिस पर आपके पाँव टिकें। वो घर सिर्फ धागों से बना है रेशम, सूती और नायलॉन के उन धागों से जो बालों से भी महीन हैं। चौदहवीं सदी के एक वेनिसियन गोदाम की सुनहरी हवा में लटका वो घर जिसकी खिड़कियाँ सफेद लकीरों में हैं, जिसकी सीढ़ियाँ एक फुसफुसाहट की तरह हैं, और जिसके दरवाज़े उस दुनिया की तरफ खुले हैं जो बहुत पहले आगे निकल चुकी है।
कलाकार सुमाक्षी सिंह ने 33 लिंक रोड का एक-एक सेंटीमीटर नापा था उससे पहले कि बुलडोज़र आते। उनके शरणार्थी नाना-नानी ने वो घर नई दिल्ली में बनाया था। पाँच पीढ़ियाँ उसमें जीईं, 74 साल उसने सबको थामे रखा — और फिर एक दिन नई इमारत के लिए वो ज़मीन छीन ली गई। जाने से पहले सुमाक्षी उन कमरों में घूमती रहीं स्केचबुक लिए, नाप का फीता लिए हाथ उन दीवारों पर फेरती रहीं जिन्हें वो फिर कभी नहीं छू पाएंगी। वो कहती हैं “मेरा काम मेरे उस घर से जन्मा है जहाँ मैं बची हूँ। वो घर जो इतनी साझा यादों का पिटारा था, आज मलबा बन चुका है उसकी मज़बूत, छाँव देती दीवारें अब सिर्फ याद में हैं।”

जो उन्होंने उसकी जगह बनाया और वेनिस के 61 वें अंतरराष्ट्रीय कला उत्सव, ला बियेनाले में भारत के राष्ट्रीय मंडप में लेकर आईं वो कोई विलाप नहीं है। वो कुछ और दुर्लभ है इस बात का प्रमाण कि घर तब भी ज़िंदा रहता है जब जगह नहीं रहती।
दूरियों का भूगोल
’ घर को याद करते हुए’, डॉ. अमीन जाफर द्वारा क्यूरेट और संस्कृति मंत्रालय द्वारा नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर और सेरेंडिपिटी आर्ट्स के सहयोग से प्रस्तुत यह प्रदर्शनी 9 मई 2026 को आर्सेनाले में खुली और 22 नवंबर तक चलेगी। सात साल बाद भारत वेनिस लौटा है और इस बार एक ऐसा सवाल लेकर आया है जो हर इंसान के लिए है जब वो जगह नहीं रहती जहाँ से हम आए हैं, तो हम क्या लेकर चलते हैं?
यह सवाल आज जितना ज़रूरी है, शायद पहले कभी नहीं था। विदेश मंत्रालय के अनुसार दुनिया भर में साढ़े तीन करोड़ से ज़्यादा भारतीय दो सौ से ज़्यादा देशों में बसे हैं , दुनिया का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय। इनमें से कई लोग भारत को पते से नहीं, आदत से जीते हैं — किसी खास पकवान की खुशबू में, किसी त्योहार की उस खास चुप्पी में जो घर से दूर और भी गहरी हो जाती है। और भारत के भीतर भी लाखों ऐसे हैं जिनका बचपन का मोहल्ला किसी फ्लाईओवर की भेंट चढ़ गया, घर बिक गया, गाँव किसी शहर में समा गया जिसे उस गाँव का नाम भी याद नहीं।
सुमाक्षी का ‘परमानेंट एड्रेस’ यानी ‘स्थायी पता’ उन सबसे बात करता है। उन पारदर्शी दीवारों के भीतर खड़े होकर जो न छाँव दे सकती हैं, न थाम सकती हैं, फिर भी किसी तरह थाम लेती हैं , हर दर्शक समझ जाता है कि सुमाक्षी क्या कहना चाहती हैं ,”हम सबके भीतर कहीं न कहीं वो तड़प है, किसी जगह से जुड़े रहने की भले ही वो जगह अब रही न हो।”
संस्कृति मंत्रालय का यह फैसला — कि पूरा मंडप इस एक विशाल, गहरे एहसास के इर्द-गिर्द बनाया जाए — साहस का काम है, और इसे स्वीकार किया जाना चाहिए। चकाचौंध भेजना आसान होता। इसके बजाय, उद्घाटन पर केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि यह मंडप उस भारत को सामने लाता है जो “अपनी सभ्यतागत स्मृति में गहरी जड़ें रखते हुए दुनिया से सक्रिय रूप से जुड़ रहा है।” और यह मंडप यह बात दावे से नहीं, कला से साबित करता है।
प्रदर्शनी में चार और काम हैं , अलवर बालासुब्रमण्यम की दरारों भरी मिट्टी की पट्टियाँ, रंजनी शेट्टार के हवा में लटकते फूलनुमा शिल्प, असिम वाकिफ का बाँस का विशाल मचान और स्करमा सोनम ताशी का कागज़ से बना लद्दाखी गाँव — हर एक अलग सामग्री से, मगर पूछता एक ही सवाल है। मिलकर ये सब कोई प्रदर्शनी नहीं बनाते : एक ऐसा गीत बनाते हैं जो धीमे-धीमे, साफ आँखों से, बिना शोर के दिल को हिला देता है।
यह मंडप हमें बताता है कि घर कोई स्थायी पता नहीं है। घर वो तड़प है जो पता मिट जाने के बाद भी बची रहती है। और वो तड़प यही दुनिया की उन चंद चीज़ों में से एक है जिसे किसी वीज़े की ज़रूरत नहीं पड़ती।


