
- राघवेंद्र तेलंग
सुपरिचित कवि,लेखक,विज्ञानवेत्ता
सच्चे ज्ञान का विज्ञान क्या है?
आज हम ज्ञान की अनुभूति की बातें करेंगे और समझेंगे कि सच्चे ज्ञान का,सच के ज्ञान का विज्ञान आखिर क्या है,कैसा है! विज्ञान भौतिक जगत की खोजबीन करते हुए का,सृष्टि का अध्ययन व उद्घाटन करता है। वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक विज्ञान सृष्टिकर्ता की कार्यप्रणाली का अध्ययन व उद्घाटन करता है। इस प्रकार ज्ञान के दो आयाम हैं और अध्यात्म की दृष्टि से सच्चा ज्ञान अनुभव और अनुभूति के द्वारा होता है। महर्षि अरविन्द को नमन करते हुए बात शुरू करते हैं जिन्होंने कहा था कि सच्चा ज्ञान सोचने की क्रिया से नहीं आता, सच तो स्वयं आप हैं और जो आप होते चले जाते हैं वह है। यहां मैं प्रेरणा स्वरूप मनसा फाउंडेशन के गुरूजी कृष्णानंद के ऐसे ही शीर्षक के एक आलेख का भी स्मरण कर रहा हूं।
अपने आसपास आप जरा ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि आज अधिकतर पढ़े-लिखे आदमियों के भीतर से किताबों की नहीं नोट की लैंग्वेज-भाषा सुनाई दे रही है, पूंजी के आंकड़ों की भाषा लगातार सबके जेहन में पसरती ही चली जा रही है। जी हां! आजकल आपके परिचय का मतलब नेटवर्थ शब्द के भीतर कैद है, आपकी भौतिक संपदा का टोटल। इससे आगे देखें तो आज हर आदमी बस बोल ही बोल रहा है उसके पास कहने को वास्तव में कुछ भी नहीं है। इस साक्षर ने पढ़- लिखकर अब अपनी पढ़ाई तक भुला दी है, पढ़ी हुई किताबें भुला दी हैं, उसके आसपास न ग्रंथ हैं, न कॉपी, न किताब। भारी शोर के बीच एक गूंगा अपनी भाषा की तलाश में भटकता घूम रहा है, अपनी ही परिक्रमा करता हुआ। मोबाइल, मशीन व कंप्यूटर में खोया हुआ मनुष्य जाने कहां, खो गया है। उसकी स्मृति एक भूल-भुलैया में खो गई है। सवाल यह है कि क्या इस अंधड़ में आदमी नाम की किताब के पन्ने इधर-उधर बिखर गए हैं। आदमी का अपने को किताब मानना अब एक पुराना ख्याल लगने लगा है। क्या आज के आदमी के भीतर अब भी कुछ ऐसा बचा है जो किसी किताब के मैटर जैसा कुछ लगे। विगत दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति ने याद दिलाया वरना तो हम भूल ही गए थे कि पश्चिम बना है सभ्यता के विनाश के लिए और पूरब सदा से पक्षधर रहा है जीवन निर्माण के लिए, बचाने के लिए, भारत जिसके लिए अहिंसा परम मूल्य है।
प्रकाश में भी अंधेरे की आंख सदा ऑन रहती है। क्योंकि आंख अंधेरे में ही पैदा हुई रहती है। इसीलिए अंधेरे में बनी रहने वाली वह आंख सदा देखती रहती है। एक फूल की यात्रा अंधेरे की यात्रा है,वह स्याह अक्षरों में लिखी होती है उसे वहीं पढ़ सकता है जो अंधेरे में भी पढ़ सकता है। ध्यान अंधेरे में अंधेरे को पढ़ने की कला है,ऐसा पढ़ना रोशनी की खातिर हुआ करता है। अंधियारे दिनों के दु:ख और रोशन दिनों के सुख,सब अनुभव के पन्ने हैं, जो आंसुओं को पढ़ना जानता है,सब जानता है।
सांसों की गति को साधना,की गति को साधना परम ज्ञान है। जैसे दो पंक्तियों के बीच अर्थ विराजते हैं वैसे ही दो सांसों के बीच के अंतराल को बढ़ाना सबसे बड़ी साधना है। ऋण और धन के दो सप्तकों के बीच तीसरा सप्तक है औरवह है शून्य का, संतुलन का,परम शीत ताप का,निर्वाण का,परम ज्ञान का। हर सृजन शून्य से शुरू होता है जैसे कोरा कागज। ज्ञानी जब न्यूट्रल स्टेट में हो तभी ज्ञान मिलता है। ऐसा ज्ञानी जब ज़ीरो होकर न्यूट्रल स्टेट में होता है तो उसके अंदर न्यूट्रल स्टेट क्रिएट हो जाने से ज्ञान भी वहीं होता है। जानकारी को आचरण बनाना पड़ता है,और ज्ञान आचरण बन जाता है। यही ज्ञान के प्रति समर्पण है, निष्ठा है। जानकारी जानने वाले को मजबूत करती है और ज्ञान जानने वाले को विलीन कर देता है। जो असत्य है वह गिर जाता है,सत्य बच जाता है। यूनिवर्स खुद एक मूर्तिकार, स्कल्पटर है। ज्ञान कोई क्रिया नही बल्कि अवस्था है,स्टेट है,न्यूट्रल रहने की। ज्ञानी या जीनियस बनने के लिए पहले पागलपन के दौर से गुज़रना पड़ता है,कई बार मरकर फिर-फिर उठना पड़ता है। पागलपन और जीनियसनेस में बहुत बारीक फर्क है,महीन रेखा है बीच में संतुलन की। लोग बोध के ज्ञान की भाषा नहीं समझते। लोग सापेक्षता,तुलना व काम वासना की भाषा के अभ्यस्त हैं। काम वासना वह भी गैर जरूरी,का विकार मिटते ही बोध का ज्ञान होता है।
शून्य यानी जो दिखाई न दे,जो होकर भी नहीं होने जैसा हो,माइक्रो यानी अदृश्य से,यानी कुछ नहीं से,यानी शून्य से सारा अनंत दृश्य संसार उपजा है। शून्य के गर्म में अज्ञात अनंत सदा विद्यमान रहता है,गर्भ में अज्ञात को जानने की जिज्ञासा सभी को रहती है, प्रश्नाकुलता से भरा मन सदा आनंद में रहता है। सो आनंद का स्रोत और स्थान शून्य ही है। कुछ नहीं को जान लिया तो गर्भ को जान लिया, शून्य को जान लिया, शून्य को जानना कुछ नहीं को जानना है, कुछ नहीं को जानने वाले फिर कुछ नहीं कहते, शून्य के बारे में शून्य मात्रा में ही कहा जा सकता है। जो शून्य को जान गया फिर वह मौन हो गया। तो जिसे जानकर भी जिसके बारे में कुछ न कहा जा सके वहीं ब्रह्म है वहीं सबका रचयिता हैं, उसी से सब आए हैं और उसी में सब समा जाएंगे, जन्मों -जन्मो की यात्रा के बाद,अनंत की यात्रा के पश्चात सबको शून्य में ही विलीन हो जाना है,ब्रह्म को पा लेना है।
मेरे मत में, शून्य और अनंत एन्टैन्गल्ड परसेप्शन की बातें हैं,एक ही समय में साथ-साथ उपस्थित,मगर विपरीत ऑरबिटल प्लेन और स्पिन की दशा में। ऐसा गुणधर्म इसलिए भी आवश्यक है कि साक्षी का ओम्नीसेन्स गुण अस्तित्व में रहें। ये दोनों मिलकर ही अस्तित्व के ड्राइवर हैं,साक्षी हैं। ओम्नीसेन्स का अर्थ ही तीन सौ साठ अंश है, सबको समाहित करने वाला परसेप्शन। दरअसल, यह अमूर्त को व्याख्यायित करने वाली बात है और इसके लिए बियॉन्ड इमेजिनेशन की बात करनी होती है, सो क्रमिक जिज्ञासाएं उपजना स्वाभाविक ही है। हां! शून्य और अनंत के परसेप्शन को समझने के लिए बिन्दु, त्राटक का प्रतीक आंखों के समक्ष होना इसीलिए आवश्यक रहता है। जब अक्रियता की, इनएक्टिव्ह की, अ-मन की ऐसी अवस्था उपलब्ध होती है, तब जो सुव्यवस्था बनती है वह सार्वभौम है, यूनिवर्सल है, जो कि ये यूनिवर्स, नेचर खुद है। जो न्यूट्रल है उसी में सुपर पावर है, यूनिवर्स की पावर, अ-मन की पावर।
शरीर में समाया यह जीवन एक इंजन की तरह है और चैतन्य या कांशसनेस इसका ड्राइवर हैं कहीं दूर बैठा देखता हुआ। पंच तत्वों की उपस्थिति के संसार में शरीर व चैतन्य दोनों साथ-साथ इवाल्व होते हैं ,विकसित होते हैं। सायुज्य युगल भी एक-सी ट्रामेटिक परिस्थितियों से आए हुए होते हैं सो दोनों इंवाल्व भी साथ-साथ होते हुए चैतन्य तक की अपनी यात्रा तय करते हैं, अपने लिए निश्चित एक समय अंतराल में। इवोल्यूशन को उसकी स्पीड को उस कछुए की गति को समझते हैं विश्वास करते हैं उनके लिए टाइम डायलेशन होता है। सेल्फ फोकस लाइफ यानी अपने अक्ष या एक्सिस पर बने रहकर कम ऊर्जा खर्च के साथ आनंद से रहना। जहां अपना पता न हो वहां भटकन ही भटकन है असीम ऊर्जा का लीकेज है।
हम सबके मन में एक सवाल कभी न कभी तो कौंधता ही है कि आखिर सच्चा ज्ञान है क्या और मिलेगा तो कैसे? ज्ञान का कोई एक विज्ञान नहीं है। ऐसा इसलिए कि वह कई रास्तों से मिलने वाली बात है,मल्टी डायमेंशनल। आप कितने ही उधार के विचार इकट्ठा कर लें,चाहे कितनी ही जानकारी, सूचनाएं जुटा लें, किताबें पढ़ लें,इन सबसे कुछ नहीं होने वाला। जब तक आप ज्ञान के पात्र यानी अपने आप के प्रति कमिटेड, ईमानदार नहीं हैं,तब तक पाक़-साफ ज्ञान की उम्मीद करिए ही मत। ईमानदार होने की शुरूआत स्वयं से करनी होती तब ही आपका शुभ्र संसार निर्मित होना शुरू होता है। फिर तो एक ऑटो प्रोसेस के तहत आपका आसवन यानी शुद्धता, क्रिस्टलीकरण, ऊर्जा ग्राह्ता का गुण, निर्विकार शून्यता कि पात्र आगत ऊर्जा के लिए सदा रिक्त मिले वगैरह मानदंड पूरे होते चलते हैं। सच्चा ज्ञान एक स्वत: संचालित प्रणाली है जिसमें आपको तभी शामिल होने की पात्रता होती है जब आप सिस्टम के प्रति समर्पण भाव के साथ हर स्टेज पर ईमानदार भावज के साथ बने रहें, डटे रहें।

सच्चा ज्ञान प्रकाश है और नीरव एकांत के बीहड़ में,अंधेरे में प्रकाश का स्पार्क खुरदुरे चकमक पत्थर की रगड़ से पैदा होता है। यहां खुरदुरेपन को दु:ख, असीम दुःख समझें। तापीय घर्षण के लिए विपरीत परिस्थितियां और डीप डाउन स्टेट मानक आवश्यकताएं हैं। इनके आने पर जो पीछे हट गया वह अनुभव से चूक गया, अनुभव ही ज्ञान है। वह स्पार्क एक क्षण में सारे अज्ञान की घांस-फूस को भस्म कर देता है और उस खाली हुई जगह को भर देता है ज्ञान की नई बयार के साथ अंतर्मन को ताजगी से भर देता है। प्रकाश के जन्म के लिए नाभिकीय ऊर्जा की भट्टी चाहिए, उस भट्टी के अंधेरे में खौलती हुई आग चाहिए और फिर वह चाहिए जिसे प्रकाश बनना है, दूर का राही होना है। ऐसी तपती भट्टी आपको निरावेशित, निर्भार, अनंत गति का कण बना देती है।
जीवन सूत्र की बात यह है कि विपरीत और कुछ भी नहीं बस दूसरा एक पूरक आधार है। एक लहर दूसरी लहर का अंतरंग हिस्सा है,भाग है, दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे से है, दोनों के समय और विपरीत भाग मिल जाने से शून्य ऊर्जा बिन्दु पर कण आ टिकता है, सर्फिंग करते हुए-सा। इन दोनों पक्षों के गणित को समझेंगे तो जान जाएंगे कि जो सुख को खोजते हैं उन्हें सिर्फ दुख ही मिलता है और जो दुख को खोजते हैं उन्हें सुख ही सुख मिलता है। बाह्य संसार में पूरकता का, विपरीतता का जो संघर्ष और तत्पश्चात सामंजस्य स्थापित हुआ दीखता है वह दरअसल, कॉस्मिक ऑर्केस्ट्रा है जिसे समझने पर यह बोध होता है कि दो पूरक अंडों का मिला-जुला नृत्य ही इनफिनिटी है, कालचक्र है। समझ के इस बिन्दु पर आकर जो वहां है वह ब्रह्म के अंडाकार आसन के शिखर बिन्दु पर है।
यह भी भूलने वाली बात नहीं है कि ज्ञान भी ज्ञानियों का पीछा करता है और यात्रा के दरम्यान उन्हें संरक्षण भी देता चलता है। जैसे वह गीत है न कि प्रीत दीवानी की कहानी भी अजीब है…। ठीक वैसे ही चैतन्य धारा की खूबी यह है कि वह आपको यात्रारत भी बनाए रखती है और आपको अपनी प्रकाश रेखा पर जोड़ते हुए आपके साथ आपकी नजरों में सतत समाई रहती है, चलायमान इलेक्ट्रिक ट्रैन के इंजिन के ऊपर ओव्हरहेड पेन्ट लीवर या पेन्टोग्राफ की तरह का यानी इंजिन का ऊर्जा से सतत जुड़ाव।
समझ की एक बात यह भी हम सब समझें कि सारे रहस्यों का रहस्य यह कि कहीं कोई रहस्य नहीं है। यह भी कि उच्चतर आयाम में असत्य का अस्तित्व नहीं है। ह्रदय से उपजे दृश्यमान सौन्दर्य का पूरक अदृश्य इन्टेलिजेंस है,बोध है ज्ञान, और यह समझ लेना ही सच्चा ज्ञान है।
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