
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
ख़्वाहिशों के जंगल और राह के मुसाफ़िर
कोई मिलता है तो अब अपना पता पूछता हूँ,
मैं तिरी खोज में तुझ से भी परे जा निकला।
तकरीबन पांच दशकों के समृद्ध लेखन के दौरान नअतों, ग़ज़लों की महत्वपूर्ण विरासत देने वाले शाइर, गीतकार और उर्दू के विद्वान मुज़फ़्फ़र वारसी का यह शेर बहुत सलीके से गहरी बात करता है। शेर के लफ़्ज़ी मआनी पर ग़ौर किया जाए तो यह कह रहा है कि मैं ऐसी जगह पहुंच चुका हूं जहां मुझे अपना पता भी नहीं मिल रहा है। मैं अपना पता दूसरों से पूछता हूं। दिखने में बहुत साधारण सा यह शेर अपने पीछे एक लंबी दास्तां कहता है।
अगर इन दो मिसरों के बीच मौजूद एक लंबे सफर को महसूस किया जाए तो शाइर यहां कहना चाहता है कि आदमी की ज़िन्दगी में ऐसे लम्हे बहुत कम ही आते हैं जब वह अपनी तयशुदा राह पर चल पाता है। ज़िन्दगी की ख़्वाहिशें उसे बहुत भटकती हैं। वह चाह कर भी उस तरफ़ ध्यान नहीं दे पाता जिस ओर उसे ध्यान देना चाहिए। कोई-कोई ऐसा शख़्स होता है जो अपनी मंज़िल की तरफ़ अग्रसर होता है। कई बार ऐसा होता है कि मंज़िल को पाने की चाह में इंसान इस क़दर मशगूल हो जाता है कि उसे पता ही नहीं चलता कि वह कहां आ पहुंचा है। वह किसी मक़ाम पर पहुंचकर भी यह कहने की स्थिति में नहीं होता कि वह कहां है। ख़्वाहिशों और इच्छाओं का जंगल भी एक ऐसा ही जंगल होता है जो इंसान को बहुत भटकाता है। बहुत उलझाता है और ऐसे मक़ाम तक ले आता है, जहां उसे ख़ुद की ख़बर नहीं होती। वहां पहुंचकर उसे ख़ुद पता नहीं होता कि वह कहां पहुंचना चाहता था और कहां पहुंच गया है।
कहने को वह बहुत सफल होता है। उसके पास ज़िन्दगी की तमाम सुविधाएं होती हैं। उसकी ख़्वाहिशें अपने सामने नज़र आती हैं लेकिन फिर भी उसके पास सुकून नहीं होता। जिन अपनों के लिए वह यह सब समेटने की कोशिश करता है, वे अपने भी उससे दूर जा चुके होते हैं। सुकून के दो पलों के लिए वह अपनी पूरी ज़िन्दगी को तबाह कर देता है। वे उसके हाथ में नहीं आते। ऐसे में वह एक मक़ाम पर पहुंचकर अपने आप से यह सवाल करता है कि उसे कहां जाना था और वह कहां आ चुका है। जिस जगह वह पहुंच चुका है उसे कुछ समझ नहीं आ रहा है। वह कैसे ऐसी जगह पहुंच गया जहां उसे खुद का पता पूछना पड़ रहा है। इस दृष्टि से यह शेर ज़िन्दगी की ख़्वाहिशों, इंसान की इच्छाओं और बहुत कुछ समेटने की चाहत को रेखांकित कर रहा है।
किसी राह पर चलने से पहले हर राहगीर यह तय करता है कि उसे कहां पहुंचना है। उसकी निगाहों में उसकी मंज़िल होती है। वह अपने सफ़र के हर पड़ाव को तय करने के बाद मंज़िल की ओर देखता है। वह यह तय करने की कोशिश करता है कि मंज़िल अभी कितनी दूर है। यहां शाइर एक नए अर्थ को उद्घाटित करता है। वह कहना चाहता है कि मंज़िल की चाह में आगे बढ़ाने वाले राही को ऐसा होना चाहिए कि उसे न तो ख़ुद की ख़बर हो न ही मंज़िल की। जब किसी मंज़िल की ख़्वाहिश लेकर इंसान आगे बढ़ता है तो उसकी निगाह में सिर्फ़ वह मंज़िल ही होती है। वह रास्ते की खूबियों से अनजान ही रह जाता है। वह रास्ते की मुश्किलों, रास्ते की सहूलियतों, रास्ते में मिले भले लोगों , रास्ते में मिले सुखों की तरफ़ ध्यान ही नहीं दे पाता है। शाइर कहना चाहता है कि एक राहगीर को इस तरह होना चाहिए कि वह अपनी मंज़िल से अनजान हो। वह राह में मिलने वाले हर अच्छे-बुरे इंसान, हर सुख-दुख के साथ इतना घुल मिल जाए कि उसे यह भान ही न हो कि वह कहां जा पहुंचा है।जब उसे यह ख़्याल आए कि वह कहां पहुंच चुका है, तब वह सही अर्थों में समृद्धि की मंज़िल की तक पहुंच चुका होगा। जीवन भी इसी तरह होना चाहिए कि इंसान को अपने जीवन में आने वाले हर अच्छे-बुरे इंसान, हर सुख-दुख, हर अच्छाई-बुराई से दो-चार होते हुए आगे बढ़ना चाहिए। जब ज़िन्दगी का आखिरी पड़ाव हो तब उसे यह आंकलन करना चाहिए कि वह कहां आ पहुंचा है। यहां आ कर उसे ख़ुद की भी ख़बर नहीं है। क्या वह अपनी ज़िन्दगी के इस पूरे सफर को तय करने में कामयाब रहा है। यह आंकलन ही उसे उसकी ज़िन्दगी के फलसफे की तरफ ले जाएगा।
यह शेर तसव्वुफ़ का भी एक अलहदा रंग पेश करता है। आशिक अपने माशूक की चाह में इतना तल्लीन है कि उसे यह ख़बर ही नहीं कि वह कहां जा रहा है। यह उसकी दीवानगी है कि वह अपने आसपास की हर चीज़ को भूल चुका है। उसके मन में सिर्फ़ अपने माशूक से मिलने की चाह है। वह उसके क़रीब जाना चाहता है। वह उसे देखना चाहता है। वह उसे महसूस करना चाहता है। इन्हीं ख़्यालों में वह निरंतर आगे बढ़ता जाता है और किसी दिन जब वह होश में आता है तो उसे महसूस होता है कि वह जिसे खोजने के लिए निकला था, वह तो आज भी उसके क़रीब नहीं है!
यहां आकर वह अपने माशूक का पता पूछता है। वह ख़ुद का पता पूछता है। वह उस जगह का पता पूछता है, जहां वह पहुंच चुका है लेकिन उसे कोई बताने के लिए तैयार नहीं होता। वह जिसकी खोज में निकला था वह पता नहीं कहां रह गया। शाइर यहां कहना चाहता है कि सही अर्थों में जो अपने माशूक की चाह में आगे बढ़ते हैं, उसे खोजने के लिए दिन-रात भटकते हैं, उन्हें अपनी ख़बर भी नहीं होती। एक आशिक को अपने माशूक से मिलने के लिए इतना तल्लीन होना ज़रूरी है। बंदा जब ख़ुदा की राह पर आगे बढ़ता है तो उसे दुनियावी ख़्वाहिशातों से असंपृक्त होना चाहिए। उसे यह भी पता नहीं होना चाहिए की कब वह अपने माशूक के क़रीब से होकर गुज़र गया। बरसों- बरस गुफाओं में बैठकर तप, आराधना करने वाले, हिमालय की वादियो में जा कर साधना करने वाले , ध्यान योगियों के साथ अगर ख़्वाहिशें नहीं होती हैं तो वे भी अपनी इस मंज़िल पर पहुंचकर इस स्थिति में आ जाते हैं कि उन्हें ख़ुद का भान नहीं होता। ऐसे सच्चे आशिक सही अर्थों में अपने माशूक से भी आगे के प्रतीत होते हैं। वे उसे मक़ाम को पा चुके होते हैं जहां पहुंचना हर किसी के बस में नहीं होता। उस जगह का पता किसी को मालूम नहीं होता। या तो आशिक जानता है या फिर माशूक। इन अर्थों में यह शेर बहुत गहरा बहुत समृद्ध और ज़िन्दगी के महत्वपूर्ण पक्ष को परिभाषित करता है।
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