
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
उदास धूप की सोहबत और रात की परख
अंधेरी रात के गुमराह जुगनुओं के लिए,
उदास धूप की टहनी पे रात रख देना।
शाइरी के ज़रिए ज़िन्दगी के सुलगते मसअलों को आवाज़ देने वाले शाइर राहत इंदौरी का यह शेर अबूझ पहेली की तरह है। इसे मानीखेज़ कहें या बेमानी, यह शाइरी के जानकारों के बीच भी चर्चा के केन्द्र में रहा। इसमें कहीं लफ़्ज़ों का उलटफेर चकित करता है तो कहीं सोचने पर मजबूर करता है। लफ़्ज़ों पर ग़ौर करें तो पहला मिसरा जिस सादगी से अपने अर्थ खोलता है, दूसरा मिसरा उतनी ही ज्यादा उलझनें पैदा करता है। इसके भीतर जाएं तो कई ज़ाविए नज़र आते हैं।
इस शेर का वैज्ञानिक पक्ष बहुत प्रबल है। शाइर ने किस मुकाम से यह शेर कहा है इसकी व्याख्या तो स्वयं शाइर ही कर सकता है, मगर इस शेर में जिस तरह वैज्ञानिक पक्ष उभरकर सामने आ रहा है, वह अद्भुत है। शेर का उला मिसरा बहुत सीधे-सीधे अपनी बात कह रहा है, वहीं सानी मिसरा उतना ही उलझा रहा है। दूसरे मिसरे में डायलेक्टिक्स का अंतर और मेटाफर का प्रयोग भी प्रभावित करता है। अब इसे विज्ञान की दृष्टि से समझें। पहली बात तो यह कि धूप ऊर्जा की प्रतीक होती है, उदासी की नहीं। धूप का खिलना जीवन में एक नई उम्मीद के उभरने के समान है। शाइर यहां ‘उदास धूप’ का प्रयोग कर रहा है, इसका सीधा सा अर्थ है कि धूप जिन तत्वों से मिलकर ऊर्जावान होती है, वे तत्व ही उसे उदास बनाने पर तुले हुए हैं। फिर इस मिसरे के आख़िर में धूप की शाखों पे रात रखने की बात हुई है। इसका आशय कोई यह लगाए कि उजाले के बजाए अंधेरा कायम किया जाए तो अनुपयुक्त होगा। एक शाइर इस तरह की बात कभी नहीं कर सकता है।
कोई भी रचनाकार खिली हुई धूप पर काली रात रखने की बात नहीं करेगा लेकिन शेर में शाइर अगर कह रहा है तो उसके पीछे आशय यह कि रात के उजले पक्ष को जिन से उम्मीद थी, वे सब निराश कर रहे हैं। ऐसे में रात की रोशनी को अगर बढ़ाना है तो उसे धूप की शाख पर रखना ज़रूरी है। रात वहीं से रोशन और ऊर्जावान होगी। इस वैज्ञानिकता का एक उदाहरण यहां से भी समझ आता है कि जिस तरह किसी पौधे को सूरज की रोशनी से दूर कर दिया जाए तो वह मुरझा जाता है, लेकिन जब उसे दिन की रोशनी पर्याप्त मिल जाती है तो वह रात में भी ऊर्जावान बना रहता है। एक ऐसा पौधा जिसे रात ने उदास कर दिया हो, उसे सूरज की रोशनी में कुछ देर रखने की ज़रूरत महसूस होती है। उदास धूप की शाख़ पर रात रखना ऐसा ही है, जैसे एक मुरझाए हुए पौधे को सूरज की सोहबत में या खुले वातावरण में रख दिया जाए। वह वातावरण से ही सूरज की रोशनी ग्रहण कर लेगा। ठीक उसी प्रकार इस प्रकार उदास धूप की शाख पर रात को रखने से वह भी धूप की आभा ग्रहण कर लेगी। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी इस दूसरे मिसरे में बखूबी उभर कर सामने आता है।
वैज्ञानिक पक्ष से अगर जुगनू के रोशन होने की बात को समझें तो हमें पता चलता है कि जुगनू अपने शरीर में एक रासायनिक प्रक्रिया के कारण रोशनी उत्पन्न करते हैं। उनके पेट के निचले हिस्से में मौजूद लुसिफेरिन नामक रसायन जब ऑक्सीजन और लुसिफरेज एंजाइम के साथ क्रिया करता है, तब यह प्रकाश पैदा होता है। यह ‘ठंडी रोशनी’ होती है, जिसमें लगभग सौ फीसद ऊर्जा प्रकाश में बदल जाती है। विज्ञान कहता है ऊर्जा को न तो उत्पन्न किया जा सकता है, न ही नष्ट किया जा सकता है, उसे एक रूप से दूसरे रूप में बदला जा सकता है। शाइर यहां रात को रोशन करने के लिए दिन से कुछ ऊर्जा ग्रहण करने की बात कर रहा है। पहले मिसरे में बहुत स्पष्ट बात कही गई है कि अंधेरी रात के जुगनू गुमराह हो चुके हैं, अर्थात अंधेरी रात में जिन्हें रोशनी बिखरने का काम सौंपा था, वे अपने दायित्व से विमुख हो चुके हैं। यह बात ज़िम्मेदारों पर तंज़ भी करती है। यदि ज़िम्मेदार अपना काम ठीक से न करे तो वे अपनी राह से गुमराह ही कहे जाएंगे। ऐसे गुमराह लोगों के लिए शाइर यह कहना चाहता है कि इनकी गुमराही का कारण ढूंढना ज़रूरी है। जुगनू रोशनी बिखेरने से विमुख हो गए हैं, इसका अर्थ यह है कि रात की स्याही में भी कुछ कमी आई है। रात को जिस तरह गहरा होना चाहिए वह नहीं हो पाई है तभी जुगनू गुमराह हो गए हैं। इसके लिए ज़रूरी है कि रात को उसकी गहनता से जोड़ा जाए। यहां एक और वैज्ञानिक बात स्पष्ट होती है।
चंद्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता है। वह सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होता है। मान लीजिए चंद्रमा कभी अपना प्रकाश न बिखेरे तो उसका सीधा सा आशय हुआ कि उसे सूरज से जो रोशनी मिलना चाहिए, वह नहीं मिल पा रही है। यदि ऐसा आक्षेप सूरज पर लगे तो सूरज उदास होगा। ऐसे उदास सूरज के सामने पथ विमुख हो चुके चंद्रमा को लाना ज़रूरी है, ताकि वह फिर से सूरज की रोशनी प्राप्त कर अंधेरी रात में अपनी चमक किसी जुगनू की तरह बिखेर सके। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि हर इंसान समाज का ही प्रतिबिंब होता है। उससे समाज जो अपेक्षा रखता है, वह पूरी नहीं होती तो समाज का उदास होना स्वाभाविक है। किसी व्यक्ति की उदासी का असर पूरे परिवेश पर होता है। यहां पर व्यक्ति और समाज दोनों एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं और जब व्यक्ति की उदासी से पूरा समाज प्रभावित होता है तो इसका निदान भी इसी तरह होता है कि समाज फिर से उस व्यक्ति को ऊर्जावान बनाए। जो ऊर्जा उसे समाज से मिलना चाहिए वह उसे वापस दे। शाइर भी व्यक्ति और समाज के पूरक संबंध को इस शेर के ज़रिए समझाने की कोशिश कर रहा है।
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राहत इंदौरी जी के इस शे र की बेहतरीन व्याख्या आपने की है जुगनू की बात करते-करते ऊर्जा कैसे प्रकाश में परिवर्तित होती है इसको भी सिद्ध कर गए और धूप जिन तत्वों से धूप बनती है वह तत्व ही धूप न बनने देने पर आमादा हों, उदासी की तरफ ले जाएं इस बात का भी आपने जिक्र किया है वाकई में बहुत ही बेहतरीन व्याख्या बनी है मजा आ गया पढ़कर.