
- अभिषेक मिश्र
भूवैज्ञानिक और स्तंभकार
गुरु दत्त: तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई
सिनेमा निर्माण के विभिन्न कलात्मक पक्षों में अपने प्रयोगधर्मी प्रयासों के लिए ‘भारत के ऑर्सन वेल्स’ कहे जाने वाले महान फिल्मकार गुरु दत्त का यह जन्मशती वर्ष है। इस वर्ष उनकी स्मृति में उनके प्रशंसकों द्वारा विविध कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं जो आज भी उनके कालजयिता का प्रमाण है। उनकी फिल्मों का पुनर्प्रदर्शन, उनकी फिल्मों पर आधारित फिल्म फेस्टिवल, विविध फिल्मोत्सव में उनकी फिल्मों और उनके कार्यों पर परिचर्चाएँ, दास्तानगोई जैसी विधा में उन पर केंद्रित विशेष सत्र, संगीत प्रेमियों के दिलों में विशेष स्थान रखने वाले सारेगामा कारवां के नए संस्करण में गुरु दत्त की फिल्मों के गानों पर पृथक खंड का शामिल किया जाना आदि दुनिया भर में उनके चाहने वालों द्वारा आयोजित किए जा रहे क्रियाकलापों की एक छोटी सी झलक मात्र है। आज जो पूरी दुनिया एक फिल्मकार के रूप में उनके योगदान के विभिन्न पक्षों की विवेचना कर रही है, उनकी दूरदृष्टि से अचंभित हो उन्हें अपने समय से आगे का रचनाकार मान रही है इसे देख शायद गुरु दत्त की आत्मा उस संतुष्टि का अनुभव कर पा रही हो जो उन्हें जीते जी न मिल सकी और महज 39 वर्ष की आयु में ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है!’ के भाव के साथ उन्होंने इस दुनिया, इस जीवन को ठुकरा मृत्यु को गले लगा लिया। उनकी संक्षिप्त और अधूरी जीवन यात्रा इस अवसर पर एक अन्य विषय पर ध्यान देने की आवश्यकता को भी जताती है जो है मानसिक स्वास्थ्य। और निस्संदेह इस विषय पर चर्चा के एक प्रतीक के रूप में भी उनका अस्तित्व समय से कहीं आगे का है ।
प्रारंभिक जीवन
गुरु दत्त का जन्म 3 जुलाई 1925 को बेंगलुरु में एक चितरपुर सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता शिवशंकर राव पादुकोणे और माता वसंती पादुकोणे एक मध्यमवर्गीय मगर घर में अच्छी शैक्षणिक पृष्ठभूमि से थे। पारिवारिक पृष्ठभूमि का बच्चों के व्यक्तित्व विकास और भविष्य निर्माण पर आधारभूत प्रभाव पड़ता है। गुरु दत्त भी इस तथ्य की एक मिसाल हैं। उनके पिता प्रारंभ में एक स्कूल में प्रधानाध्यापक रहे। वह एक साहित्यप्रेमी व्यक्ति थे, अंग्रेज़ी भाषा पर अच्छी पकड़ रखते हुए वे इसमें कविताएँ भी लिखते थे। उनकी एक अव्यक्त इच्छा पत्रिकाओं में लेखन और उनका संपादन करने की भी थी जो उनके पारिवारिक दायित्वों को पूरा करने के दबाव में अधूरी ही रह गई। उनका व्यक्तित्व कम बोलने, अलग-थलग रहने और अपने सपनों में खोए रहने वाले अंतर्मुखी व्यक्ति सदृश्य था। उनकी माँ निजी ट्यूशन देने के अलावा लघुकथाएं लिखा करती थीं और बांग्ला उपन्यासों का कन्नड भाषा में अनुवाद भी करती थीं।
इस प्रकार अपने माता-पिता के व्यक्तित्व और गुणों की छाप हम गुरु दत्त के व्यक्तित्व में भी देखते हैं। जीवन में रचनात्मकता की कमी से असंतुष्ट उनके पिता लगातार नौकरियां बदलते अंततः कोलकाता पहुँचे, जहाँ उनके परिवार को आर्थिक स्थिरता मिली तो गुरु दत्त को एक सांस्कृतिक परिवेश जिसने उन्हें वास्तव में वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोणे से हर दिल अज़ीज़ गुरु दत्त बनाया।
जीवन में कला का प्रवेश
गुरु दत्त की फिल्मों की सिनेमेटोग्राफी में प्रकाश और छाया को लेकर कई प्रयोग दिखते हैं। इस संयोजन के बीज भी उनके बचपन में ही पड़ गए थे। उनकी दादी शाम की आरती के लिए दीया जलाया करती थीं, जिसकी रोशनी में वो उँगलियों की विभिन्न मुद्राओं से छाया आकृतियाँ बनाया करते थे। उनकी यह बाल सुलभ चंचलता भविष्य में उनकी फिल्मों के कई कलात्मक दृश्यों का आधार बनी।
दीये के इस खेल ने उनके जीवन को किसी और रूप में भी प्रभावित किया। एक दीया खुद को जला कर ही रोशनी बिखेरता है। गुरु दत्त के सिनेमा से जो रोशनी बिखरी उसके पीछे उनका खुद का जलना लोगों को दिखाई नहीं दिया। बंगाल में स्थानीय रंगमंच के एक रूप जात्रा ने भी उन्हें काफ़ी आकर्षित किया। इसने उनमें कहानियों के प्रति आकर्षण और इन्हें प्रस्तुत करने की कला के बीज बोए। सड़कों पर एकतारा बजा भक्ति गीत गाते गुज़रने वाले बाउल गायकों के मीठे गीतों ने उनमें संगीत के प्रति अभिरूचि विकसित की, जिसका उन्नत रूप उनकी फिल्मों के हृदयस्पर्शी गीतों उनमें भी बांग्ला पृष्ठभूमि के गीतोंमें दिखता है। उदाहरण के लिए ‘आज सजन मोहे अंग लगा लो…’ (प्यासा)।
यहीं से उनके जीवन में नृत्य का जुड़ाव भी हुआ। सुप्रसिद्ध नर्तक उदयशंकर के अल्मोड़ा स्थित इंडियन कल्चर सेंटरमें 75 रुपये की वार्षिक छात्रवृति पर पाँच साल तक नृत्य की शिक्षा प्राप्त की। नृत्य के इसी प्रशिक्षण ने उन्हें आगे प्रभात स्टूडियो से नृत्य निर्देशक के रूप में जोड़ा। यहीं उनकी मुलाक़ात और दोस्ती दो ऐसी शख़्सियतों से हुई जो पूरी ज़िंदगी उनका साथ देने वाले थे- रहमान और देव आनंद। इस प्रकार बांग्ला परिवेश का एक रचनाकार के रूप में उनकी विकास यात्रा पर हमें गहरा प्रभाव दिखाई देता है। बंगाल से इसी जुड़ाव ने उन्हें भावनात्मक रूप से गीता दत्त से जोड़ा होगा जो आगे चल उनके सिनेमा और उनके जीवन का अविभाज्य अंग बनीं।
परदे के पीछे से आगे तक का सफ़र
अपने पिता का अंतर्मुखी व्यवहार उनके व्यक्तित्व में भी उतर आया था। उन्हें जानने वाले बताते हैं कि वह निर्देशन और कैमरे के माध्यम से अपने विचार दर्शकों तक तो प्रेषित कर देते थे मगर अपने व्यक्तिगत विचार अपने दोस्तों, परिजनों तक को संप्रेषित कर पाने में उतने सहज नहीं थे। यही कारण था कि तीन बार आत्महत्या के उनके प्रयासों से पहले की उनकी मनःस्थिति उनका कोई क़रीबी न भाँप सका। एक निर्देशक के अलावा एक अभिनेता के रूप में उनका प्रभाव आज भी उनके प्रशंसकों के दिलों पर क़ायम है। परंतु यह जानकर आश्चर्य होगा कि फिल्म ‘प्यासा’ की स्क्रिप्ट लिए वो पहले दिलीप कुमार के पास गए थे। उनके द्वारा यह भूमिका न निभा पाने के बाद उन्होंने यह भूमिका ख़ुद निभाई और अपनी अभिनय प्रतिभा की गहरी छाप छोड़ी। मगर कैमरे के सामने आने में उनकी हिचकिचाहट उनकी प्रारंभिक फिल्मों में भी दिखती है। ग़ौरतलब है कि अपनी निर्देशित शुरुआती दो फिल्मों ‘बाज़ी’ और ‘जाल’ में वो ख़ुद भी कुछ क्षणों के लिए ही सही कैमरे के सामने आए थे। अंततः अपनी कहानी के नायकों को अपनी तरह से पर्दे पर उतारने की चाह उन्हें अभिनेता के रूप में भी उतार लाई।

उनके व्यक्तित्व का आईना उनकी फिल्में
उन्होंने फिल्म निर्माण से जुड़ी एक विलक्षण टीम निर्मित की। उनकी टीम के सदस्य विभिन्न साक्षात्कारों में बताते हैं कि फिल्म के दृश्य भी उनके दिमाग़ में ही तय रहते थे। वह दर्शकों से प्रभावशाली दृश्यात्मक संवाद तो कर लेते थे लेकिन सेट पर बाक़ी सदस्यों को यह समझ पाना कठिन होता था कि वो दरअसल चाहते क्या और किस तरह से हैं। शायद उनके मन में कहीं यह भाव था कि उनके कहे बगैर ही लोग समझ लें कि उनके मन में क्या चल रहा है। सिनेमा के माध्यम से वो अपनी बात अपने लक्ष्य वर्ग तक तो पहुँचा सके परंतु निजी जीवन में उनकी यह तलाश अधूरी ही रही।
उनकी फिल्मों की कहानी का नायक कहीं-न-कहीं उनकी ही बात करता दिखाई देता है। कहते हैं ‘प्यासा’ की कहानी उन्होंने ‘कशमकश’ नाम से पहले ही लिख रखी थी। इसमें एक लेखक की रचनात्मक विवशता में उनके तथा उनके पिता के अनुभवों की झलक दिखती है। ‘काग़ज़ के फूल’ के लिए तो कहा जाता है कि प्रसिद्ध संगीतकार सचिन देव बर्मन द्वारा इसे उनकी व्यक्तिगत कहानी बता फिल्म न बनाने के सुझाव पर गुरु दत्त नाराज़ हो गए थे। ‘काग़ज़ के फूल’ उनकी एक महत्वाकांक्षी फिल्म थी जिसकी असफलता ने उन्हें तोड़ दिया था। वह दर्शकों से संवाद की अपनी क्षमता पर आत्मविश्वास खो बैठे थे।
फिल्मों के साथ जीवन का भी क्लाइमेक्स
उन्होंने ‘चौदहवीं का चाँद’ की सफलता देखी मगर इसमें वो निर्माता और अभिनेता के रूप में ही सामने आए। ‘साहब, बीवी और ग़ुलाम’ में भी उन्होंने यही भूमिका चुनी। इसके बाद ‘बहारें फिर भी आएंगी’ उनके द्वारा अभिनीत और निर्मित की जा रही अंतिम ही फिल्म रही जिसे बाद में धर्मेन्द्र को लेकर पूरा किया गया। इसी फिल्म से उनका यह संवाद फिल्म इंडस्ट्री से भी उनके आख़िरी संवाद के रूप में देखा जाता है जिसमें वो संपादक की मेज़ पर इस्तीफ़ा देते हुए कहते हैं- “आप इस्तीफ़ा मंजूर करें या न करें, यह रहा मेरा इस्तीफ़ा। मैं जा रहा हूँ…”
मानसिक तनाव से अकेली जद्दोज़हद
व्यक्तिगत और रचनात्मक दोनों जीवन में वो काफ़ी कुछ अर्जित कर चुके थे,फिर भी एक खालीपन था जो उन्हें विचलित करता था। और दुःखद यह कि वह ख़ुद भी इसे पूरी तरह समझ नहीं पा रहे थे। अपनी मानसिक अवस्था का उन्हें इतना तो अंदाजा था कि वह कई बार कह उठते थे, “लगता है वो पागल हो जाएंगे।” अपने मित्रों से कई बार बैठकों में वो मरने की कोशिशों पर चर्चा किया करते थे। प्रसिद्ध सिनेमेटोग्राफर और अपने मित्र वीके मूर्ति को उन्होंने कहा था- “देखो न! मुझे डायरेक्टर बनना था, डायरेक्टर बन गया; एक्टर बनना था एक्टर बन गया; पिक्चर अच्छे बनाने थे अच्छे बने। पैसा है, सब कुछ है, पर कुछ भी नहीं रहा।”
कुछ पाने के बाद आगे क्या का प्रश्न भी उनकी कशमकश बढ़ा रहा था।
तंग आ चुके हैं, कशमकश-ए-जिंदगी से हम
ठुकरा न दे जहां को कहीं बे-हिसी से हम…
‘कागज के फूल’ निर्माण की बारीकियां विश्व सिनेमा में आज भी पढ़ाई जाती है मगर समीक्षकों ने इसकी काफ़ी आलोचना की थी। इस तरह की आलोचना ने निर्देशन पर से उनका आत्मविश्वास कम कर उन्हें अकेलेपन की चारदीवारी में धकेल दिया जिसे कोई और देख नहीं पा रहा था। इसी मनोवेदना में उन्होंने नींद की 38 गोलियां खा दूसरी बार आत्महत्या का प्रयास किया। यह कहीं ऐसा भी था कि अपनी फिल्मों के अलावा ऐसे प्रयासों से भी वो लोगों का ध्यान अपनी पीड़ा की ओर खींचने की कोशिश कर रहे हैं। मगर अपनी लड़ाई सभी को अकेले ही तो लड़नी होती है। वो भी अपनी इस लड़ाई में अकेले पड़ गए थे।
आज मानसिक स्वास्थ्य, अवसाद आदि पर खुलकर बातें होती हैं। लोग उसे स्वीकारते हुए उसका समाधान ढूंढते हैं। मगर उस दौर में इसे समझना और स्वीकारना भी एक चुनौती थी। उनके परिवार ने एक मनोचिकित्सक को काउंसिलिंग के लिए एक बार बुलाया भी। मगर एक मनोचिकित्सक सिर्फ बातचीत करने के लिए महंगी फीस ले, यह इलाज किसी को समझ नहीं आया और उसे फिर नहीं बुलाया गया। इस प्रकार गुरु दत्त एक बार फिर अपने मानसिक तनाव और एकाकीपन से जूझने को अकेले रह गए। और फिर आई 10 अक्टूबर 1964 की सुबह जब ज़माने ने उन्हें अपने आसपास रचे इस मनोवैज्ञानिक क़ैद से आज़ाद होते देखा। उनके चाहने वाले आज भी इसे दुर्घटना या आत्महत्या में अंतर नहीं कर सके हैं मगर जो तय था वो यह कि गुरु दत्त एक बार फिर नींद की गोलियों के साथ इस बार कभी न टूटने वाली नींद में हमेशा के लिए खो अपने प्रशंसकों से शारीरिक रूप से दूर हो चुके थे। उनका शरीर निष्प्राण था मगर ऐसा प्रतीत होता था मानो अपने जीवन का आख़िरी शॉट उन्होंने बड़े मनोयोगपूर्वक रचा हो! कुर्ता पायजामा पहने, पीठ के बल अधलेटे, बंद आँखें, शांत चेहरा, पास में अधूरी किताब, दाहिने हाथ की तर्जनी ठोड़ी पर लगाए जैसे किसी गहरी विचार मुद्रा में लीन हों।
एक असंतुष्ट, अतृप्त मन लिए गुरु दत्त इस दुनिया से जा चुके थे शायद वहाँ जहाँ उनके द्वारा तलाश की जा रही शांति उन्हें मिल सकी हो। अपने पीछे वो एक ऐसी विरासत छोड़ गए जो उनके चाहने वालों को आज भी उन से जोड़े हुए है। मात्र 39 साल की आयु वाकई जिसमें जीवन नए मोड़ ले रहा होता है- यह समय निकल गया होता तो हिंदुस्तानी सिनेमा उनके योगदान से और भी समृद्ध हुआ होता। परंतु इतने महान और प्रतिभावान कलाकार का असमय अंत यदि हँसते-मुस्कुराते सफल नज़र आते चेहरों के पीछे छुपी पीड़ाओं के प्रति संवेदनापूर्ण दृष्टिकोण विकसित कर पाए तो यह भी उनके द्वारा अनुभव की जा रही पीड़ा के प्रति एक सहानुभूतिपूर्ण श्रद्धांजलि ही होगी।

अंत में सुप्रसिद्ध शायर कैफ़ी आज़मी साहब के शब्दों में इस महान रचनाकार को श्रद्धांजलि जो उनके चाहने वालों की उनके प्रति भावनाओं को भी सटीक अभिव्यक्ति देती है-
रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई
तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई।
डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर
राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई।
इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी
यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई ।
माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे
बे-रात ढले शम्अ बुझाता नहीं कोई।
साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा
अब ज़हर से भी प्यास बुझाता नहीं कोई।
हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना
क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई।
अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के
नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई।
स्रोत: 1. बिछड़े सभी बारी-बारी; बिमल मित्र, 2. गुरु दत्त – एक अधूरी दास्तान; यासिर उस्मान, 3. विभिन्न लेख व साक्षात्कार
लेखक परिचय: भूवैज्ञानिक और विज्ञान लेखक। साहित्य, कला-संस्कृति, विरासत, फ़िल्म आदि में भी रुचि। आम जनता में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने हेतु विज्ञान लेखन और अनुवाद आदि में भी संलग्न। ‘विज्ञान प्रगति’, ‘अहा ! जिंदगी’, ‘विज्ञान कथा’, ‘इलेक्ट्रोनिकी आपके लिए’ आदि कई पत्र – पत्रिकाओं, ब्लौग्स आदि में साइंस फिक्शन तथा लेख आदि प्रकाशित। ‘पूरी दुनिया’ मासिक पत्रिका के लिए विज्ञान कौलम लेखन।मुख्य रूप से हिंदी विज्ञान लेख, विज्ञान कथाएं और हमारी विरासत के बारे में लेखन।

