
- विवेक मिश्र
लेखक हिंदी के प्रोफेसर हैं।
फुर्सत कहां से लाऊं? बस सोचता रहता हूं कि कहीं फुर्सत मिले तो संभाल कर रख लूं। फुर्सत मिल जाए तो बड़ा काम हो जाएं। एक समय के बाद आदमी को कुछ और नहीं फुर्सत की जरूरत होती है और फुर्सत है कि किसी माल में नहीं मिलती कि जा कर खरीद लाएं। बड़े से बड़े शोरूम में चले जाइए, सबकुछ मिल जाएगा पर फुर्सत नहीं मिलेगी। फुर्सत में बैठा कोई आदमी दिखता ही नहीं। यदि कहीं कोई फुर्सत में बैठा मिल जाए तो उसका पता दीजिएगा। फुर्सत के साथ बैठा आदमी इस समय का सबसे बढ़िया पोस्टर हो सकता है। चलिए खोजते हैं कि कोई फुर्सत वाला आदमी मिल जाए।
दुनिया इन दिनों भाग रही है और बहुत तेजी से भाग रही है। कई बार तो ऐसा लगता है कि पृथ्वी की घूर्णन गति से भी तेज दुनिया भाग रही है और हम सभी इसी के साथ बिना सोचे समझे बस भाग रहे हैं। कोई भी सुनने वाला नहीं है। किसी के पास फुर्सत नहीं है। सब अति व्यस्त दिख रहे हैं, सब भाग रहे हैं, इधर से उधर जा रहे हैं पर किसी के पास फुर्सत नहीं है।
बाजार हर तरह के उत्पाद को बेचने के लिए सजा हुआ है पर इस बाजार में भी कुछ मिलने वाला नहीं है। फुर्सत के साथ बैठकर बारिश की धुन को सुनने या किसी नदी की लहरों को महसूस करने का धैर्य भी गायब होता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि सब कुछ खत्म हो गया है और हमारे पास कुछ करने को हो ही नहीं, बस, हमारी आदतें और प्राथमिकताएं बदल गई हैं। अब कोई किसी का इंतजार करता हुआ नहीं दिखता, सबको अपने अपने गंतव्य पर जाने की जल्दी है। किसी के साथ कुछ दूर तक चलना या किसी के साथ केवल इसलिए चाय पर बैठ जाना कि उसका समय बढ़िया गुजर जाएगा या किसी के साथ बैठकर गपशप करना; ये सब अब लगता है कि पुराने दिनों की बातें हो गई हैं, जैसे कि जमाना ही बदल गया है। जो भी हो पर अपने लिए और औरों के लिए एक फुर्सत भरा समय निकालकर रखना ही होगा अन्यथा यह दुनिया कहां जायेगी कह नहीं सकते।
आजकल फुर्सत के साथ घंटों–घंटों अखबार भी पढ़ते कोई नहीं दिखता न ही दो–चार अखबार पढ़कर कोई चर्चा करता है। पता नहीं कहां गुम हो गए हैं फुर्सत वाले लोग। कितना भी खोजें कोई फुर्सत वाला आदमी नहीं मिलता। हम बस आवाज ही लगा सकते हैं कि इस गली में कोई फुर्सत वाला आदमी है क्या…? इस पुकार का जवाब नहीं मिलता है। पूरी गली में सन्नाटा पसरा होता है। कोई कहीं भी समय पर दिखता ही नहीं और तरह तरह की घटनाएं घटती रहती हैं क्योंकि घरों में भी फुर्सत वाले लोग अब नहीं बचे हैं। जो हैं उनके पास किसी के लिए समय ही नहीं है फिर बस सुबह–सुबह खबरें पढ़कर समय को कोसते लोग पता नहीं किसे दोष देते हैं?
जब सब कुछ बेचा जा रहा है तो फुर्सत की दुकान लगाने वाले लोग भी होने ही चाहिए? पर फुर्सत को बेचा नहीं जा सकता यह तो हमारे भीतर ही इनबिल्ट होती है। कोई फेरी वाला भी आवाज़ नहीं लगाता कि…लो फुर्सत ले लो… अरे भाई फुर्सत ले लो। इत्र फुलेल सब बेचे जा रहें हैं बस फुर्सत ही नहीं मिलती। कोई भी कीमत देकर फुर्सत को खरीद नहीं सकता। यह भी हो सकता है कि इफरात फुर्सत में कोई दिख जाए पर जो दिखता है वह बस दिखता ही है। एक कदम भी आपके साथ नहीं चलेगा। यदि किसी से पूछते हैं कि फुर्सत में हैं तो उसका उत्तर नहीं में ही मिलेगा। चलिए ये भाई साहब बैठे हैं पूछकर देखते हैं कि फुर्सत में हैं क्या? मेरे साथ चलेंगे तो उत्तर यहीं मिलेगा कि मैं आपको खाली दिखता हूं क्या? या मैं फालतू आदमी हूं क्या? आपने क्या समझ लिया है और बिना बात के लड़ने आ जाएंगे। जो सबसे ज्यादा खाली बैठा होगा जिसके पास किसी तरह का काम नहीं है वह आदमी सबसे पहले व्यस्त होने का नाटक करता है, इसके लिए बड़ा हंगामा भी कर सकता है। हो सकता है कि वह आपकी शांति भंग कर दें। यह भी हो सकता है कि वह फुर्सत में बैठा हो या व्यस्त होते हुए भी बैठ गया हो यूं ही समय संसार को देखने के लिए।
सबकी यह इच्छा होती है कि आराम से बैठ कर दुनिया को देखें… अपने आसपास के लोगों को देखें संसार को समझने का जतन करें। संसार को रुई की तरह धुन कर भी कुछ लोग कमाते हैं। संसार में आना और संसार को जानना दोनों दो बातें हैं हर कोई जो संसार में आता है वह संसार को जानता हो ज़रूरी नहीं है। कुछ लोग संसार को जानने के लिए फुर्सत को लेकर बैठे होते हैं। इनके लिए संसार ज्ञान का सबसे बड़ा साधन है। इन्हें किसी स्कूल में जाने की जरूरत नहीं होती ये तो बैठे-बैठे ही दुनिया भर का ज्ञान जतन करते जाते हैं। यहां यह कह सकते हैं कि संसार में अपडेट रहने के लिए कुछ लोग लोग बैठे रहते हैं। उन्हें फुर्सत में मान लेना एक तरह से गलती हो जाती है। इस तरह के लोग दार्शनिक होते हैं, विचारक होते हैं और खुली आंखों से तो बंद आंखों से दुनिया को देखते रहते हैं। जो कोई फुर्सत से बैठा दिख रहा है शायद वह काम-धाम की खोज में बैठा हो। आप उन्हें फुरसतिया आदमी समझ लेंगे तो यह गलती आपकी ही है। केवल आपके देखें जाने भर से क्या होता है, दुनिया तो सब तरह से सबके देखें जाने से ही चलती है।
यदि यही हाल रहा और इसी तरह से चलते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब हम सब किसी पागलखाने में बैठे मिलेंगे और दुनिया को कोस रहे होंगे। कोई भी अपने आप से नहीं पूछता, सब दूसरे के बारे में जानने के लिए बेचैन रहते हैं। किसी को यह चिंता है ही नहीं कि वह क्या कर रहा है या क्या नहीं कर पा रहा है। सब बस व्यस्त होने का नाटक बढ़िया से कर रहे हैं। सयाने लोग तो बहुत पहले ही कह गए थे कि नाटक करने की जरूरत नहीं है, सब ठीक हो जाएगा। थोड़ा धैर्य रखें। धैर्य और फुर्सत बहुत मुश्किल से मिलते हैं और जिसके उपर ऊपरवाला मेहरबान होता है उसे ही फुर्सत होती है। वहीं अपनी दुनिया में कुछ कर पाता है जिसके पास फुर्सत होती है। जो अपने से बाहर निकल कर थोड़ा बाहर आता है और दुनिया को अपने हिसाब से देखते हुए दुनिया के लिए कुछ करता है। अपने जीवन को कुछ सार्थक करता है। जब फुर्सत होती है तो आदमी दुनिया को देखता है दुनिया को समझता है और दुनिया के लिए अपने कदम बढ़ाता है।

