Sunita Williams Returns: अपना भविष्य सोच समझकर चुनिए दोस्तों

– पूजा सिंह
स्वतंत्र पत्रकार
दोस्तो, आज सुबह व्हाट्सअप ग्रुप्स पर ऊपर-नीचे दो संदेशों से दिन की शुरुआत हुई।
पहला, ‘आपके शहर में नागपुर जैसे हालात बन जाएं तो आपकी क्या तैयारी है?’
दूसरा, ‘सुप्रसिद्ध अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स नौ महीने बाद वापस पृथ्वी पर लौटीं।’
मैं सोच में पड़ गई। अपने समाज और समूची मानव जाति की प्राथमिकताओं के बारे में विचार करने लगी। इतिहास कभी एक सच बयां नहीं करता। उसके हर पात्र की अपनी अलग सचाई होती है जो उस समय पर निर्भर होती है जिससे वे पात्र ताल्लुक रखते हैं।
पिछले कुछ सालों से फिल्मों के माध्यम से नया इतिहास लिखा जा रहा है। ‘कश्मीर फाइल्स’, ‘द केरला स्टोरी’, ‘बस्तर: द नक्सल स्टोरी’, ‘इमरजेंसी’ और अभी हाल ही में ‘छावा’ जैसी फिल्में इसका उदाहरण हैं। ‘छावा’ फिल्म में संभाजी महाराज पर हुए जुल्मों से जनता आक्रोशित है। औरंगज़ेब की औरंगाबाद स्थित कब्र को तोड़ने के मंसूबे बांधे जा रहे हैं। फिल्मों के डिस्क्लेमर में वर्क ऑफ फिक्शन लिखकर जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली जा रही है। जबकि जनता उसे सच मानकर दीवानी हुई जा रही है। सैकड़ों साल पहले मर चुके लोगों से बदला लेने की कसमें खा रही है।
लेख को आगे पढ़ने से पहले एक डिस्क्लेमर पढ़ लीजिए।
डिस्क्लेमर: नीचे कुछ ऐसे तथ्य पेश किए जा रहे हैं जो कुछ अरुचिपूर्ण लग सकते हैं।
दक्षिणपंथी रुझान के माने जाने वाले सुप्रसिद्ध इतिहासकार जदुनाथ सरकार अपनी किताब ‘शिवाजी एंड हिज टाइम्स’ में लिखते हैं: शिवाजी का बड़ा बेटा संभाजी उनके लिए मुश्किल बन चुका था। वह अस्थिर और विचारहीन युवक था। महिलाओं के साथ गलत व्यवहार की शिकायत मिलने के बाद शिवाजी ने उसे पन्हाला के किले में नजरबंद कर दिया था।
ध्यान रहे कि इतिहासकार जदुनाथ सरकार ने कहीं भी यह नहीं लिखा है कि औरंगज़ेब ने संभाजी से मुसलमान बनने का प्रस्ताव रखा था। गिरफ्तारी के बाद जब नशे में धुत संभाजी और उनके मंत्री कवि कलश को लगा कि अब उनका बचना मुश्किल है तो उन्होंने औरंगजे़ब को तमाम ताने मारे जिससे वह नाराज हो गया और फांसी पर लटका दिया।
इतिहासकार जदुनाथ सरकार समेत उस दौर के तमाम इतिहासकारों ने लिखा है कि संभाजी खराब चरित्र के व्यक्ति थे लेकिन उस ब्योरे में जाने का फिलहाल कोई अर्थ नहीं है। जहां तक संभाजी के साथ क्रूरता किए जाने की बात है तो उस दौर में या उससे पहले के काल में विजेता शासक पराजित के साथ क्रूरता करता ही था। यह बहुत सामान्य बात होती थी। सोच कर देखिए कि अगर संभाजी ने औरंगजे़ब को गिरफ्तार किया होता तो क्या होता?
बहरहाल, ‘छावा’ फिल्म के सिनेमाघरों में आने के बाद जिस तेजी से इस मुद्दे का राजनीतिकरण हुआ और जिस ढंग से औरंगजे़ब को याद किया जा रहा है वैसा तो शायद बीती दो-तीन सदियों में नहीं हुआ होगा।
अब आते हैं दूसरी खबर पर। कथित ऐतिहासिक गलतियों के सुधार के हो हल्ले के बीच ताजा हवा के झोंके की तरह एक और खबर आती है। मैं तुरंत यूट्यूब पर वीडियो देखती हूं। सुनीता विलियम्स और उनके साथी अंतरिक्ष यात्री के पृथ्वी पर वापस आने का महान दृश्य मेरी आंखों के सामने है। चार पैराशूट के सहारे एक कैप्सूल सागर में उतरता है और तमाम डॉलफिन मछलियां उसे घेर लेती हैं। सुनीता बाहर आती हैं। एक अलग ही आभा है उस चेहरे में। यह सोचकर भी सिहरन होती है कि महज आठ दिन के लिए अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र पर गई सुनीता विलियम्स को वहां नौ महीने से अधिक समय बिताना पड़ा।
अपनी पृथ्वी, अपने मुल्क, अपने परिवार से इतनी दूर इतने समय तक रहना जैसे कल्पना से परे कोई बात। कितने साहस, कितने धैर्य की जरूरत पड़ी होगी। वापसी का सफर आसान नहीं था। तमाम खबरें आ रही थीं कि कैसे 26,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उन्हें ला रहा कैप्सूल वायुमंडल में प्रवेश करेगा और कैसे एक चूक भी एक क्षण में इन अंतरिक्ष यात्रियों को भाप में तब्दील कर देगी। लेकिन चमत्कारों से भरी इस दुनिया में विज्ञान ने अपना काम किया। इस वापसी ने बताया कि अगर एक-एक गणना सही हो और सभी कदम सही तरीके से उठाए जाएं तो विज्ञान हर मुश्किल को आसान बना देता है।
सुनीता विलियम्स वापस पृथ्वी पर लौट आई हैं। वह भारतवंशी हैं। भारत के प्रधानमंत्री ने उन्हें पत्र लिखकर उनकी वापसी का स्वागत किया है और उन्हें भारत आमंत्रित किया है। सुनीता विलियम्स एक असाधारण प्रतिभा हैं। उनकी वापसी विज्ञान का एक ऐसा चमत्कार है जिसकी गंभीरता शायद कुछ समय के बाद समझ में आएगी। असंभव को संभव में बदल देने वाली यह घटना, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की एक ऐसी कामयाबी है जिसकी मिसालें दी जाएंगी।
परंतु इसके बरअक्स देखें तो हमारे देश का युवा कुछ अलग ही कामों में लगा हुआ है। ऐसे समय में जब विज्ञान और प्रौद्योगिकी अपने अब तक के सबसे प्रखरतम स्वरूप में हमारे सामने हैं, जब संभावनाओं के असीमित अवसर उपलब्ध हैं तब हमारे देश के युवाओं के सामने क्या विकल्प हैं और उनके क्या चयन हैं?
शिक्षा के निजीकरण ने उनके सामने उच्च शिक्षा के विकल्पों को सीमित कर दिया है। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों में फीस में इजाफा ने उन्हें आम लोगों की पहुंच से बाहर कर दिया है। चिकित्सा शिक्षा भी हद से ज्यादा महंगी हो चुकी है। इस बीच उत्तर भारत के बड़े हिस्से में नए सिरे से बाबाओं की धूम है। उन्हें मिल रही कामयाबी और शासन प्रशासन का सहयोग युवाओं को भ्रमित कर रहा है। कई प्रतिभाशाली युवाओं ने बहुत अफसोस के साथ निजी बातचीत में कहा कि जब इन बाबाओं की ही हाजिरी बजानी है तो प्रशासनिक सेवा में क्यों जाएं सीधे बाबा ही बन जाते हैं।
इससे बचे युवाओं का समय व्हाट्सअप ऐप पर प्रसारित झूठ का पाठ पढ़ने और उसका प्रसार करने में जा रहा है। अगर किसी चीज की सबसे कम कद्र है तो वह है सत्य। युवा साथियों से आग्रह है कि अपने नेताओं से ठोस सवाल करें। नौकरी को लेकर, बेरोजगारी को लेकर, आय को लेकर, चिकित्सा को लेकर, शिक्षा को लेकर, अपने भविष्य को लेकर। नेताओं के फैलाए जाल में फंसकर वे अपना ही समय खराब कर रहे हैं क्योंकि आपके नेताओं के बच्चे न तो किसी मस्जिद के सामने नाच रहे हैं और न ही किसी कब्र को तोड़ने में लगे हैं। वह देश-विदेश के किसी उच्च शिक्षण संस्थान में अपनी पढ़ाई पूरी कर रह होंगे।
Very nice and appreciate. True picture of the contemporary India covering multiple faces of the politics.
बहुत खूब आपने सही कहा सेकड़ो साल पहले जो मर गए उनको आज याद किया जा रहा है और जो भविष्य उसको लोगो को कोई चिंता नहीं है, फिलकर झूठ परोस रहा है और लोग फिल्मो को सच समझ रहे है और नेता उसका फायदा उठा रहे है मुझे फ़िक्र है उन नौजवान बच्चो कि जिनके हाथ मे उनका भविष्य है!