Life in Bhopal: फोटाग्राफर गिरीश शर्मा की नजर से देखा गया एक अद्भुत नजारा

पंकज शुक्ला, पत्रकार-स्तंभकार
सभी फोटो: गिरीश शर्मा
काटा है… काटा है… का शोर और आसमान से धरती की तरफ लहराती आती पतंग को लूट लेने के लिए बेतहाशा भागते हैं। छत से छत पर छलांगें मारते बच्चे, आकाश की ओर से आती पतंग को ताकते हुए गलियों में दौड़ लगाते बच्चे। समाने से आती गाडि़यों, राहगीरों सहित तमाम बाधाओं को अनदेखा कर पतंग को लूट लेने के लिए प्राणप्रण से भागते बच्चे। एक टोली दौड़ती है कटी पतंग को लपक लेने के लिए मगर किसी एक के हाथ आ जाती है डोर। वह झट से कब्जे में करता है पतंग और उसे पताका बना कर विजयी भाव से दौड़ पड़ता है अपने ठिकाने की ओर। वैसे ही जैसे ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीत लेने के बाद एथलिट हाथ में अपने देश का झंडा लिए मैदान पर दौड़ पड़ता है।
कुछ ऐसा दृश्य होता है वसंत के आने के ऐन पहले जब सूर्य उत्तरायण में आते हैं और मकर संक्रांति मनाई जाती है। देश के अनेक हिस्सों में नीला आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से संवर जाता है। घर की सूनी छतों पर पंछियों से ज्यादा बच्चों का डेरा होता है। और जो उम्र में बच्चे नहीं होते यानी युवा और अधेड़ भी जब छत पर पहुंचते हैं और पतंगबाजों की संगत में आते हैं तो मन से बच्चे ही हो जाते हैं। क्रिकेट मैच तो देखा ही होगा आपने? दो टक्कर की टीमों के बीच फायनल का मुकाबला हो तो मैदान के बाहर बैठा हर क्रिकेट प्रेमी एक्सपर्ट होता है। मैदान पर हो रही हर गतिविधि पर वह यूं कमेंट करता है जैसे खुद होता तो बिगड़ी बना देता। वैसे ही पतंगबाजी के दौरान पतंग उड़ा रहे व्यक्ति के अलावा साथ खड़ा हर व्यक्ति सलाहकार होता है। वह कहता ढील दे, और, और…और दे। पेंच लड़ाते, लड़ाते कैसे ढील देकर डोर को खींच लेना है जिसे यह हुनर आ गया वह सामने वाले कि पतंग काट लेता है।
ढील और खींच के खेल में अपनी ही पतंग कट भी जाती है। जैसे ही पतंग कटती है, काटा है, काटा है का शोर उठता है… आसमान पर लहराती, बल खाती, इठलाती कई पतंगों के बीच कटी हुई कोई पतंग चल पड़ती है धरती की ओर … उस पतंग की दिशा और रफ्तार को देख धरती पर छतों पर, गलियों में, सड़कों पर बच्चे दौड़ पड़ते हैं बेतहाशा, बेपरवाह, बेकाबू। झट से पतंग को अपने कब्जे में लेते हैं और फुर्ती से डोर को पंजे पर लपेटते हैं। सबकुछ इतनी जल्दी और इतने संतुलन से होता है कि समूचा दृश्य एक खास तरह की जुगलबंदी रचते संगीत की मानिंद मनमोहक हो जाता है।
यह ख्याल नहीं है बल्कि हकीकत है कि रेड सिग्नल पर खड़ी गाड़ी में बैठा एक शख्स आसमान में उड़ती पतंग को देख पल में अपने बचपन में लौट जाता है, घूम आता है उन छतों पर जहां खड़े हो कर उसने हजारों बार चीख-चीख कर बताया है, काटा है… काटा है…। वह रेड से ग्रीन होते सिग्नल के कुल जमा तीस सेकंडों में उन गलियों में भी दौड़ आता हैं जहां पतंगें कट कर आया करती थी और वह बेपरवाह भाग कर लूट लाता था पतंग। उस लूटी हुई पतंग का रंग सबसे अधिक चटकीला होता है, सबसे अधिक प्रिय होती है लूट कर लाई गई पतंग।
उड़ती पतंगें यदि अंबर का सौंदर्य है तो धरा की ओर आती कटी हुई पतंग को लूट लेने को आतुर भागते बच्चे, युवा पृथ्वी का हौसला है। आकाश उड़ती पतंगें यदि हमारे अरमानों का प्रतिबिंब है तो धरती की ओर आती पतंगों को पा लेने की जद्दोजहद हमारी कोशिशों और परिश्रम का पर्याय है। इस तरह पतंग एक दर्शन है, एक विचार, एक ख्याल कि भले पतंग उड़ा न पाओ, आसमान में उड़ती पतंग को एक भरपूर नजर देखो जरूर कि यह जाने कब तुम्हारी उम्मीदों को परवाज दे जाए। कट कर धरती की ओर आती पतंग को भी देखो एक पूरी नजर से; क्या खबर तुम्हारे पैरों को ताकत मिल जाए और वे भाग पड़े बेतहाशा उन ख्वाबों को पाने की तरफ जो वक्त के साथ पेंच लगाने की कोशिशों में गिर रहे हों कटी पतंग की तरह।
उन पतंगों का क्या जो कटती है, लहराते हुए धरती की तरफ आती जरूर है लेकिन किसी के हाथ नहीं आती। वे अटक जाती है किसी पेड़ पर, बिजली के खंबे पर तो कभी तारों की बीच तो कभी किसी ऊंची इमारत की छत पर गिर जाती है, ऐसी छत जहां कोई आता-जाता नहीं। कभी कोई पतंग किसी घर की बालकनी में आ गिरती है और इस घटना से अनजान मालिक की नजर उस पर पड़ती है तो वह इसे नेमत ले जाता है अंदर। ऐसी पतंगों के हिस्से में उड़ाने वाले हाथ नहीं आते। जब तक वह साबुत रहती है, उसे पाने के प्रयास होते हैं और जब फटने लगती है या पाने की कोशिशें कामयाब नहीं होती तो अधर में टंगी हसरत की तरह वह मुंह चिढ़ाती रहती है। पेड़, बिजली के तारों, खंबों पर अटकी पतंगे कुछ समय तक लहराती रहती है, फड़फड़ाती भी हैं और फिर समय के साथ उसके अस्थि पंजर बिखर जाते हैं। उसकी ओर ध्यान भी देना बंद कर दिया जाता है लेकिन गाहे-बगाहे उसकी तरफ निगाहें चली जाती है। इस तरह एक फटी पतंग अधूरी हसरतों का शिलालेख बन बनी रहती है हमारे आसपास।
पतंगों और उससे जुड़े जीवन की बात इसलिए कि आज एक ऐसी घटना घटी जो हमारे लिए अभूतपूर्व थी। गौर कीजिएगा यह घटना हमारे लिए अभूतपूर्व थी क्योंकि यह अब हमारे सामने घटी अन्यथा तो यह उतनी ही सामान्य है जितनी आसमान से कट कर धरती की ओर आती पतंग।
मामला कुछ यूं है कि पेशे से प्रशासनिक अधिकारी और पेशन से फोटोग्राफर गिरीश शर्मा भोपाल के जीवन को कैमरे में कैद करने निकले थे। वीआईपी रोड पर फोटोग्राफी के दौरान एक अद्भुत लम्हा कैमरे में कैद हुआ। हुआ यूं कि वीआईपी रोड पर पतंग उड़ा रहे बच्चों की निगाह आसमान से कट कर आ रही पंतग पर पड़ी। पतंग का कटना तो सामान्य है लेकिन उसे लूटने के लिए बच्चे भागे नहीं, वे जहां थे वहां खड़े रहे। बस आसमान की तरफ ताकते रहे। यह असामान्य था।

इसकी वजह थी पतंग कट कर धरती की ओर आ तो रही थी लेकिन जहां उसके गिरने की संभावना थी वहां सूखी धरती नहीं थी पानी थी। बड़े तालाब का लबालब पानी। इसके बाद जो घटा उसे अभूतपूर्व कहा गया है। गिरीश जी ने देखा कि बड़े तालाब में डोंगी (छोटी नाव) में बैठा एक बच्चा उस कट कर आती पतंग की ओर दौड़ पड़ा है। उसके पैर नहीं भाग रहे थे बल्कि चप्पू पकड़े हुए हाथ तेज-तेज चल रहे थे। कोशिश यही थी कि पानी में गिरने के पहले पतंग को कब्जे में ले लिया जाए। यह कोशिश और भी तेज हुई क्योंकि तालाब में डोंगी और भी थी और वह भी पतंग को लूटने के लिए भागी जा रही थी। पतंग बीच में और उसे पाने को दो तरफ से भागी आती डोंगियां। दिल थाम कर देखने वाला था यह नजारा कि आखिर किसके हाथ आएगी वह बल खाती पतंग।

समझा जा सकता है, यह एक अनूठा दृश्य होगा। लहराती जा रही पतंग पानी में गिरने को बेताब है और उसे थाम लेने के लिए डोंगी में सवार तेजी से चप्पू चला रहा है। तमाम कोशिशों के बाद भी पतंग उसके हिस्से नहीं आई। वह पानी को छू कर भीग गई थी। भीगी हुई पतंग के साथ उसे कब्जा लेने के अरमान भी डूब गए थे। मगर जो न डूबा वह था जीवन का सार। कोशिशों के होते रहने का संदेश और पीछे छूट जाने के बाद भी मिले कुछ सबक। कुछ संदेश। एक तो यह की जो छूट रहा है, जो फिसल रहा है, वह भी एक खूबसूरत दृश्य तो देखकर जाता है। यह और बात है कि हम उस दृश्य को देख कर खिल उठते हैं या खोने के मलाल में खो जाते हैं।

फोटोग्राफर गिरीश शर्मा दृष्टा भाव से सब कैमरे में कैद कर रहे थे। उन्होंने पतंग को लूट लेने को तेज-तेज चप्पू चलाते युवा की उमंग को भी कैद किया और यह भी देखा कि कैसे पतंग के डूब जाने के शोक को परे रख वह पुन: जुट गया अपने काम में। वह काम जिसके लिए वह डोंगी में सवार हो कर उतरा था बड़े तालाब में।
इस अद्भुत दृश्य पर बहुत कुछ सोचा और लिखा जा सकता है। फिलहाल तो ज़ेब ग़ौरी का लिखा याद आ रहा है:
दिल के किसी कोने में पड़े होंगे अब भी
एक खुला आकाश, पतंगें, डोर बहुत।
सच में कितना अद्भुत दृश्य रहा होगा। और वर्णन इतना जीवन्त कि सब कुछ सामने दिख रहा जैसे।
प्रिय गिरीश जी ने अद्भुत नज़ारे को अपनी आंखों और कैमरे में कैद किया। और हम सबके प्रिय पंकज जी ने जीवन के इस मर्म को शब्दों के प्रवाह में बेहद खूबसूरत अंदाज़ में उकेर दिया। हम धन्य हैं कि हम इन दोनों बेमिसाल शख्सियतों के के दोस्त हैं, साथी हैं।
शुक्रिया सर।
बहुत शुक्रिया।
अद्भुत वर्णन . याद आया बचपन , जब पतंग उड़ाना , मांझा सूतना सीखा ही था. ईश्वर से जो पहली चीज़ मांगी वह थी “हे भगवान् हवा चल जाए!”
शुक्रिया सर।
पूरी कविता लिख डाली गद्य में। सच बात है चीजों को देखने का नजरिया होना चाहिए।
शुक्रिया सर।
सर , आपके लेखन की सौम्यता साधारण को भी असाधारण बना देती है, जैसे कोई अनगढ़ पत्थर कलाकार के स्पर्श से मूर्तिमय हो उठे। आपकी अभिव्यक्ति की इस अद्भुत कला को सादर नमन, मुझे पढ़ कर बहुत आनंद आया।
शुभकामनाएं सर
बहुत शुक्रिया।