कलारंग

निगाहे-मस्त ने ठुकरा दिया ज़माने को…

इस शेर को अगर तसव्वुफ़ के रंग में रंगा हुआ समझा जाए तो यह एक नए ज़ाविए की तरफ़ ले जाता है। यहां सुबु, जाम , ख़ुम और मयखाना इश्तियारे की तरह इस्तेमाल किए गए हैं।

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जो जितने ज्‍यादा दिन ‘ठहरेगा’, उतना ज्‍यादा बिल देना पड़ेगा

श्री महाकालेश्वर के दर्शन हेतु शारीरिक एवं मानसिक मजबूती दोनों जरूरी है क्योंकि ये वही देव हैं जो अपने ही शादी में रानी मैनावती की परिक्षा लेने में भी पीछे नहीं रहे।

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मात खा रहे शिव ने कुछ ऐसा किया कि स्‍तब्‍ध रह गई पार्वती

शिव ने कोई भी ऐसा काम नहीं किया जिसका औचित्य उस काम से ही न ठहराया जा सके। आदमी की जानकारी में वह इस तरह के अकेले प्राणी हैं जिनके काम का औचित्य अपने-आप में था।

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इश्क़, इंक़लाब और फ़ैज़

फ़ैज़ जिस दौर में रच रहे थे तब दुनिया फासीवाद, नाजीवाद और पूंजीवाद की तिहरी मार झेल रही थी। इन तमाम परिदृश्यों ने उनकी पहले से सचेत सामाजिक नागरिक समझ को वंचित और मजलूम तबकों के साथ अधिक गहराई से जोड़ दिया।

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लगानी पड़ती है डुबकी उभरने से पहले…

शेर जीवन की उस हक़ीक़त को भी बयां कर रहा है जिसमें कई सारे अक़्स हमें नज़र आते हैं। आगे की ओर जाने की इच्छा से कुछ क़दम पीछे लौटना बुरा नहीं होता।

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सुधा जैसा असमंजस सीधा-साधा, अपनी किताब छापें या नहीं?

कई लोग इस दोराहे पर खड़े हैं कि अपनी किताब छापें या नहीं? असमंजस भी बड़ा है, कौन पढ़ेगा, कौन छापेगा, कैसे छपेगी किताब।

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कानपुर में एक लड़का है, उसे जरूर बुला लें…

सत्तर के दशक में नीरज को लगातार तीन बार फिल्‍म फेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। वे पहले गीतकार थे जिनके भजन को फिल्‍म फेयर अवार्ड मिला था।

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