कलारंग

जिन्‍हें सुन अभंग याद आता है, जोहार माय बाप,जोहार माय बाप

यह कहा जा सकता है कि सांगीतिक डोमेन में राग की छवि का रूपांतरण का कीमिया एक गणितीय प्रक्रिया है जो एक जटिल सिग्नल को उसके मूल आवृत्ति घटकों में विभाजित करता है।

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बिना चीख चिल्लाहट, हौले से दर्द और भावनाओं को उकेरती फिल्‍म

लियो एक बहुत सामान्य इंसान है। पिता का विराट व्यक्तित्व उसे ढँके रहा जब वह उनसे दूर जाता है तब सही गलत को निष्पक्ष देख पाता है।

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… अंत में जो बच जाता है वह आँखें भिगो देता है

एलिस को यह जानते डर लगता है लेकिन पति को बताने पर वह इसे बहुत हल्के में लेते हैं। डॉक्टर से मिलते हुए भी वह जिस उग्रता से इसके लक्षणों को नकारते हैं।

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जब कवि की उंगली तिलोत्तमा के सामने रुकी रह गई

जैसे ही दो उंगलियां उठीं, वे उठी ही रह गईं। इसके बाद क्या बोलना है, कुछ याद नहीं आया। घबराहट इतनी थी कि न तो कुछ याद आ रहा था और न ही उंगली नीचे हो रही थी।

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शरद पूर्णिमा में रास: हिय प्रेम का ताप उपजावे

वृंदावन के निधिवन में राधा-कृष्ण के महारास की गाथा सुनाई जाती है। मान्यता के अनुसार, निधिवन में रात के समय राधा और कृष्ण महारास के लिए आते है।

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जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो…

अगर अपनी मंज़िल तक पहुंचना है तो इस संजीदगी के साथ सफ़र तय किया जाए कि किसी को पता न चले और आपकी मंज़िल आपके कदमों में हो।

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पं‍. छन्‍नूलाल मिश्र: गुरु ने कहा था, भीतर-बाहर एक जैसा दिखना…

पंडित छन्नूलाल मिश्र ने जीवन के अंतिम पड़ाव तक न गुरु को विस्‍मृत किया न उनकी शिक्षाओं को। करीब 10 साल पहले कला समीक्षक-पत्रकार विनय उपाध्‍याय ने पंडित छन्‍नूलाल मिश्र से लंबी बात की थी। पुनर्पाठ में उसी साक्षात्‍कार के प्रमुख अंश:

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अंश की यात्रा: एक अनूठे कवि की सांगीतिक दस्तक

आज के समय में एक युवा कवि द्वारा अंतर्मन के गंभीर संकेतों की ये अभिव्यक्तियां चौंकाती हैं और भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करती हैं।

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‘एक था जाँस्कर’… वो भी तो कभी देख जो मंज़र में नहीं है

अजय सोडानी ने तो पूरा वृत्‍तांत इतनी खूबसूरती, इतनी तल्‍लीनता से लिखा है कि पाठक भी उनका सहयात्री बन उसी लम्‍हें में जीने लगता है। मेरे साथ भी यही हुआ। किताब पढ़ते-पढ़ते सहसा महसूस हुआ कि ‘एक था जाँस्कर’ की रचना प्रक्रिया जाननी चाहिए। इस सवाल से आरंभ हुआ एक रोचक संवाद।

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