विश्व कविता दिवस 2025: हिंदी के अत्यंत लोकप्रिय ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार की विख्यात ग़ज़ल
हम हर साल 21 मार्च को विश्व कविता दिवस मनाते हैं। यह सुनकर जरा अजीब लगता है और सहज सवाल उठता है कि क्या कविता के लिए भी कोई एक दिन का उत्सव मनाया जाना चाहिए? असल में, यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने तय किया है कि ” काव्यात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से भाषाई विविधता का समर्थन करने और लुप्तप्राय भाषाओं को सुनने के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से” कविता दिवस बनाया जाना चाहिए। जाहिर है, इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया भर में कविता के पढ़ने, लिखने, छपने और शिक्षण को बढ़ावा देना है। यह “राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कविता आंदोलनों को नई पहचान और प्रोत्साहन देना” की पहल है। इस दिन को हम अपनी पसंदीदा कविता साझा कर यादगार बनाना चाहते हैं। इस क्रम में पढ़िए हमारे स्तंभकार ख्यात फोटोग्राफर और शिक्षक बंसीलाल परमार की पसंदीदा कविता :
भोपाल की एक पहचान हिंदी के अत्यंत लोकप्रिय ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार यानी दुष्यंत कुमार त्यागी की रचनाएं सड़क से संसद तक खूब पढ़ी गईं। उन्होंने कविता, नाटक, एकांकी, उपन्यास आदि विधाओं में समान दक्षता से लिखा लेकिन ग़ज़लों ने उन्हें कालजयी लोकप्रियता प्रदान की। ‘साये में धूप’ और ‘सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं’ जैसे उनका पर्याय बन गए हैं।
दुष्यंत कुमार की रचनाओं में से अपनी पसंद की रचना प्रस्तुत करते हुए प्रख्यात फोटोग्राफर और शिक्षक बंसीलाल परमार कहते हैं,”मुझे दुष्यंत कुमार की यह ग़ज़ल बहुत प्रभावित करती है क्योंकि यह उस युग में भी सामयिक थी और आज भी सामयिक है। जिस तरह का वर्तमान माहौल और व्यवस्था है वहां इस आशा से कि ये आएंगे ठीक होगा, वो आएंगे ठीक होगा पर विश्वास करना कठिन है। हर बार हर घड़ी छलते जा रहे हम। बिना संघर्ष और चेतना के हालात बदलना नामुमकिन है। यह कविता संघर्ष करते रहने की प्रेरणा देती है। खासकर मेरे जैसे लोगों को जो जीवन के उत्तरार्ध में भी परिस्थिति के सामने झुकने तैयार नहीं और न ही शुतुरमुर्ग की तरह सिर छुपा कर बर्दाश्त करते हैं।”

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
मेरी पसंदीदा रचनाओं में एक.
कविता दिवस होना चाहिए अभी तक जितने क्वी हुए हैं उनने समाज को उत्तम संदेश दिए हैं एवं समाज को संस्कृत बनाते हुए आमोद प्रमोद के साथ हास्य कविताओं कहानियों के द्वारा मनोरंजन भी किया है।