101 साल के गीतों के राजकुमार हमारे नीरज
- टॉक थ्रू
क्या आपने ‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’ गीत सुना है? यह न सुना होगा तो ‘शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब’, ‘आज मदहोश हुआ जाए रे’, ‘लिखे जो खत तुझे’, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो’ या ‘दिल आज शायर है’ … गीत तो सुना ही होगा। अगर हां तो फिर आज का दिन इन गीतों के रचयिता गोपाल दास ‘नीरज’ को याद करने का दिन है। वे आज होते तो हम उनका 101 वां जन्मदिन मना रहे होते। ‘गीतों के राजकुमार’ की जयंती हो और उनके लिखे की बात न हो, ऐसा कैसे हो सकता है? आखिर,
‘नीरज’ से बढ़कर और धनी है कौन,
उसके हृदय में पीर है सारे जहान की।
नीरज यानी हम सबके चहेते गीतकार गोपालदास नीरज। ‘नीरज’ जिनकी यात्रा ‘गीतों के राजकुमार’ से आरंभ हो कर ‘गीत ऋषि’ कहलाने तक समृद्ध हुई। 1941 से लेकर मृत्यु के पूर्व तक लगभग 75 बरस तक काव्य पाठ करने वाले एक नीरज और उनके हजारों किस्से हैं। 1962 में आई फिल्म ‘चा चा चा’ के लिए नीरज ने गीत लिखा था :
खुशी जिसने खोजी वो धन लेके लौटा
हंसी जिसने खोजी चमन लेके लौटा
मगर प्यार को खोजने जो चला वो
न तन लेके लौटा न मन लेके लौटा।
ठीक ऐसे ही जिसकी साहित्य में रूचि थी उसने नीरज को मंच से सुना, किताबों में पढ़ा। प्रेम के राही ने नीरज की कविताओं में अभिव्यक्ति खोजी। जिसने अध्यात्म की राह पकड़ी उसने नीरज के गीतों, दोहों व हाइकू में अध्यात्म का रंग पाया। तभी तो दिनकर ने उन्हें ‘हिंदी काव्य की वीणा’ कहा तो प्रभाकर श्रोत्रिय ने उन्हें ‘जीवित किंवदन्ती’ कह कर संबोधित किया। तमाम तरह की भागदौड़, विवादों में फंसे होने के बाद भी वे स्वयं को फक्कड़, फकीर और एक ‘तपभ्रष्ट योगी’ बताते थे।
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरवाली गांव में 4 जनवरी 1925 को जन्मे गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ का आरंभिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। पिता नहीं थे तो मां ने किसी तरह लालन पालन किया फिर परिवार की जिम्मेदारी संभालते हुए नीरज संघर्ष की भट्टी में तप कर कुंदन हुए। शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की। लंबे समय तक बेकाम रहने के बाद दिल्ली गए सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहां से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डीएवी कॉलेज में क्लर्क हुए। फिर एक प्राइवेट कम्पनी में पांच वर्ष तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएं देकर 1951 में बीए और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिंदी साहित्य से एमए किया।
निराला, माखलाल चतुर्वेदी जैसे दिग्गज कवियों के युग में मंच से काव्यपाठ की शुरुआत करने वाले नीरज को कवि सम्मेलनों में अपार लोकप्रियता मिली। एक समय तो ऐसा आया जब मंच पर तीन गोपाल (गोपाल सिंह ‘नेपाली’, गोपालदास नीरज और गोपाल प्रसाद व्यास) के गीतों से गमक उठता था। मंच पर मिली प्रसिद्धि की खबर मुंबई तक पहुंची तो बॉलीवुड से बुलावा आया। वे खुशी-खुशी गए और पांच बरस में अपनी लेखनी का लोहा मनवा कर फिर गृह नगर अलीगढ़ लौट आए। यह पांच वर्ष का फिल्मों का सफर भी यादगार बना हुआ है। शुरुआत में ही फिल्मों के लिए लिखे उनके गीत ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे’, ‘प्यार का यह मुहूरत निकल जाएगा’ चर्चित हो गए। मेरा नाम जोकर, शर्मीली, प्रेम पुजारी जैसी फिल्मों के गीतों को आज भी पसंद किया जाता है।
सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिए सत्तर के दशक में उन्हें लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया। यह नामांकन 1970 में फिल्म ‘चंदा और बिजली’ के ‘भजन काल का पहिया घूमे रे भइया’,1971 में फिल्म ‘पहचान’ के गीत ‘बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं’ तथा 1972 में फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के गीत ‘ए भाई! जरा देख के चलो’ के लिए हुआ। उन्हें 1970 में ‘काल का पहिया घूमे रे भइया’ भजन के लिए फिल्म फेयर अवार्ड मिला था। हिंदी सिने जगत के वे पहले गीतकार थे जिनके भजन को फिल्म फेयर अवार्ड मिला था।
जितना लंबा मंच पर काव्यपाठ का अनुभव था उतने ही किस्से चर्चा में रहे। कुछ फैलाए गए, कुछ बातों को बढ़ा-चढ़ा कर रचा गया। अपनी पुस्तक ‘एक मस्त फकीर नीरज’ में प्रेमकुमार ने समय समय पर नीरज से हुई बातचीत को विस्तार से लिखा है। इस किताब की भूमिका में वे लिखते हैं, ‘जब तक नीरज से इस तरह इतने दिनों तक लगातार ऐसे नहीं मिला था तो पता ही नहीं था कि उन्हें कविता पढ़ते सुनना तो एक सुख है ही, पर उन्हें कहीं भी किसी भी स्थिति में, बोलते सुनना भी एक अलग तरह का और बड़ा सुख है। वे किसी भी विषय पर घंटों तक बोलते रह सकते हैं। मौलिक, नई व्याख्याओं, जानकारियों, सूचनाओं के साथ। विषय चाहे प्रेम, विवाह, सुख-दुख, रोग-शोक, जन्म-मरण या युद्ध और शांति से जुड़ा हो या फिर आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, राष्ट्रीय, अन्तरराष्ट्रीय किसी समस्या या घटना से संबंधित हो, वे जब उस पर बोलेंगे तो लगेगा कि जैसे वे मंच से ही कुछ बोल पढ़ रहे हैं। अधिकांश लोग उन्हें कवि रूप में जानते हैं, पर वे कवि के अतिरिक्त भी और बहुत कुछ हैं। उनकी प्रतिभा, स्मृति, जीवट, सक्रियता, जीवंतता, भोलापन, मस्ती, फकीरी-सब में ऐसा सम्मोहन कि जब भी आप मिलें प्रभावित बिना हुए न रहें।‘
काव्य प्रेमियों ने उन्हें दशकों तक कवि सम्मेलनों में दीवानों की तरह सुना है। मगर खुद नीरज को बरसों तक साहित्यकारों द्वारा गीतों को नजरअंदाज किए जाने का मलाल था तो स्वयं को श्रंगार का कवि कहलाने पर आपत्ति थी। वे कहते थे, श्रंगार की रचनाएं तो कम लिखी, बहुत तो अध्यात्म और दर्शन पर लिखा है। सच भी है, जब जब अध्यात्म को काव्य में कहने की बारी आई तो कई लोगों ने नीरज के लिखे को गुनगुनाया है।
प्रेमकुमार के साथ ही चर्चा में नीरज ने कवि सम्मेलन की यात्रा का जिक्र किया है। अपनी यादों को टटोलते हुए नीरज ने बताया है कि डॉ. अमरनाथ की अध्यक्षता में कानपुर में हुए कवि सम्मेलन में माखनलाल चतुर्वेदी ने भी भाग लिया था। दादा माखनलाल हमेशा छोटे लोगों को प्रोत्साहित करते रहते थे। उन्होंने हमेशा उभरते लोगों को आगे किया। इंदौर में एक कवि सम्मेलन होना था। ईश्वरचंद जैन उसकी अध्यक्षता करने के आग्रह के साथ माखनलाल चतुर्वेदी के पास खंडवा गए तो माखनलाल जी ने उनसे कहा कि कानपुर में एक लड़का है नीरज, उसे जरूर बुला लें। एक सौ इक्यावन रुपए भेंट करने की बात के साथ नीरज को इंदौर बुलाया गया। तब नीरज की पत्नी गर्भवती थी। प्रसव का समय करीब था। उनका मन डगमगा रहा था। पैसों की जरूरत समझ मन कड़ा किया और नीरज इंदौर पहुंच गए। इंदौर में पहले कवि सम्मेलन में उन्होंने कविता पढ़ी-
तैयारी करो कफन की ताज तख्त वालों
भूखी धरती अब भूख मिटाने आती है।
नीरज बताते हैं इस कविता से इंदौर में सन्नाटा छा गया। उन्हें एक सौ इक्यावन की जगह तीन सौ रुपए भेंट किए गए। फिर लगातार पचास वर्ष तक इंदौर ने नीरज को बुलाया और नीरज इस प्रेम के वशीभूत हो कर इंदौर आते रहे। वे खुद कहते थे, किसी कवि को किसी शहर में लगातार लगभग पचास वर्षो से ज्यादा बुलाया गया हो ऐसा न कोई दूसरा शहर है, न कोई दूसरा कवि।
चार दशक से भी ज्यादा समय तक मंच पर राज करने वाले नीरज जी की रचना और जीवन यात्रा भी एक कर्मयोगी की जीवन यात्रा की तरह रही है। यही कारण है कि समकालीन कवियों ने उन्हें ‘संत कवि’ कह कर संबोधित किया है। वे हमेशा मानवता की बात करते रहे। जैसे इस गीत में वे कहते हैं :
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।
जिसकी ख़ुशबू से महक जाय पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।
आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहां जाके नहाया जाए।
प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अंधेरे को उजाले में बुलाया जाए।
मेरे दु:ख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।
जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए।
तू ढूंढ़ता था जिसे जा के बृज के गोकुल में
वो श्याम तो किसी मीरा की चश्मे-तर में रहा ।
वो और ही थे जिन्हें थी ख़बर सितारों की
मेरा ये देश तो रोटी की ही ख़बर में रहा।
और कारवां गुजर गया…
नीरज जी के सब गीतों के बीच ‘कारवां गुजर गया…’ की बात ही कुछ ओर है। कवि सम्मेलनों की सफलता के बाद उन्हें फिल्मी गीत लिखने का प्रस्ताव मिला था। पहली फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ का पहला गीत था… कारवां गुजर गया। यह गीत इतना चर्चित हुआ कि नीरज जी की तमाम बेहद महत्वपूर्ण रचनाओं के बाद भी उनकी सिग्नेचर रचना साबित हुआ। फिल्म में इस गीत को मोहम्मद रफी ने स्वर दिए थे मगर नीरज जी के इस गीत को पढ़ने के खास अंदाज ने रफी के सुरीले कंठ को जैसे मात दे दी थी। नीरज जी जहां जहां जाते उनसे इसी गीत को सुनने की फरमाईश होती थी। 93 वर्ष की उम्र में भी प्रशंसक श्रोताओं का अरमान होता था कि नीरज जी बस एक पंक्ति भर गुनगुना दें। ऐसा है यह गीत और उसे सुनाने का नीरज जी का अंदाज :
स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गए सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया गुबार देखते रहे।
एक और गीत है जो नीरज जी का पर्याय बन गया है। उस गीत का दर्शन और उसे सुनाने का विरला अंदाज आज भी नीरज जी को हमारे बीच स्पंदित कर देता है :
छिप-छिप अश्रु बहाने वालों
मोती व्यर्थ बहाने वालों
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।
सपना क्या है? नयन सेज पर
सोया हुआ आंख का पानी,
और टूटना है उसका ज्यों
जागे कच्ची नींद जवानी
गीली उमर बनाने वालों
डूबे बिना नहाने वालों
कुछ पानी के बह जाने से सावन नहीं मरा करता है।
और यह दर्शन कितनी सहजता से व्यक्त हुआ है जिसे नीरज अपनी रचनाओं में शुरू से अंत तक जीत रहे:
कोई चला तो किस लिए नज़र तू डबडबा गई?
सिंगार क्यों सहम गया उदासी क्यों ये छा गई?
न जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ, बस इतनी सिर्फ बात है
किसी की आंख खुल गई, किसी को नींद आ गई …
नीरज जी को उनके गीतों के माध्यम से सदियों तक याद रखा जाएगा। जब-जब उनके गीतों को गुनगुनाया जाएगा तब तब उनका लिखा ही याद आएगा :
इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में
तुमको लग जाएंगी सदियां इसे भुलाने में
न तो पीने का सलीका, न पिलाने का शऊर
अब तो ऐसे लोग चले आते हैं मैखाने में …
पद्म श्री, पद्म भूषण से सम्मानित गीतकार गोपालदास ‘नीरज’ ने एम्स दिल्ली में 19 जुलाई 2018 की शाम अंतिम सांस ली। वे ता उम्र गीतकार बन कर जिए और यही इच्छा व्यक्त करते रहे कि अगले जन्म में भी कवि ही बनें। आज वे नहीं है लेकिन उनकी रचनाएं हैं जो हमें उनकी याद दिलाती हैं। उन्होंने अपनी मां से सीखा था कि किसी का उधार नहीं रखना है। इस शिक्षा को ताउम्र याद रखा। अपने अंतिम साक्षात्कारों में उन्होंने पत्नी के प्रति व्यवहार पर प्रायश्चित भी व्यक्त किया और प्रेम संबंधों पर बनाई गई बातों पर भी बेबाकी से बात रखी। जब उनसे पश्चात्ताप के बारे में पूछा गया तो जवाब मिला, पत्नी के कारण। बकौल नीरज, बड़ी सीधी-सरल महिला थीं। वे अंतिम समय में कोमा में चली गई थीं। मैं उनसे माफी भी नहीं मांग पाया। यह पश्चात्ताप जीवन-भर रहेगा। पत्नी के प्रति पश्चात्ताप भाव से ही नीरज ने लिखा था-
मेरे कारण ही सहे, तुमने कष्ट अपार।
चैन न देगा उम्र भर मुझको यही विचार।
पत्नी के लिए उन्होंने एक शेर भी लिखा था –
जब तलक तुम थीं, मुझे ये घर मेरे घर-सा लगा।
अब नहीं तुम हो तो फिर ये, एक खंडहर सा लगा।
अपनी प्रेमिका के साथ किए गए कटु व्यवहार के लिए दु:ख व्यक्त किया। प्रत्यक्ष माफी न मांग पाने पर अफसोस भी जताया। फकीर ऐसे ही होते हैं शायद। उन्हें चाहे मंच पर खास अंदाज में पढ़े गए गीतों के कारण याद करें या फिल्मी गीतों के लिए या जीवन के विविध आयाम के लिए, किसी भी तरह उन्हें भुलाया जाना मुमकीन नहीं है।

