भला एक शाइर किताबें जलाने की बात कैसे कर सकता है?

  • आशीष दशोत्‍तर

साहित्‍यकार एवं स्‍तंभकार

मरहूम शाइर राहत इंदौरी की ग़ज़ल का मतअला उलझनें बढ़ाने वाला है। इसके कई अक़्स दिखाई देते हैं। पहली नज़र में यह शेर नकारात्मक ध्वनि का अहसास करवाता है। लफ़्जी मआनी पर ग़ौर किया जाए तो भी ऐसा ही कुछ महसूस होता है। ख़याल यह भी आता है कि भला एक शाइर किताबें जलाने की बात कैसे कर सकता है? क्या क़िताब जलाने से कुछ हासिल हो सकता है? ऐसा करने से तो और अंधेरा होगा। ऐसी बात तो जहालत फैलाने वाले करते हैं। तानाशाही के हर दौर में सबसे पहला हमला किताबों पर ही होता है फिर बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया जाता है। आततायी हमेशा से ऐसा करते रहे हैं। खुलकर लिखने और बेहतर पढ़ने पर रोक लगा दी जाती है। जब ऐसा बुरे लोग करते हैं तो एक शाइर यह बात क्यूं कह रहा है। शाइर तो कभी तीरगी का हिमायती नहीं होता। वह तो हर बुरी बात का प्रतिकार करता है। यहां एक विरोधाभास और नज़र आता है। ऊले मिसरे में जहालत मिटाने की बात है और सानी मिसरे में क़िताबें जलाने की बात।

दरअसल, इस विरोधाभास को समझने के लिए इस शेर के लफ़्जी मआनी से इतर इसके विभिन्न आयामों पर ग़ौर करना होगा। पहली बात तो यह समझना ज़रूरी है कि क्या सभी क़िताबें इंसान को आगे की ओर ले जाती है? कुछ क़िताबें इंसान को कमज़ोर भी बनाती है। बेड़ियों में जकड़ती है। अंधविश्वासी बनाती है। हक़ीक़त से दूर कर भीरू बनाती है। तो ऐसी क़िताबें किस काम की? ये किताबें तो अज्ञानता ही बढ़ाएंगी न। तो फिर ऐसी किताबों को जला देना ही बेहतर है। ऐसी क़िताबों के जलने से ही तो इंसान दकियानूसी सोच से मुक्त होगा। इस लिहाज से तो क़िताबें जलाने में कोई बुराई नहीं होना चाहिए। आख़िर हमें रोशनी की सरपरस्ती में चलना सिखाया जाता है, अंधेरे की कालिमा में नहीं। इस दृष्टि से तो शेर अपनी बात से आम आदमी की चिंता करता नज़र आता ही है, साथ ही यह सीख भी देता है कि जहालतों को बढ़ाने वाली क़िताबें जलाना कोई ग़लत नहीं है।लेकिन यह बात कहां किसी के गले उतरती है कि क़िताबों को जलाया जाना चाहिए? सीता के तीखे वचनों से हो क्रोधित हो रावण ने यह दुस्साहस किया था। अपनी लाइब्रेरी की तमाम क़िताबें जला दी थी। वह विद्वान तो था लेकिन तानाशाह भी। उसकी विद्वता पर परदा पड़ा था। लेकिन हम तो ऐसे नहीं हैं। हम क़िताबें जलाने की बात कैसे कर सकते हैं?

कुछ ऐसे काम होते हैं जो बगैर कुर्बानियां दिए पूरे ही नहीं होते। किसी बुराई को ख़त्म करने के लिए भलाई को मिटना ही होता है। क्या यहां शाइर यह कहना चाहता है कि जहालतों के अंधेरे को मैंने मिटा तो दिए हैं, चाहे इसके लिए मुझे क़िताबें ही क्यूं न जलानी पड़ी हो। यानी एक बुराई को मिटाने के लिए एक अच्छाई की कुर्बानी भी अगर देना पड़ी तो मैंने दी लेकिन उसे मिटाकर ही दम लिया। यह एक इंसान का फ़र्ज़ भी होता है कि वह हर बुराई को मिटाने के लिए अपनी अंतिम सांस तक लड़ता रहे। अपना सब कुछ मिटा कर भी वह उसे स्थापित करने की कोशिश करे। शाइर भी उसे मिटाने की ही बात कर रहा है। एक नज़रिया यह भी उभरता है कि नफ़रतों की जड़ में आख़िर है क्या? क्यूं बार-बार लोगों को नफ़रतों की आग में झोंक दिया जाता है? नफ़रतें फैलाने वाले लोगों के मंसूबे कामयाब कैसे हो जाते हैं? क्या इन सबके पीछे लोगों की जहालत ज़िम्मेदार नहीं है? इल्म के अभाव में भोले-भाले लोगों को बहलाया फुसलाया जाता है। बरगलाया जाता है। ऐसे अंधेरों को मिटाने के लिए कुछ भी करना पड़े तो करना चाहिए।

शाइर यहां समाज से नफ़रतों को मिटाना चाहता है और वह जानता है कि बग़ैर जहालत को मिटाए कुछ नहीं होगा। लिहाजा वह इसे मिटाने के लिए अपना सबकुछ मिटा देता है। इन सबसे इतर एक और ज़ाविया है जो शाइर के इस शेर को बुलन्दी पर पहुंचाता है। हमारी रवायत में हर अंधेरे को मिटाने के लिए एक दीप जलाने की सीख दी गई है। हम हर काविश से पहले चिराग़ रोशन करते हैं। यहां जहालतों के घने अन्धकार छाए हुए हैं। इन्हें मिटाने के लिए शाइर भी एक चिराग़ जलाने की कोशिश कर रहा है। वह चिराग़ है इल्म का। यहां जलाने का मतलब नज़रे- आतिश करना नहीं है बल्कि शमा रोशन करना है। शाइर कह रहा है कि जहालतों के अंधेरे जहां भी थे वहां मैंने किताबों की मशालें जला दी है। निरक्षरों को अक्षर का प्रकाश दे दिया है। उनके जेहन को इस क़दर रोशन कर दिया है कि अब कोई भोलेपन को बहला फुसलाकर ग़लत राहों पर नहीं ले जा सकेगा। हर उस जगह क़िताब रूपी मशालें जलाने की ज़रूरत है जहां अज्ञान का अंधेरा है। जहां नफ़रतों का बसेरा है। 

संपर्क: 9827084966

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