गुरु चले जाते हैं… मगर उनकी कक्षाएं कभी खत्म नहीं होती

  • प्रो. परिचय दास

लेखक रवींद्र श्रीवास्‍तव नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय (संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ) नालंदा में प्रोफेसर हैं।

गुरु के चले जाने के बाद सबसे पहले लगता है कि एक आवाज़ कम हो गई है। फिर धीरे-धीरे पता चलता है कि आवाज़ कम नहीं हुई, उसका स्थान बदल गया है। जो आवाज़ कभी सामने से आती थी, वह अब भीतर से आने लगती है। पहले जिसे सुनने के लिए गुरु के पास जाना पड़ता था, वही बात अब किसी अकेले क्षण में अपने भीतर सुनाई पड़ जाती है। तब समझ में आता है कि गुरु का जाना हमेशा अनुपस्थिति नहीं होता। कई बार वह उपस्थिति का दूसरा रूप होता है।

मनुष्य अपने जीवन में बहुत-से लोगों से मिलता है। कुछ लोग परिचय बनकर आते हैं, कुछ मित्र बनकर, कुछ सहकर्मी बनकर, कुछ किसी अवसर की तरह आते हैं और अवसर बीतते ही स्मृति के किसी कोने में रख दिए जाते हैं। लेकिन गुरु का संबंध इन सबसे अलग होता है। गुरु हमारे जीवन में केवल ज्ञान लेकर नहीं आता। वह हमारे देखने का ढंग बदलता है। वह हमारे भीतर कुछ ऐसे प्रश्न रख जाता है, जिनका उत्तर हमें वर्षों बाद मिलता है। कई बार तो पूरी उम्र उत्तर खोजते हुए बीत जाती है और तब पता चलता है कि प्रश्न ही गुरु की सबसे बड़ी देन था।

गुरु परमानंद श्रीवास्तव की स्मृति मेरे लिए इसी तरह की स्मृति है। उन्हें याद करना किसी व्यक्ति को याद करना भर नहीं है। उनके साथ बिताए हुए समय, उनके कहे हुए वाक्य, उनकी आलोचनात्मक दृष्टि, साहित्य को देखने की उनकी बेचैनी और अपने शिष्य से उनकी अपेक्षाएँ, सब मिलकर एक ऐसी आंतरिक आवाज़ बन गए हैं जो समय के साथ धीमी नहीं हुई। जीवन में कुछ आवाज़ें बाहर से सुनाई देती हैं और कुछ आवाज़ें भीतर अपना घर बना लेती हैं। गुरु की आवाज़ दूसरी तरह की आवाज़ होती है।

शिष्य के जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब वह गुरु के सामने केवल सीखने वाला विद्यार्थी नहीं रहता। वह स्वयं लिखता है, बोलता है, पढ़ाता है, आलोचना करता है, अपने निर्णय लेता है। उसे लगता है कि अब वह अपने रास्ते पर है। लेकिन किसी महत्वपूर्ण क्षण में अचानक भीतर से कोई पुराना प्रश्न उठता है—क्या यह बात इतनी ही है? क्या इसे और गहराई से नहीं देखना चाहिए? क्या इसके पीछे कोई दूसरी मानवीय परत नहीं है? उस क्षण हम समझते हैं कि गुरु अभी भी हमारे साथ हैं।

गुरु की यही अदृश्य उपस्थिति शायद शिक्षा की सबसे दुर्लभ उपलब्धि है।

कक्षा समाप्त हो जाती है, पाठ्यक्रम समाप्त हो जाता है, विश्वविद्यालय बदल जाते हैं, पीढ़ियाँ बदल जाती हैं, पुस्तकें पुरानी हो जाती हैं, लेकिन गुरु द्वारा दिया हुआ दृष्टिकोण अपनी उम्र स्वयं तय करता है। वह किसी प्रमाणपत्र में दर्ज नहीं होता। उसे किसी उपाधि के साथ नहीं लगाया जा सकता। वह धीरे-धीरे व्यवहार में आता है, लेखन में आता है, दूसरों को पढ़ने के ढंग में आता है और कभी-कभी हमारी चुप्पियों में भी दिखाई देता है।

मैं जब साहित्य के किसी प्रश्न पर सोचता हूँ तो कई बार मुझे लगता है कि मैं अकेला नहीं सोच रहा। मेरे साथ वे सभी लोग बैठे हैं जिनसे मैंने कुछ सीखा है। लेकिन कुछ आवाज़ें उनमें अधिक स्पष्ट हैं। परमानंद जी की आवाज़ उनमें एक ऐसी आवाज़ है जो साहित्य को केवल साहित्य की सीमा में बंद नहीं रहने देती। वह रचना के भीतर मनुष्य को खोजती है और मनुष्य के भीतर उसके समय को। आलोचना उनके लिए केवल निर्णय देने की प्रक्रिया नहीं थी। वह रचना के भीतर प्रवेश करने का एक रास्ता थी।
शायद इसी कारण गुरु की स्मृति सबसे अधिक तब आती है जब हम स्वयं किसी बात पर निर्णय लेने वाले होते हैं।

किसी लेख की पंक्ति लिखते हुए, किसी कवि पर विचार करते हुए, किसी आलोचक को पढ़ते हुए, किसी वक्तव्य के लिए शब्द चुनते हुए अचानक लगता है कि सामने बैठे गुरु इस वाक्य को सुन रहे हैं। वे कुछ कहते नहीं, केवल सुनते हैं। और उनका सुनना ही पर्याप्त होता है। हम अपनी पंक्ति फिर पढ़ते हैं। कोई शब्द अनावश्यक लगता है तो उसे हटा देते हैं। कोई विचार अधूरा लगता है तो उसे रोक देते हैं। कोई बात बहुत आसानी से कही जा रही है तो उसके भीतर छिपी कठिनाई खोजने लगते हैं।
यही तो गुरु की दी हुई दृष्टि है—वह हमारे भीतर एक अदृश्य पाठक पैदा कर देता है।

जीवन में बहुत कम लोग हमारे भीतर ऐसा पाठक पैदा कर पाते हैं।

गुरु की स्मृति का एक दु:ख भी है। हम जानते हैं कि अब उनसे कोई नया प्रश्न नहीं पूछ सकते। कोई उलझन लेकर उनके सामने बैठना संभव नहीं। किसी नई पुस्तक पर उनकी प्रतिक्रिया जानना संभव नहीं। अपने लिखे हुए किसी नए लेख की प्रति उनके हाथ में देना संभव नहीं। यह असंभवता स्मृति को कभी-कभी बहुत निजी बना देती है। हम उन दिनों में लौटना चाहते हैं जब प्रश्न अभी पूछे जा सकते थे, जब उत्तर सामने से मिल सकता था, जब असहमति भी संवाद का हिस्सा थी।

लेकिन स्मृति का अपना एक अनुशासन होता है। वह हमें केवल पीछे नहीं ले जाती। वह वर्तमान में लौटाकर पूछती है कि जो कुछ मिला था, उसका अब क्या किया जा रहा है।
शायद गुरु को याद करने का सबसे सच्चा तरीका उन्हें बार-बार याद करना नहीं, बल्कि उनकी दी हुई दृष्टि से अपने समय को देखना है।

गुरु की स्मृति को यदि केवल श्रद्धांजलि में बदल दिया जाए तो उसमें से जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा निकल जाता है। श्रद्धा आवश्यक है, लेकिन गुरु केवल श्रद्धा की वस्तु नहीं होते। वे हमारी बौद्धिक और मानवीय जिम्मेदारी भी होते हैं। उन्होंने हमें जो देखने की क्षमता दी, उसका उपयोग हम कैसे करते हैं, यही उनके प्रति हमारा वास्तविक उत्तर है।

इसलिए गुरु के जाने के बाद शिष्य के सामने एक विचित्र स्थिति होती है। वह गुरु को खोता भी है और उनसे अधिक गहराई से मिलता भी है। सामने बैठा व्यक्ति नहीं है, लेकिन उसके विचारों से हमारा संवाद जारी रहता है। पहले हम गुरु से सीखते थे, अब गुरु की स्मृति से सीखते हैं। पहले वे हमारी भूल पकड़ते थे, अब उनकी आवाज़ हमारी भूल पकड़ती है। पहले वे प्रश्न करते थे, अब उनके प्रश्न हमारे भीतर उठते हैं।

यह परिवर्तन बहुत सूक्ष्म होता है।

कभी कोई पुरानी पुस्तक खोलते हुए, कभी किसी शहर की सड़क पर चलते हुए, कभी किसी सभा में बोलते हुए, कभी किसी विद्यार्थी को पढ़ाते हुए, अचानक कोई पुराना क्षण लौट आता है। कोई बहुत छोटी-सी बात, जिसे उस समय हमने शायद महत्व भी नहीं दिया था, वर्षों बाद अपना अर्थ खोल देती है। तब लगता है कि गुरु केवल बड़े विचारों में नहीं रहते। वे छोटी-छोटी आदतों में भी रहते हैं। किसी शब्द को सावधानी से चुनने में, किसी लेखक के साथ न्याय करने में, किसी असहमति को बिना कटुता के व्यक्त करने में, किसी कनिष्ठ को बोलने का अवसर देने में, किसी पुस्तक को पूरा पढ़े बिना उस पर निर्णय न देने में।

गुरु का सबसे स्थायी स्मारक शायद यही होता है कि शिष्य के आचरण में उनकी कोई सूक्ष्म रेखा दिखाई देने लगे।

मृत्यु मनुष्य को हमसे छीन सकती है, उसकी दी हुई दृष्टि को नहीं। समय शरीर को दूर कर सकता है, संवाद को नहीं। दूरी स्मृति को धुँधला कर सकती है, लेकिन कुछ संबंध ऐसे होते हैं जिनकी स्पष्टता दूरी से ही बढ़ती है। सामने रहते हुए हम व्यक्ति को देखते हैं; दूर जाने के बाद उसके अर्थ को देखने लगते हैं। परमानंद जी को याद करते हुए मेरे भीतर यही अर्थ बार-बार उभरता है कि गुरु होना केवल पढ़ाना नहीं है। गुरु होना किसी दूसरे मनुष्य के भीतर ऐसी जगह बना लेना है जहाँ से वह व्यक्ति जीवन भर अपने प्रश्न सुन सके।

शायद इसी कारण गुरु की मृत्यु के बाद शिष्य के भीतर एक नया अकेलापन जन्म लेता है। यह वह अकेलापन नहीं जिसमें कोई साथ नहीं है। यह वह अकेलापन है जिसमें बहुत-सी आवाज़ें हैं, लेकिन एक विशेष आवाज़ को हम सामने से नहीं सुन सकते। उस अनुपस्थिति को स्वीकार करने में समय लगता है।
फिर एक दिन हम उसी आवाज़ को अपने भीतर पहचान लेते हैं।

तब शोक थोड़ा बदल जाता है।

वह केवल किसी प्रिय व्यक्ति के न रहने का शोक नहीं रह जाता। वह कृतज्ञता में बदलने लगता है। हमें लगता है कि हमें जितना मिला, वह केवल उस समय का हिस्सा नहीं था। वह हमारे साथ आगे भी आया। गुरु ने हमें अपना वर्तमान नहीं दिया था, उन्होंने हमें अपना भविष्य देखने की आँख दी थी। और शायद यही शिक्षा की सबसे बड़ी सुंदरता है।

एक दिन शिक्षक चला जाता है और शिष्य बोलता रहता है। लेकिन उसके बोलने में कहीं न कहीं शिक्षक की वह पुरानी सावधानी, वह प्रश्नाकुलता, वह आग्रह, वह मनुष्य के प्रति विश्वास और साहित्य के प्रति ईमानदारी चली आती है। शिष्य चाहे जितना स्वतंत्र हो जाए, उसकी स्वतंत्रता के भीतर भी गुरु की दी हुई जमीन रहती है।

गुरु का जाना इसलिए अंतिम वाक्य नहीं होता।

वह एक दीर्घ विराम होता है। उस विराम के बाद जो कुछ हम लिखते हैं, बोलते हैं, सोचते हैं और जीते हैं, उसमें कहीं न कहीं वह आवाज़ फिर सुनाई देती है।
धीमी।

बहुत भीतर से आती हुई।
लेकिन पहचान में आने योग्य।
गुरु की आवाज़।
गुरु के जाने के बाद भी बची हुई आवाज़

गुरु के जाने के बाद भी एक अजीब तरह की बातचीत चलती रहती है। बाहर से देखने वाला व्यक्ति शायद उसे बातचीत न माने। वहाँ न प्रश्न दिखाई देता है, न उत्तर। न सामने कोई चेहरा होता है, न कोई आवाज़ सचमुच सुनाई देती है। फिर भी भीतर कोई पूछता है और भीतर ही कोई उत्तर देता है। यही वह क्षण है जब स्मृति, स्मृति भर नहीं रहती। वह एक जीवित अनुभव में बदल जाती है।

गुरु के चले जाने के बाद हमें यह भी समझ में आता है कि हमने उनसे कितना कुछ सुना था और कितना कुछ केवल उनकी उपस्थिति से सीखा था। कहा हुआ तो स्मरण में आ सकता है, लेकिन उपस्थिति से सीखी हुई चीजें हमारे स्वभाव में उतर जाती हैं। उनका कोई उद्धरण नहीं होता, कोई प्रमाण नहीं होता, कोई संदर्भ नहीं होता। वे हमारे व्यवहार में होती हैं।

किसी लेखक को पढ़ते हुए अचानक उसके प्रति जल्दबाजी न करने की इच्छा, किसी कविता पर बोलते हुए उसके भीतर के मौन को भी सुन लेने की कोशिश, किसी आलोचनात्मक मत से असहमत होते हुए भी लेखक के श्रम का सम्मान, किसी विद्यार्थी की अधूरी बात को बीच में न काटना, किसी पुस्तक को केवल उसके प्रसिद्ध नाम के कारण महान न मान लेना, किसी नए लेखक को केवल नया होने के कारण खारिज न कर देना, ये सब शायद किसी पुस्तक से सीधे नहीं सीखे जाते। इनके पीछे किसी मनुष्य की दी हुई दृष्टि होती है।

गुरु की सबसे बड़ी शिक्षा अक्सर यही होती है कि वह हमें किसी एक उत्तर का अनुयायी नहीं बनाता। वह हमें प्रश्न करने का साहस देता है।

शायद इसी कारण गुरु और विद्यार्थी का संबंध समय के साथ बदलता है। विद्यार्थी की उम्र बढ़ती है, उसकी अपनी दुनिया बनती है, उसकी अपनी भाषा बनती है, उसके अपने निर्णय बनते हैं। वह एक दिन गुरु से असहमत भी होता है। यह असहमति संबंध को समाप्त नहीं करती। बल्कि कई बार उसी से पता चलता है कि शिक्षा भीतर तक पहुँची है। जिस गुरु ने शिष्य को केवल अपनी बात मानना सिखाया, उसने उसे आधा ही शिक्षित किया। जिसने उसे स्वयं सोचने दिया, उसने उसे वास्तव में अपने से आगे जाने का अवसर दिया।

परमानंद जी की स्मृति में मुझे यह स्वतंत्रता विशेष रूप से दिखाई देती है। साहित्य को देखने की दृष्टि किसी बंद कमरे की तरह नहीं थी जिसमें प्रवेश करते ही कुछ निर्धारित निष्कर्ष स्वीकार करने पड़ें। वहाँ संवाद था, जिज्ञासा थी, असहमति की जगह थी और रचना को उसके अपने अनुभव-संसार में समझने की कोशिश थी। आलोचना का अर्थ केवल यह बताना नहीं कि कौन अच्छा है और कौन कम अच्छा। आलोचना के भीतर मनुष्य की जटिलता को पढ़ना भी था।

शायद इसीलिए उनके जाने के बाद उनकी स्मृति को केवल श्रद्धांजलि में सीमित करना मुझे पर्याप्त नहीं लगता।

गुरु को याद करना उनके बारे में बोलना ही नहीं है। उनके कारण अपने भीतर पैदा हुई दृष्टि को पहचानना भी है।

कभी-कभी लगता है कि गुरु का वास्तविक जीवन उनकी मृत्यु के बाद शुरू होता है। जब वे सामने होते हैं तो हम उन्हें व्यक्ति की तरह देखते हैं। उनकी आवाज़, उनका स्वभाव, उनका व्यवहार, उनकी आदतें, उनकी प्रसन्नता, उनकी नाराज़गी, उनकी व्यस्तता, उनकी छोटी-छोटी मानवीय कमजोरियाँ सब दिखाई देती हैं। उनके जाने के बाद इन सबके ऊपर से धीरे-धीरे एक दूसरी परत हटती है और उनका काम सामने आता है। तब व्यक्ति से अधिक उसका प्रभाव दिखाई देता है।
और प्रभाव का कोई एक आकार नहीं होता।
वह अलग-अलग शिष्यों में अलग-अलग रूपों में जीवित रहता है।

किसी में वह अध्यापन बन जाता है, किसी में लेखन, किसी में आलोचना, किसी में शोध, किसी में संगठन, किसी में केवल एक संवेदनशील मनुष्य बने रहने की कोशिश। गुरु की विरासत कभी एक जैसी प्रतिलिपि नहीं बनती। वह हर शिष्य में अपनी नई आकृति बनाती है। इसीलिए गुरु की परंपरा को केवल अनुकरण से बचाना चाहिए।

गुरु की नकल गुरु की विरासत नहीं है।

उनकी दी हुई स्वतंत्र दृष्टि से अपने समय को देखना उनकी वास्तविक परंपरा है।

समय भी बदलता रहता है। जिस साहित्यिक प्रश्न पर हमारे गुरु ने विचार किया था, वह आज दूसरी परिस्थिति में उपस्थित हो सकता है। जिस लेखक को उन्होंने पढ़ा था, उसे हम नए संदर्भ में पढ़ सकते हैं। जिस रचना का अर्थ उनके समय में कुछ और था, वह हमारे समय में कोई दूसरी बेचैनी पैदा कर सकती है। यदि गुरु की शिक्षा जीवित है तो वह हमें पुराने उत्तरों को दोहराने के बजाय नए प्रश्नों के सामने खड़ा करेगी।
यहीं गुरु की स्मृति और गुरु की परंपरा के बीच अंतर खुलता है।

स्मृति पीछे देखती है।
परंपरा आगे चलती है।
स्मृति कहती है, वे ऐसे थे।
परंपरा पूछती है, अब हमें क्या करना है?
शायद गुरु के जाने के बाद शिष्य के सामने सबसे कठिन प्रश्न यही होता है।
अब क्या करना है?
किसके सामने अपनी पंक्ति रखनी है?
किससे पूछना है कि यह बात कुछ अधिक सरल तो नहीं हो गई?
किससे पूछना है कि यह आलोचना रचना के साथ न्याय कर रही है या केवल आलोचक की सुविधा के साथ?
किससे पूछना है कि इस लेखक को पढ़ते हुए हमने उसके भीतर का मनुष्य देखा भी है या केवल उसकी प्रसिद्धि?

इन प्रश्नों का कोई प्रत्यक्ष उत्तर नहीं मिलता। लेकिन कुछ समय बाद हमें पता चलता है कि उत्तर की आवश्यकता भी हर बार नहीं होती। प्रश्न को जीवित रखना ही पर्याप्त है।
गुरु ने शायद यही दिया था।
एक जीवित प्रश्न।
जीवन में कुछ उपहार ऐसे होते हैं जिनका मूल्य उनके उत्तर में नहीं, उनकी दीर्घता में होता है।
गुरु द्वारा दिया हुआ प्रश्न वर्षों तक हमारे साथ चलता है। वह बदलता है, अपना रूप बदलता है, कभी दब जाता है, कभी फिर सामने आ जाता है। लेकिन वह हमें भीतर से असावधान नहीं होने देता।

साहित्य में भी यही असावधानी सबसे बड़ा संकट है। शब्द बहुत जल्दी उपलब्ध हो जाते हैं। निष्कर्ष उससे भी जल्दी। किसी लेखक के बारे में दो-चार बातें पढ़कर उसके बारे में बोल देना आसान है। किसी रचना को एक परिचित खाँचे में रख देना आसान है। कठिन यह है कि उसके सामने कुछ देर चुप रहा जाए। रचना को अपने भीतर खुलने दिया जाए। उसके अस्पष्ट हिस्से को भी स्वीकार किया जाए। उसके विरोधाभास को तुरंत किसी सूत्र में न बदला जाए।

गुरु की आवाज़ ऐसे ही क्षणों में आती है।
वह कहती है, थोड़ा और ठहरो।
शायद यही सबसे कठिन शिक्षा है।
ठहरना।

आज का समय हर चीज़ का तत्काल उत्तर चाहता है। पुस्तक पढ़ने से पहले उसकी चर्चा तैयार है। कविता पढ़ने से पहले उसका मूल्यांकन तैयार है। किसी लेखक का नाम आते ही उसकी जगह तय है। जैसे मनुष्य ने साहित्य को भी अपनी अधीरता के हवाले कर दिया हो। ऐसे समय में गुरु की वह पुरानी आवाज़ और अधिक जरूरी लगती है जो कहती है कि किसी रचना के पास जल्दी मत जाओ, पहले उसके पास बैठो।

किसी गुरु की स्मृति यदि हमें थोड़ा अधिक धैर्यवान बना दे तो वह स्मृति अभी जीवित है।
यदि वह हमें थोड़ा अधिक न्यायपूर्ण बना दे तो वह स्मृति जीवित है।
यदि वह हमें अपने ही निष्कर्षों पर संदेह करना सिखा दे तो वह स्मृति जीवित है।
और यदि वह हमें यह याद दिलाती रहे कि साहित्य के केंद्र में अंततः मनुष्य है, तो वह आवाज़ अभी समाप्त नहीं हुई।

गुरु के साथ बिताए हुए वर्षों को जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि उस समय हम केवल साहित्य नहीं पढ़ रहे थे। हम अपने देखने की आँख को धीरे-धीरे बना रहे थे। हमें शायद पता भी नहीं था कि शिक्षा का सबसे गहरा हिस्सा पाठ्यक्रम के बाहर घट रहा है। किताबें थीं, कक्षाएँ थीं, शोध था, बातचीत थी, बहसें थीं, लेकिन उनके पीछे एक बड़ी प्रक्रिया चल रही थी। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को अधिक सजग मनुष्य बनने की दिशा में धकेल रहा था।

यह धक्का कभी बहुत कोमल होता है।
कभी किसी प्रश्न के रूप में।
कभी किसी असहमति के रूप में।
कभी केवल एक चुप्पी के रूप में।
और कभी किसी ऐसी बात के रूप में जिसे उस समय हम शायद समझ ही नहीं पाते।
समय उसका अर्थ खोलता है।

इसलिए गुरु की स्मृति समय के साथ पुरानी नहीं होती। वह कई बार समय के साथ अधिक अर्थवान होती जाती है। बीस वर्ष पहले सुनी हुई कोई बात आज अचानक पूरी तरह समझ में आ सकती है। दस वर्ष पहले किसी प्रतिक्रिया को हमने कठोर समझा हो, आज उसके भीतर की चिंता दिखाई दे सकती है। कभी गुरु का आग्रह उस समय अनुशासन लगता है, बाद में पता चलता है कि वह स्वतंत्रता की तैयारी था।

गुरु की कठोरता में भी करुणा हो सकती है।
उनकी असहमति में भी विश्वास।
उनकी चुप्पी में भी शिक्षा।
और उनकी अनुपस्थिति में भी एक अजीब तरह की संगति।
शिष्य का जीवन शायद इसी संगति की खोज है।

हम अपने जीवन में बहुत दूर निकल जाते हैं। शहर बदलते हैं। संस्थाएँ बदलती हैं। पद बदलते हैं। जिम्मेदारियाँ बदलती हैं। हमारे आसपास के लोग बदलते रहते हैं। लेकिन भीतर कहीं एक पुराना कमरा बचा रहता है। वहाँ कुछ किताबें हैं। एक मेज है। कुछ पुराने कागज हैं। कुछ प्रश्न हैं। और एक आवाज़ है जो हमें लगातार यह याद दिलाती है कि शब्द केवल शब्द नहीं हैं।
शब्दों के पीछे मनुष्य है।
मनुष्य के पीछे उसका समय है।
और समय के पीछे उसकी स्मृति।
शायद साहित्य की असली यात्रा भी यही है।

इसीलिए गुरु की स्मृति अंततः व्यक्तिगत होकर भी केवल व्यक्तिगत नहीं रहती। एक गुरु के जाने का दुख उनके परिवार, उनके शिष्यों और उनके निकट लोगों का निजी दुख है, लेकिन उनके द्वारा निर्मित साहित्यिक संसार से जुड़े लोगों के लिए वह एक सार्वजनिक रिक्ति भी है। उस रिक्ति को केवल समारोहों से नहीं भरा जा सकता। उसे काम से भरा जाता है। पढ़ने से, लिखने से, प्रश्न करने से, नए लोगों को अवसर देने से और उस परंपरा को आगे ले जाने से जिसमें मनुष्य को केवल नाम, पद या विचार से नहीं, उसकी संपूर्ण जटिलता में देखा जाता है।

शायद यही गुरु के प्रति सबसे कठिन श्रद्धांजलि है।

उनके जाने के बाद भी अपने भीतर उनकी अपेक्षा को जीवित रखना।
जब कोई नया लेख लिखूँ तो भीतर से यह प्रश्न उठे कि क्या यह सचमुच आवश्यक था।
जब किसी लेखक पर बोलूँ तो यह सावधानी रहे कि मैंने उसे पर्याप्त पढ़ा है या नहीं।
जब किसी विद्यार्थी से बात करूँ तो यह स्मरण रहे कि उसके भीतर अभी वह सब कुछ संभव है जिसे वह स्वयं भी नहीं जानता।
जब किसी सहकर्मी से असहमति हो तो असहमति को मनुष्य से बड़ा न होने दूँ।
और जब किसी युवा लेखक की रचना सामने आए तो उसके भीतर भविष्य की संभावना देखने का धैर्य रखूँ।
यदि गुरु की आवाज़ हमारे भीतर इन छोटे-छोटे क्षणों में काम करती रहती है तो वे वास्तव में हमसे बहुत दूर नहीं गए।
वे केवल सामने से हटे हैं।
भीतर से नहीं।

शायद मृत्यु की सबसे बड़ी सीमा यही है कि वह शरीर को रोक सकती है, लेकिन किसी सच्चे शिक्षक द्वारा दूसरे मनुष्य में जगा दी गई चेतना को नहीं रोक सकती।

गुरु चले जाते हैं।
उनकी कक्षाएँ समाप्त हो जाती हैं।
उनकी कुर्सी खाली हो जाती है।
उनकी मेज पर रखी पुस्तकें किसी और कमरे में चली जाती हैं।
उनकी लिखावट धीरे-धीरे पुराने कागजों पर पीली पड़ती है।
उनकी आवाज़ की प्रत्यक्ष स्मृति भी समय के साथ धुँधली हो सकती है।
लेकिन उन्होंने जिन मनुष्यों को सोचने की आदत दी, उनमें उनका एक हिस्सा लगातार चलता रहता है।
वहीं गुरु की असली अमरता है।
किसी स्मारक में नहीं।
किसी पट्टिका पर नहीं।
किसी औपचारिक संबोधन में भी नहीं।
बल्कि उस क्षण में जब उनका कोई शिष्य किसी कठिन प्रश्न के सामने अकेला बैठा हो और अचानक भीतर से कोई आवाज़ उठे—
जल्दी मत करो।
फिर से पढ़ो।
इसके भीतर कुछ और भी है।
और शिष्य पुस्तक पर झुक जाए।
फिर पढ़ने लगे।
तभी लगता है कि गुरु कहीं गए नहीं हैं।
वे अपनी सबसे लंबी कक्षा में चले गए हैं।
हमारे भीतर।
और उस कक्षा की कोई अंतिम घंटी नहीं होती।

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