नदी किनारे जाऊंगा, कुछ तैरूंगा और डूब जाऊंगा…

हम हर साल 21 मार्च को विश्व कविता दिवस मनाते हैं। यह सुनकर जरा अजीब लगता है और सहज सवाल उठता है कि क्‍या कविता के लिए भी कोई एक दिन का उत्‍सव मनाया जाना चाहिए? असल में, यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने तय किया है कि ” काव्यात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से भाषाई विविधता का समर्थन करने और लुप्तप्राय भाषाओं को सुनने के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से” कविता दिवस बनाया जाना चाहिए। जाहिर है, इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया भर में कविता के पढ़ने, लिखने, छपने और शिक्षण को बढ़ावा देना है। यह “राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कविता आंदोलनों को नई पहचान और प्रोत्साहन देना” की पहल है। इस दिन को हम अपनी पसंदीदा कविता साझा कर यादगार बनाना चाहते हैं।

इस क्रम में पढ़िए शशि तिवारी की पसंदीदा कविता :

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में निवासरत विनोद कुमार शुक्ल समकालीन हिंदी कविता के सर्वाधिक चर्चित कवियों में से एक हैं। ‘गजानन माधव मुक्तिबोध फ़ेलोशिप’,‘राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान’, ‘शिखर सम्मान’ (म.प्र. शासन), ‘हिन्दी गौरव सम्मान’ (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान), ‘रज़ा पुरस्कार’, ‘दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान’, ‘रघुवीर सहाय स्मृति पुरस्कार’ तथा ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के लिए ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ से सम्मानित विनोद कुमार शुक्‍ल की कविताएं हर बार पाठ के साथ सोच, समझ और संवेदना का नया दरवाजा खोलती हैं।

जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे

जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊंगा।

एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊंगा
कुछ तैरूंगा और डूब जाऊंगा

पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएंगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गांव-गांव, जंगल-गलियां जाऊंगा।

जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं
उनसे एक जरूरी काम की तरह

मिलता रहूंगा –
इसे मैं अकेली आखिरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूंगा।

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