
- राघवेंद्र तेलंग
सुपरिचित कवि,लेखक,विज्ञानवेत्ता
एवरेस्ट विजेता भारतीय पर्वतारोही ज्योति रात्रे से अंतर्मन का संवाद
दुनिया में दुनिया के लिए वे ही लोग महत्वपूर्ण हैं जो मौलिक हैं,ओरिजिनल हैं,ख़ुद ख़ुद के ड्राइवर हैं, दुनिया अपना स्टीयरिंग ऐसे ही लोगों के हाथों में सौंपती है। आज भौतिकतावादी युग में अधिकतम लोग सत्य की आड़ में नकली जीवन,प्लास्टिक का जीवन जी रहे हैं, यूज़ एंड थ्रो के संसार के उपभोक्ता कहलाने वाले नागरिक। यकीन मानिए ये सब सत्य के ड्राइवर के भरोसे पीछे की सीट पर ऊंघते हुए यात्री हैं। जबकि सत्य यह है कि वहां पैदल ही जाना है वह भी खुद,न हाथी है न घोड़ा है…!
संकल्प की बात
आज हम सबसे पहले एक ऐसे शब्द से अपनी बात शुरू करेंगे जिसका कीमिया जब-जब भीतर उतर आता है तब-तब अविश्वसनीय घटित होता है। जी हां! वह शब्द है संकल्प। जो संकल्पवान होते हैं वे अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कटिबद्ध होते हैं, व्यक्तित्व में ऐसे गुण को भारतीय वांग्मय में पौरूषेय कहा गया है और ऐसे मनुष्य को सांकेतिक ढंग से ‘पुरूष’ कहते हुए एक ही मानक संज्ञा से निरूपित किया गया है। भारतीय वांग्मय की अपौरुषेय कृतियां कट्टर तार्किक और रैशनल लोगों की समझ में ढलने योग्य नहीं हैं, पवित्र ग्रंथों का वितान और उनकी मैग्नेटिक लाइंस ऐसे लोगों में नहीं उतर पाएंगी जिनका पानी उतर चुका है। बहरहाल, जिनकी समझ की आँखों में नमी नहीं उनसे यहां हम भी संबोधित नहीं क्योंकि कुछ को सोच कर भी कभी समझ नहीं आता, कुछ को आता है समझ कुछ सोचने के बाद। तो चलिए अब आगे बढ़ते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन को संकल्पशक्ति का प्रभाव बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।
अर्थात;श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं,सामान्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करने लगते हैं। श्रेष्ठ पुरुष जिस कर्म को करता है,उसी को आदर्श मानकर लोग उसका अनुसरण करते हैं।
दुर्लभ प्रतिभाएं
एक चीनी कहावत याद आ रही है जिसमें कहा गया है कि जब आप पहाड़ के सामने खड़े होते हैं तो कुछ महान घटित होता है। पहाड़ को अगर उपमा मानकर इसी कोण को लेकर आगे बढ़ें तो कहा जा सकता है पहाड़ चढ़कर जो लौटता है वह फिर वह नहीं रह जाता जो पहाड़ चढ़ने के पहले था।
भौतिक विज्ञान के क्वांटम टनलिंग इफेक्ट को बारीकी से समझेंगे तो समझ आएगा कि असंभव की दीवार को लांघने की एक संभावना भी अस्तित्व में हमेशा मौजूद रहती है। और ऐसी व्यवस्था अस्तित्व में अस्तित्व ने उन विरल, दुर्लभ लोगों के लिए कर रखी है जो हाथ बढ़ाकर इस बात का बीड़ा उठा सकते हैं कि हां! हम ही हैं गार्जियंस ऑफ गैलेक्सी। क्या आपने अरूणिमा घोष या बछेंद्री पाल के बारे में सुना है? क्या आपने मिहिर सेन का नाम कहीं पढ़ा है? सुधा चंद्रन और रवींद्र जैन को तो आप जानते ही होंगे! ये नाम तो बस इशारा भर हैं और आज के हंसध्वनि के इस मंच के माध्यम से आपके भीतर आपकी अंतर्ज्योति को जगाने का उपक्रम भी है, फिलामेंट एलिमेंट के रूप में इन पके हुए शब्दों को आपके समक्ष रखा जा रहा है।

हमारी प्रेरणा
जी हां! आज बातें पर्वतों को जीतने वाली अदम्य साहस और संकल्प की धनी और मध्य प्रदेश की एक अज़ीम शख्सियत विदुषी ज्योति रात्रे की, जो आजकल न सिर्फ झीलों की नगरी भोपाल की शान हैं बल्कि पर्वतारोहण के रिकार्ड के पन्नों पर एक स्वर्णाक्षर भी हैं। चूंकि अब वे साक्षात प्रकाश स्तंभ हो चुकी हैं सो पाठक वृंद से आग्रह है कि वे विभिन्न मीडिया मंचों पर जाकर उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों की यात्रा की जानकारी से अवश्य अवगत हों लें ताकि इस फिलासाफिकल आलेख का आनंद और अधिक महसूस हो सके।
दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट को वय के पचपनवें मुकाम पर फतह करने वाली भारतीय पर्वतारोही ज्योति रात्रे जी भारत देश की अकेली महिला हैं और विश्व की बत्तीसवीं महिला हैं। निश्चित ही इस विरल गौरव को छूने के पूर्व बतौर रियाज़ उन्होंने दूसरे कई पर्वतों को जीता है फिर कहीं जाकर उन्होंने हिमालय में स्थित विश्व के सर्वोच्च शिखर की ओर रुख किया। आपको यह जानना दिलचस्प लगेगा कि विदुषी ज्योति रात्रे के साहचर्य के कुछ ही समय में मैंने उनके न्यूनतम संवादों में समाए अधिकतम मौन को पढ़ा। मौन जिसे संगीत के जरिए ही डिकोड किया जा सकता है। इस आलेख में लिखे गए शब्द और वाक्य उसी तपस्विनी की गुनगुनाई बंदिशें हैं। यह आलेख हमारे परस्पर संवाद, विमर्श से तैयार हुआ है। मीडिया में दाएं-बाएं के कोण से ज्योति रात्रे जी के व्यक्तित्व पर विभिन्न आयामों पर प्रकाश आपतित हो चुका है। लेकिन उनकी वैचारिकी पर, उनके दार्शनिक पक्ष का अभी तक उत्खनन नहीं हुआ है। मैंने यहां कुछ अलग तरह से उनके फिलासाफिकल केनवास पर रंग भरने की कोशिश की है जो सीधे संवादों के जरिए तो कतई संभव नहीं था।
जीवन दर्शन
इसी विचार क्रम में एवरेस्टियन ज्योति रात्रे जी से मैंने जीवन के लक्ष्य पर दार्शनिक पक्ष के नजरिए से बात की,जो इस आलेख में यहां दर्ज हो रहा है। आगे बढ़ें इसके पहले एक शायर की बात यहां याद आ पड़ती है वो कुछ ऐसी है- शाम को तुम जाकर छत पर देखना,धूप ने क्या लिखा पढ़ कर देखना। बहुत मुश्किल है अपने-आपसे जीतना, हां! कभी खुद से लड़कर देखना। देखा आपने! कितनी सीधी-सरल बात कही गई है कि जीवन के संध्याकाल में जब हम देह या शरीर से मुक्ति की बात सोचते हैं तब बहुत मुश्किल होता है पदार्थवादी मोह के संसार का त्याग। ये पंक्तियां मेरे स्मृति शेष मित्र अनवारे इस्लाम की हैं।
सुपर कंडक्टिविटी
हमारे इस आलेख की वरेण्य विभूति ज्योति रात्रे की परम साहसिक यात्रा के संदर्भ में समझें तो पर्वतों के शिखरों की ओर की यात्रा स्वयं को खाली कर, निर्भर कर शून्यता की यात्रा है। जाहिर है ये सफर शरीर के बोध को शून्य करने का सफर है।
हमारा अनुभव है कि जीवन के कुल समय तक दिलो-दिमाग से ही हम अपने शरीर में वास किया करते हैं। शरीर का मोह छूट ही नहीं पाता अंत तक। हम जानते ही हैं कि अंदर-बाहर से हम ऊर्जा पुंज से घिरे हुए हैं। लेकिन जब आप अंदर-बाहर के इन ऊर्जा पुंजों को चैनलाइज करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं तब आपको अपने शरीर को एक पवित्र स्थान मानकर ही उसे ऊर्जा का सुपर वाहक, चालक बनाना होता है। स्पष्टत: यह इशारा सुपरकंडक्टीविटी की ओर है जिसका आजकल विज्ञान के आविष्कार जगत में चर्चा जोरों पर है। जब आप सर्वाधिक ऊंचाई पर विचरती पाक़-साफ़ हवा और काॅस्मिक एनर्जी की ओर अग्रसर होते हैं तब उन्हें अपने में समाहित करने के लिए आपको अपने- आपको एक स्वच्छ और फाॅल्टलेस पात्र या कंडक्टर बनाने की कवायद शुरू करना होती है। पवित्रता की ओर बढ़ते हुए अब आपकी यात्रा खुद को खाली करने की होती है। ताकि नव स्थान में नवागत ऊर्जा का स्वागत हो सके। ऐसे में अब आगे ऊपर की ओर बढ़ते हुए हर कदम पर ऊर्जा संरक्षण ही ऊर्जा का उत्पादन है ऐसा सोच में भर आता है और अब यही आपका मूलमंत्र हो जाता है। जैसे-जैसे आप ऊंचाई की ओर बढ़ते चलते हैं, ऊर्जा संरक्षण का गणित व विज्ञान यहां लागू होता चलता है। बेकाम के विचार झड़ते चले जाते हैं। हर तरह का भ्रम, कोलाहल, शोर पीछे छूटता चला जाता है। आपका आहार चयनित व सघन हो जाता है। आपकी सांसें गहरी होती चली जाती हैं, आपकी प्राण ऊर्जा में चैतन्य घुलता चला जाता है, अब यह मौन की ओर की यात्रा होती चली जाती है,यहाँ हैं सीमित विचार पर हाइली एनर्जिएटिक, ड्राय फ्रूट्स में समाई ऊर्जा के जैसे। शिखर की ओर जाना पहले मृत्यु से होकर पार गुजर जाना है, समाधि अवस्था को जान जाना है, संन्यास का अर्थ समझ जाना है।

शिक्षा,ध्यान, शून्यता, निर्वाण
तत्पश्चात कुछ देर हमने आपस में कुछ बातें समाधि अवस्था यानी शून्यता को भी समझने के हिसाब से कीं। इसके पहले बात हमने ध्यान विषय से शुरू की। मनुष्य जीवन के एकमेव लक्ष्य मोक्ष या निर्वाण की प्राप्ति की ओर कदम रखने के पहले जब आप उन आठ चरणों की सीढ़ी की ओर कदम बढ़ाते हैं जिनका उल्लेख पतंजलि योग सूत्र के अष्टांग मार्ग के रूप में दर्ज है। आगे हमारा संवाद शिक्षा-दीक्षा और सीखने की आनुभविक सामाजिक प्रणाली पर केन्द्रित था। हमारी बातचीत आगे बढ़ी और अनुभव से प्रारंभ हुई।
कुछ अनुभव ज्ञान से जुड़े होते हैं तो कुछ अनुभव ध्यान में आते हैं। ध्यान के माध्यम से पवित्रता बोध आ जाने पर परम पिता द्वारा प्रदत्त किए जाने वाले विज्ञान और दृष्टि का मार्ग खुलता है। यहां समझ आ जाता है कि सब कुछ पूर्ण का ही अंश है और सारे अंशों का स्पंदन एक संपूर्णता की दिशा में है। एकात्मकता की प्राकृतिक जागृति। अब आप जान जाते हैं इस चक्र में सब आप से ही शुरू है और आप पर ही समाप्त है। यहां आप आगे हैं न पीछे। हम सब सबके साथ एक परिधि पर परिक्रमा पथ पर हैं सदा गतिमान- चलायमान। ऐसी अवस्था में आपको कण-कण में संपूर्ण एक दिखाई दे जाता है। यहां तक कि अनगढ़ में का अनिंद्य सौन्दर्य आपके सामने साक्षात होता है।
तब आपको सृष्टि को चलायमान बनाए रखने वाली हर ऊर्जा,हर शक्ति का मर्म समझ आ जाता है फिर तो कोई भी,किसी भी किस्म का ज्ञान गुह्य यानी सीक्रेट नहीं रह जाता और यह सब अज्ञान की गठरी की गठान खुलने भर से होता है। एवरेस्टियन ज्योति रात्रे संवाद को दिशा देते हुए आगे कहतीं हैं कि लेकिन इसके आगे का भी एक अलग आयाम है,डायमेंशन है,आगे अभी उसकी भी हम बात करेंगे,मैंने सहमति जताई।
द्वैत से अद्वैत तक और गीता संदेश
हमने शुरूआत में ही कहा कि विशाल की उपस्थिति से आसपास के हर मामूली में फर्क आना शुरू हो जाता है। आप समझ ही गए होंगे कि यहां बात अद्वैत और द्वैत के पारस्परिक संबंधों की हो रही है। स्पष्ट है अद्वैत के शिखर पर भला शरीर का क्या काम। तो जहां शरीर नहीं वहां बुद्धि नहीं,फिजूल तर्क नहीं। शिखर जब निर्विकार भाव से आपको देखता है तो उसकी एक दृष्टि ही आप में महासिद्धि उत्पन्न करने वाली होती है। यह ज्ञान वे लोग और उनकी किताबें दे जातीं हैं जिन्हें कभी पूरा पढ़ सकना संभव ही नहीं,इसके लिए अपार पवित्रता चाहिए। सुखद असंभव आपके हाथों तभी घटता है जब वह विचार में ही नहीं होता,वह बस होता है जो परिणाम कहलाता है। जब केवल वह होता है तब आप भी नहीं होते,आप उसमें होते हैं वह आपमें। मगर बाद में परिणाम आपके हिस्से आता है इसलिए कि वह होना आपके माध्यम से घटा है,यह आप ही जानते है कि आपने कुछ नहीं किया है वह उसके होने से हुआ है। यह विधि की,एक प्रोसेस की बात है,भला प्रोसेस को,क्रियाविधि को भी कोई देख सकता है,साक्षी के भाव के अलावा। परिणाम की चिंता के साथ किया गया कर्म खुशी वाला परिणाम नहीं दे पाएगा क्योंकि वहां चिंता भी घुली हुई है। खुशी के साथ किया गया कर्म अपने परिणाम में आनंददायक आश्चर्य लेकर आएगा वह खुशी का एक्सपोनेंशियल फार्म होगा। यहां तक आकर विदुषी ज्योति रात्रे जी मंद-मंद मुस्कुराती हैं और कहती हैं कि गीता में निष्काम कर्म की शिक्षा के पीछे यही दर्शन है। जी हां!
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” श्रीमद्भगवद्गीता (2.47) का प्रसिद्ध श्लोक है, जिसका अर्थ है कि आपका अधिकार केवल कर्म (कर्तव्य) करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं। कृष्ण कहते हैं कि फल की चिंता में न पड़ें और न ही कर्म से विमुख (आलसी) हों, बल्कि निष्काम भाव से निरंतर प्रयास करते रहें।

अनुभव का अनुभव खेल-खेल में
मैं अक्सर सोचा करता था कि आखिर स्पोर्ट्स या खेल गतिविधियों का हमारे व्यवहार पर कैसा असर आता है! एवरेस्ट विजेता ने स्पष्ट किया कि खेल दरअसल अनुभव शब्द का,भाव का साक्षात अनुभव हैं जो भौतिक और आध्यात्मिक रूप से ऐसा बहुत कुछ सिखा जाते हैं जो कई किताबें भी नहीं कर पातीं। खेल के फील्ड में अपने उस्ताद आप स्वयं होते हैं यानी जो कुछ करना है अपने भरोसे ही करना है। खेल अनुशासन से प्रेम करना सिखाते हैं। अनुशासन से ही आत्मिक शुद्धीकरण की,आसवन की,प्योरिफिकेशन की प्रक्रिया सिद्ध होती है। फिर कई अंधेरी रातों,डार्क नाइट ऑफ सोल से गुजरने के बाद,कई मर्मान्तक अनुभवों के बाद शिखर पर पहुंच कर आपका आपके हाथों एक नया जन्म होता है। इस जन्मने को नारी शक्ति के सिवाय भलीभांति और कौन समझकर बयान कर सकता है,तभी तो यह सब कहन एवरेस्टियन ज्योति रात्रे के जरिए बाहर आई। दुष्यंत जी ने लिखा ही है- ये जो व्यथा वहन कर रहा हूं मैं, तुम्हारी कहन थी कहन कर रहा हूं मैं। इसी बात को भाई जहीर कुरेशी भी यह कहकर आगे बढ़ा गए कि- सबको लड़ने ही पड़े अपने-अपने युद्ध,चाहे राजा राम हों या हों गौतम बुद्ध।
आजकल घरेलू शिक्षा के लिए वातावरण और समय किसी पैरेंट्स के पास नहीं है,वहीं संस्थागत प्रणाली यानी स्कूल व कालेजों में भी अनुभव आधारित शिक्षा प्राथमिकता में नहीं है।अनुभव आधारित शिक्षा का मूल फंडा यह है कि जीवन के संवेदनशील पहलुओं के साक्षात्कार के समय यानी सीखते समय हृदय से काम लो बजाय बुद्धि के। हृदय के द्वार हमेशा खुले रहते हैं, वहां शून्यता का, आती-जाती ऊर्जा का अक्षय भंडार है। वहां कोई दूसरा नहीं होता। वहां एकांत का वृक्ष हरदम हरा है। वहीं इसके उलट बुद्धि यह कभी नहीं मानती कि मैं जानती नहीं हूं। खालीपन उसे नहीं भाता। जबकि सीखने का सत्य यही है कि जब आप खाली होते हैं तभी भरना शुरू होता है। जब आप नहीं जानने की अवस्था में होते हैं तब ही जानने को सीखना प्रारंभ होता है। स्पेस जिसमें सारा जानना समाहित है खालीपन के स्थान में उतरता है। कांशसनेस स्वयं ऊर्जारूपी कर्ता है,वह कोई संज्ञा रूप नहीं है,यह तो हमारे समझने-समझाने का कॉन्सेप्ट है, चैतन्य की खासियत है कि वह सत्य के हर पहलू को,परसेप्शन को एवेलेबल रिसोर्सेज के माध्यम से समझाते चलता है। उसका यह दिलचस्प खेल या कहें टीचिंग दिन-रात,सोते-जागते में चलता ही रहता है और यह तब-तब पकड़ में आता है जब-जब आप सजग स्थिति में हों, नि:शब्द।
मौन की सत्ता
शब्द से परे मौन की अलग सत्ता है,यूनिवर्स है,यह पड़ाव है सत्यानुभूति तक पहुंचने के पहले का। सत्य दूर होगा तो पुकार की आवश्यकता होगी,मगर जहां दूरी मिट जाती है वहां फिर आवाज़ की ज़रूरत नहीं होती। शिखर एक बिंदु है लकीर नहीं,तभी तो वहां कोई दूरी नहीं, वहां आप साक्षात शिव-शक्ति का,पोटेंशियल एनर्जी और काइनेटिक एनर्जी का मिलन बिंदु हैं, सिंगुलेरिटी प्वाइंट।
इसी तारतम्य में मैंने यह कहकर बात आगे बढ़ाई कि शिखर पर जब आप अकेले वह भी नि:शब्द होते हैं तब भला ऐसा क्या घटता है जो वर्णनातीत होता है। विदुषी ज्योति ने अपने मतानुसार अभिव्यक्त करते हुए कहा कि फिर नि:शब्द के वातायन में ज्ञान से परे जो है उस अदृश्य ज्ञान की अनुभूति होती है,तब यह अनुभव ध्यान में समा जाता है हमेशा के लिए।
इसके यानी कांशसनेस की ऊर्जा के हर स्पर्श के साथ उसमे सन्निहित बोध की आप पर और उसके बोध पर आपकी पकड़ समय के साथ-साथ और और मजबूत होती चली जाती है,जैसे-जैसे आप मिटते चले जाते हैं आपका मैटर भाव नष्ट होते चला जाता है और उस असीम ऊर्जा के साथ आप कपल्ड मोड में आ जाते हैं संपूर्ण रूप से संचालित डिसाल्व्हड। मैंने सहमति के साथ आगे कहा कि इस स्थिति में अब ऊर्जा और मैटर का एकीकरण हो चुका होता है,यही अतिमानस का नवजीवन है,अवतरण है। इस शक्ति से प्रेरित सारे शास्त्रों के ज्ञान एब्रिविएटेड फॉर्म में फिर आपके अंदर भी प्रविष्टि होते है उसके बाद यह निर्भर करता है कि उसकी प्रस्तुति आप किस मंच पर किस ढंग से किस शैली में करते हैं। इस प्रविष्ट बोध ज्ञान के बाद प्रकृति की हरेक क्रिया-घटना को बयान करने के लिए फिर अलग से किसी शास्त्र का सहारा लेने की जरूरत नहीं रह जाती।
ऊर्जा और मैटर की संयुक्तता और उसकी विशालता का अहसास जैसे ही हो जाता है,आपको मालूम पड़ जाता है कि यहां आप एक तैराक हैं और विशाल का उत्प्लावन बल यानी बायोयेंट फोर्स आपकी समझ के भीतर समाहित हो जाएगा,कभी डूबने न देगा।
आप और आपसे दूर रोशनी के स्रोत के बीच आपकी इंद्रियां एक साथ फोकस्ड होकर जब सक्रिय अवस्था में आ जाती है और जब आप शीतावस्था में होते हैं तब एक बादल का निर्माण होता है,तब ही ऊपर से झरना बह निकलता है,गंगोत्री विराजमान हो जाती है।

शिखर पर अद्वैत से परिचय
शून्यता के शिखर बिंदु पर शक्ति हस्तांतरण की प्रक्रिया होने का संकेत भारत के अनेक यशस्वी योगियों ने अपने संस्मरणों में किया है, इस बारे में लाहिड़ी महाशय और परमहंस योगानंद सरस्वती ने इसके उदाहरण दिए है। विदुषी ज्योति रात्रे ने भी किसी एक अलौकिक शक्ति के अस्तित्व की अनुभूति को स्वीकार करते हुए कहा कि उस अनुभव का बयान शब्दातीत है।
शक्ति का संकल्प और जेन्डर समभाव
एवरेस्ट विजेता के इन उद्गारों को समेकित कर कहा जाए कि संकल्प यह एक फेमिनाइन ऊर्जा है,शक्ति है अत: यह उस पात्र में ही उतरती है जो सर्वथा योग्य हो। इसके गर्भ में प्रवेश बिना आचरण,निष्ठा,नैतिकता,सत्यवादिता की परीक्षा उत्तीर्ण किए बिना नामुमकिन है। अनुशासन,संयम और साधना के बगैर साध्य को पाया भी तो नहीं जा सकता सभ्यता, समाज,संस्कृति के निर्माण के ये बुनियादी तत्व हैं। इन वृत्तों की परिधि के भीतर ही वास्तविक स्वतंत्रता है और आज़ाद सोच की डोर ही वांछित मुक्ति तक पहुंचाती है जो कि मोक्ष है।
जेंडर न्यूट्रल सोच व व्यवहार के स्वप्न की दिशा में हम अभी भी पाते हैं कि नारी शक्ति की अलग पहचान बनाने के उद्देश्य से ही बाधा या विक्टिम कार्ड के जरिए उसकी आइडेन्टिटी स्थापित की जाती है जबकि आइडेन्टिटी अपने-आप में द्वैत का मूल्य है,वह उसी घेरे में आपको हर बार की तरह घुमाएगा, निकलने न देगा। ऐसे में कि एवरेस्ट विजेता विदुषी ज्योति रात्रे का यह दर्शन अधिक समीचीन है कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के परस्पर सम-सखाभाव के उदाहरणों यथा गार्गी,मैत्रेयी,भामती,अश्रया,लोपामुद्रा, रेणुका,अरुंधती, सुलभा,अदिति,अपाला आदि के द्वारा भारतीय मनीषा में किए गए योगदान को स्मरण करते हुए व्यक्तित्व विकास के मानदंड तय किए जाएं, न कि संघर्ष, उद्वेलन के जरिए जेन्डर इक्वेलिटी के प्रयास की दिशा विनिर्दिष्ट हो कहना न होगा कि इस सरल हृदयमना भारतीय विदुषी ने अपनी समस्त अप्रतिम उपलब्धियों का श्रेय अपने जीवन सखा श्री कृष्ण कुमार रात्रे जी, माता-पिता,गुरू, परिवार और सेम वेव्हलेंग्थ के मित्र मंडल को दिया है।
एक कविता बछेंद्री पाल से संबंधित कुछ ऐसी कहीं पढ़ी थी कि
हताश लोगों से एक ही सवाल, हिमालय ऊंचा या बछेंद्री पाल।
आज वर्षों बाद नई कविता रचने का समय है जो कुछ ऐसी होगी-
असंभव को संभव करने के हैं रास्ते, हिमालय से बताने आई ज्योति रात्रे।
महान ओशो के वाक्य में कहता हूं
प्रामाणिक होने का अर्थ है स्वयं के प्रति सच्चा होना। यह एक बहुत ही खतरनाक बात है; बहुत कम लोग ऐसा कर पाते हैं। लेकिन जब कोई ऐसा करता है, तो वह इतनी सुंदरता,अनुग्रह और संतोष प्राप्त करता है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।
पुण्य सलिला नर्मदा की गोद में पली-बढ़ी अदम्य जिजीविषा और साहस की प्रतिमान इस अप्रतिम नायिका को संपादक मंडल की ओर से असीम शुभकामनाएं।
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