एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
21 अगस्त 2007 मथुरा-वृंदावन : बृजभूमि भ्रमण
सुबह चार बजे के करीब मथुरा स्टेशन पर उतर गए। एक और बिना टिकिट सफर सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। रात में बिस्किट और नमकीन खाकर पानी पी लिया था। सोचा थोड़ी देर यहीं रूक लें, लेकिन पेशाब की बदबू इतनी थी कि अंधेरे में ही निकल पड़े। बाबा ने कहा एक-डेढ़ किलोमीटर पर एक आश्रम है। अंदाज से चलते गये। बाबा को भी यहां की कोई विशेष जानकारी नहीं लगती। बाबा कहते है सब जानते है, सबको पहचानते हैं, रूकने के सैकड़ों ठिकाने हैं, अपने कई स्थान हैं, महीनों जहां चाहें रह सकते हैं, अपने को सब जानते हैं, आदि-आदि…। परंतु वास्तविकता ठीक इसके उलट है। मैं उनका यह दुस्साहस समझ ही नहीं पाया कि कैसे कोई व्यक्ति इस तरह का दावा कर सकता है। जबकि वह स्वयं जानता है कि इस झूठ का भंडाफोड तुरंत ही हो जाएगा। शायद बाबागिरी का यह एक अनिवार्य गुण है?
चलते-चलते एकदम सड़क पर ही एक धर्मशालानुमा मंदिर दिखाई दिया। गेट बंद है। मैंने पूछा, “ये कौन-सा मंदिर है?” बाबा ने कहा “चलो यहीं रूक जाते हैं।” अभी एकदम अंधेरा है। बाबा ने तो गेट के बाहर सड़क के किनारे, मच्छरों के बीच बिस्तरा लगाया और सो गया। मैं टहलता रहा। पांच बजे के करीब गेट खुला तो अंदर गए। एक बरामदे में आसन जमाया। यह महंत नृत्यगोपाल दास के चेले महंत हरिहरदास द्वारा स्थापित आश्रम है। पैसा बंबई के सेठों का लगा है। नृत्यगोपाल दास का नाम अयोध्या के संदर्भ में चर्चित हुआ था। थोड़ी देर में स्नान कर लिया। चाय मिल गई। बिस्किट खा लिए। बाबा फिर सो गया। मैं बैठकर लिखने लगा। पानी गिर रहा है। इस बीच बाबा ने हवन कर लिया था। थोड़ी देर में खाना तैयार हो गया। यहां का जितना खराब खाना है उतना ही तिरस्कारपूर्ण व्यवहार भी है। यहां सब तनखइया रहते हैं, कोई साधु नहीं है। उनको यहां आकर रूकने वाले बोझ लगते हैं। अयोध्या के एक साधु को तो खाते हुए नमक मांगने पर बहुत जोर से झिड़क दिया। खाकर बाबा फिर लेट गया। थोड़ी देर में उठे। मैंने कहा, चलो वृंदावन चलते हैं। कृष्ण जन्मभूमि देखते हुए वहां पहुंच जाएंगे।
दो बजे के करीब पानी रूका तो निकल पड़े। पूछते-पूछते रेल्वे लाइन के किनारे चलते हुए विवादित कृष्ण जन्मभूमि पहुंच गये। कृष्णचरित भारतीय साहित्य का सबसे रूचिकर, मनमोहक,रहस्यमय और रोमांचित करने वाला चरित्र है। मथुरा,वृंदावन आना जैसे किसी सपने के पूरा होने जैसा भी है। उम्मीद है यहां बहुत कुछ समझने को मिलेगा। परंतु यहां जबर्दस्त सिक्यूरिटी से साबका पड़ा। एक बहुत बड़ी पुरानी शाही ईदगाह मस्जिद बनी हुई हैं और उससे एकदम लगा हुआ, उससे भी बड़ा आधुनिक कृष्ण मंदिर, धर्मशाला, अतिथि गृह आदि बने हैं। सब सामान, मोबाइल आदि बाहर जमा करके व खूब तलाशी के बाद अंदर जाने देते हैं। दोपहर के समय भीड़-भाड़ थोड़ी कम हो जाती है क्योंकि इस समय अधिकतर मंदिरों के पट बंद रहते हैं। हां, कृष्ण जन्मभूमि स्थल खुला हुआ है। उसके अंदर गए। कारागार की तरह ही बना हुआ है। जैसी कि किंवदन्ती है कि कारागार में ही श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। बहुत प्राचीन तो नहीं है, लेकिन यह हिस्सा है तो पुराना। उसके एकदम पीछे दीवार से दीवार लगकर मस्जिद है। कमोबेश कॉमन दीवार ही है। यहां बड़ी विस्फोटक स्थिति दिखाई दी। कभी भी, कुछ भी हो सकता हैं। कोई एक व्यक्ति भी ठान ले तो कहर ढ़ा सकता है। साथ ही यह बात भी समझ में आ रही है कि प्रत्येक धार्मिक स्थल को अनावश्यक रूप से विवादित बनाया जा रहा है। यहां आकर ही पता लग सकता है कि स्थितियां कितनी विस्फोटक और संवदेनशील हैं। साथ ही यह भी तय है कि विवाद के निराकरण में दोनों ही पक्षों की ज्यादा रूचि नहीं है। परंतु अभी तो मैं यहां किसी और उद्देश्य से आया हूं। यह उद्देश्य धार्मिक है या आध्यत्मिक? या ‘स्टडी टूर’!
दस-पंद्रह मिनिट रूके और बाहर निकल आए। मुझे भी वृंदावन पहुंचने की जल्दी है, मथुरा में तो दम घुटता है। करीब आधा घंटे में वृंदावन पहुंच गए। घुसते ही बड़ा अच्छा लगा। लोग उतरते गए, टेम्पो चलता गया। आखिर में जाकर रूक गया, हम दोनों ही रह गए। अब बाबा ने टेम्पो वाले से पूछा- ये ग्यारह नंबर कितनी दूर है। उसने कहा दो किलोमीटर पीछे रह गया। इस बाबा को कुछ भी जानकारी नहीं है और किसी से पूछता भी नहीं। मैं तो बाबा की ढ़ीठता देखकर चकित सा हूं। उसे कोई जानकारी नहीं पर गजब का आत्मविश्वास है, अपने झूठ पर! आज का सारा दिन हो गया था भटकते-भटकते।
अब तक थोड़ी थकान भी लगने लगी थी। उतरकर चले वापस-गोशाला धर्मशाला और आगे की ओर। अचानक सामने से एक युवा साधु को आते देखकर बाबा एकदम चहक गया और उसे रोक लिया। वह भी बाबा को पहचान गया। ऐसा लगा एक परिचित को देखकर बाबा की जान में जान आई। दोनों बातें करते रहे, फिर बाबा ने उससे पूछा-कहां रूके हो? उसने स्थान बताया। बाबा ने कहा, चलो हम भी वहीं चलते हैं। वह हिचकिचाया, टालने की कोशिश की फिर कहा-चलो देखते हैं। सैकड़ों दर्शनीय स्थान जानने वाले बाबा अब उसके पीछे-पीछे एक अनजान स्थान को चले। परंतु किसी तरह का कोई संकोच या झेंप उनके चेहरे पर नहीं था। अटल्ला चुंगी पर एकदम रोड पर एक निर्माणाधीन मंदिर है ‘परमहंस राम मंदिर, राजपुर, अटल्ला चुंगी।’ वहीं घुस गए। सीधे बेसमेंट में चले गए। वहां कमरे बने हैं। पर किसी ने घुसने नहीं दिया। बीच में बड़ा सा ढ़का हुआ बरामदा-हॉलनुमा है,उसी में एक किनारे पर आसन जमा दिया। शाम का करीब पांच बज गया था। इसी समय चाय बंटने लगी। हमें भी मिल गई, अच्छा लगा। वह युवा साधु मेरे बैग और वेशभूषा को अच्छी नजरों से नहीं देख रहा है। थोड़ी देर में घूमने निकल गए। बाबा के कहने से सबसे पहले एक त्यागी झोली खरीदी-जरूरी सामान और पैसा साथ रखकर चलने के लिए। डेढ़ सौ रुपए लग गए। फिर आगे गलियों में चलते गए।
यह युवक यहां की गलियों से खूब वाकिफ है। अच्छा मिल गया, बाबा की किस्मत से और विशेष कर मेरी किस्मत से। उसका नाम है प्रहलाद दास, चौबीस-पच्चीस साल का होगा। छोटेपन से वृंदावन क्षेत्र में रहा है। उड़ीसा का जन्म है, त्यागी है। दास तो सभी रामानंदी वैष्णव होते हैं, उनमें त्यागी एक शाखा है। मुझे फिर लगा कि बाबा तो लगता नहीं कि कभी यहां आया भी है। कहने लगा पांच-छह साल पहले आया था, अब बहुत बदल गया है। पता नहीं क्या बदल गया? मुझे तो लगता है कि जैसे कृष्ण जन्म के बाद युग युगांतर से यहां न तो कुछ बदला है और न ही बदलेगा।
बस, वृंदावन की गलियां में चलते चले गए। वृंदावन की गलियों का जिक्र तो कई गानों, भजनों में है, लेकिन प्रत्यक्ष देखने का मौका अभी मिला। वह अनदेखा जैसे अब साकार हो रहा है। चलते-चलते नगर के बीचोंबीच एक स्थान पर पहुंचे। इसे लताकुंज कहते हैं। वृंदावन की कुंज गली में।
चारों तरफ से बड़ी पुरानी मिट्टी की दीवारों से घिरा हुआ एक खुला स्थान, जिसमें लताएं ही लताएं हैं। लताओं का जंगल, लताओं का कुंज। तरह-तरह की आकृतियों के पत्ते हैं, जो पहले कभी देखे नहीं। रेतीली मिट्टी है। अंदर घुसने के लिए पगडंडियां हैं, लेकिन ओर-छोर दिखाई नहीं देता। पूरे वातावरण में एक अजीब सी महक छाई हुई है। सुगंध और दुर्गंध मिली हुई है। थोड़ी देर में समझ में आया कि अंदर लताओं से उठती हुई एक अद्भुत सी अनोखी गंध और दीवारों के बाहर से आ रही मल-मूत्र और गटर की गंध का यह अजीबोगरीब मिश्रण है। कभी एक दूसरे पर हावी हो जाता है और कभी दूसरा पहले पर। यह गजब की पवित्र भूमि है और गजब के श्रद्धालु हैं। लता कुंज के चारों ओर दीवारों से लगा हुआ करीब चार फीट चौड़ा फुटपाथ बना हुआ है। सारे फुटपाथ पर और दीवारों पर संगमरमर के चौकोर पत्थर लगे हुए हैं जिन पर नाम खुदे हुए हैं, कि किसकी याद में, किसने और कब लगाये। सैकड़ों सालों से लेकर अब तक हैं सभी बंगाली या उड़िया भाषा में। एक भी दूसरा कोई नहीं। पूर्वी भारत के लोगों की वृंदावन-मथुरा पर जबरदस्त श्रद्धा है। शायद चैतन्य महाप्रभु की वजह से? ढेर सारे लाल मुंह के बंदर जो बैठे, लेटे या सोए हुए हैं,। प्रहलाद ने बताया कि इन लताओं में बड़े-बड़े सांप भरे पड़े हैं, इसलिये कोई अंदर नहीं जाता। वैसे इन्होंने आज तक किसी को कभी काटा नहीं है। किंवदन्ती है कि हर पूर्णमासी को यहां श्रीकृष्ण और श्रीराधा गोपिकाओं के साथ अवतरित होकर रासलीला करते हैं। स्वाभाविक है, किसी भी मनुष्य को अंदर नहीं घुसने दिया जाता, इसलिए किसी ने उन्हें रासलीला करते देखा भी नहीं है।
यदि इतनी जबर्दस्त दुर्गंध न हो तो यह बहुत ही रमणीक स्थान है जहां घंटों बैठे रहने का मन करे। परंतु वास्तविकता तो वास्तविकता है और वह देवलोक में भी बदलती नहीं। वहां से बाहर निकले। फिर गलियों में चले। कुंज के आसपास की गलियों में अधिकतर बंगालियों के पुराने-पुराने मकान हैं। गलियों को ईंट-खड़ंजे डालकर पक्का बनाया गया है और दोनों तरफ सकरी नालियां हैं। बच्चे इन नालियों में शौच कर रहे हैं, और सुअर बच्चों को डराकर झपटकर वह खा रहे हैं। सोचा शायद नरक की स्थिति कुछ-कुछ ऐसी ही होगी। एक ऐसा स्थान जो कि विश्व के सबसे पूज्य व लोकप्रिय स्थानों में है, वहां ऐसी गंदगी? यहां पर शासन, प्रशासन, तीर्थयात्री और पर्यटकों की सामुहिक अकर्मण्यता स्पष्ट तौर पर नजर आ रही है। पर निदान क्या है?
चलते-चलते बाजार में पहुंच गए। बाजार में बीचों बीच श्री बांके बिहारी मंदिर स्थित है। हवेली के अंदर यह काफी पुराना मंदिर है। इस समय इसे वृंदावन का सबसे पवित्र और आराध्य मंदिर माना जाता है। दर्शनार्थियों की भीड़ लगी हुई है। दूर तक लोग लाइन में खड़े हैं। प्रहलाद हमें अंदर ले गया। दूर से ही दर्शन किए और मंदिर की परिक्रमा भी की। गर्भगृह तक नहीं जा पाए। पिछली बार लगभग सवा साल पहले मई के अंत में वृंदावन आना हुआ था, तब संयोग से सुबह-सुबह बांके बिहारी जी के एकदम पास से दर्शन हो गए थे। तब मंदिर के कपाट तो बंद थे, लेकिन सफाई के लिये खोले गए थे, उसी समय हम अंदर आ गये थे। बड़ी ही सुंदर मूर्ति है और दरवाजों पर बेहद आकर्षक नक्काशी भी की हुई है। बड़ा भव्य मंदिर है।
इसके बाद दूसरे महत्वपूर्ण मंदिर श्री राधागोविंद मंदिर भी चले गए। यहां अंदर तक जाकर दर्शन करने को मिल गए। यह भी बड़ा प्राचीन मंदिर है। इसमें श्री राधा और श्री कृष्ण की बड़ी प्राचीन मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं जो बंगाल स्कूल आफ आर्ट का प्रतिनिधित्व करती हैं। यहां बड़ी शांति है। हम लोग अब तक काफी थक चुके हैं। वैसे लग रहा है, घूमते जाओ। एक जगह रूककर रबड़ी खाई, थोड़े पेड़े भी। बहुत ही स्वादिष्ट रबड़ी बनी है। ‘स्वयंपाकी त्यागियों’ ने भी खूब रबड़ी और पेड़े डटाए। मैंने आलू टिक्की भी खाई। फिर वापस चल दिए। यह वही जगह है जहां पिछली बार सुबह-सुबह बहुत स्वादिष्ट चाय पी थी। छोटे-छोटे कुल्हड़ में। पर इस बार की चाय जमी नहीं। त्यागियों ने भी पी।
वापस अटल्ला चुंगी, राम मंदिर पहुंच गए। यहां शौच और स्नान की अच्छी व्यवस्था है। नहाते-धोते भोजन का समय हो गया। पंगत बैठी दाल, सब्जी और रोटी तथा चावल भी। ठीक-ठाक खाना। काफी सारे लोग हैं। बहुत बड़ा मंदिर है। यह परमहंसों का मंदिर है। जो हैं तो वैष्णव लेकिन ईश्वर के सभी स्वरूपों को मानते हैं और सभी जीव में ईश्वर देखते हैं। इनके लिए वैष्णव, शैव सब समान हैं, सभी मनुष्य बराबर हैं। एक पढ़ा-लिखा महंत और एक बूढ़े भंडारी व्यवस्था देखते हैं। यहां आध्यात्मिक शिक्षा पाने वाले युवा विद्यार्थी भी रहते हैं जो भोजन आदि में मदद करते हैं। यहां रह कर पढ़ते हैं और रात में घुसकर टी.वी. देखते और हंसी-ठिठोली करते हैं। धर्म को लेकर गंभीरता का अभाव हर जगह दिखाई देता है। सबकुछ जैसे यंत्रवत हो रहा है। मंदिर गुजरात के किसी सेठ ने अपने पिता की याद में बनवाया है।
1 सितंबर 2007
यहां गर्मी बहुत नहीं है। पिछली बार मई में आया था। तब भयानक लू वाली गर्मी से पाला पड़ा था। ये मौसम ठीक है। तब इस्कान के मेरे मित्रवत स्वामी महामन दास ने कहा था ‘होली’ में अवश्य पधारना। आए तो हैं जन्माष्टमी में, लेकिन दूसरे रूप में और इस्कॉन से दूर। आरती हुई। यहां अच्छी आरती होती है। राधा-कृष्ण, राम-जानकी, बजरंगबली, देवी और शिव सभी की मूर्तियां हैं। आरती के बाद ढोलक-मंजीरा, हारमोनियम के साथ कुछ साधु और भक्त भजन गाने बैठ गए। चाय का समय हो गया, साथ में जीरे में बघारे उबले काबुली चने, बेहद स्वादिष्ट बालभोग। बाबा और प्रहलाद हवन के लिए बैठ गए। रात में तय किया था कि सुबह चाय पीकर मंदिरों में दर्शन के लिए जाएंगे। अब मना कर दिया। इस बीच सब्जियां निकल आई। मैं भी सब्जियां छीलने और अमनिया करने में मदद करने बैठ गया। करीब एक घंटा तक इसमें व्यस्त रहा।
इसके बाद मैं अकेला ही टहलने निकल गया। थोड़े एकांत की जरूरत भी महसूस हो रही थी। राम मंदिर के बाद थोड़ी ही दूर पर श्री रामकृष्ण मिशन का बहुत बड़ा कैम्पस है। सड़क के दूसरी ओर सामने की ओर जयपुर स्टेट की विशाल प्रॉपटी है-हजारों एकड़। जिसमें एक बहुत बड़ा मंदिर भी है, जो अब राजस्थान सरकार के संरक्षण में है। आगे चलता गया। छोटा सा बाजार है और फिर नगर पालिका चौक, जहां सारी गाडियां आकर रूकती हैं। बाईं तरफ कुछ ऊंचाई पर एक बहुत पुराना विशाल मंदिर दिखाई दिया। चढ़कर ऊपर पहुंचा, अंदर गया। मंदिर की भव्यता और विशालता देखते ही बनती है-लाल पत्थर का बना हुआ। वही जिससे फतहपुर-सीकरी बना है और लगभग उसी समय का यह मंदिर भी है। इतना भव्य और सुंदर मंदिर अब तक बहुत कम ही देखने को मिला है। जयपुर के राजा और सम्राट अकबर के सेनापति मानसिंह ने यह मंदिर बनवाया था और जयपुर से लाकर यहां अपने कुलदेवता श्री गोविंद को प्रतिष्ठित किया था। यह वृंदावन का भव्यतम मंदिर माना जाता था। कहा जाता है कि औरंगजेब के समय इस मंदिर को भग्न करने के लिए आक्रमण हुआ और यहां का पुजारी श्री गोविंद की मूर्ति को साथ लेकर जान बचाकर चुपचाप जयपुर चला गया। वही मूर्ति तब से जयपुर में श्री गोविंद के मंदिर में प्रतिष्ठित है। यहां अब दूसरी मूर्तियां रख दी गई हैं। मंदिर में कई स्थान टूटे हुए है और ऊपरी हिस्सा तो काफी टूटा हुआ है। बहुत देर तक इस मंदिर में रहा और यह सब देखकर बहुत ही दुःख हुआ। यह कैसी बर्बरता, यह कैसा धार्मिक उन्माद कि इतनी सुंदर, ऐसी अमर कृतियों का विध्वंस कर डाला। इस तरह की नृशंसता, बर्बरता और वहशीपन का किस तरह कोई बचाव कर सकता है? सवाल यह भी है औरंगजेब ने अपने ही पूर्वज के सबसे वफादार द्वारा निर्मित एक मंदिर को नष्ट करने का साहस कैसे जुटाया होगा? मुझे लगता है कि इसे महज धर्मांधता का नाम देकर बचा नहीं जा सकता। यह उससे आगे की स्थिति है।
मुझे महसूस हो रहा है कि इस बार आने पर मंदिरों और अन्य परिस्थितियों को देखने का मेरा नजरिया, पिछली बार से कुछ भिन्न है। शायद यहां से लौटने पर अधिक स्पष्टता हो पाएगी। श्री गोविंद के मंदिर से भारी मन लेकर निकला। सड़क के दूसरी ओर थोड़ी दूरी पर एक विशालकाय मंदिर है, जो दूर से देखकर ही दक्षिण भारतीय कला को प्रदर्शित करता लगता है। यह श्री रंग मंदिर है, संभवतः यहां का सबसे बड़ा मंदिर। भगवान के ऐश्वर्य को दिग्दर्शित करता यह मंदिर श्री रामानुज के शिष्य श्री रंगाचारी द्वारा बनवाया गया है। भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों को दिखाते इस भव्य मंदिर में सोने के विशाल स्तंभ आज भी मौजूद हैं। हर तरफ भव्यता, ऐश्वर्य और सम्पन्नता के दर्शन होते हैं। बाहर बहुत बड़ा बोर्ड लगा है, जिस पर लिखा है कि यह ‘पर्सनल प्रॉपर्टी’ है और अन्य हिदायतों के साथ बड़े-बड़े अक्षरों में यह भी लिखा है कि “यहां केवल हिन्दू धर्मावलंबी ही प्रवेश कर सकते हैं।” जब हम बडे़ गर्व से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की बात करते हैं, तो ऐसा कैसे कह सकते हैं कि मंदिर में केवल ‘हिन्दू’ ही आएं। दो में से कोई एक बात तो गलत हो सकती है। वैसे जगन्नाथ जी के मंदिर में भी यही बाध्यता है। खैर, मेरा भ्रमण जारी है, साथ ही नए सिरे से पुनरावलोकन भी। इसके बाद, प्राचीन, ऐतिहासिक श्री राधा-दामोदर मंदिर देखा। लौटने का समय हो गया। लौटते हुए जयपुर इस्टेट के अंदर जाकर श्री राधामाधव मंदिर देखा। मंदिर की दीवारों पर इसे बनवाने वाले जयपुर महाराज और उनकी अंग्रेजों के प्रति वफादारी का अधिक वर्णन है, चलते-फिरते यह भी उल्लेख है कि महाराज साहब ने अपने कुल देवता के लिये यह मंदिर बनवाया। लगभग सौ वर्ष पुराना मंदिर है। अब तो उजाड़ पड़ा हुआ है। वैसे सरकार के संरक्षण में है। मंदिरों में अपनी गुलामी की स्वीकार्यता का यह पूरे भारत में संभवतः एकमात्र प्रमाण होगा। इसीलिए इसे संभालना भी जरूरी है। इससे भारतीय इतिहास का वह पक्ष भी उजागर होता है, जिसमें कि शासकों की स्वार्थपरता का चरम भी स्पष्ट तौर पर उभरता है। एक मंदिर के बाहर लिखा है कि गैर हिन्दुओं का प्रवेश निषेध और उसी से थोड़ी दूर पर बने मंदिर में मुख्य कक्ष में भगवान के साथ-साथ अंग्रेजों के चित्र भी हैं। यही तो है विविधता!
लौटते-लौटते साढ़े ग्यारह बज गये। इस साधु जीवन का नियम है कि साधु सब कुछ छोड़ दें, भोजन नहीं छोड़ सकता। एक बार चूका, तो फिर नहीं मिलता है। अपने इस नए जीवन की इस सबसे बड़ी सीख का हमेशा ध्यान रखना जरूरी है। इतना ही नहीं, अच्छा मिले तो दोनों समय का एक साथ खा लेने में भी बुराई नहीं है। राम मंदिर पहुंचा, तो देखा बस भोजन लगने की तैयारी चल रही है। अभी तो मैं भी गर्व के साथ पा सकता हूं, क्योंकि साग अमनिया करने में सहयोग किया है। भोजन अच्छा बना था और अच्छे से खाया। थोड़ी देर आराम किया और लगभग एक बजे निकल पड़े घूमने। सबसे पहले श्री मदन मोहन के प्राचीन मंदिर पहुंचे। यमुना के किनारे एक टीले पर बना हुआ बहुत प्राचीन मंदिर है। अब तो यमुना का पाट इससे लगभग आधा कि.मी. दूर खिसक चुका है। संभवतः यह वृंदावन का सबसे ऊंचा टीला है। सुंदर मंदिर है पर अभी बंद है। आश्चर्य कि यहां पर एक स्तूप सा बना हुआ है जिस पर स्पष्ट तौर पर बौद्ध स्थापत्य कला का असर दिखाई दे रहा है। यह बंगालियों का गौड़ मंदिर है। कहते हैं कि एक बार यमुना में ऐसी बाढ़ आई कि मंदिर का एक शिखर ढह गया और शिखरों पर जितना सोना चढ़ा था वह चोर उतारकर ले गये। भगवान को अन्यत्र ले जाना पड़ा। यानी भगवान भी विस्थापित हो गए। पास ही इससे लगा हुआ दूसरा नया मंदिर है, जिसे बिड़ला ट्रस्ट द्वारा बनाया गया है।
श्री मदनमोहन मंदिर से ही कुछ दूरी पर यमुना किनारे एक सुंदर घाट और मंदिर दिखाई देता है। मैंने कहा, वहां चलेंगे। बाबा ने तो टालने की कोशिश की, लेकिन प्रहलाददास तैयार हो गया। मुझे लगा साथ घूमने के लिये सियाचरण बाबा बहुत ही अनुपयुक्त व्यक्ति है। इसे कुछ देखने, जानने या घूमने में कोई रूचि ही नहीं है। शायद मेरी किस्मत में ही वृंदावन जैसी जगह में अनुपयुक्त व्यक्तियों के साथ आना बदा है। वैसे सबसे अच्छा अकेले घूमना ही होता है। सुबह बहुत आनंद आया था। खैर, चल दिए। धूप और गर्मी अच्छी-खासी हो गई है। अब हम वृंदावन परिक्रमा मार्ग पर हैं,काफी दूर तक यमुना के किनारे-किनारे चलना हो रहा है। पांच कोशी परिक्रमा, यानी लगभग 15 किलोमीटर यमुना के किनारे-किनारे सड़क पर। इच्छा है कि यमुना जी के दर्शन और आचमन कर लिया जाए और सिर पर पानी डाल लिया जाए। चलते चले गए। मगर, दिखाई पड़ रहा है कि नगर के सारे खुले गटर आकर यमुना में प्रवाहित हो रहे हैं। पाट तो दूर खिसक ही गया है।
चलते-चलते केशीघाट पहुंचे। यहां पानी घाट तक है। इतना सुंदर घाट और उस पर बना हुआ इतना सुंदर मंदिर और महल। मैंने कभी किसी नदी के तट पर ऐसी भव्यता नहीं देखी।
लेकिन नदी? नदी की दुर्दशा देखकर एकदम रोना आ गया। किसी भी नदी में इतना गंदा पानी भी मैंने आज तक नहीं देखा। बहुत हिम्मत करने के बावजूद यमुना का जल छूने का साहस नहीं बटोर पाया। जहां भी हाथ डालना चाहा, एकदम गटर से निकला हुआ मैला, पानी में ऊपर दिखाई दिया। मंदिर की एक दीवार पर लिखा है- “क्या यमुना जी की दुर्दशा पर आपको रोना नहीं आता?” सचमुच रोना आता है। यहां आने वाले तीर्थयात्रियों, पर्यटकों को भी अवश्य रोना आता होगा। लेकिन स्थानीय निवासियों और स्थानीय प्रशासन के लिए तो जैसे यह पवित्रता का प्रतिरूप है। यमुना गंदी रहेगी तो ही तो साफ करने के लिए पैसे मिलेंगे। किंवदन्ती है कि इस घाट पर श्री कृष्ण ने केशी नामक राक्षस का वध किया था। भरतपुर के राजा ने यहा घाट, मंदिर, महल बनवाए थे। यहां बंगाल के संतों, उड़ीसा के भक्तों और राजपूताना के राजाओं का योगदान और प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। राजपूताना की हर बड़ी स्टेट जयपुर, उदयपुर, जोधपुर, भरतपुर, अलवर सभी के मंदिर व महल वृंदावन में बने हुए है। राजस्थान में भगवान कृष्ण का बड़ा मान व लोकप्रियता है। मीराबाई के बाद शायद यहीं इतने राजघरानों का मिलन नजर आता है।
केशीघाट से आगे बढ़े। प्रहलाद के कुछ परिचित साधु मिल गये। वह उनके साथ दम लगाने लगा। मैंने बाबा से पूछा तो बोला, अरे वह गांजा नहीं पीता। यह व्यक्ति कुछ भी नहीं जानता। आगे चले डेरहा बाबा का टेकरी मंदिर आया। डेरहा बाबा का नाम भी अयोध्या आंदोलन में चर्चित हुआ था। फिर चैतन्य कुटी। कुछ परिचित साधु मिल गए। एक ठेले के पास बैठकर चाय पी। आगे चलकर सुदामा कुटी, वंशीवट पहुंचे। यह उन दो स्थानों में से एक है जहां रूकने का सोचा था। त्यागियों का यहां सबसे बड़ा केंद्र है और सबसे गंदा स्थान। सैकड़ों, हजारों साधु, भिखारियों की तरह यहां बंदरों और कुत्तों के साथ पड़े हुए हैं। यहां आकर तो शायद गंदगी भी शरमा जाए। आकर ऐसा लगा कि गंदगी वीभत्सता में बदल गई है। एक तरफ एक मंदिर में काफी भौंड़ी कृष्ण लीला चल रही है। अंदर दम घुटने लगा, मैं बाहर आकर सड़क के किनारे पुलिया पर बैठ गया। वे दोनों करीब आधा घंटे में निकले। फिर आगे बढ़े। वहीं परिक्रमा मार्ग, मोरकुटी पर रूके। त्यागियों की कोई जमात आई हुई है। आगे बढ़े। साक्षी गोपाल मंदिर पहुंचे। वे दोनों थक गये, मैं चलता रहा। बातें बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन चलने में अलाल हैं। मुझे महसूस हुआ न तो इनमें बौद्धिकता है और न ही शारीरिक दृढ़ता। मंदिर के पास आकर रामदास काठिया बाबा मार्ग मिला। करीब आठ बजे मंदिर पहुंच गये। आठ किलोमीटर के करीब चले होंगे, आधी परिक्रमा।
क्रमशः…
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