एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-28

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
22 दिसंबर 2007
कल रात भूरु के घर खाट पर सोने से दिन भर पीठ में दर्द रहा, इसलिए आज रात जमीन पर सोया। बिछाने के लिए तो मिल गया लेकिन ओढ़ने के लिए इनके यहाँ कुछ नहीं था। मेरे पास जो भी है, वही सब ओढ़कर सो गया। रात में तो ठंड थोड़ी कम ही थी। सुबह ज्यादा ठण्डक थी और लगता है सिर में घुस गई। सुबह से उठकर घूमने भी निकल गया। बहुत ठण्डक है। किले तक जाना तो चाहता था, लेकिन रास्ते में कुत्ते बहुत हैं, इसलिए आधे रास्ते से लौट आया। लगता है ठंड लग गई, बहुत छींकें आ रही हे और नाक बह रही है। जालम सिंह का दूसरा बेटा सुनील खुले में आँगन में सो रहा था, एक पतली-सी कथरी ओढ़कर, रात भर खेत में पानी देता रहा। उसे कोई सर्दी-वर्दी नहीं हुई।
बाबा ने कहा थोड़ी दूर पर एक बड़ा बाँध है, वहाँ तक घूमने चल सकते हैं। वहीं से सिंचाई के लिए पानी इनके खेत में भी आता है। वहाँ चोम सिंह रहता है और खेती करता है, मंदिर बना रखा है। 4-5 कि.मी. पैदल चलना होगा। मैंने कहा चलो। 4 कि.मी. चलकर वहाँ से अंदर दूसरी तरफ करीब 2 कि.मी. आगे जाकर रामपुरा बाँध के पिछले हिस्से पर पहुँचे। देखकर तबियत खुश हो गई। यह तीन तरफ से पानी से घिरा हुआ एक छोटा सा टापू है जहाँ तीन-चार छोटी-छोटी झोपड़ियाँ बनी हुई हैं। एकदम आश्रम की तरह प्रतीत हो रहा है। एक पहाड़ी पर छोटी-सी बगिया-सी है, जिसके अन्दर इन आदिवासियों के मूल देवता ‘बाब देव’ स्थापित हैं। यह भील और भिलाला दोनों समुदायों के मुख्य देवता हैं। दीपावली के एक दिन पहले बाबदेव के यहां पूर्वजों की पूजा करते हैं। मुर्गे, बकरे की बली और शराब का भोग लगता है। सारा गांव सामूहिक पूजा करता है। गौंड़ लोग अपने मूल देवता को बड़ा देव कहते है। बिलकुल उसी तरह पत्थरों के ढेर पर पेड़ों के झुरमुट में बड़ा-सा पत्थर रखा हुआ है, जिसके आसपास छोटे-छोटे झंडे और लोहे के छोटे-छोटे अस्त्र-शस्त्र और मिट्टी से बनाई गई आकृतियों का ढेर लगा हुआ है। बड़ी सुंदर जगह है। यह बाबदेव या बड़देव ही शिवलिंग का मूल होगा। ऐसा समझ आता है। इस लिहाज से शिवलिंग से शिवगंगा काफी अर्थपूर्ण है।
बाबदेव को प्रणाम करके चोम सिंह बाबा की कुटिया की तरफ चले। वैसे ही दाढ़ी-बाल वाला ठेठ भील आदिवासी 40-50 साल का बाबा है जो तुअर उड़ाने में लगा हुआ है। हमें वहां देखकर काम छोड़कर स्वागत में जुट गया। यहाँ बाँध के पानी के किनारे टीले पर पाँच झोपड़ियाँ बनी हुई हैं। इसमें से एक बाबा की और चार उसके भाइयों की हैं। सब यहीं रहते हैं और इन्हीं पहाड़ियों के पत्थर और झाड़ियाँ साफ-करके खेती करते हैं। बाबा का ज़्यादा समय बाबदेव की सेवा में लगता है। यहीं एक प्राथमिक पाठशाला का कमरा भी 2-3 साल पहले बन गया है। वहाँ के बच्चों के लिए खाना बनाकर भी उनकी कुछ आय हो जाती है। बिजली और सड़क यहाँ नहीं है। इनके बच्चे भी यहीं पढ़ लेते हैं।
बाबा के बाप की अच्छी खेती थी। वह सारी जमीन इस बांध में डूब में चली गई। उसके मुआवजे में कोई पैसा तो नहीं मिला, उसके बदले दूर किसी गाँव हीरापुर के पास जमीन मिली लेकिन उसने वह जमीन लेने और यहाँ से जाने से इंकार कर दिया। शहरी व्यक्ति मुआवजा ठुकराने की बात सोच भी नहीं सकता। परंतु इनका अपनी भूमि से लगाव वास्तव में आश्चर्यचकित करता है। खेती बाड़ी तो चली गई, घर भी डूब में आ गया और गिर गया, लेकिन ये लोग यहीं टीले पर कच्ची झोपड़ी बनाकर रहने लगे और मेहनत मजदूरी करके, लकड़ी बेचकर पेट पालने लगे। बाँध बनाने में इन्हीं लोगों ने बचपन से मजदूरी की। यह लगभग 30 साल पहले की बात है, जब ये बेघर हुए और यहाँ रहते रहे। ईसा के सलीब उठाने की घटना याद आ गई। माँ-बाप दोनों मर गए। बड़े भाई ने पाला। बड़े हुए, शादी ब्याह हुए, बच्चे हुए लेकिन यहाँ से हटे नहीं। अब जंगल और सिंचाई विभाग ने इनकी उपस्थिति एकतरह से स्वीकार कर ली है। बाबदेव का स्थान और उनका पुजारी होने के कारण भी कोई इन्हें हटाने का साहस नहीं करता। स्कूल बनाकर भी एक तरह से इन्हें मान्यता दे दी गई है। बहुत सारे पेड़-पौधे, फूल लगा रखे हैं। धीरे-धीरे करके काफी जगह खेती भी कर ली है। बिजली न होने से सिंचाई की समस्या है। लेकिन कुल मिलाकर चोम सिंह बाबा ने अपने परिवार को यहाँ स्थापित कर लिया है और एकतरह से अपना अलग फलिया ही बना लिया है। इक्कीसवी शताब्दी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है यह चोम सिंह ने समझा दिया। परंतु यह भी तय है कि हमारी इस तरह के नैसर्गिक जीवन या आधुनिक भाषा में कहें तो आदिमयुग में लौटने की तैयारी होनी चाहिए। न बिजली, न नल का पानी, न मोबाइल, न टेलीविजन। इसके बिना क्या कोई आज जीवन की कल्पना कर सकता है? थोड़ी दूर पर जो बस्ती है उसका नाम सेल्ली- कंजी फलिया है जो किला जोबट गाँव का ही फलिया है।
चोम सिंह और उसके भाइयों के सभी बड़े बच्चे मजदूरी के लिए गुजरात गए हुए हैं। भगत जी बाबा चोम सिंह के आठ बेटे हैं। हाँ आठ। एक भी बेटी नहीं है। बस दो सबसे छोटे बेटे अभी यहाँ हैं जो स्कूल में पढ़ते हैं। करीब साढे ग्यारह बजे एक मास्टर जी आ गए, बघेल, जो संविदा शिक्षक हैं। बडवानी का रहने वाला है। भला नवयुवक लगा। धीरे-धीरे स्कूल चालू हो गया। थोड़ी देर में दूसरे प्राइमरी शिक्षक चौबेजी मोटरसाइकिल पर आ गए। यह जोबट के ही रहने वाले हैं और शिवगंगा के लोगों के करीब हैं। थोड़ी देर बाबा की बगिया में बैठकर बातचीत होती रही, तुअर उड़ाने का काम भी चलता रहा। खाना बनना भी शुरू हो गया।
भूख लगनी शुरू हो गई। समझ में आया कि इन लोगों में खाना बनाना एक लम्बी प्रक्रिया हैं और यहां असमय अचानक से खाना बनाना बड़ा दुष्कर भी होता है। कल से यहां भूखे रहने की आदत पड़ चुकी है, इसलिए आज भूख से उतना बुरा हाल तो नहीं है, लेकिन फिर भी ध्यान उसी तरफ है। सामान्यता शाम को सात-साढ़े सात बजे खाना हो जाता है फिर उसके बाद सुबह तक कुछ भी नहीं। बस एक कप चाय। पता नहीं ये लोग कैसे इस तरह एकदम भूखे रह कर काम करते हैं। आज शनिवार है इसलिए जालम सिंह का उपवास हैं, बस एक टाइम शाम को ही खाएंगे। सिर्फ मेरे लिए ही खाना बन रहा है। दोनों बाबाओं से अपने काम करने के विचार के बारे में थोड़ी बहुत बात की। बहुत खुश हुए, बोले इसकी तो जरुरत है। अंतत: ढाई बजे के करीब खाना लग ही गया। बड़ी राहत मिली। उड़द की दाल, लहसुन मिर्च की चटनी, घी और मक्के की रोटी। मजा आ गया। खूब खाया। मास्टर जी लोगों के साथ बैठकर काली चाय पी और वापस चल दिया। चोम सिंह बाबजी के स्थान तक छोड़ने आया। जाहिर है मैं अभी अपना नया मुकाम तलाश रहा हूँ। महेश जी को फ़ोन किया लेकिन जवाब नहीं आया। बताना चाहता था कि मेरे मिजाज के हिसाब से तो यह जगह सबसे अच्छी है और यहाँ रहते हुए काम करना बहुत ही सुखद होगा, लेकिन समस्या सिर्फ सड़क से दूरी और बिजली के अभाव की है। आकर घूम फिर कर चले जाना अलग बात है, परंतु बसना एकदम अलग स्थिति है।
शाम 4 बजे के करीब जालम सिंह जी के घर पहुँच गए। कबूतर, मुर्गे और बकरियों के बीच। जोबट से कोई नहीं आया और न ही कोई खबर आई। सोचता हूं अब इनके यहाँ एक रात रह चुका, आज तो कहीं और जाना चाहिए था। मैंने महसूस किया है कि एक दिन के लिए तो सभी स्वागत करते हैं, लेकिन दूसरे दिन बोझ-सा लगने लगता है। स्वाभाविक भी है, किसी बाहरी आदमी के रहने से सारी दिनचर्या में बाधा पड़ती है तथा उसके खाने-पीने के इंतजाम में भी अतिरिक्त व्यवस्था और भार होता है। और ऐसा आदमी जो घर, खेती के किसी काम में हाथ नहीं बटायें, निश्चित्त रूप से इन परिवारों के लिए बहुत स्वागत योग्य नहीं है।
देखने लायक था शराबी भाई का प्रेम
अंधेरा होने लगा। अब साफ़ हो गया कि आज की रात भी यहीं बितानी है। दाल तो बन ही रही थी 7 बजे रोटी भी सिकने लगी और जबरदस्ती करके मुझे खिला दीं गरमा-गरम। एक रोटी खा ही ली। आज थोडा संकोच हो रहा है। बैठे बातचीत करते रहे। धीरे-धीरे घनिष्ठता काफी बढ़ गई है। अच्छे, भले लोग हैं। शाम को पड़ोस के खेत वाले से सिंचाई के पानी को लेकर इनकी बहस चलती रही। काफी गरमा-गरमी हो गई। बाबा की पत्नी अच्छी खासी लड़ाकू है। थोड़ी देर में नाले के उस पार से भी किसी के पीकर गाली देने की आवाज आने लगी। खाना खाकर बैठे थे, तभी एक आदमी लडखड़ाता हुआ आया। जालम सिंह ने बताया उसका छोटा भाई है। वही नाले के उस पार से पडोसी किसान को गालियाँ दे रहा था कि अगर मेरे भाई को कुछ बोला तो काटकर फेंक दूँगा। अकेला पीकर पड़ा रहता है। उसके घर के सब लोग मजदूरी करके कमाने गुजरात गए हुए हैं। मुझे देखकर थोडा झेंप गया फिर राम-राम करके एक किनारे बैठ गया। थोड़ी देर में भाभी से एक रोटी माँगी, खाई और लड़खड़ाते हुए वापस चल दिया। शराबी है इसलिए भगत जी उससे बात नहीं करते, फिर भी शराबी भाई का प्रेम देखने लायक है। अपनी भाभी से बतियाता रहता है और बच्चे हँसते रहते हैं। सब कुछ इतना सरल और नैसर्गिक है कि अनायास ही श्रद्धा होने लगती है।
थोड़ी देर बातें करते करते सो गए। आज अच्छे से ओढ़ लिया। सोकर उठने के थोड़ी देर में पांडे आ गया फिर भूरु भाई भी आ गया। साथ में एक-दो लोग और भी आए हैं। जिनमें बेटवासा का मदन भी है। मेरी खोज जारी है। पांडे के साथ बेटवासा के लिए निकले और 5-7 मिनट में ही पहुँच गए। उनका पूरा दस्ता आ गया। बेटवासा 5 किलो मीटर है जोबट से इंदौर रोड पर। सड़क पर ही एक आटा चक्की पर रुक गए। पांडे मुझे छोड़कर वापस चला गया। मदन सिंह की चक्की में छोटी-सी बिस्कुट-चॉकलेट की दुकान भी है। इसी से लगकर शिवलिंग की स्थापना की है। शिवलिंग किसी के खेत में है, चक्की सरकारी जमीन पर है और मदन पुजारी है। पुजारी जी ने शिवलिंग और चक्की की स्थापना एकसाथ ही की है। है न मजेदार संयोजन!
आज इतवार की स्कूल की छुट्टी है। यहां पर कुछ पढ़ने वाले लड़के भी है। वैल सिंह चौहान दसवीं में पढ़ता है। वह अपने साथ मुझे अपने घर ले गया। सड़क से करीब एक किलो मीटर दूर उसका नया बसा हुआ फलिया है जहाँ उसके कुटुंब के लोग ही रहते है। अच्छे खाते-पीते लोग हैं-मध्यम स्तर के किसान। गेहूँ की अच्छी फसल है। सिंचाई का साधन भी है। काका की जमीन पर एक बड़ा कुँआ खोद कर रखा है वहीं से सारे भाई पानी लेते हैं। वैल सिंह समझदार और सुसंस्कृत लड़का लगा। परिवार का सबसे बड़ा बेटा है, चार छोटे भाई हैं और एक बहन है। पढ़ने में मन लगता है, ट्यूशन भी पढ़ता है। सम्पन्न परिवार है। पिता इंदौर के पास मजदूरी के लिए गए हुए हैं। वैल सिंह ने कहा खेती से सब पूरा हो जाता है और मजदूरी की जरुरत नहीं है लेकिन पिता को बाहर जाने का शौक है, इसलिए मजदूरी के लिए निकल जाते हैं, कुछ दिन के लिए। उसकी बात सही लगी कमाई करने की दृष्टि से तो लोग गुजरात जाते है। ऐसी ही बात कहीं और भी-शायद कट्ठीवाड़ा में- किसी ने कही थी। मजदूरी पर बाहर जाना एक आदत बन गई है। शायद इसकी एक वजह यहां पर विद्यमान एकरसता भी है। घूमने जैसी आर्थिक स्थिति तो है नहीं, अतएव मजदूरी के लिए कहीं बाहर जाना या पलायन ही इससे बचने का एकमात्र विकल्प है। वैल सिंह के साथ उसकी वैल देखने गए और फिर नदी की तरफ। यह वही डोही नदी है, जोबट पहुँचने से पहले-यहाँ कितनी स्वच्छ है। दोनों तरफ के खेतों में सिंचाई के लिए मोटरें लगी हुई हैं। बस बिजली की समस्या है।
घूमकर वैल सिंह के घर आए। थोड़ी देर आराम किया और टहलने निकल गए। मदन भी खाने के समय आ गया था। वह भी साथ हो लिया। मदन की चक्की पर पहुँचे। यह गाँव का केन्द्र बन गया है। सभी यहीं आकर रुकते हैं, बस स्टॉप भी बन गया है और गप्पबाजी का अड्डा भी। वैल सिंह के घर में बैठकर मदन से थोड़ी बात हुई और अपने विचार बताए। बहुत उत्साही, समझदार और काम का व्यक्ति लगा। उसे स्पष्ट हो गया कि मैं धार्मिक कार्य के लिए नहीं आया हूँ बल्कि दूसरा ही मकसद है। इसके बाद वह मुझे सर कहने लगा। थोड़ी देर हम लोग गाँव के दूसरे फलियों में घूमने निकल गए। और भी लड़के साथ हो लिए। अच्छा गाँव है। बहुत बड़ा नहीं है। रोड़ फलिया और पुजारिया फलिया सड़क के आसपास हैं जहाँ वाहन आ-जा सकते हैं। नौजवान लड़के काफी अच्छे और उत्साही लगे। काफी लोगों से भेंट हुई। वैल सिंह के चचेरे भाई नारायण सिंह के यहाँ काफी देर बैठे। बहुत सारे छोटे-छोटे भाई-बहन हैं। माता-पिता खेत में काम करते रहते हैं। दादा-दादी भी हैं। दादी को दिखाई नहीं देता, परंतु सब कुछ जानना चाहती है। दादा उसे बताता रहता है। बहुत बूढा है, लेकिन फिर भी खेत में, काम करता रहता है। अच्छे सम्पन्न लोग हैं, बड़ा-सा घर है। यह गाँव काम के लिहाज से उपयुक्त लग रहा है। देखते है आगे क्या बनता है।
उसने मुझे परिपक्व साधू बाबा, पुजारी समझा
शाम 7 बजे के करीब मदन ने कहा खाना खा लो। बताया कि वैल सिंह खाना लेकर यहीं आ गया है। मेरा सामान भी यहीं ले आया है। यानी उसके घर से विदाई? सुबह तो कह रहा था काका के अधबने मकान में सोएंगे, पता नहीं क्या हुआ? बाहरी आदमियों को बिना पूरी तरह से पहचाने घर में रखना शायद उचित नहीं समझते होंगे। मुझे बताया कि यहाँ गाँव के सारे लड़के अभी गाने-बजाने बातें करने इकट्ठे होंगे, देर हो जाएगी और उसके बाद रात को जाने में मुश्किल होगी, इसलिए सामान यहीं ले आया। खैर, चक्की में ही फर्श पर बैठकर मैंने और मदन ने दाल-रोटी खाई, घी भी। इसके बाद लड़के इकट्ठे होते रहे। हँसी-मजाक चलता रहा। आश्चर्य की बात यह है कि इन लोगों के पास पूरा बैण्ड है। इनके पास-बड़े-बड़े ड्रम्स, सिन्थेसाइजर वगैरह। ट्रैक्टर की बैटरी से लाइट जलाई और म्यूजिक सिस्टम चालू किया। बस उसके बाद माइक लगाकर संगीत का कार्यक्रम शुरू हुआ। जहां चाह वहां राह! वैल सिंह का एक चचेरा भाई सुखराम सिंह बहुत अच्छा बजाता है और सही धुन निकालता है, बाकी सब लोग बैंड बजाते हैं। ज्यादातर गरबा की धुनें ही बजाते रहें। गुजरात का बहुत असर है झाबुआ जिले में, बहुत प्रभाव है वहाँ की संस्कृति का। आदिवासी समाज का वैसे भी संगीत से बेहद लगाव है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि उनके जीवन का अविभाज्य अंग है।
थोड़ी देर में ठंड और थकन लगने लगी। मैंने अपनी खाट चक्की के अंदर रखवा ली और बैठ गया। नींद भी आ रही है। एक लड़का अंदर आया और कहने लगा कि बाबा, तुम अपनी पसंद का कुछ बजाओ। मैंने कहा, मैं बजाना नहीं जानता भाई। कहने लगा, कुछ तो गाते-बजाते होगे ही, अपनी तरफ अपने मंदिर में। मैंने कहा भाई मैं मंदिर में गाना-बजाना नहीं करता, दूसरे काम करता हूँ। मेरा हुलिया देखकर उसने मुझे परिपक्व साधू बाबा, पुजारी समझा था। बड़ा निराश होकर बाहर चला गया। क्या आपका कलेवर आपका व्यवसाय भी सुनिश्चित कर देता है? सोचकर मजा आया ! उसके बाद गाने-बजाने का जोश थोडा ठंडा पड़ने लगा। मदन ने आकर पूछा कि बंद करा दें क्या? मैंने कहा, अरे नहीं, चलने दो, बस मैं शामिल नहीं हो पाउँगा। थोड़ी देर में नींद आने लगी। मदन ने ओढने-बिछाने की आवश्यकता से अधिक ही व्यवस्था कर दी। बजाना चलता रहा, मैं आँख बंद करके लेट गया और नींद लग गई। काफी सारे मुर्गे-मुर्गियां, चूजे हैं मदन के पास। वे सब भी यहीं चक्की के अंदर रहते हैं। थोड़ी देर में एक मुर्गा बोला तो नींद खुली। ध्यान गया कि गाना बंद होकर सब जा चुके हैं। मदन और दो लड़के अंदर फर्श पर सो रहे हैं। छोटी सी खटिया करीब चार-साढे चार फुट की, उस पर पैर मोड़कर मैं भी सो रहा हूँ। मुर्गे सारी रात बोलते रहे। नींद लगती-उचटती रही।
क्रमशः…
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