एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-27

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
16 दिसंबर 2007
आज वन्या की शादी की पहली सालगिरह है। सुबह घूमते हुए पिछले साल का सारा घटनाक्रम याद करता रहा। सबकुछ सपना जैसा लगता है। शादी तो इस तरह से हो गई जिसकी मुझे भी कल्पना नहीं थी और न ही लगता था कि मुझमें इतना सामर्थ्य है। शादी सबके लिए यादगार बन गई। बस उसी दिन से वैराग्य की भावना बलवती होने लगी। वन्या के जन्म के बाद की सबसे बड़ी घटना शायद वन्या की शादी ही थी। इसके बाद तो मेरे जीवन में बदलाव आना था, जो आया भी। उसी बदलाव को रेखांकित करने का समय अब आ गया है।
यह संयोग ही था कि सन् 1979 दिल्ली से भोपाल आकर मैंने वकालत शुरू की थी। सागर विश्वविद्यालय से सोशल एन्थ्रोपोलॉजी में एमए और एलएलबी करने के बाद मैं समाज शास्त्र में एम.फिल/ पीएचडी के लिए जेएनयू चला गया और वहां से 1979 की शुरूआत में भोपाल आया। मेरी रूचि और समझ मूलतः थिएटर और जनआंदोलन में थी। यह भागीदारी अपने सागर विश्वविद्यालय के दिनों से ही रही है। वामपंथी समझ और विचारधारा की बुनियाद भी सागर में पढ़ाई करते हुए 1974 में जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर छात्र आंदोलन के दौरान विकसित हुई थी जो निरंतर गहरी होती गई। भोपाल आकर वकालत का पेशा अपनाने के पीछे भी मुख्य उद्देश्य थिएटर के माध्यम से वामपंथी जन-आंदोलन में सक्रिय भागीदारी करना और चुनावी रणनीति से दूर एक सर्वहारा पार्टी को मजबूत बनाना था। न तो केवल वकालत के पेशे में अपने आप को डुबो देना उद्देश्य था और न ही आर्थिक सम्पन्नता हासिल करना कोई लक्ष्य था। जेएनयू में अध्ययनरत रहते हुए ही प्रकट रूप से अपनी ही तरह की सोच और समझ रखने वाली तथा मेरी जीवनदृष्टि से सहमत साथी से विवाह भी हो गया था और हम दोनों अपनी प्रतिबद्धता के अनुसार जीवन जीने के लिए एक अनजान शहर भोपाल आ गए थे।
प्रांरभिक वर्षों में अपनी सोच और समझ के अनुरूप ही जीवन जीते रहे। इसी बीच हमारी बेटी का जन्म हुआ और आर्थिक कठिनाइयों के बीच हम अपनी प्रतिबद्धता के अनुरूप सुखमय जीवन जीते रहे। बहुत जल्दी भोपाल में थिएटर और लोकोन्मुखी राजनैतिक परिदृश्य में हमारी जगह बन गई। मैं पूरे समर्पण के साथ जनआंदोलनों का हिस्सा बन गया। वकालत का पेशा केवल अनुषांगिक था जो मूलतः जनआंदोलनों में सशक्त भागीदारी में सहयोगी और पूरक था। कितना सुखमय जीवन था हमारा भोपाल में श्यामला रोड पर उस छोटे से अपने किराए के मकान में रहते हुए!
दिसंबर 1984 में भोपाल में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से गैस रिसाव के परिणामस्वरूप मौत के ताण्डव और निरंतर मंडराती त्रासदी के बीच हम कुछ लोगों ने एकजुट होकर हत्यारी कार्बाइड और जनविरोधी सरकार के खिलाफ जन आंदोलन की शुरूआत की जो निरंतर मजबूत होता गया। मैंने अपने-आप को पूरी तरह से उसमें झोंक दिया था, सब कुछ भूलकर, सब-कुछ छोड़कर। महीनों यही स्थिति बनी रही। वकालत भी पूरी तरह से छूट गई और घर की सारी जिम्मेदारी पत्नी ही उठाती रही। साथ ही इस आंदोलन में सहयोगी के रूप में भी वह लगातार सक्रिय रहीं।
कार्बाइड के खिलाफ इस जन आंदोलन के दौरान अपने साथियों के भटकाव और प्रतिबद्धता में कमी का अहसास होते एक समय आकर मैंने अपने-आपको इससे दूर कर लिया। और इसी दौरान अपनी राजनैतिक पार्टी की अवसरवादिता से भी विक्षुब्ध होकर उससे भी दूर हो गया। मेरे लिए यह स्थिति बहुत विषादपूर्ण थी। इस बीच वकालत भी लगभग छूट सी चुकी थी। थिएटर में भी सक्रियता कम हो गई थी।
1986 के अंत में भोपाल कोर्ट में भारत सरकार द्वारा गैसपीड़ितों को ओर से यूनियन कार्बाइड के विरूद्ध मुआवजे का दावा लगाने के बाद एकबार फिर से मैं कार्बाइड के खिलाफ कानूनी लड़ाई में सक्रिय हो गया और कार्बाइड और सरकार के बीच मिलीभगत की आशंका को सामने रखते हुए उस मुकदमे में गैसपीड़ितों के संगठन की ओर से हस्तक्षेपकर्ता (इटरविनर) बना। कार्बाइड से गैस पीड़ितों को अंतरिम राहत राशि दिलाए जाने की मांग करते हुए मैंने न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया जो तमाम विरोधों के बाद स्वीकार कर लिया गया और जिला न्यायालय ने यूनियन कार्बाइड के खिलाफ अंतरिम आदेश पारित करते हुए तीन सौ पचास करोड़ रूपए की अंतरिम सहायता राशि जमा करने हेतु निर्देशित किया। यह गैस पीड़ितों की पहली और अब तक की एकमात्र कानूनी जीत थी जिसकी पहल करने का श्रेय मुझे मिला। हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट में निरंतर यह कानूनी लड़ाई जारी रही जिसमें भी मैं मुस्तैदी से जुटा रहा।
17 दिसंबर 1987 को भोपाल जिला न्यायालय से अंतरिम मुआवजे का आदेश पारित होने के साथ ही अचानक रातों-रात मैं भोपाल में वकील के रूप में एक जाना पहचाना नाम बन गया और तब से मेरी पहचान मुख्यतः एक वकील के रूप में बन गई, जो अब तक नहीं थी।
अब तक मैं एक कलाकार, रंगकर्मी, एक्टिविस्ट के रूप में ही जाना जाता था। इस अचानक हासिल हुई शोहरत के साथ मेरी जिम्मेदारियां और मुझसे अपेक्षा भी एकदम बढ़ गई और क्रमशः मैं वकालत के पेशे में डूबता चला गया। रंगकर्म, कला और संस्कृति के क्षेत्र में संलग्नता और जन आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निरंतर कम होती चली गई और अपने पेशे की व्यस्तता के बीच स्वाभाविक रूप से घर में समय देना भी कम होता चला गया। जैसी मैंने कभी नहीं चाही थी शनैः शनैः जीवनचर्या वैसी ही होती चली गई। मैं यह सब देख रहा था, अनुभव कर रहा था लेकिन उलझता चला जा रहा था। यह सब मेरी बनावट और मूल स्वभाव के विपरीत था। वकालत के पेशे में पूरी तरह उतर जाने के बाद मुझे हमारी अदालतों, न्यायाधीशों व न्यायालयों को भी बहुत करीब से देखने का मौका मिला। यूनियन कार्बाइड के मामलों में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के हाथों गैस पीड़ितों के न्यायिक अधिकारों का गला घोंटकर कार्बाइड को पूरी तरह से बचा लेना और इस तरह मल्टीनेशनल को हमारे देश में खुली छूट दे देना भी मैंने अपनी आंखों के सामने घटते देखा।
सामान्य नागरिकों का न्यायापालिका विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय, के समक्ष महत्वहीन होना और नागरिक स्वतंत्रता, समानता का अधिकार केवल कुछ विशिष्ट लोगों तक सीमित हो जाना भी महसूस किया। गरीबों, आदिवासियों, दलितों,मजदूरों, किसानों और उनके जायज अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले लोगों को समाजविरोधी और राष्ट्रविरोधी करार दिए जाने को भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा उचित ठहराए जाने को भी लगातार देखता रहा। विरोध करने के मूलभूत अधिकार को सुप्रीम कोर्ट ने निरंतर सीमित किया और मजदूर आंदोलन को तो उसने पूरी तरह से पंगु बना दिया। न्यायापालिका में निरंतर बढ़ता भ्रष्टाचार अब एक स्वीकृत तथ्य बनता चला गया। बहुत थोड़े से अपवादों को छोड़कर नीचे से ऊपर तक अधिकतर वकीलों का अत्यधिक स्वार्थी, तिकडमबाज और आत्मकेन्द्रित होना भी मुझे लगातार सालता रहा।
ऐसे जनविरोधी संवदेनारहित तंत्र का हिस्सा बने रहना मुझे स्वीकार नहीं था। इससे निकल भागने भी छटपटाहट तो बनी ही रहती थी और कुल मिलाकर जीवन किसी भी तरह से सुखमय नहीं था। मेरे पास यश था, समृद्धि थी, लेकिन सुख नहीं था। मैं इस मकड़जाल में फंस चुका था। सन् 2001 में भी एक बार मैंने अचानक निकल जाने का प्रयत्न किया था और चुपचाप निर्जन पड़े अपने पैतृक गांव चला गया था। लगभग छह महीने तक भोपाल से और वकालत के पेश से दूर रहा लेकिन मोहवश और जिम्मेदारियां निभाने वापस आ गया। उसके बाद मैं और भी उलझता चला गया। वकील के रूप में मेरी प्रतिष्ठा और व्यस्तता और भी ज्यादा बढ़ गई। 16 दिसंबर 2006 को अपनी इकलौती बेटी की शादी करके पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हुआ।
मुझे पूरे समय यह अहसास था कि जो मैं कर रहा हूं, मैं उसके लिए नहीं बना हूं। वकालत का पेशा एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए उपयुक्त नहीं है यह मैंने बहुत पहले महसूस कर लिया था। मुझे मालूम था कि यह सब निरंतर नहीं चलेगा और एक समय ऐसा आएगा कि मेरी पीड़ा, संत्रास और छटपटाहट मुझे मुक्ति के रास्ते पर ले जाएगी। वह बिंदु कब आएगा मुझे मालूम नहीं था और न ही उसे प्लान किया जा सकता था क्योंकि जो होना था वह रिटायरमेंट नहीं बल्कि मुक्ति की अनजानी राह थी। क्या मैं मुक्ति के पथ पर चल पड़ा हूं?
सूखता न मैं
बनता न ठूंठ,
यदि प्रत्राच्छद आश्रित रखता
सबको समस्त,
निज आशाओं के सबल सहारे समाश्वस्त,
अत्यन्त सुरक्षित रखता यदि
घोंसला
तो तोड़-ताड़ का यह अजीब सिलसिला
टूटता खुद! – मुक्तिबोध
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर

