एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
21 अगस्त 2007 मथुरा-वृंदावन : बृजभूमि भ्रमण
यहां वृंदावन आकर परमहंस मंदिर में रूके हुए दो दिन हो चुके हैं। देखते हैं आगे क्या होता है? साथ चल रहे प्रहलाद दास को लेकर मेरी काफी जिज्ञासा थी। पता चला कि प्रहलाददास की प्रारंभिक दीक्षा वृंदावन में ही हुई हैं और यहां उसके प्रारंभिक गुरु रमन रेती में रहते हैं। वह अपने उस गुरू के सम्मान में भंडारा करना चाहता है, अर्थात कुछ साधुओं को बुलाकर भोज करना चाहता है। सियाचरण बाबा मिल गए हैं और उन्हें उनका पसंदीदा काम मिल गया। बाबा, प्रहलाद और मैं बाजार चले, भंडारा के लिए साग-सब्जी, सामान लेने। वनखंडी महादेव, लोई बाजार, सब्जी मंडी सब जगह घूमते रहे। बाजार में सुअर और बंदर बराबर की संख्या में हैं। गजब का अनुपात है। नालियां एकदम गंदगी से ठसी हुई जिनके निकास या सफाई की शायद कोई व्यवस्था नहीं। जो भी सफाई होती है, वह वही जो सुअर कर देते हैं। इसलिए शायद सुअर विशेष रूप से छोड़कर रखे गए हैं। यहां यह अनुभूति होती है कि विधाता ने इस सृष्टि में कुछ भी निरर्थक निर्मित नहीं किया है। वे जानते थे कि इक्कीसवी सदी में मथुरा-वृंदावन कैसा होगा, इसलिए सुअर भी यहां अपरिहार्य ही होगें। जाहिर है, उससे समर्पित सफाई कर्मचारी तो कोई दूसरा हो नहीं सकता और वह भी निः शुल्क और निस्वार्थ सेवा करने वाला।
दुकानदार, रिक्शा वाले, मजदूर सब बंगाली बोलते हैं। ग्राहकों में ज्यादातर बंगाली ही हैं। यहां के निवासी भी और बाहर से आए भक्त भी। ऐसा लगता है जैसे कलकत्ता के ही गुरियाहाट या किसी ऐसे ही बाजार में आ गए है। भिखारी भी बंगाली और उड़िया ही हैं। सैकड़ों साल से बंगाल और उड़ीसा की विधवाओं को धोखे से यहां लाकर छोड़ जाने की प्रथा शायद अभी भी चल रही है। एकदम बूढ़ी से अपेक्षाकृत जवान बंगाली और उड़िया विधवाएं पूरे वृंदावन में सब्जी बेचते, मजदूरी करते और भीख मांगते दिखती हैं। बिल्कुल नए कलेवर में पूर्वी भारत यहां नजर आता है। इस पर विस्तृत शोध होना चाहिए कि यहां यह परंपरा कब और क्यों प्रारंभ हुई। यह स्थान जबकि इन प्रदेशों से बहुत दूर है।
दरअसल, वृंदावन में अच्छा-बुरा जो भी है वह बंगाल, उड़ीसा का ही है स्थानीय कुछ भी नहीं। राजपुताना प्रभाव को ही थोड़ा बहुत स्थानीय प्रभाव कह सकते हैं। चैतन्य महाप्रभु पूरे वृंदावन पर छाए हुए हैं। वे तो जैसे वृंदावन की आत्मा ही हैं। हर तरफ उनका प्रभाव एकदम साफ दिखाई देता है। राधा-कृष्ण के गौरांग रूप की ही यहां सबसे अधिक प्रतिष्ठा है। चैतन्य के मार्ग पर चलते हुए पूरा वृंदावन भक्ति और संगीत में लीन है। चैतन्य ने राधा और कृष्ण दोनों को एकात्म किया और गौरांग रूप धारण किया। उन्होंने कहा कि राधा और कृष्ण एक ही हैं और यह सब उन्हीं की लीला है। कृष्ण पूर्ण शक्तिमान हैं और राधा पूर्णशक्ति। जो वस्ततु: कृष्ण से भिन्न नहीं हैं। श्री चैतन्य के अनुयायी जीव गोस्वामी और अन्य का मानना है कि श्री चैतन्य या गौरांग राधा-कृष्ण के ही अवतार थे और वृंदावन उनकी कर्मस्थली है, जहां परमब्रहम की लीला सर्वोच्च और सुंदरतम रूप में प्रकट हुई है। वृंदावन श्रीधाम है, यानी श्री राधा-कृष्ण का स्थान।
वृंदावन में हर व्यक्ति एक-दूसरे से राधे-राधे कहकर ही अभिवादन करता है। रिक्शेवाला भी कभी चलो-चलो या हटो-हटो नहीं बोलता, वह भी सड़क चलते लोगों को किनारे हटने के लिए पीछे से राधे-राधे की ही हॉक लगाता है। न कोई राम का नाम लेता, न कृष्ण का, बस सभी राधे-राधे जपते हैं। राधा की ऐसी लोक व्यापकता वास्तव में अचंभित करती है। राधा भले ही एक मिथकीय या लोक द्वारा रचित एक काल्पनिक चरित्र हो, लेकिन मीरा तो ऐतिहासिक सत्यता हैं। राधा की व्यापकता अब भी विस्तारित हो रही है। भले ही अब इसे अपनाने या दोहराने वालों में से कई एक दोहरा जीवन जी रहे हों। बहरहाल, राधे-राधे।
राधा-कृष्ण के अलौकिक संसार से निकल कर पुनः वर्तमान वृंदावन के लौकिक संसार में लौटते हैं। यहां इस लौकिक संसार में प्रहलाद कृष्ण भक्ति की बजाए गांजे में मस्त है। बाजार के अंदर उसका साफा छप्पर के ऊपर से एक बड़े बंदर ने पकड़कर खींच लिया और खुद लपेट लिया। प्रहलाद को पता ही नहीं चला, हमने देखा और खूब हंसते रहे। सब्जियां खरीदीं, किराने का सामान लिया और रिक्शा में रखकर वापस चले। वृंदावन में शायद मनुष्यों और बंदरों की आबादी बराबर है। सब खाते-पीते रहते हैं,। बहुत ज्यादा तंग नहीं करते। बस थोड़ा सचेत रहना पड़ता है। बताते हैं अयोध्या के बंदर आक्रामक और हिंसक हैं। क्या दोनों स्थानों के बंदरों की तुलना संभव है?
शास्त्री जी के कृष्ण-बलराम आश्रम पहुंचे और सामान रखा। भोजन तैयार मिला, खाया तथा थोड़ा आराम किया। तत्पश्चात फिर घूमने निकल गए। सबसे पहले इस्कॉन के मंदिर गए। इतना व्यवस्थित, सुरूचिपूर्ण और आकर्षक कोई दूसरा मंदिर यहां पर नहीं है। यहां भी बेहद भीड़ थी। बांके बिहारी जी और अंग्रेजों के मंदिर में लगभग बराबर भीड़ है। यहां पूरे समय सुरूचिपूर्ण भजन और नृत्य चलता रहता है। सामान्य भक्तों के लिए आकर्षण तो नाचते-गाते सफेद चमड़ी वाले लोग हैं। अकेला आता तो मैं शायद यहीं रूकता। जिस तरह अभी रह रहे हैं, वह एकदम अलग ही अनुभव है और दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। यहां से एकबार फिर मदन मोहन जी के मंदिर गए, वहां आरती में शामिल हुए। विशुद्ध बंगाल का मंदिर है। बहुत आकर्षक मूर्ति है। इसके बाद एक बार फिर बांके बिहारी जी के मंदिर गए और यहां की आरती में शामिल हो हुए। इस समय यहां सबसे अधिक भीड़ है। लौटते हुए अंग्रेज मंदिर के पास ही श्री गौरांग मंदिर गए। बहुत सुंदर और शांत आश्रम है। रूकने लायक स्थान यही है। यहां सभी उड़िया लोग हैं। उडियावाद यहां बहुत है। प्रहलाद भले ही स्वयं त्यागी बन गया है, लेकिन किसी भी उड़ियाभाषी मंदिर या आश्रम में जाने पर उसका स्वागत होता है और वह भी पूरे अधिकार के साथ वहां जाता है।
मैं सोच रहा था वृंदावन अपनी तमाम गंदगी के होते हुए भी एक दर्शनीय स्थान है। यहां आकर कुछ दिन एकांत में रहना चाहिए। या तो अकेले आएं या उपयुक्त लोग साथ हों। ऐसे लोगों के साथ जिनके साथ मैं अभी आया हूं उनके साथ आना मूर्खता है, न खुद कुछ देखें-समझे, न ही दूसरे को देखने-समझने दें। निश्चय ही यहां समय बिताने पर संत,महात्मा और भक्तों से भेंट होगी। यहां के वातावरण में इतिहास, भक्ति, और सौंदर्य का बड़ा अच्छा मिश्रण है। यहां की गलियों में घूमते हुए लगता है कि सचमुच ही राधा-कृष्ण की लीला होती होगी। यहां के मंदिर इतने सुरूचिपूर्ण हैं कि उनके अंदर जाकर ही एक अद्भुत शांति की अनुभूति होती है। धार्मिक न भी हो तो केवल सांस्कृतिक दृष्टि से ही वृंदावन निश्चित ही एक बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। भौतिकता से निकलकर आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने के लिए यह उपयुक्त स्थान लगता है। चैतन्य महाप्रभु के साथ ही रामानुजाचार्य, माधवाचार्य, वल्लभाचार्य, रामकृष्ण सभी का प्रभाव यहां स्पष्ट परिलक्षित होता है। शायद कभी मन का करने का बुलावा आ जाए। मन ही मन राधे-राधे कहा। और….।
गोवर्धन
आज जन्माष्टमी है। मैं तो सुबह जल्दी उठकर साढ़े पांच बजे तक नहा-धोकर तैयार हो गया, और बाकी सब धीरे-धीरे उठे। नहाए-धोए फिर हवन करने बैठे गए। इतने में मंदिर में आरती शुरू हो गई और तब तक करीब पौने आठ बज गया था। अच्छी-खासी धूप हो गई। महंत नारायणदास ने बहुत कहा कि अब मत जाओ शाम को चार बजे निकलना और बारह बजे के पहले आ जाना। ‘जन्माष्टमी’ है इसलिए हर तरफ चहल-पहल रहेगी। बाकी के नहीं माने। बाबा सियाचरणदास ने कहा अब निकल ही चलते हैं। बस, निकल पड़े गिरिराज जी की परिक्रमा के लिए ‘जन्माष्टमी’ के पवित्र दिन। गिरिराज का मंदिर जहां मानसी गंगा कुण्ड है यहीं से परिक्रमा शुरू करते हैं। शुरू करते-करते करते आठ बज गया था। बस चलते गए। मुझे लगा अकेले चलना बेहतर है इसलिए इन सबसे अलग हो गया। शुरू में काफी आनंद आया। एक पहाड़ी है- एकदम एक जैसी ऊंचाई-चौड़ाई से सीधी चली गई है। ऊंचाई-चौड़ाई लगभग उतनी ही होगी, जितनी भंवरताल में घर से लगी पहाड़ी की, और वैसी ही एकदम लगातार चलती। यह भी विचित्र ही है कि मुझे हर जगह भंवरताल से तुलना करने को कुछ न कुछ मिल ही जाता है। इसी पहाड़ी की परिक्रमा करनी है, जिसे पवित्रतम परिक्रमा माना जाता है। मान्यता है कि बड़े पुण्यात्मा ही यह परिक्रमा कर पाते हैं। जैसे मैं?
इसी छोटी-सी पहाड़ी का नाम ‘गिरिराज’ यानी पर्वतों का राजा है। हिमालय को भी रामायण में गिरिराज सम्बोधित किया गया है। किंवदंती है कि हिमालय का ही एक अंश श्रीकृष्ण यहां ले आए। यह भी कहा जाता है कि यह पर्वत कलियुग में शनै-शनै, छोटा होता जा रहा है द्वापर में हिमालय जैसा ही ऊंचा था। मनुष्य में बढ़ते पापों की वजह से क्या यह घटता जा रहा है? जो भी हो मुझे तो यही लगा कि चूंकि इस क्षेत्र में दूर-दूर तक कोई भी पहाड़ नहीं है इसलिए इस छोटी-सी पहाड़ी को गिरिराज मानकर पूजा जाता है। एकदम सूखा और वीरान। सिर्फ पत्थर और चट्टानें कोई पेड़-पौधे नहीं। पहाड़ी के दोनों और फेंसिग की है, इसलिए दूर से ही सड़क से देखते हुए चलना होता है। सड़क पर भी सिर्फ बबूल के ही पेड हैं, बस। सड़क के किनारे-किनारे एक अन्य प्रजाति के पेड़ कहीं-कहीं लगाए गए हैं, काफी पुराने दिखे जिनकी कुछ छाया होती है, इन्हें डुंगर नाम से जाना जाता है। कहीं और ऐसे पेड़ नहीं देखें। (डूंगर ब्रज क्षेत्र में पाया जाने वाला एक आध्यात्मिक और औषधीय पेड़ है। इसे पीलू भी कहते हैं। इससे दातून करने पर दांत के रोग नहीं होते। यह पीलिया में भी रामबाण का काम करता है। इसके फल पानी की कमी भी पूरी करते हैं। इसकी छाल भी काम में आती है। इसका वानस्पतिक नाम डाइओरप इरोस कांडी फोलिया है। इसे कृष्ण व राधा से भी जोड़ा जाता है। संतों के कमंडल में भी इसका प्रयोग होता है।) परिक्रमा में शहरी लोग या तो रिक्शे में चल रहे हैं या उनके साथ-साथ कार चल रही हैं। तीर्थ यात्रा और भगवत ध्यान भी अपनी सुविधानुसार। पर स्थानीय लोगों को रोजगार तो मिल रहा है। ग्रामीण परिवेश के लोग पैदल चल रहे हैं। यहां बेहद गर्मी है क्योंकि इस तरफ बहुत दिनों से बारिश नहीं हुई है।
गोर्वधन से करीब तीन-चार किलोमीटर चलकर राजस्थान के भरतपुर जिले में घुस गए। यहां पूंछरी एक बड़ा कस्बा है। एकदम बारिश आ गई। जितनी देर में एक चाय की दुकान में घुसते कुर्ता भीग गया। चाय पी, करीब दस-पंद्रह मिनट बारिश रही। कुर्ता उतारा पीठ पर डाल लिया। छतरी तो वृंदावन में गायब हो गई थी। अभी तक सिर्फ एक छतरी ही खोई है। गर्मी, बारिश और फिर उमस से छींके आने लगी। थोड़ा आगे चलकर फिर उत्तर प्रदेश का मथुरा जिला लग गया। यहां जतीपुरा एक बड़ा कस्बा है। फिर गोर्वधन कस्बे में पहुंच गए यानी आधी परिक्रमा हो गई। अब पहाड़ के दूसरी ओर चलना है। इस बीच एक जगह बैठकर मैंने थोड़े से चने खा लिए। बाकी लोग तो दनादन फ्रूटी, गन्ना, बीड़ी-सिगरेट, गांजा दबा रहे हैं। यह सब साधु पा सकते हैं और पाते चल भी रहे हैं। सब अपनी सुविधानुसार ही होता है। गोर्वधन से निकले तो करीब ग्यारह बजा होगा। बारह बजे के करीब बहुत ही तेज धूप हो गई, अब सब साथ हो गए। एक पेड़ के नीचे कुछ देर बैठे रहे। मुझे छींके और खांसी आना और पूरे समय नाक से पानी बहना शुरू हो गया। काफी थकान लगने लगी।
चलते-चलते एक बजे के करीब श्री राधाकुण्ड पहुंचे। यह बहुत पुराना कुंड है, जिसमें एकदम हरा पानी भरा हुआ है। इस कुंड को अत्यंत पवित्र माना जाता है। सबने इस भरी धूप में कुंड में स्नान किया। मैंने तो बस गंदगी से भरा रूका हुआ हरा पानी छिड़क लिया और पैर धो लिए। अब तक धूप से हालत बहुत ही खराब हो चुकी है। राधाकुंड भी बहुत महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान है। राधाकुंड से लगा हुआ ही कृष्णकुंड है और इनके आसपास वही मृतकों की याद में हजारों संगमरमर को चौकोर पत्थर लगे हुए हैं जाहिर है अधिकतर बंगाली और उड़िया। अजीब सी परंपरा है। पहली बार कभी ऐसा देखा सभी पत्थर चौकोर। हम चलते गए। यहां बहुत सारे पुराने-पुराने मंदिर और धर्मशालाएं हैं और सभी बंगाल, उड़ीसा, असम, त्रिपुरा के लोगों द्वारा स्थापित है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर भी बहुत से मंदिर हैं। पूर्वी भारत का स्पष्ट बोलबाला यहां नजर आता है। इसे विभिन्नता में एकता भी तो कहा जा सकता है। यह एकतरह से भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत उदाहरण भी है। हमें यहां समझ आता है कि राष्ट्र एक भौगोलिक सीमा भर नहीं है।
लगभग दो बजे श्री राधारमण भजनाश्रम पहुंचे। प्रहलाद ने कहा “गेट खुला है, अंदर चलकर देखते हैं।” अंदर गए। यहां कुछ उड़िया साधु मिल गए। यहां का महंत भी उड़िया हैं। फिर क्या था प्रहलाद का घर मिल गया। बड़ा सुंदर मंदिर है और काफी बड़ा आवासीय परिसर। सबको जन्माष्टमी का फलाहार मिल गया। इतना सुरूचिपूर्ण और स्वादिष्ट भोजन मथुरा आने के बाद से पहली बार किया। जितने बालक, युवा, वृद्ध, साधु-संन्यासी दिखे, सभी शिक्षित और सुसंस्कृत लगे। निरंतर भजन होता रहता है। श्री गौरांग का मंदिर है, और श्री चैतन्य महाप्रभु का भी। यदि चैतन्य महाप्रभु को अलग कर दें तो यह पूरा बृज क्षेत्र एकदम शुष्क और संस्कृतिविहीन लगेगा। मन में विचार उठा कि एक व्यक्ति कितनों को एकसाथ रूपांतरित करने की क्षमता रखता है और इतना ही नहीं उसकी उपस्थिति सैकड़ों वर्ष बाद भी जीवंत बनी रहती है। इस राधारमण भजनाश्रम में आकर बड़ा अच्छा लगा।
चार बजे के करीब उठ कर फिर चल दिए। अभी भी बहुत गर्मी और उमस है। एक और त्यागियों के डेरे पर दस मिनिट रूके और चलते गए। थोड़ी आगे एक बहुत ही सुंदर व बेहद प्राचीन ‘कुसुम कुंड’ मिला। कुसुम राधारानी की सखी थीं। जिनके नाम पर यह ‘कुसुम सरोवर’ बना है। इसे सोलहंवी शताब्दी में ओरछा के राज वीर सिंह ने दोबारा बनवाया। मुगलों और फिर अंग्रेजों ने भी इस क्षेत्र में आखेट निषिद्ध कर रखा था। वो शिलालेख और बोर्ड आज भी लगे हैं। और लोग तो आगे बढ़ गए, मैं ही रूककर देखता रहा। राधा की सखी के बारे में कभी सुना नहीं था। उत्सुकता बढ़ रही है। इसकी पवित्रता इस बात से भी सिद्ध होती है कि जिन्हांने मथुरा में तोड़फोड़ मचाई यहां विपरीत आचरण कर रहे थे। कोशिश करूंगा ओरछा से कुछ पता लग सके। छह बजे के करीब परिक्रमा पूरी करके वापस ‘सुंदर धाम’ पहुंच गए। बुरी तरह से थके हुए थे तो लेट गए और बाद में उठकर नहाया-धोया। सोचा था रात में गिरिराज मंदिर में जन्माष्टमी कार्यक्रम में जायेंगे लेकिन हिम्मत नहीं हुई। इस आश्रम से भी लोग मथुरा और वृंदावन गए हैं जन्माष्टमी के लिए तथा हम सियाचरण बाबा के नेतृत्व में वृंदावन छोड़कर यहां आए हैं! यहां कोई विशेष हलचल या रौनक नहीं है। भोजन करके सब बैठे रहे। बड़ी थकान लग रही है। रात ठीक बारह बजे आरती हुई, प्रसाद वितरण हुआ और सब जाकर अपने-अपने स्थान में सो गए।
सुबह उठा तो तबियत ठीक नहीं लग रही थी। शायद तेज बुखार आया था। उठने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। खाना भी नहीं खाया और कोई पूछने भी नहीं आया। थोड़ी देर में तखत वाले महात्मा आए, उन्होंने तबियत और खाने के बारे में पूछा। बोले पास में ही सरकारी अस्पताल है, वहां हो आएं। मैंने देखा था कि वह कुछ किताबें रखे हुए हैं। एक किताब मुझे भी पढ़ने को दी। इस पर मैंने कहा, इतने दिन में पहली बार किसी को पढ़ते देखा। वे कहने लगे त्यागियों का पढ़ने-लिखने से क्या वास्ता! वह खुद वल्लभाचार्य सम्प्रदाय के हैं और गुजरात से हैं, कुछ दिनों के लिए आए हैं। यह आश्रम इंदौर के किसी सेठ ने बनवाया है जिसके गुजरात से संबंध हैं। रात में इस साधु का कोई मजाक उड़ाते हुए कह रहा था “अरे वह कहां है, ग्रेजुएट?” मैं समझ गया कि साधुओं के समुदाय में पढ़ना लिखना कमोवेश दुर्गुण है। रोज कुछ न कुछ नया ‘बोध’ हो ही जाता है। वह जन्माष्टमी समारोह के लिये मथुरा गये हुए थे। दिनभर सियाचरणदास, प्रहलाद दास या हंसदास में से कोई भी पूछने नहीं आया कि कैसी तबियत है, कुछ दवाई चाहिये क्या? चार बजे के करीब सियाचरणदास आये और बोले चलना है क्या? मैंने कहा-हां यहां से तो चलना है लेकिन पैदल चलने लायक हालत नहीं है। उन्होंने कहा प्रहलाद के बचपन के गुरू का आश्रम है, नंदगांव के पास, वहां चलते है। मैंने कहा, ठीक है। चलने को तैयार हो गया। बुखार तो उतर गया है, कमजोरी है। चलते हुए बाबा नारायणदास ने चाय पिलवाई और सबको विदाई दी। मैंने लेने से मना कर दिया। चलते समय सोच रहा था कि इस ‘धंधे’ में रहने के ठिकाने और भोजन की कोई समस्या नहीं है। तबियत की वजह से मेरी हालत जरूर पतली है।
करीब एक किलोमीटर चलकर मुख्य सड़क पहुंचे। दवाई की दुकान से नाइस की तीन गोलियां लीं। नए जीवन में पहली बार कोई दवा खरीदी। कोई वाहन उपलब्ध नहीं था। बड़ी मुश्किल से एक मिनीट्रक में जगह मिली। चल दिए। रास्ते में बरसाना पड़ा। वहां एक गोल पहाड़ी पर मंदिर हैं, जहां बिजली नहीं है। थोड़ी देर बार नंदग्राम पहुंच गए। करीब पौने सात बजा होगा। अंधेरा हो गया। बिजली यहां भी नहीं है। एक पहाड़ी पर मंदिर दिखाई दिया। ऊपर चढ़ना शुरू किया, काफी सीढ़ियां हैं और रास्ता एकदम सकरा तथा भीड़ भी बहुत है। ऊपर मंदिर के दरवाजे बंद थे। बाबा ने कहा चलो-चलो, देर मत करो। अब इतने ऊपर चढ़कर आए हैं तो थोड़ी देर रूके रहे। फिर दर्शन करके चल दिए। पूरे क्षेत्र में अंधकार छाया हुआ है। दूर-दूर तक कहीं लाइट नहीं है। कैसा राज्य है यह उत्तरप्रदेश? इस पूरे क्षेत्र के लिए जन्माष्टमी सबसे महत्वपूर्ण पर्व है, लेकिन कहीं बिजली नहीं। एकदम अंधेरे में कच्ची रोड पर चले। कृष्ण के जन्मवाले दिन अंधेरा? अंधेरा है या अंधेर? बस चलते चले गए। करीब चार-पांच किलोमीटर चलकर एक गांव के कोने में बने पुराने मंदिर पहुंचे। गांव का नाम है ‘गिडोह’।
यहां भी एकदम अंधेरा है कहीं कोई आवाज नहीं। तीन-चार लोग लेटे हुए थे। अंदर घुसकर प्रहलाद ने अपना परिचय दिया, तब पहचाने। उसके गुरु एक बहुत बूढ़े व्यक्ति हैं, जिन्हें न अब सुनाई देता है, न दिखाई। सबने मिलकर रोटी-सब्जी बनाई और खा लिया। मैंने नाइस की एक गोली खा ली और सो गया। चींटे यहां भी काफी हैं। पूरे मथुरा-वृंदावन क्षेत्र में इन काले चीटों की भरमार है। इतनी बड़ी तादाद में इनके यहां होने का कारण भी समझ नहीं आया। बाकी लोग छत पर सोए। मैं नीचे एक तखत पर आधा अंदर आधा बाहर सो गया। इकतीस अगस्त को मथुरा पहुंचे थे, आज छह सितंबर है यानी यहां आए पूरा एक हफ्ता हो गया। ढ़ेर सारे नए अनुभव सामने आए। ध्यात्म व श्रृद्धा का एक बिल्कुल नया संसार मेरे सामने था। आसपास जो मिले या दिखे कमोबेश सभी अभावों में जी रहे थे। परंतु वे असाधारण रूप से संतुष्ट और काफी हद तक प्रसन्न, खासकर यहां पर तो दिखाई दे ही रहे थे।
यह निताई गौड़ मंदिर है यानी-दोनों का संयुक्त बलराम-श्रीकृष्ण मंदिर। वैसे ब्रज में बलराम के मंदिर कम ही दिखते हैं। सर्वत्र राधा और कृष्ण ही व्याप्त हैं। उड़िया महात्मा है-उनका नाम है पतितपावन दास और उनकी आयु लगभग 98 वर्ष की है। पिछले लगभग पचास साल से यहीं हैं। यह सभी उड़िया लोग बहुत पहले इस क्षेत्र में आ गए हैं। सभी पर चैतन्य महाप्रभु का प्रभाव है। अब महंत जी पूरी तरह से अशक्त हो गए हैं, न ठीक से दिखाई देता और न ही सुनाई देता। वैसे सजग हैं और चलकर गांव तक चले जाते हैं। महंत जी का कोई भी चेला यहां नहीं है, कोई पुजारी भी नहीं है इस गांव में। शायद कंजूस भी बहुत है।
सुबह उठकर तैयार हुए। एक और स्थानीयता या विशिष्टता से सामना हुआ। सुबह से सड़क के दोनों ओर शौच के लिए बैठने वालों की लाइन लग जाती है। बस, बीच में ही चार-पांच फुट सड़क छूट जाती है। वरना पैर रखने की जगह नहीं रहती। सब तरफ मल भरा पड़ा है। गिडोह काफी बड़ा और सम्पन्न गांव है। परंतु लगता है यहां घरों में शौचालय बनवाने की प्रथा ही नहीं है। गोवर्धन में भी बहुत कुछ ऐसा ही था। काफी गंदगी है बृज में। मध्यप्रदेश का बुंदेलखंड भी इसी परंपरा के लिए कुख्यात है। निताई गौड़ देवता और पतित पावनदास महाराज को प्रणाम करके सुबह साढ़े आठ के करीब निकल पड़े। एक किलोमीटर चलकर एक जुगाड़ में बैठ कर नंदगांव पहुंचे और वहां से टेम्पो में बैठकर बरसाने करीब दस बजे पहुंच गए। मंदिर काफी ऊंचाई पर होने से चढ़ते-चढ़ते थक गए। ऊपर पहुंचकर अच्छा लगा। श्री राधारानी का नया मंदिर है, पुराना मंदिर एकदम जीर्ण-शीर्ण होकर बंद है। नीचे बरसाने दिखाई देता है। अच्छा दृश्य है। बहुत थोड़ी देर यहां रूके। दरअसल, यहां आकर मैं महसूस कर रहा था कि श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है। वस्तुत : मैं इस पूरे क्षेत्र को बहुत व्यापकता से देखना व समझना चाहता हूं। समझना चाहता हूं कि एक पूरा इलाका किस तरह सिर्फ श्रद्धा व वात्सल्य के तहत सदियों तक बसा रहता है और दुनिया भर के लोगों को आकर्षित भी करता रहता हैं।
नीचे उतरे। इस पूरे ब्रज क्षेत्र में बस एक गोर्वधन पर्वत है, एक बरसाने की पहाड़ी और एक नंदगांव की पहाड़ी बाकी सब ओर सपाट मैदान हैं। ऐसा बताते हैं कि कोकिलावन में भी शनि का मंदिर है और पहाड़ी है। नीचे उतर कर बाजार में सबने लस्सी पी और मैंने एक सेब खाया। आज एकादशी है। सबका उपवास है। अब तक मेरी बातचीत सबसे बहुत कम हो गई है। मेरी यह समझ में आ गया है कि ये लोग किसी भी तरह से साथ रहने लायक नहीं हैं। वस्तुतः जब हम किसी के साथ लगातार संपर्क में रहते हैं, तभी उसको ठीक से समझ पाते हैं। इन बाबाओं को कृष्ण भक्ति के पीछे के दर्शन में कोई दिलचस्पी नहीं है। शायद ये जानते ही नहीं हैं कि यह कोई दर्शन भी है। सिर्फ समय काटते हैं। जैसे नौकरी कर रहे हों। परंतु मेरा धर्म का पैमाना लगातार बढ़ता जा रहा है।
फिर पैदल चले। थोड़ी दूर में एक गली में एक आश्रम-धर्मशाला दिखी। उसमें घुस गए। यहां श्री लाडलीशरण आश्रम ट्रस्ट संस्थान में श्री कृष्ण चैतन्य भगवान प्रतिष्ठित हैं। बरामदे में बैठ गए और सबने अपनी-अपनी जगह हड़पकर आसन बिछाया और लेट गए, मैं बैठा रहा। कमजोरी काफी हो गई है तथा बुखार भी है। आज भी एक गोली खा लूंगा। इसी बीच फलाहार के लिए घंटी बज गई। बीच के आंगन में साधु, भक्त, भिखारी सब एकसाथ बैठे और फलाहार परोसा गया। सबके बीच बैठकर अच्छा ही लगा कि मेरा बचा खुचा अहंकार भी टूट रहा है। फलाहार ठीक-ठाक ही है, खा लिया। आकर अपने बैग पर सिर रखकर थोड़ी-सी जगह बनाकर लेट गया। हंसदास से बहस हो गई। मैंने कहा आप लोगों के साथ रहकर अब तक जो समझ में आया है उसके अनुसार साधु वह जो केवल अपनी सोचे,जिसे किसी दूसरे की सुविधा-असुविधा से कोई वास्ता न हो। सब चुप रहे, लेकिन चिढ़ गए। आखिर कब तक चुप रहा जा सकता है? मैं तो अब बोलूंगा और मैंने तय भी कर लिया है कि इनका साथ छोड़ना है। थोड़ी देर में सियाचरण बाबा नहाकर आ गया और कहने लगा चलो देर मत करो। मैंने कहा कहां? बोला बस चलते हैं, कोसी और फिर मथुरा।
एक बार फिर चल पड़े वापस पैदल। करीब चार बजा है, बेहद धूप और गर्मी। तबियत पहले से ही खराब चल रही है। रोड पर पहुंचे। थोड़ी देर में एक मिनी ट्रक मिल गया, सब उस पर चढ़ गए। पूछा कि अब कहां जा रहे हैं? जवाब मिला कोसी, फिर मथुरा, और शाहगंज। मैंने पूछा सभी? बाबा बोले हां, सभी। मैंने कहा चलो और चल पड़े। कोसी से करीब दो किलोमीटर पहले ट्रक के पट्टे टूट गए। आगे पैदल चले। यूपी के खास गंदे शहरों की ही तरह कोसी भी दिल्ली और मथुरा के बीच स्थित है। स्टेशन पहुंचे। बहुत तेज बारिश आ गई और सब भीग गए। एक गाड़ी आई फीरोजपुर पैसेंजर उसमें चढ़कर मथुरा पहुंचे गए। अभी भी तेज पानी गिर रहा है। अब मथुरा से होशंगाबाद जाना है। शायद आखिरी बार बिना टिकिट के यात्रा करनी है। थोड़ी धुक-धुक होने लगी। कहीं पकड़े न जाएं? बाबा कॅरियर के अंत में ट्रेन में फंस न जाएं? बाबा कॅरियर यानी धंधा। नया शब्द काफी मजेदार लगा। बिना टिकिट चलने की धुक धुकी से लगा कि बाबा बनने की पूरी प्रतिभा मुझ में अभी भी विकसित नहीं हो पाई है। अब शायद न भी हो। गोंडवाना एक्सप्रेस आ गई। एक डिब्बे में सियाचरण बाबा और मैं घुस गए, दूसरे में बाकी लोग। यह स्लीपर है। दरवाजे के पास आसन जमाकर बैठ गए। थोड़ी देर में टीटी आया। उसने नजर डाली और दूसरी तरफ देखने लगा। पुलिस वाले आए उन्होंने भी हम पर नजर डाली और चल दिए। एक भिखारी भी बैठा था। उसे एक लात मारी और कह दिया अगले स्टेशन पर उतर जाना। वह सीट के नीचे घुसकर सो गया। समझ में आ गया साधु और भिखारी में यही अंतर है। वैसे हम दोनों ही बिना टिकट हैं। पर हम से होने वाला व्यवहार एकदम अलग-अलग है। हमने बचा हुआ सेब और बिस्किट खाए, पानी पिया। बाबा तानकर सो गया। मैं रात भर बैठा रहा। ट्रेन में बेहद मच्छर हैं।
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया

