एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
धार: भगवद् गीता सार
शाम तक धार पहुंच गया शाम को थोड़ा टहले। अच्छे से नहाया। यहां पहुंचने के बाद पैर के पंजे में दर्द एकदम बढ़ गया है। चलने में काफी तकलीफ हो रही है। थोड़ी देर कुछ पढ़ा। गांधी जयंती पर मंजूर भाई, केसवानी, जैदी, मुकेश शुक्ला और इरा को फोन किया। सुबह उठकर घूमने नहीं जा सका। पैर का दर्द और बढ़ गया। मधुमक्खी का छता तोड़कर छगन ने उसकी मोम लगाई हैं। शायद फायदा होगा लेकिन नाखून भी सूजता जा रहा है और बहुत दर्द हो रहा है। शायद नाखून निकालना पड़े। क्रेक्स में तो फायदा हुआ है। आज महेश जी का भी फोन आया। हर्ष जी सिर्फ एक दिन के लिए ही मेघनगर आ रहे हैं। अंगूठे की वजह से मैं तो अभी जा नहीं पाऊंगा। जल्दी ही इन लोगों से बात करके कुछ फैसला करना है। अब और इस तरह खाली बैठे-बैठे नहीं चलेगा। यह चोट शायद इसलिए भी लाभप्रद साबित हो सकती है कि मैं यहां बैठकर आगे के बारे में गंभीरता से सोच सकूं। दर्द के बीच जो थोड़ा समय मिलता है, वह इसी मनन चिंतन में बीत जाता है। दर्द के साथ जीने का भी अपना ही रस है, मजा है।
आजकल रोज लगभग एक डेढ़ घंटा पीछे मंदिर में बैठकर गीता पाठ करता हूं। एकांत में अच्छा लगता है। पहले कभी भगवद्गीता पूरी पढ़ी नहीं है इसलिए कुछ जानने को भी मिलता है। हिन्दू धर्मशास्त्र की सबसे चर्चित और प्रामाणिक कृति यही मानी जाती है। कहा जाता है कि यही हिंदू दर्शन है। बीच के अध्यायों से यह काफी स्पष्ट है कि दूसरे धार्मिक सिद्धांतों की चुनौती मिलने पर ही इसकी रचना हुई है। यह संभवतः बौद्ध और जैन धर्मों की स्थापना के बाद की कृति है। अध्याय-तीन के श्लोक क्रमांक-पैंतीस से यह स्पष्ट है कि हिंदू धर्म को दूसरे धर्मों से श्रेष्ठ बताते हुए हर स्थिति में उसका पालन करने का आह्वान किया गया है और निकृष्टतम हिंदू को श्रेष्ठतम विधर्मी से उन्नत बताया गया है। यह भी हो सकता है कि अलग-अलग अध्यायों की रचना अलग-अलग समय काल में की गई हो। वैसे भगवद्गीता में विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा, कर्मकांड और यज्ञ आदि के महत्व को कम किया जाकर योग और साधना पर अधिक जोर दिया गया है। यह भी बौद्ध और जैन धर्म का प्रभाव दिखता है। गीता को धर्मशास्त्र न कहकर योग शास्त्र कहा जाता है। वैसे तो इसे महाभारत का हिस्सा मानकर ही स्वीकार किया जाता है, लेकिन इसकी रचना किसी एक काल में ही हुई हो, यह थोड़ा अविश्वसनीय लगता है। वैसे गीता की तमाम विद्वानों ने अपनी-अपनी तरह से विवेचना की है, लेकिन इसकी संरचना के समय, काल और परिस्थितियों को लेकर बहुत कम कार्य हुआ है। मैं इसको समाज के क्रमिक विकास के क्रम को ध्यान में रखकर भी पढ़ना चाहता हूं। इसकी असाधारण लोकप्रियता भी आश्चर्य का विषय है। वैसे तो भारत में अधिकांश लोग इसे पढ़े-बिना ही, पूरा जीवन इसे उद्धृत करते रहते हैं।
पूरे सौ दिन हो चुके हैं निकले हुए। अफसोस यह है कि अभी तक आगे का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसा कभी नहीं लगा कि निकलकर कोई गलती की है लेकिन यह जरूर लगने लगा है कभी-कभी कि और दूर न जाकर भारी भूल की है। अक्सर आसमान से गिरे और खजूर में अटके जैसी स्थिति लगने लगती है। दूर होकर भी मोह में पड़ गया। खुशी देना चाहकर भी शायद दुःख ही दिया। मेरे जीवन की संभवतः सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि जो भी सबसे करीब है और जिसे सबसे ज्यादा खुशी देना चाही, बस उसे ही खुश नहीं रख पाया। निश्चय ही मेरे व्यक्तित्व में, मेरे चरित्र में और मेरे व्यवहार में कोई गंभीर खोट रही है। एकबार फिर वही दोहराया गया है। बस, अब और नहीं। पर क्या यह मेरे वश में है? सौ दिन में बहुत कुछ पाया है परंतु बहुत संतुष्टि मिली हो ऐसा भी नहीं लगता। घर कैसा भी हो याद तो आता ही है।
नरेश सक्सेना की पंक्तियां हैंः
दरवाजा होना तो किसी ऐसे घर का
जिस पर पड़ने वाली थपकियों से ही
समझ लेते हों लोग,कि कौन आया है
परिचित या अपरिचित
और बिना डरे कहते हों हर बार
खुला है चले आईए।
शायद मैं भी किसी ऐसे ही दरवाजे की तलाश में लगातार भटक रहा हूं। खैर आवश्यकताजनित संयोग से बना साधु-बाबाओं का साथ छूट ही गया है। शिवगंगा के साथ जुड़ पाना बहुत दुष्कर लग रहा है। तो फिर और क्या? यहां मित्र के महल में पड़े रहने से तो अपने गांव के झोपड़े में समय बिताना ही शायद बेहतर है? पता नहीं कल से यह विचार रह रहकर कौंध रहा है। इस हफ्ते में कुछ निर्णय लेना ही होगा।
मैं अपने बारे में सोचने लगा। मेरा अंगूठा सड़ने से बच गया है। दवाइयों और चीरा लगाने से फायदा तो हुआ है। चीरा लगने के अगले दिन उठा तो थोड़ा आराम महसूस हुआ। आधा घंटा घूमा भी। आज महेश जी से बात हुई। छह से नौ अक्टूबर तक चलने वाला उनका प्रशिक्षण वर्ग पूरा हो गया है। वे अभी मेघनगर में ही है। महेश जी वगैरह ग्यारह अक्टूबर को यहां धार आएंगे। दीपक चौदह को भोपाल जाएगा। मुझे भी उम्मीद है कि मैं भी तब तक कुछ तय कर पाने की स्थिति में हो जाऊंगा। इतना तो तय है कि मुझे अब भीलों (धार-झाबुआ) और गोंड़ों (मंडला-डिंडोरी) आदिवासियों के बीच ही चुनाव करना है। यानी आगे का कार्य और निवास दोनों सिद्धांततः आदिवासी क्षेत्र में ही रहने की पूरी संभावना है। दूसरी ओर यह भी लग रहा है कि अभी शारीरिक स्थिति ऐसी नहीं है कि नर्मदा परिक्रमा मुझसे संभव हो पाएगी। जाहिर है, सब कुछ एकसाथ तो पाया नहीं जा सकता।
आज भगवद्गीता का पाठ पूरा कर लिया। काफी रोचक और सारगर्भित वक्तव्य है। स्पष्ट है कि भौतिकवादी और अनीश्वरवादी हिंदू दर्शन-लोकायत, बृहस्पत्य, चार्वाक,बौद्ध और जैन धर्मों के निरंतर आक्रमण से आहत और क्षत-विक्षत होकर वेदान्तियों ने भगवद् गीता की रचना की होगी जिसमें स्वयं परमब्रहम परमेश्वर को उपदेशक बनाया गया। यह मूलत: एक वेदांतिक धर्मग्रंथ है, जिसमें हिंदू दर्शन के सांख्य और योग व्यवस्थाओं को आधार बनाया गया है। कर्म को वर्णाश्रम धर्म के अंतर्गत परिभाषित किया गया है। अट्टारहवें और अंतिम अध्याय में वर्णव्यवस्था को विस्तारपूर्वक समझाया गया है। तीसरे और चौथे अध्याय में भी यज्ञ और भक्ति को वर्णाश्रम के परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाकर तदनुसार निष्काम कर्म की महत्ता बताई गई हैं। नौवें अध्याय में ‘निम्नजन्मा’ स्त्री, वैश्य और शूद्र को भी भगवद् मार्ग पर चलने की अनुमति दी गई है।
सोलहवां अध्याय अनीश्वरवादियों और भौतिकवादियों पर खुला आक्रमण है। मुझे लगता है कि गीता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष आडम्बरविहीन, कर्मकांड़ों से विरक्त योग और भक्ति का आह्वान है। भौतिक प्रकृति के तीन गुण सतो-रजो-तमो की व्याख्या और योग तथा सन्यास की विस्तृत चर्चा अत्यन्त प्रभावशाली और विचारोत्तेजक है। लगभग अंत में सब धर्मों का त्याग कर भगवतशरण में आने का आह्वान भी इस परिप्रेक्ष्य में विचारणीय है। “सर्व-धमौन्तरित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” इसमें संदेह नहीं कि हिंदू धर्मशास्त्र का यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
स संन्यासी च योगी च न निरर्ग्निव चाक्रियः !!(61)
अनाश्रितः कर्मफलं कार्य कर्म करोति यः।
काम्यानां कर्मणां न्यास सन्यासं कवयो विदु :।
सर्वकर्मफलात्यागं प्राहुस्त्यांग विचक्षणाः ।। (182)
जो व्यक्ति अपने कर्मफल के प्रति अनासक्त होकर अपने कर्तव्य कर्म का पालन करता है, वही वास्तव में संन्यासी और योगी है। वह नहीं जो कोई कर्म नहीं करता। ‘संन्यास’ का अर्थ भौतिक, लौकिक इच्छाओं पर आधारित समस्त कर्मों का परित्याग है। किंतु समस्त कर्मों के फल की इच्छा का परित्याग ही ‘त्याग’ है। मनुष्य के जो नियम कर्म हैं उन्हें अपना कर्तव्य मानकर करते हुए जो समस्त भौतिक, लौकिक संगति और कर्म-फल की आसक्ति को त्याग देता है, वही त्याग सात्विक, सतोगुणी होकर वास्तविक त्याग है, न कि मोहवश या कष्टप्रद समझकर किया गया त्याग।
गीता का विस्तृत अध्ययन काफी रूचिकर और समझ बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ। महत्वपूर्ण यह है कि हम उस रचना को किस परिप्रेक्ष्य में देखते व समझते हैं। मेरा अपना विवेचनात्मक दृष्टिकोण कहीं न कहीं इसे प्रतिक्रिया में रचे ग्रंथ के रूप में देखता है। फिर भी आने वाले समय में इस अध्ययन ने मेरी काफी मदद की।
जैसा कि तय था, अगले ही दिन हर्ष चौहान सुबह लगभग साढ़े नौ बजे इंदौर से मुकेश जैन के साथ धार आ गए। थोड़ी देर में हर्ष जी और मैं अलग बैठ गए। मैंने अपनी अब तक की अनुभूतियां, अपनी वैचारिक पृष्ठभूमि, वर्तमान सोच और साथ काम करने में आने वाली संभावित समस्याओं की खुलकर चर्चा की। हर्ष जी ने थोड़ा-बहुत अपने और अपने संगठन के विषय में बताया और यह कहा कि इस सब पर और विचार करना होगा। यह भी कहा कि महेश जी को साथ बैठाए बिना किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता, क्योंकि दिन-प्रतिदिन का काम तो उन्हीं के साथ करना है। कल महेश जी और अन्य लोग इंदौर में बैठक के लिए इकटठे होंगे और परसों महेश जी को साथ लेकर हर्ष जी फिर से यहां आ जायेंगे। हर्ष जी के साथ लगभग दो घंटे बात हुई। खाना खाकर वे दोनों चले गए। मुझे लग रहा है कि बात बन नहीं पाएगी। परंतु किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले विस्तृत विमर्श और चिंतन अनिवार्य है। वर्तमान परिस्थिति में महेश जी से चर्चा के बगैर किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सकता।
अलीराजपुर: भील लोक में
दूसरे दिन महेश जी का फोन आ गया कि रात में ही धार आ जाएंगे। मेरे पांव की तकलीफ अब काफी कम है। अंगूठे की पट्टी कल निकालनी है। बिमाई में भी दर्द कम है। मैन लगाने से लाभ हुआ है। बीच में तो चलना ही मुश्किल हो गया था। सुबह घूमने निकला था। रात में महेश जी इंदौर से आ गए। सुबह से उठकर घूमते-फिरते, महेश जी से बातें चलती रहीं। उनके सामने भी मैंने वही सब बातें रखीं जो हर्ष जी से कहीं थीं। महेश जी से बातचीत के दौरान मतभेद और समझ में अंतर एकदम उभर कर आए। लेकिन कुल मिलाकर दोनों ही ओर से सद्भावी इच्छा यही दिखाई दी कि साथ काम करने का प्रयत्न करना चाहिए। हर्ष जी और महेश जी की आपस में विशेष बात नहीं हो पाई थी। हर्ष जी के साथ भी चर्चा करके ही आगे की रूपरेखा तय करनी होगी। कंपाउंडर ने आकर अंगूठे की पट्टी भी खोल दी। अब चलने लायक स्थिति है। महेश जी ने मुझे लुभाने के लिए कहा कि कट्ठीवाड़ा क्षेत्र चलेंगे। मेरी तो इच्छा है ही निकलने की। दस दिन हो गए यहां आए। मन बेचैन होने लगा है। कुक्षी जाने वाली बस मिली। बिल्कुल भी जगह नहीं है। राजगढ़ से कुक्षी तक ही बैठने की जगह मिली। रोड बहुत खराब है। राजगढ़ और कुक्षी के बीच प्रसिद्ध बाघ की गुफाएं हैं। लगता नहीं कि इसे देखने बहुत ज्यादा लोग आते हैं। उन्नीस सौ अस्सी में जब पहली बार धार आए थे, फिल्म की शूटिंग के लिए, तक बाघ केव्स की चर्चा हुई थी और जाने का सोचा था लेकिन जा नहीं पाए थे। चार बजे के करीब कुक्षी पहुंच गए। काफी बड़ी जगह है, व्यावसायिक केन्द्र है। इसे निमाड़ का इंदौर कहते हैं। यहां से नर्मदा भी पास ही है। कुक्षी से अलीराजपुर के लिए एकदम भरी हुई बस मिली, खड़े-खड़े चले। सड़क तो बहुत ही खराब है और बस की हालत अच्छी नही है।
कैफ भोपाली का एक शेर हैः
पीछे बंधे हैं हाथ मगर शर्त है सफर,
किससे कहें कि पांव के कांटे निकाल दे।
जाहिर है, मेरा आगे का जीवन सफर बहुत आसान नहीं होगा। समस्या चुनाव करने की है। करीब पचास किलो मीटर का सफर लगभग ढाई घंटे में सात बजे खत्म हुआ। यह बड़ी जगह है। झाबुआ जिले का एक बड़ा केंद्र है और झाबुआ के दूसरे केंद्रो से काफी कुछ भिन्न भी है। इस जगह का नाम आली-राजपुर है, न कि अलीराजपुर। आली एक अलग छोटा गांव है और राजपुर कस्बा, जैसे बाड़ी-बरेली या कान्हा-किसली। अभी यहां से करीब पंद्रह किलोमीटर दूर उमराली जाना है। बस का पता लगाया तो जानकारी मिली कि शायद साढ़े आठ के करीब एक बस जाए। यह जंगली और खतरनाक इलाका है और यहां रात में वाहन नहीं चलते। महेश जी ने कहा उमराली में कार्यकर्ता इंतजार कर रहे होंगे, वहां से लगभग चार किलोमीटर आगे पैदल जाना है। यह सोंडवा विकासखण्ड का क्षेत्र है जो इस क्षेत्र में सबसे खतरनाक माना जाता है। चारों ओर जंगल ही जंगल और धनुर्धारी भील-भिलाले। इसी से लगा हुआ नर्मदा का वह क्षेत्र है, जिसे परिक्रमा में झाड़ी क्षेत्र बोला जाता है और जहां वनवासी सब कुछ लूट लेते हैं। नर्मदा परिक्रमा से संबंधित यात्रा वृतांतों में इसका विशेष जिक्र आता है।
रात साढ़े सात के करीब एक जीप वाला उमराली जाते मिला। उसने पचास रूपए में तय करके बैठा लिया। रोड बहुत अच्छी है। थोड़ी देर में उमराली पहुंचे गए। वहां सड़क पर ही कार्यकर्ता मिल गए। जीप वाले ने गाड़ी रोकी तो उन्होंने कहा कि थोड़ी दूर और जीप जाती है, वहां छोड़ दें। जीप वाला घबरा गया। सब कार्यकर्ताओं के हाथ में तीर-कमान और फालिए (फरसे के समान) सजे हुए हैं। उसने आगे जाने से मना कर दिया और पचास रूपए लेने से भी मना कर दिया और तुरंत वापस चला गया। यहां आकर लगा कि सचमुच झाबुआ जिले के धनुर्धारी वनवासियों के बीच आ गए हैं, अब तक इनकी बस चर्चा सुनते थे। सोंड़वा विकासखण्ड में तो जंगल ही जंगल हैं। सबसे ज्यादा हत्याएं और अन्य अपराध यहीं होते हैं। गुजरात की सीमा एकदम लगी हुए है। और नर्मदा के उस पार महाराष्ट्र का नन्दूरबार जिला है। यहां आने की लोग सामान्यतया हिम्मत नहीं करते हैं। ‘नक्सलवादियों’ का प्रभाव क्षेत्र यही है जो तेजी से बढ़ रहा है। यहां शिवगंगा के लिए रंजीत नाम का युवा कार्यकर्ता काम कर रहा है, जो बहुत दूर रतलाम बॉर्डर का रहने वाला है। यहां आगे की यात्रा तो और भी रोमांचक होगी ऐसी प्रतीत हो रहा था। शायद पहली बार इस क्षेत्र के आदिवासियों को उनके मूल चरित्र में देखा। यह भी समझ में आ रहा था कि शिवगंगा ने कितने अंदर तक पैठ बना ली है। वस्तुतः अभी तो इस क्षेत्र को और लोगों को इस संगठन को ही ठीक से समझना होगा। यही सोचते हुए आगे बढ़ा।
उमराली के इस बाजार फलिया तक ही सड़क है। इसके बाद एक कच्ची रोड है या फिर नदी के किनारे-किनारे पगडंडी है। रंजीत के साथ पांच लोग और हैं-जिनमें टक्कर सिंह प्रमुख है,जो साधुनुमा जटा-जूटधारी व्यक्ति है। भगत है। हम लोग रात के उस अंधेरे में नदी के किनारे वाले रास्ते पर पैदल चल दिए। घनघोर अंधेरा है। तीन बार नदी पार करनी पड़ी। करीब चार किलोमीटर चलकर उमराली के धामनबड़ा फलिया पहुंचे, जहां टक्कर सिंह का घर है। बडी रोमांचक यात्रा रही। सारा अनुभव इतना रोचक कि बीमारी के बावजूद इस तरह दिन भर यात्रा करने के बाद भी बहुत ज्यादा थकान महसूस नहीं हुई। टक्कर सिंह जी के यहां खाना बनाया जा रहा है। उनका झोपड़ीनुमा घर है, नदी के किनारे काफी ऊंचाई पर। आसपास खेत ही खेत यानी खड़ी हुई फसल। घर की दीवारे लकड़ी-बांस पर मिट्टी छापकर बनाई गई हैं जो बरसात में कहीं-कहीं से बह गई दिखती हैं। पहुंचते ही बड़े-बड़े सीताफल निकालकर रख दिए गए और कहा खाओ। रात है, सर्दी का असर है लेकिन खाते चले गए। जितने स्वादिष्ट उतने ही प्रेम से एक-एक छांटकर खिलाया जाता रहा। अड़ोस-पड़ोस की लड़कियां गेंहू की अच्छी रोटी सेंकने आई हैं। यहां इस क्षेत्र में लगातार देख रहा हूं कि खाना बनाने, खासकर गेहूं की रोटी बनाने, नई उमर की लड़कियां ही आती हैं। अधिक उम्र की महिलाएं शायद अभी भी गेहूं की रोटी बनाने में पारंगत नहीं हैं। यह भी लगा कि गेहूं अभी यहां बाहरी लोगों या कथित विशिष्ट लोगों का भोजन है, यह अभी तक सामान्य आदिवासी का खाना नहीं बन पाया है। खूब प्रेम से रोटी-दाल परोसी गई। हमने तो मक्के की रोटी ही खाई। अब तक आसपास के और लोग मिलने आ गए थे। कुछ दूसरे फलिए के भी। कई लोगों ने खाना खाया। फिर से सीताफल। दो खटियां बिछ गयीं। हम लेट गए। फिर गाना-बजाना शुरू हो गया। सुनते-सुनते नींद आ गई। करीब बारह बज गया होगा। उसके बाद सब वापस गए होंगे। क्या जबरदस्त दिन रहा।
सुबह उठा तो दिमाग में आया कि मेरा शरीर अब जल्द अनुकूलन कर रहा है। एक रात पहले मैं एक महलनुमा भवन के कमरे में पूरी आधुनिक सुख-सुविधाओं के साथ सो रहा था और पिछली रात मैं यहां खुले आसमान के नीचे बिछी खाट पर कितने आराम से सोया और नींद भी गहरी आई। लगता है, मुझमें कुछ सुधार हो रहा है।
टक्कर सिंह का घर तो ऊंचाई पर हैं। आसपास सब पथरीली जमीन है। समतल भूमि तो यहां है ही नहीं, टीलों पर ही खेती करते हैं। सब वैसी ही जमीन है जहां गौंड लोग सिर्फ कोदों-कुटकी ही बो पाते है। एक बार फिर तुलना हो ही गई। यहां के लोगों के जीवन और खेती में पारंगतता, महारत की दाद तो देनी ही पड़ेगी। लेकिन यहां तो सब कुछ है- मक्का कपास, तुअर तिली और धान भी। नीचे कुंआ है जो टक्कर सिंह ने अकेले ही खोदा है, उसमें मोटर लगाई है। कुंए के आसपास छोटे-छोटे पत्थर और गिट्टी ही है जिनके बीच-बीच में मिट्टी दिखाई दे रही है। कोई मेढ़ नहीं, कोई पाल नहीं और धान की फसल लहलहा रही है। वाह, क्या लोग हैं और कितने परिश्रमी! इसे कहते हैं पत्थर से पानी निकालना। टक्कर सिंह के यहां चाय पी और फिर वहां से निकल चले। नदी में नहाने में खूब मजा आया। खूब सारे बच्चे इकट्ठे हो गए। तैर-तैरकर नहाते रहे। बच्चों ने भी खूब आंनद लिया। नहा-धोकर फिर घूमने निकले।
यहां से एकदम लगा हुआ है उज्जड़ गांव। वहां की एक छोटी लड़की रात में रोटी बनाने टक्कर सिंह के यहां आई थी। बार-बार बोल गई थी कि सुबह मेरे घर आना। उसके घर पहुंचे। उनके यहां सीताफल खाया, चाय पी। उसके पिता पढ़े-लिखे हैं, नौकरी करते थे और अब खेती करते हैं। सब भाई आसपास रहते हैं। एक-एक करके सबके घर गए। अच्छे खाते-पीते लोग है। एक भाई एलआईसी में है। सभी महिलाएं और बच्चे खेतों में काम करते हैं। बच्चे पढ़ते भी हैं। एक घर का फर्श इतना सुंदर बना हुआ है कि मैं देखता ही रह गया। पूरे फर्श पर मिट्टी और गोबर से ताड़ के पत्तों की आकृति उभारी हुई है। बहुत सुंदर कलाकृति है। यहां के लोग नैसर्गिक कलाकार हैं। साथ ही बहुत जीवंत लोग हैं। अभी यह प्रश्न तो लगातार दिमाग में कौंध ही रहा है कि आखिर संघ के लोग इतने भीतर तक कैसे इतनी पैठ बना पा रहे हैं? शायद वे अपने कार्यकर्ताओं को प्रेरित करने से अधिक या स्पष्ट कहें तो सम्मोहित यानी हिप्नोटाइज तो नहीं करते? उत्तर शायद ही मिले। वहीं दूसरी ओर इन आदिवासियों की नैसर्गिक प्रतिभा और सौंदर्य दृष्टि को लेकर मैं जरूर सम्मोहित हो रहा था। स्पष्ट कहूं तो सम्मोहित हो गया था।
क्रमशः…
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