एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-25

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
सबसे बड़ी चिंता मेरी आर्थिक दशा
इधर, मैं यहां काफी रम गया हूं। झाबुआ अभी दिमाग से जैसे उतरा हुआ है। कुछ सोचने का मौका भी तो नहीं मिला, पारिवारिक व्यस्तता के चलते। परंतु तेइस नवंबर को दीपक का इंदौर से रात में फोन आया। उसने पूछा हर्ष ने बात की या नहीं? थोड़़ी देर में महेश जी का फोन आया झाबुआ से और फिर हर्ष जी का इंदौर से। तीन दिसंबर को सबका बैठकर चर्चा करना और निर्णय लेना तय हुआ। अब न तो उन्हें और न ही मुझे लग रहा है कि साथ करना संभव हो पाएगा, लेकिन दीपक का दोनों से ही आग्रह है कि मिलकर काम करें। पता नहीं कैसे संभव हो पाएगा? दीपक की इच्छा यही है कि मैं उसके आसपास रहूं। बेहद अकेला है वह भी।
आज कार्तिक पूर्णिमा है और गुरूनानक जयंती भी। दीवाली को एक पखवाड़ा बीत गया। बहुत समय बाद इतने दिन यहां रूकना हुआ। यहां दिन कैसे बीत जाते हैं, पता ही नहीं चलता। पूरे बीस दिन हो गए। कल आशीष तिवारी व विक्रम सिंह का भी फोन आया था कि मिलने आना चाहता है। आशीष भोपाल में और विक्रम जबलपुर में मेरे सहायक वकील हैं। मैंने आज कहा कि आना चाहो तो दोनों साथ आ जाओ। यहां सबको यह समझ में आ चुका है कि मैं अब कभी भी यहां से जा सकता हूं। इसी वजह से सभी लोग ज्यादा से ज्यादा साथ रहना चाहते हैं। मुझे भी ऐसा ही लगता है। यह भी तय नहीं है कि मैं भंवरताल में नहीं रहूंगा। परंतु यह भी उतना ही सच है कि अभी कुछ भी तय नहीं है। सुबह ग्यारह बजे के करीब मंडला से मुकेश शुक्ल आ गया। आज वैसे कोई भी छुट्टी नहीं है। मुकेश को बहुत अधिक लगाव है मुझसे, सही मायने में छोटे भाई की तरह। उसकी शारीरिक अवस्था अच्छी नहीं है, वह मंडला का प्रतिष्ठित वकील है। लेकिन आज दूसरी बार आया है। मुकेश ही है जिसके साथ खुलकर सभी तरह की बातचीत हो सकती है। अपने तक रखने के विश्वास के साथ। इस समय उसकी सबसे बड़ी चिंता मेरी आर्थिक दशा को लेकर है जिसे मैंने निर्मूल होना समझाया।
शाम चार बजे के करीब आशीष और विक्रम आ गए। एकदम हतप्रभ से लगे। थोड़ी देर में चाय पीकर मुकेश मंडला के लिए निकल गया और हम सब बाबा की गाड़ी में सीतारपटन मड़ई के लिए। यह जगह यहां से करीब पंद्रह किलो मीटर दूर है ककैया-बोकर होकर गए। अंधेरा होते पहुंचे। मडई में घूमने में सबको बहुत मजा आया। खूब मिठाई भी खाई मडई वाली। बाबा ने अजनिया के रेस्ट हाउस में खाने का इंतजाम किया है। सीतारपटन सुंदर जगह है। सुरपन नदी किनारे एक विशाल चट्टान पर छोटे-छोटे मंदिर बने हैं और एक गड्ढा है। किवदंती है कि सीता की अग्निपरीक्षा यहीं हुई थी और सीताजी यहां रपट कर (फिसलकर) धरती के अंदर वहां समा गई थीं, जहां धरती फटी हुई हैं। इसीलिए इसे “सीता-रपटन” कहते हैं। यह बात हमेशा हैरान करती है कि कहीं भी जाएं वहां या तो राम-सीता से जुड़े स्थान या पांडवों से जुड़े स्थान मिल ही जाते हैं। इन महाकाव्यों की पैठ अनादिकाल से भारतीय समाज में रही है। सीता की अग्निपरीक्षा और धरती में समा जाना, ऐसे प्रतीक हैं, जो हमेशा सवाल खड़े करते हैं। पर “सीता-रपटन” वास्तव में एक विचारणीय विषय है।
अंजनिया पहुंचे। चांदनी रात बहुत सुंदर है। मैंने कमरे में पहले विक्रम से और फिर आशीष से विस्तारपूर्वक अलग-अलग बात की और यह स्पष्ट किया कि अब लौटने का कोई सवाल ही नहीं है। आशीष को वन्या-अलंकार से थोड़ा इशारा मिल चुका था। दोनों काफी निराश हो गए। वैसे सभी इस बात पर अडिग हैं कि मुझे पुनः पुराने जीवन में लौट आना चाहिए। वे शायद आगे आने वाली परेशानियां और कष्टों को लेकर बेचैन हैं। मुझे उनकी आत्मीयता समझ में आती है। परंतु मेरा फैसला किसी भावनात्मक अतिरेक में उठाया गया फैसला नहीं है। भटकन बहुत मददगार सिद्ध हो रही है।
भंवरताल में इस बार यह आखिरी रात है, कल निकलना है। अब पता नहीं कब यहां आना होगा। मेरा बचपन एक बार फिर यहीं रह जाएगा। कुल मिलाकर यहां बहुत अच्छा लगा। कुछ समय एकदम अकेले में और कुछ सबके साथ बिताकर। समय अकेले के लिए कुछ और मिलना था। अब लगता है घूम-फिरकर अंत में यहीं आना है। ऐसा होना अनुचित भी नहीं होगा। चार महीने से अधिक का समय बीतने के बाद आया था, इसलिए सब लोग इस रूप में स्वीकार करने के लिए दिमागी तौर पर तैयार थे। पर पुनः विदाई शायद सबको भारी पड़ रही है।
मेरी वापसी यात्रा शुरू हो गई है। रोज की तरह दिनचर्या शुरू की। बस नाश्ते की जगह सीधा खाना खाया और मंडला पहुंच गया। वहा अर्पणा के घर गए। चाय पीकर करीब चार बजे जबलपुर के लिए निकल पडे़। छः बजे जबलपुर पहुंच गए। इस बीच भोपाल से आकर मुकेश ने फ्लेट किसी को दिखाया था। खाना मंगाकर रेस्ट हाउस में खाया और मुकेश के साथ स्टेशन निकल पड़ा। बाबा की आंखों में सचमुच आंसू भर आए। अपनी तमाम कमजोरियों के साथ भी मुझे बहुत अधिक चाहता और मानता है। रात साढ़े नौ बजे मेरी ट्रेन आ गई। बर्थ मिल गई। मुकेश अगली ट्रेन से निकलेगा। अपने भाई को फोन करके बोला कि बैरागढ़ में मेरे लिए नाश्ता लेकर आए, मैंने बहुत मना किया। ट्रेन चल पड़ी। तब मुकेश भी रोने लगा। मेरा भी मन दुखी तो हो रहा है, परंतु जाना अब अनिवार्यता हो गई है। कितना अजीब है यह अनुभव। कितने सारे जाने-अनजाने लोग हैं, जो मुझसे इतना स्नेह रखते हैं। आज मेरे पास उन्हें देने के लिए क्या है? सब लोग देना चाहते हैं, जितना भी देना संभव हो। क्या मैं खुशकिस्मत व्यक्ति नहीं हूं? कितने लोगों को नसीब होता है यह प्यार यह स्नेह, यह लगाव और समर्पण। क्या जीवन में इसके अलावा किसी और चीज की जरूरत होती है?
इंदौर/धार: भविष्य का खाका
1 दिसंबर 2007 सुबह सात बजे इंदौर के लिए रवाना हो गया। साढे़ ग्यारह के करीब महेश जी और हर्ष जी आ गए। दीपक ने पहले हर्ष जी से अलग बैठकर थोड़ी देर बात की। मैं और महेश जी अनौपचारिक बातचीत करते रहे। दीपक ने अपनी बात सबसे मनवा ली और यह तय हुआ कि जोबट में ही स्वतंत्र रूप से एक केन्द्र की स्थापना करेंगे। यह केंद्र मुख्यतः कानूनी अधिकारों के लोकव्यापीकरण को लेकर कार्य करेगा। शुरू में कुछ दिन महेश जी के साथ वहां जाकर परिस्थितियां समझेंगे। यह काम मुख्यतः मुझे ही करना है। शिवगंगा के कार्यकर्ता सहयोग करेंगे। यह है तो बहुत महत्वपूर्ण और उपयोगी काम, इसमें कोई संदेह नहीं। निश्चित रूप से एक सार्थक पहल हो सकती है और मेरा भविष्य अर्थपूर्ण हो सकता है। यह मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती है। कहां तक कर पाऊंगा, यह देखना है। बातचीत करके खाना खाकर दोनों चले गए। बड़ा अच्छा लग रहा है तय होने पर। अब मुझे पूरी तरह से जुटना होगा। एक नई राह तो खुलती नजर आ रही है। महेश जी वापस मेघनगर चले गए। अब मैं ग्यारह-बारह तारीख को उनके पास जाऊंगा, तब तक उनकी अन्यत्र व्यस्तता है। चार बजे मैं इंदौर से निकल गया। छः बजे से पहले धार पहुंच गए। यहां झिराबाग पहुंच कर बहुत हल्का लगा। कुछ घंटों में ही बड़ा भारी सा लगने लगा इंदौर में। बड़े शहरों से अब विरक्तता सी होती जा रही है। वहीं दूसरी ओर नए जीवन की परिकल्पना भी सामने है। अंदर से रोमांच हो रहा है। पर अभी सफर काफी लंबा है।
3 दिसंबर 2007
आज तीन दिसंबर है। तेइस साल हो गए, गैस विभीषिका को। अब तो भोपाल ने ही इसे भुला दिया है। रेडियो या किसी भी अखबार में कोई जिक्र नहीं है। भोपाल में कल रात से वैसा ही औपचारिक विरोध प्रदर्शन, श्रद्धांजलि आदि की गतिविधियां चल रही होंगी। मैंने तो पूरी तरह से अपने-आपको इस काम में झोंक दिया था। महीनों सब कुछ भूलकर इसी में लगा रहा था। उसके बाद छह महीने तक तो और कुछ भी नहीं सूझा कि कहां क्या हो रहा है? तब युवावस्था थी। मैं बत्तीस साल का था। अब फिर ठीक तेइस साल बाद एक नया काम शुरू करने का मन बना लिया है, पचपन साल की उम्र में। देखें, क्या कुछ हो पाता है। उसी तरह से दोबारा झोंकने की जरूरत है, खुद को। पिछले पांच महीने से अधिक की तपस्या के बाद लग तो रहा है कि मैं इस सबके लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार हूं। यह भी उम्मीद है कि सहयोग मिलेगा। परंतु अपने-आपको पूरी तरह से एक नए रूप में ढालना होगा। अब समय आ गया है कि सारे दुःख, विषाद और क्रोध त्यागकर सभी पुराने लोगों से संबंधों का सामान्यीकरण हो जाए, जिससे भविष्य में इस ओर ध्यान न भटके।
देबू ने दीवाली के दूसरे दिन मुझे एसएमएस किया था, भवानी प्रसाद मिश्र की कविता की बेहद सुंदर पंक्तियां भेजी थीं:
सोना सूरज का था,
उसने अपना सोना बीन लिया,
मगर नींद मेरी थी
उसने क्यूं छीन लिया,
मेरा सोना।
तब से इसका जवाब नहीं बन पड़ रहा था। अब शायद जवाब देने की स्थिति में आ सकूं।
गैस त्रासदी की बरसी
आज छह दिसबंर है, भारत के इतिहास का एक अत्यंत काला दिवस। हिन्दुत्ववादी संगठन इसे शौर्य दिवस कहते हैं। जबकि इसे “राष्ट्रीय शर्म दिवस” कहना चाहिए। आज से पंद्रह साल पहले अयोध्या में बाबरी मस्जिद सुरक्षा एजेंसी के सामने ढहा दी गई थी। उस दिन से दिलों में जो खाई पैदा हुई, वह बढ़ती ही जा रही है।
दोपहर में देबू आया। उसके साथ जाने-माने पत्रकार और ‘फिल्मफेयर’ के संपादक रहे विक्रम सिंह। विक्रम सिंह बहुत सुलझे हुए व्यक्ति लगे। कहने लगे भोपाल के संदर्भ में मेरा नाम सुन रखा था। देबू ने वर्तमान परिचय दिया तो मिलने की बड़ी इच्छा हुई। उन्हीं की इच्छा थी मिलने आने की। बहुत अच्छा लगा इन लोगों से मिलकर। खूब फोटो खींचे। मुझसे पूछ रह थे कि आप दीपक को कैसे जानते हैं क्योंकि आप दोनों तो उत्तर और दक्षिण ध्रुव होंगे। मैंने कहा आप बिल्कुल ठीक सोचते हैं, लेकिन हम दोनों पुराने सहपाठी हैं और एक-दूसरे से एकदम उलटे होते हुए भी बहुत अच्छे दोस्त हैं।
भोपाल से मुकेश मिलने आया जो पहले मेरा ड्राइवर था। रात रूक गया। बोला सोने की व्यवस्था तो दोनों ड्राइवरों के लिए ठीक है लेकिन कहने लगा ठंडा और बासी खाना खाने को मिला। मैंने कहा भाई महलों में छोटे लोगों को ऐसे ही खाने को मिलता है। बस महल का ऐश्वर्य देखो और देख-देख कर पेट भरो,खुश रहो। भर पेट अच्छे से खाना है तो झोपड़े में आदिवासी के यहां रहो। पिछले दिनों जो मैं आदिवासी अंचलों में भटका हूं, वहां उनकी अनूठी और समावेशी जीवनशैली देखकर, कई बार अपने सुसंस्कृत होने पर भी शक होने लगता है। वहां अब भी मेहमान, पूरे फलिए, पूरे गांव का मेहमान होता है।वहां ऊंच नीच का भेद इस तरह से देखने को नहीं मिला जैसे हमारे कथित ‘सभ्य’ और ‘सुसंस्कृत’ समाज में दिखाई देता है। हमें यह कोशिश करनी चाहिए कि वे हमारी तरह की मुख्यधारा के नागरिक न बने। बल्कि हम उनसे सीखे। पर हम ऐसा होने थोडे़ ही देगे।
शिशु लोरी के शब्द नहीं संगीत समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
अभी वह अर्थ समझता है,
समझता है सबकी मुस्कान
सभी की अल्ले ले ले ले
तुम्हारे वेद, पुराण, कुरान,
अभी वह व्यर्थ समझता है
अभी वह अर्थ समझता है,
समझने में उसको,
तुम हो कितने असमर्थ,
समझता है
बाद में सीखेगा भाषा
उसी से है, जो है आशा। (नरेश सक्सेना)
मैं अभी संगीत समझने की अवस्था में ही हूं। लोरी फिर मुझमें संप्रेषित हो रही है।
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
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